Sunday, August 6, 2017

उनवास यानी देहाती दुनिया के कलमकार का गांव

बिहार के बक्सर जिले का उनवास गांव। गांव का नाम हर साहित्य प्रेमी ने सुन रखा होगा। यह हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय का गांव है। देहाती दुनिया के लेखक का गांव। मुंडमाल और कहानी का प्लाट जैसी कालजयी कृतियों के लेखकर का गांव। पर बक्सर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद आपको यह याद दिलाने के लिए कोई सूचना या मूर्ति आदि नहीं लगाई गई है जो ये जानकारी देती हो कि आचार्य शिवपूजन सहाय का गांव यहां से 18 किलोमीटर दूर है। इस तरह का काम झांसी रेलवे स्टेशन पर किया गया है, जहां मैथिली शरण गुप्त, आचार्य महावीर प्रसाद दि्वेदी और वृंदावन लाल वर्मा की प्रतिमाएं लगाई हैं और उनका संक्षिप्त जीवन परिचय लिखा गया है। बक्सर के साहित्य प्रेमियों और प्रशासन को इस तरह की पहल करनी चाहिए।

उनवास गांव में आचार्य शिवपूजन सहाय का पुश्तैनी घर अब भी देखा जा सकता है। 9 अगस्त 1893 को आचार्य जी का यहीं जन्म हुआ था। 21 जनवरी 1963 को 70 साल की उम्र में पटना में मृत्यु होने तक वे गांव में आते जाते रहे। पर अब उनके बेटे इस गांव में नहीं रहते। शिवपूजन सहाय ने लखनऊ में मुंशी प्रेमचंद के साथ काम किया और उनकी कई कहानियों का संपादन भी किया। वे एक कथाकार, उपन्यासकार, संपादक होने के साथ महान मानवतावादी व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने वाराणसी में जयशंकर प्रसाद के साथ कोलकाता में मुंशीनवजादिक लाल श्रीवास्तव समेत कई महान साहित्यकारों के साथ भी काम किया। पर चाहे जहां भी रहे गांव से उनका रिश्ता बना रहा। उनकी उपलब्धियों के लिए 1960 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। पर उनके गांव में उनकी स्मृतियों की बेकद्री हो रही है। अगर आप साहित्य प्रेमी हैं तो एक महान साहित्यकार की धरोहर के दर्शन करना आपके लिए किसी मंदिर में देव दर्शन सदृश्य ही प्रतीत होगा।
गांव में उन्होंने अपने घर में अपने माता पिता के नाम पर पुस्तकालय और वाचनालय का निर्माण कराया। वह भवन आज खंडहर हो रहा है। पर उसपर लगी संगमरर की पट्टिका अपना इतिहास बता रही है। वागेश्वरी पुस्तकालय, पिता वागेश्वरी सहाय के नाम पर, और राजकुमारी वाचनालय, माता राजकुमारी देवी के नाम पर। श्रीरामनवमी – विक्रम संवत 1978  मतलब साल हुआ 1921 ईश्वी। पर अब रखरखाव के अभाव में इस मजबूत इमारत की दीवारें अब गिरने लगी हैं। दरवाजे खिड़कियां भी टूट रहे हैं। अंदर शायद अब किताबें नहीं हों।
आचार्य जी की कुरसी
पर मुझे सहाय परिवार में आचार्य शिवपूजन सहाय की एक अनमोल विरासत नजर आती है। वागेश्वरी सहाय के तीन बेटे थे। आचार्य शिवपूजन सहाय के अलावा दो भाइयों का परिवार के कुछ लोग अभी भी गांव में रहते हैं। इनमें से एक राजेश रंजन सहाय का घर आचार्य शिवपूजन सहाय के पुश्तैनी घर से लगा हुआ है। उनके पास मुझे वह विशाल आराम कुर्सी दिखाई देती है जिसपर बैठकर आचार्य शिवपूजन सहाय साहित्य सृजन किया करते थे। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूं। आचार्य जी के न जाने कितने ग्रंथों के सृजन की ये कुरसी गवाह होगी।

गांव में लगी मूर्ति की भी बेकद्री  
भले ही पूरे बिहार में और बाहर लोग उनवास को आचार्य शिवपूजन सहाय के गांव के रुप में जानते हों पर गांव में उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर कोई आयोजन नहीं होता। गांव में उनकी एक मूर्ति लगी है पर वग शिवाला की जमीन पर है। वहां कोई फूल चढ़ाने नहीं जाता। मूर्ति चश्मा भी गायब हो चुका है। गांव के लोगों से पता चलता है आचार्य जी के परिवार के लोग पढ़े लिखे और उच्च पदों पर हैं, पर उनमें कोई गांव में उनकी स्मृतियों को संभाल कर रखने की सुध नहीं ले रहा। हलांकि उनवास गांव बक्सर से धनसोई जाने वाली मुख्य सड़क पर एक विकसित गांव है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( ACHARYA SHIVPUJAN SAHAY, UNWAS, BUXAR ) 

उनवास में बुरे हाल में महान साहित्यकार का घर। कभी था ये विद्या का मंदिर। 


1 comment:

  1. पुस्तकालय,मूर्ती की जर्जर हालत के विषय में जानकर दुःख हुआ। इनकी कद्र वही समझ सकता है जिसकी साहित्य में रुचि हो।

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