Monday, April 16, 2018

ऐतिहासिक गुरुद्वारा – चुंगथांग, मतलब चंगा स्थान

अब लाचुंग से हमारा वापसी का सफर आरंभ हो चुका है। तीस्ता नदी के किनारे चुंगथांग एक छोटा खूबसूरत शहर है। यह शहर ऐतिहासिक गुरुद्वारा के लिए भी जाना जाता है। गंगटोक से चुंगथांग की दूरी 93 किलोमीटर से ज्यादा है। वहीं लांचुंग वैली से वापसी में यह 30 किलोमीटर के करीब है। चुंगथांग की ऊंचाई 5870 फीट ( 1790 मीटर) है। तीस्ता नदी के तट पर बसा चुंगथांग बड़ा ही मनोरम शहर है। चुंगथांग के पास लाचेन और लाचुंग नदियों का संगम भी है। दोनों नदियों के मिलन के बाद आगे इसे तीस्ता नाम मिलता है। यहां तीस्ता नदी पर बांध बनाकर विशाल जलाशय बनाया गया है। यहां पर हाईड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट भी है। चुंगथांग में भारतीय सेना का भी बहुत बड़ा केंद्र है।  
कहा जाता है कि बौद्ध धर्म गुरु आचार्य पद्मसंभव तिब्बत जाते समय सातवीं सदी में चुंगथांग में रुके थे। वहां उनके पांव के निशान आज भी बताया जाता है। वैसे चुंगथांग शब्द स्थानीय लेपचा भाषा से आया है। कहा जाता है कि आचार्य पद्मसंभव ने यहां एक भूखंड पर धान के कुछ दाने फेंक दिए थे। वहां धान उग आए। अब भी वहां उस क्षेत्र में धान उगता है। हालांकि हाई एल्टीट्यूड वाले इस क्षेत्र में और कहीं धान नहीं होता।  
चुंगथांग में तीस्ता नदी के तट पर है ऐतिहासिक गुरुद्वारा नानकलामा साहिब। इस गुरुद्वारा का संबंध सिक्ख पंथ के पहले गुरु गुरुनानक देव जी से है। कहा जाता है कि गुरुनानक देव जी अपनी तिब्बत की उदासी (यात्रा) के क्रम में चुंगथांग में रुके थे। कहा जाता है कि चुंगथांग शब्द पंजाबी से आया है। यह पंजाबी में चंगा स्थान है। यह गुरु जी द्वारा दिया गया नाम है। गुरुनानक देव जी अपनी तीसरी उदासी के क्रम में यहां पहुंचे थे।
कहा जाता है कि गुरुनानक देव जी अपनी छड़ी यहां पर गड्ढा करके लगा दी थी जिसने बाद में यहां एक विशाल पेड़ का रुप ले लिया। गुरुनानक देव जी यहां 1516 ईस्वी में आए थे। बाद में इसी मार्ग से वे कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए। इस दौरान कई लामा समुदाय के लोग उनके अनुयायी बन गए थे। गुरुनानक देव जी से जुड़ी कुछ स्मृतियां यहां लाचेन गुंफा में रखी गई हैं। उनका इस्तेमाल किया हुआ जल पात्र (कमंडल) यहां रखा गया है।   
चुंगथांग गुरुद्वारा में गुरुजी की छड़ी से रोपा गया पौधा जो अब वृक्ष बन चुका है देखा जा सकता है। इसके अलावा गुरु जी द्वारा लगाया गया धान का छोटा सा खेत भी देख सकते हैं। यहां गुरुजी द्वारा स्थापित एक अमृतकुंड के भी दर्शन किए जा सकते हैं।
वर्तमान में जो यहां गुरुद्वारा है उसका निर्माण असम राइफल्स और भारतीय सेना ने स्थानीय लेपचा जन जाति के लोगों के सहयोग से बनवाया है। साल 2005 से पहले चीन और भूटान की सीमा से काफी करीब होने के कारण इस क्षेत्र में सैलानियों की आवाजाही निषिद्ध थी। 2005 में इस गुरुद्वारा को आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। गुरुद्वारा के अंदर विशाल निशान साहिब ( ध्वज) की स्थापना की गई है।
चुंगथांग से आप 17800 फीट की ऊंचाई पर गुरुडंगमार लेक देखने भी जा सकते हैं। इसके लिए आपको एक दिन का समय और निकालना पड़ेगा। यह देश की सबसे ऊंची और दुनिया की सबसे ऊंची झीलों में से एक है। दुनिया भर में फैले सिक्ख पंथ के लोगों में चुंगथांग गुरुद्वारे के प्रति काफी सम्मान है। सिक्ख समाज के लोग यहां पहुंचकर खुद को धन्य समझते हैं।
तीस्ता नदी के पुल से चुंगथांग गुरुद्वारा का बड़ा सुंदर नजारा दिखाई देता है। वापसी में हमलोग एक बार फिर शाम को रंगरंग के चिराग ढाबा पर रुके। जाते समय यहीं दोपहर का भोजन किया था। गंगटोक पहुंचते हुए रात के आठ बज गए हैं। एक बार फिर हमलोग एमजी रोड पर हैं। अच्छी भूख लगी है तो हमलोग भरपेट खाने के लिए मारवाड़ी भोजनालय का रुख करते हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

GANGTOK TO CHUNGTHANG, GURUDWARA, GURU NANAK DEV  )

2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन एयर मार्शल अर्जन सिंह जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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