Thursday, June 29, 2017

एक पत्थर से बनी दुनिया की विशालतम मूर्ति – बाहुबली

कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की विशाल प्रतिमा भारत के अदभुत स्मारकों में शुमार है। श्रवणबेलगोला में मुख्य आकर्षण का केंद्र बाहुबली की विशाल प्रतिमा है। धार्मिक रूप से यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जैनियों का मानना है कि मोक्ष  (जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा) की प्राप्ति सर्वप्रथम बाहुबली को हुई थी। आदिपुराण के अनुसार बाहुबली इस युग के प्रथम कामदेव थे।
गोमतेश्वर की यह बाहुबली की प्रतिमा दसवीं शताब्दी की है। पर यह आज भी जिस शान से पर्वत शिखर पर विराजमान है, वह दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और सैलानियों को चकित करती है। श्रवणबेलगोला में स्थापित गोमतेश्वर की प्रतिमा के लिए यह मान्यता है कि इस मूर्ति में शक्ति,  साधुत्व, बल तथा उदारवादी भावनाओं का अद्भुत प्रदर्शन होता है। यह मूर्ति मध्यकालीन कर्नाटक की शिल्पकला की सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह पूरे विश्व में एक पत्थर से निर्मित (एकाश्म) सबसे विशालकाय मूर्ति है।

कौन थे बाहुबली - आखिर कौन थे बाहुबली। बाहुबली जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर  ऋषभदेव के पुत्र थे  अपने बड़े भाई  भरत  चक्रवर्ती से युद्ध के बाद वह जैन मुनि बन गए। उन्होंने एक साल तक कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यान किया। जिसके पश्चात् उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई इसके बाद वे केवली कहलाए।


जैन ग्रंथों के अनुसार जब ऋषभदेव ने संन्यास लेने का निश्चय किया तब उन्होंने अपना राज्य अपने सौ पुत्रों में बांट दिया। भरत अयोध्या में और बाहुबली पौदनपुर में शासन करने लगे। बाद में भरत चक्रवर्ती जब छह खंड जीत कर अयोध्या लौटे तब उनका चक्र-रत्न नगरी के द्वार पर रुक गया। इसका कारण उन्होंने पुरोहित से पूछा। पुरोहित ने बताया की अभी आपके भाइयों ने आपकी आधीनता नहीं स्वीकारी है। भरत चक्रवर्ती ने अपने सभी 99 भाइयों के यहां दूत भेजे। 98 भाइयों ने जिन दीक्षा ले ली और जैन मुनि  बन गए। पर बाहुबली के यहां जब दूत ने भरत चक्रवर्ती का अधीनता स्वीकारने का सन्देश सुनाया तब बाहुबली को क्रोध आ गया। उन्होंने भरत चक्रवर्ती के दूत को कहा की भरत का भाई रुप में आदर करता हूं पर राजा के तौर पर अधीनता नहीं स्वीकार करूंगा, उनसे कहो युद्ध के लिए तैयार हो जाएं।
और वैरागी बने बाहुबली- दोनों के मध्य सैन्य-युद्ध नहीं हो इसके लिए मंत्रियों ने तीन प्रकार के युद्ध सुझाए जो शस्त्र रहित अहिंसक युद्ध हो। वह युद्ध थे- दृष्टि युद्ध, जल-युद्ध और मल-युद्ध। बाहुबली ने तीनों युद्धों में भरत को पराजित कर डाला। पर हारे हुए चक्रवर्ती भाई को देखकर बाहुबली के मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हो गया। बाहुबली राजकाज से विरक्त होकर मुनि की दीक्षा लेकर तप करने लगे।


दसवीं सदी में बनी प्रतिमा -  श्रवणबेलगोला में बाहुबली की प्रतिमा का निर्माण 983 ईश्वी में गंग सम्राज्य के राजा राजमल के एक सेनापति चामुण्डाराय द्वारा करवाया गया। उन्होंने अपनी मां कल्लाला देवी की इच्छा से मूर्ति का निर्माण कराया। इस मूर्ति को सफेद ग्रेनाइट के एक ही पत्थर से काटकर बनाया गया है। मूर्ति एक कमल पर खड़ी हुई है। यह जांघों तक बिना किसी समर्थन के खड़ी है। मूर्ति की लंबाई 60 फीट (18 मीटर) है। इसके चेहरे का माप 6.5 फीट (2.0 मी.) है। जैन परंपरा के अनुरूप यह मूर्ति पूर्णतया दिगंबर अवस्था में है। विंध्यगिरी पर्वत पर स्थित यह मूर्ति 30 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देती है।


चामुंडराय ने महाशिल्पी को बुलाकर इस मूर्ति का निर्माण कराया। इसके अभिषेक के दौरान 1008 कलश दूध, गन्ने का रस, दूध चंदन आदि से अभिषेक किया गया। फिर भी अभिषेक पूर्ण नहीं हुआ। जब गुल्लिका अज्जी (दादी) ने अपनी छोटी से लुटिया से दुग्धाभिषेक किया तो अभिषेक पूर्ण हुआ।

गोमतेश्वर भी एक नाम - बाहुबली की मूर्ति के चेहरे के निर्मल भाव दिखाई देता है। उनकी घुंघराली आकर्षक जटाएं, आनुपातिक शारीरिक रचना, विशालकाय आकार और कलात्मकता शिल्पकला के बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। बाहुबली का एक नाम गोमतेश्वर भी है। दरअसल चामुंडराय को उनकी मां बचमन में गोम्मद कहकर बुलाती थीं। तो गोम्मद के ईश्वर गोमतेश्वर हुए।


हर 12 साल पर महामस्तकाभिषेक - श्रवणबेलगोला में हर 12 साल पर श्रद्धालु यहां महामस्तकाभिषेक के लिए जुटते हैं. इस मूर्ति को केसर, घी, दूध, दही, सोने के सिक्कों तथा कई अन्य वस्तुओं से नहलाया जाता है।  उस समय शहर में बहुत बड़ा मेला लगता है। इस मौके पर देश दुनिया से लाखों जैन श्रद्धालु यहां जुटते हैं। श्रवणबेलगोला प्राचीनकाल में यह स्थान जैन धर्म का महान केन्द्र था। जैन अनुश्रुतियों के मुताबिक मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने राज्य का परित्याग कर अंतिम दिन मैसूर के श्रवणबेलगोला में व्यतीत किया था।  

- -      विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
(BAHUBALI, SHARVANBELGOLA, GOMATESHWARA, JAIN TIRTH ) 


Tuesday, June 27, 2017

बेंगलुरू से श्रवणबेलगोला, बाहुबली के पास

इस बार बेंगलुरु आया हूं तो श्रवणबेलगोला जाने की इच्छा है। एक दिन सुबह निकल पड़ता हूं इस महान जैन तीर्थ के लिए। हालांकि मार्च 2017 के आखिरी दिनों में भारतीय रेलवे ने श्रवणबेलगोला के लिए एक नियमित ट्रेन का संचालन भी शुरू कर दिया है। इंटरसिटी एक्सप्रेस 22679 शाम को 6.15 बजे चलती है हासन के लिए। ट्रेन 133 किलोमीटर का सफर करके श्रवणबेलगोला 8.10 बजे पहुंचती है। पर सुबह जाकर शाम को बेंगुलुरू लौटने के लिहाज से इस ट्रेन का समय मुझे मुफीद नहीं बैठ रहा है। वैसे यशवंतपुर से सुबह सात बजे कारवार एक्सप्रेस है श्रवणबेलगोला जाती है। यह ट्रेन सुबह साढ़े दस बजे हासन पहुंचा देती है। इस रेलवे स्टेशन का स्टेशन कोड एसबीजीए (एसबीजीए) है। मैंने बस से सफर करने का तय किया है।
श्रवणबेलगोला के लिए पैकेज भी - कर्नाटक स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कारपोरेशन श्रवणबेलगोला,बेलुर और हेलेबीडू का एक दिन का टूर पैकेज भी संचालित करता है। इसके लिए बस सुबह 6.30 बजे बेंगलुरु के बादामी हाउस से संचालित होती है। अगर आप बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन के आसपास रहते हैं तो इस पैकेज को ले सकते हैं। ये पैकेज 800 रुपये का नॉन एसी बस से और 950 रुपये का वोल्वो बस से हैं। ये टूर पैकेज आप कर्नाटक पर्यटन के बादामी हाउस दफ्तर से प्राप्त कर सकते हैं। यह बेंगलुरु रेलवे स्टेशन के पास ही स्थित है। आराम से यात्रा करने वालों के लिए पैकेज बेहतर है। 
हिरीसावे से भी मुड़कर जा सकते हैं श्रवणबेलगोला 

बेंगलुरु से श्रवणबेलगोला की दूरी वाया चेनेरायपटना 157 किलोमीटर है। मेजेस्टिक बस स्टैंड से कुछ बसें सीधी भी वहां तक जाती हैं। पर आप जल्दी जाना चाहते हैं तो अच्छा विकल्प है किसी भी हासन की ओर जाने वाली बस में बैठे और चेनेरायपटना उतरकर वहां से श्रवणबेलगोला की दूसरी बस लें। चेनेरायपटना से श्रवणबेलगोला 11 किलोमीटर है।

मैं सुबह नौ बजे के आसपास बेंगलुरु सिटी के सामने मैजेस्टिक बस स्टैंड पर पहुंच गया हूं। सुबह का नास्ता नहीं किया है। हालांकि मैजेस्टिक बस स्टैंड परिसर में नास्ते और भोजन के लिए अच्छे कैफेटेरिया हैं पर मैं नास्ते का विचार छोड़कर पहले हासन जाने वाली बस की तलाश करता हूं। बस नौ बजे चल पड़ती है। बेंगलुरु शहर के भीड़भाड़ वाले रास्तों को पार करती हुई बस यशवंतपुर का इलाका पार करती है। बस में ज्यादा भीड़ नहीं है। कुछ सवारियां रास्ते में चढ़ती हैं। बस यशवंतपुर के बार बेंगलुरू के बाहरी इलाके पेन्नेमा में दाहिनी तरफ नए बने बसेसवरा बस स्टैंड में जाकर कुछ मिनट रुकती है।
चेनेरायपटना और श्रवणबेलगोला के बीच विशाल सरोवर 

यह बस स्टैंड काफी विशाल और शानदार बना है। उत्तर भारत के राज्यों को ऐसे बस स्टैंड देखकर सीख लेनी चाहिए। बस एनएच 75 पर सरपट भाग रही है। सड़क काफी अच्छी बनी है। यह बेंगलुरू मेंगलुरू हाईवे  है। रास्ते कुणिगल नामक एक तहसील स्तर का शहर आता है। यहां पर बस नेशनल हाईवे छोड़कर शहर के अंदर बने बस स्टैंड में जाती है। मैं यहां खीरा खाता हूं। कुणिगल तुमकुर जिले में आता है। रास्ते में बस ढाबे में रुकी। यहां पर राइस भात की थाली 40 रुपये की है। मैं यहां पर नास्ते या भोजन जो समझ लिजिए ये मिनी थाली खाता हूं। खाना स्वादिष्ट है। उत्तर भारत के हाईवे ढाबों की तरह कोई ठगी नहीं है। सभी वस्तुओं की दरें लिखी हुई हैं। सबसे बड़ी बात की दरें वाजिब भी हैं।

चेनेराय पटना में बस से मैं उतर जाता हूं। ये बस हासन तक जा रही है। चेनेरायपटना हासन से 35 किलोमीटर पहले है। चेनेरायपटना बस स्टैंड के अंदर से ही श्रवणबेलगोला जाने वाली लोकल बस मिली। यह सरकारी बस  है जेएनआरयूएम योजना के तहत चलने वाली। कुल 11 किलोमीटर की दूरी का किराया 15 रुपये है।

श्रवणबेलगोला के रास्ते में एक विशाल सरोवर आता है। इस सरोवर में मछलियां खूब हैं। सरोवर के किनारे ताजी मछलियों की दुकान सजी है। सड़क के दोनों तरफ हरियाली भी खूब है। हम पहुंच गए हैं श्रवणबेलगोला के बस स्टैंड में। वैसे आप अपने वाहन से बेंगलुरु से आ रहे हैं तो आपको चेनेरायपटना तक आने की जरूरत नहीं है। फिर आप चेनेरायपटना से पहले हिरीसावे से ही श्रवणबेलगोला के लिए मुड़ जाएं।  

कुल 616 सीढ़ियों की चढ़ाई - श्रवणबेलगोला के बस स्टैंड से 500 मीटर चलने आगे चलने के बाद विंध्यगिरी पर्वत पर स्थित बाहुबली की प्रतिमा तक जाने के लिए चढ़ाई शुरू होती है। कुल 616 सीढ़ियां चढ़नी है नंगे पांव। सीधी चढ़ाई है। धूप तेज है। पत्थर गर्म हो गए होंगे। तो चप्पल स्टैंड वाले सलाह देते हैं कि बगलवाली दुकान से सूती मोजे खरीद लिजिए। मैं 50 रुपये जोड़ी का एक एंकल कट वाला मोजा खरीद लेता हूं। 
बाहुबली की प्रतिमा तक जाने के लिए विंध्यगिरी पर्वत के नीचे बना प्रवेश द्वार...


प्रवेश द्वार पर चप्पल स्टैंड, क्लाक रूम आदि का इंतजाम है। स्वागत कक्ष में पुस्तकों की एक दुकान है। जैन श्रद्धालुओं के लिए पालकी का भी इंतजाम है। यहां पर पालकी सेवा की दरें लिखी हुई हैं। हालांकि आज पालकी सेवा बंद है।
बाहुबली के दर्शन की आस में कड़ी धूप में सैकड़ो लोग चढ़ाई कर रहे हैं। मैं भी उनका सहयात्री बन जाता हूं। कुछ लोग अपने नन्हें बच्चों को कंधे पर रखकर भी चढ़ाई कर रहे हैं। पर्वतशिखर को काटकर सीढियां बनाई गई हैं। सहारे के लिए लोहे की रेलिंग भी है। बीच में थकने पर सुस्ताने के लिए दो विश्राम स्थल भी बने हैं। पर मुझे विश्राम की इच्छा नहीं। लगता है बाहुबली अपनी ओर लगातार खींच रहे हैं।  
- vidyutp@gmail.com  
( BAHUBALI, SHARVANBELGOLA, GOMATESHWARA, JAIN TIRTH ) 

Sunday, June 25, 2017

गिर गाय...स्नेह और प्रेम की भूखी

छोटी छोटी गइया छोटे छोटे ग्वाल छोटो सो मेरो नंद गोपाल...ये भजन तो आपने सुना ही होगा। गिर नस्ल की गाय को देखकर यही गीत गुनगुनाने की इच्छा होती है। गुजरात की गिर नस्ल की गाय कद काठी में छोटी होती है। पर यह प्रेम और स्नेह की भूखी होती है। आप इसके साथ खड़े होकर कितना भी प्यार और दुलार करें यह आपसे दूर नहीं जाएगी। ऐसा लगता है मानो हमारा इसका कोई जन्म जन्म का रिश्ता हो। बेंगलुरु के कनकपुरा रोड स्थित आर्ट ऑफ लिविंग की गौशाला में 400 से ज्यादा गिर नस्ल की गाय हैं। आश्रम के भोजनालय में इन्ही गायों के दूध से बने खीर, छाछ आदि श्रद्धालुओं को परोसे जाते हैं। इन गायों से मिलने वाला सारा दूध आश्रम में ही खर्च किया जाता है। दूध की बाहर बिक्री नहीं की जाती है।

गुजरात में पायी जाती है गिर गाय- बात गिर गाय की करें तो यह बहुतायत तौर पर गुजरात में पाई जाती है। मूल निवास गुजरात का गिर वन होने के कारण ही इन्हे गिर गाय कहा जाता है। कहा जाता है कि यह वही गाय है जिसे कान्हा जी चराया करते थे। कान्हा जी और बलराम इन गायों के साथ दिन भर जंगल में गुजार देते थे, पर गिर गाय का ममत्व देखकर लगता है कि दिन का इनके साथ पूरा जीवन गुजारा जा सकता है।
आमतौर पर यह गुजरात राज्य के गिर वन क्षेत्र और महाराष्ट्र और राजस्थान के आसपास के जिलों में पायी जाती है। यह गाय अच्छी नस्ल की मानी जाती है। आमतौर पर इस गाय के शरीर का रंग सफेद, गहरे लाल या चॉकलेट भूरे रंग के धब्बे के साथ या कभी कभी चमकदार लाल रंग में पाया जाता है। 
गिर गाय अपनी बेहतरीन रोग प्रतिरोध क्षमता के लिए जानी जाती है। यह नियमित रूप से बछड़े देती है। पहली बार यह तीन साल की उम्र में बछड़ा देती है। गिर गायों में थन भी अच्छी तरह विकसित होते हैं। देखने में छोटी लगने वाली यह गाय प्रतिदिन 12 लीटर से अधिक दूध देती है। कुछ लोग दावा करते हैं कि 40 से 60 लीटर दूध देने वाली गाय है। पर यह सही नहीं है।
महज 5000 बची हैं गिर गाय - यह भी कहा जा रहा है कि भारत में अब गिर गाय सिर्फ पांच हजार ही बची हैं। भले ही गिर का मूल निवास दक्षिण काठिवाड़ के इलाके में है, पर गिर गाय हर मौसम के लिए अनुकूलित होती है। यह गर्म इलाकों में भी आसानी से रह सकती है। हालांकि गिर गाय के बछड़े अच्छे बैल नहीं होते। यह मूल रुप से दूध देने वाली गाय है। एक गिर गाय की औसत कीमत 60 हजार रुपये से आरंभ होती है। यह कई बार लाखों में भी चली जाती है। 

गिर गाय के मूत्र में सोना - हाल ही में जूनागढ़ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (जेएयू) के वैज्ञानिकों ने अपने विश्लेषण के बाद पाया कि गाय के मूत्र में सोने के कण होते हैं। ये प्रयोग गिर की गायों पर किया गया था।  गुजरात के जूनागढ़ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने गिर की 400  गांवों के मूत्र के विश्लेषण के बाद पाया कि उसमें सोने के अंश हैं। गाय के एक लीटर मूत्र में तीन मिलीग्राम से लेकर दस मिली ग्राम तक सोने के कण पाए गए। ये सोना आयोनिक रूप में मिला, जोकि पानी में घुलनशील गोल्ड साल्ट है। वैज्ञानिकों का दावा है कि गाय के मूत्र में पाए जाने वाले सोने को निकाला जा सकता है और केमिकल प्रक्रिया से उसे ठोस बनाया जा सकता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( GIR COW, ART OF LIVING, KANAKPURA ROAD ) 




Friday, June 23, 2017

युगादि का दिन श्री श्री के नाम

बेंगलुरु के कनकपुरा रोड पर है आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी का आश्रम। इस बार के बेंगलुरु यात्रा में हमारी इच्छा श्री श्री के आश्रम में जाने की थी। तो संयोग ऐसा बना कि हिंदू नववर्ष यानी युगादि हमने यहां मनाया। बेंगलुरु पहुंचने पर हम उत्तरहाली के पास गुबलाला में रुके थे। यहां हमें पता चला की श्री श्री रविशंकर जी का आश्रम कनकपुरा रोड में निकट ही स्थित है। तो हमने अपने पत्रकार मित्र स्वंय प्रकाश से बात की। स्वयं प्रकाश भाई ने श्री श्री रविशंकर की हिंदी में जीवनी जीना सीखा दिया लिखी है। हिंदी में श्री श्री के जीवन परिचय पर ही बेहतरीन पुस्तक है। इसे आप देश भर के बुक स्टाल पर बिकते हुए देख सकते हैं। 


हमने स्वंय भाई को बताया कि हमलोग आर्ट ऑफ लिविंग का आश्रम देखना चाहते हैं। उन्होंने तुरंत हमारी बात सुजीत भाई से कराई। पर सुजीत भाई यूपी में कहीं दौरे पर थे। उन्होंने श्री श्री के आश्रम में मीडिया सेल में कार्यरत श्रीकुमार जी से बात कराई। उन्होंने तारीख और कितने लोग आएंगे आदि पूछा। तय कार्यक्रम के अनुसार 29 मार्च को युगादि के दिन हमलोग कनकपुरा रोड स्थित आर्ट ऑफ लिविंग के आश्रम के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। यह शहर के बाहर सुरम्य वातावरण में स्थित है। अंदर स्वागत कक्ष पर पहुंचने के बाद श्रीकुमार जी ने आश्रम की वैन सेवा से रसोई घर के पास आने को कहा। रसोई घर के प्रवेश द्वार पर युवा श्रीकुमार जी मुलाकात हुई।

हमलोग सीधे भोजन कक्ष की ओर चले। विशाल हाल में कुर्सी टेबल पर बड़ी संख्या में भक्तगण भोजन कर रहे थे। पर श्री कुमार जी हमारे पूरे परिवार को विशिष्ट अतिथि कक्ष में ले गए। दोनों कक्ष का खाना एक समान ही है। आज युगादि होने के कारण खाने मे मिष्ठान खीर आदि भी था। खाना अत्यंत सुस्वादु था।यह भी पता चला कि आश्रम को भोजन में जो दही और छाछ इस्तेमाल होता है वह आश्रम की ही गायों का होता है।

भोजन के बाद हमलोग आश्रम के अलग अलग हिस्सों में घूमने निकले। सबसे पहले संस्कृत विद्यालय और वहां स्थित मंदिर थे। यहां बालकों के लिए कई सालों का लंबा संस्कृत का पाठ्यक्रम चलाया जाता है। शिक्षा में पारंगत बटुक वेद की ऋचाओं का अत्यंत शुद्धता से उच्चारण करते हैं।

इसके बाद हमने आश्रम का सरोवर कृषि क्षेत्र देखा। आश्रम के परिसर में विशाल पंचकर्म केंद्र है। यहां पर शुल्क देकर पंचकर्म कराया जा सकता है। केंद्र का वातावरण अत्यंत मनोरम है। यह आपको केरल के वन प्रदेश में ले जाता है। नारियल के विशाल वृक्षों पर बंदरों खूब हैं। वे नारियल तोड़कर नीचे फेंक देते हैं। तो थोड़ा उनसे सावधान रहने की सलाह गी गई हमें। पर हमने बंदरों द्वारा फेकें गए नारियल को प्रसाद समझकर उठा लिया। इसके बाद हमलोग आश्रम की ओर से संचालित आयुर्वेदिक हास्पीटल और मेडिकल कालेज देखने गए।
कालेज से लौटने के बाद कुछ वक्त आश्रम के बिक्रय केंद्र में गुजारा। यहां श्री श्री के आश्रम के आयुर्वेदिक उत्पाद कपड़े आदि खरीदे जा सकते हैं। शाम गहराने लगी और हमलोग चल पड़े विशालाक्षी मंडपम की ओर। हर रोज शाम को इस विशाल मंडप में 6.30 से 8.00 बजे तक सत्संग होता है। आज युगादि है तो गुरुदेव लाइव थे दुनिया के किसी और देश से। आधे घंटे से ज्यादा ध्यान के बाद थोड़ा प्रवचन और काशी भाई ने भक्तों के लिए नववर्ष का संदेश दिया। यहां हमारी मुलाकात हिमांशु कालरा से हुई। वे आईआईटी दिल्ली से निकलने के बाद दस साल कारपोरेट जगत में रहे। अब श्री श्री के आश्रम में नदियों को पुनर्जीवित करने की परियोजना की अगुवाई कर रहे हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की 23 छोटी छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है आर्ट ऑफ लिविंग ने।

-   - विद्युत प्रकाश मौर्य   (ART OF LIVING, KANAKPURA ) 

Wednesday, June 21, 2017

हर साल गर्म होता जा रहा बेंगलुरु

31 मार्च 2017 का दिन है। अखबार में खबर है कि कई सालों में पहली पर मार्च का आखिरी दिन इतना गर्म रहा है। बेंगलुरु शहर का दिन का तापमान 33 डिग्री को पार कर गया है। कभी बाग बगीचों के शहर के नाम पर और सालों भर सुहाने मौसम के लिए प्रसिद्ध बेंगलुरु शहर का तापमान हर साल बढ़ रहा है। कहा जाता है कि देश के पांच प्रमुख महानगरों में रहने के लिहाज से बेंगलुरु सबसे बेहतर शहर है। यहां का मौसम सदाबहार रहता है। अपनी इससे पहले की दो बेंगलुरु यात्राओं में मैंने इसे महसूस भी किया था। पर इस बार निराशा हो रही है। शहर का ट्रैफिक और लगातार बढ़ रहे तापमान को देखकर जान निकल रही है। बेंगलुरु के मेरे एक स्थानीय मित्र कहते हैं कि हर साल औसतन शहर का तापमान एक डिग्री बढ़ रहा है। अगर यही हाल रहा तो कुछ सालों में यह शहर रहने के लिए बेहतरीन शहरों की सूची से बाहर हो जाएगा।

इतना ही नहीं अप्रैल 2017 में 16 तारीख को स्थानीय अखबारों में खबर है कि शहर का तापमान 36 डिग्री को पार कर गया है। डाक्टर सलाह दे रहे हैं कि दोपहर 11 बजे से तीन बजे तक हिट स्ट्रोक से बचने के लिए उपाय करके शहर में चलें। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।

अप्रैल की दोपहर में ही बेंगलुरु में इतनी गर्मी पड़ने लगी कि खुली छत पर जाकर आप धूप में अंडे फ्राई कर सकते हैं। कुछ लोगों ने तो ऐसा करके देखा भी। महज 20 मिनट अंडा फोड़ कर पैन में रख देने के बाद धूप में अंडा अपने आप आमलेट बन गया।

साल 2016 में भी अप्रैल में बेंगलुरु का तापमान अधिकतम 39.2 डिग्री सेल्सियस तक रिकार्ड किया गया था। यह एक बड़े खतरे का संकेत है।
यह सब कुछ क्यों हो रहा है...क्योंकि शहर कंक्रीट के जंगलों में तेजी से तब्दील होता जा रहा है। हरे भरे पेड़ खत्म होते जा रहे हैं। उनकी जगह लेती जा रही हैं बहुमंजिली इमारते हैं। शहर के तमाम इलाकों में तो 25 मंजिल से ज्यादा की इमारतें बन रही हैं। हमारे पड़ोस में जैन स्वदेश टावर है जिसमें 26 मंजिले हैं। इसके ऊपर हेलीपैड भी बना हुआ है। हमारे एक दोस्त बताते हैं कि उत्तरहाली और गुब्बलाला में तो हरियाली है। पास में एक हरित क्षेत्र सुरक्षित है अभी। शहर के बाकी हिस्सों का हाल और बुरा है। शहर के केआरपुरम (कृष्णराजपुरम) इलाके में तो हरे भरे पेड़ दिखाई भी नहीं देते। अब गर्मी में बढ़ते तापमान के कारण बेंगलुरु निवासियों के चेहरे पर चिंता की लकीरे दिखाई दे रही हैं। जल्द ही शहर से गार्डेन सिटी का तमगा छीन जाएगा और इसे कंक्रीट सिटी ही कहा जाएगा।

कुछ साल पहले लोग कहते थे कि बेंगलुरु में घर में एसी (एयरकंडिशनर)  लगाने की कोई जरूरत नहीं है। पर अब इस साल की गर्मी में एसी की बिक्री तेजी से हो रही है। लोगों का बिजली बिल भी बढ़ रहा है। अस्पताल में हिट स्ट्रोक के मरीज भी बढ़ रहे हैं। शहर के कई तालाबों का अस्तित्व खतरे में है। कब्बन पार्क और लालबाग जैसे और भी बगीचे शहर में तलाश करना मुश्किल है क्योंकि शहर चारों तरफ तेजी से विशाल अपार्टमेंट के साथ आगे बढ़ता जा रहा है।
- vidyutp@gmail.com
(BENGALURU, CLIMATE, HOTTER ) 






Monday, June 19, 2017

यादों में बसा हंपी, वापसी वाया होसपेटे

ऐतिहासिक शहर हंपी में भ्रमण की हमारी शुरुआत गणेश मंदिर से हुई थी , तो अंत भी गणेश मंदिर से हुआ। हमने जाते समय  कडलेकालु गणेश जी के दर्शन किए थे, तो अब वापसी में ससिवेकालु गणेश जी के दरबार में पहुंचे हैं। यह गणेश प्रतिमा 2.4 मीटर ऊंची है। अत्यंत कलात्मक गणेश प्रतिमा वर्गाकर मंडप में स्थापित है। गणेश जी को नमन।

इससे पहले हमलोग चंडिकेश्वर मंदिर में रुके थे। सोलहवीं सदी के बने चंडिकेश्वर मंदिर में भी हनुमान, गरुड, बालकृष्ण आदि की अदभुत मूर्तिकारी देखी जा सकती है। वैसे हंपी में कई मंदिर हैं अभी जो देखने से रह गए हैं।

लेकिन हंपी के बारे में समग्र तौर पर जानने के लिए आप कमलापुर में  स्थित हंपी संग्रहालय जरूर जाएं। संग्रहालय बड़ा ही व्यवस्थित है। अंदर पूरी तरह वातानुकूलित है। शीतल पेयजल और शौचालय आदि का सुंदर इंतजाम है।

संग्रहालय में हंपी का मानचित्र, हंपी के बारे में जानकारी के साथ ही अलग अलग गैलरी में हंपी और आसपास से मिली मूर्तियां देखी जा सकती हैं। यहां आप कम से कम एक घंटे का समय जरूर दें। कमलापुर में खाने पीने के विकल्प मौजूद हैं। यहां क्लार्क इन समेत कई अच्छे आवासीय होटल भी हैं। हंपी से इसकी दूरी कोई 5 किलोमीटर है।

दिन भर घूमने का बाद हमलोग वापस अपने लक्ष्मी हेरिटेज होम में आ गए हैं। आटो वाले स्वामी को धन्यवाद देकर उनसे विदा ली। अब अपने कमरे का एसी चलाकर हमलोग आराम करने लगे। पर भूख भी तो लगी थी, लेकिन किसी भी कमरे से निकल कर आसपास के रेस्टोरेंट में जाने की इच्छा नहीं थी। तो हमने तय किया कि गोपी रुफ टॉप रेस्टोरेंट से खाना यहीं लाकर खाया जाए।
मैंने जाकर गोपी में वेज बिरयानी का आर्डर दिया। उनकी कल की बिरयानी इतनी उम्दा थी कि कुछ और आजमाने की कोशिश नहीं की।
उन्होंने हमें थाली पैक करके ले जाने की सुविधा प्रदान कर दी। फिर हमने कमरे में बैठकर बिरयानी खाने का लुत्फ उठाया। फिर हम गोपी से चाय भी लेकर आए और काफी देर तक चुस्की ली। तो आप भी हंपी में हों तो गोपी में भोजन के लिए जरूर पहुंचे।

एक दिन पहले रात को अनादि की मसाला डोसा खाने की इच्छा हुई थी, गोपी में मसाला डोसा का विकल्प नहीं था, तो हमलोग पड़ोस के अर्चना रुफटॉप रेस्टोरेंट में खाने चले गए। पर खाने के बाद महसूस हुआ कि उनका खाना काफी घटिया था। भले ही वहां कई देशों के सैलानी स्वाद ले रहे थे, पर हमें उनका सब्जियां बासी, डोसा जला हुआ मिला। तो आप भी अर्चना में मत जाना कभी। हां गोपी की चाय, बिरयानी या कोई भी डिश हो सब ताजा और स्वाद उम्दा होता है। हर व्यंजन वे आर्डर पर बनाते हैं इसलिए थोड़ा वक्त लगता है।

हंपी में एटीएम नहीं  
हंपी के विरुपाक्ष मंदिर के पास के बाजार में एटीएम की कमी खटकती है। हालांकि कई जगह आप कार्ड से लेनदेन कर सकते हैं। साथ ही यहां दुकानदार कई देशों की मुद्रा का विनिमय कर देते हैं।

बेंगलुरु के लिए हमारी ट्रेन होसपेटे रेलवे स्टेशन से रात को 9.30 बजे है। हंपी बाजार से रात 8 बजे तक बसें होसपेटे बस स्टैंड के लिए चलती हैं। हमलोग 7.30 बजे वाली बस में सवार हो गए। बड़े भरे मन से महान ऐतिहासिक विरासत वाले शहर हंपी अलविदा कहा। यहां घूमने के लिए दो दिन तो कम ही हैं। कर्नाटक रोडवेज बस के ड्राइवर महोदय ने हमें होसपेटे बाजार में पहुंचने पर एक चौराहे पर उतर जाने की सलाह दी। यहां से रेलवे स्टेशन 400 मीटर की दूरी पर था। तो हम टहलते हुए स्टेशन पहुंच गए। 

होसपेटे रेलवे स्टेशन यहां के बस स्टैंड की तरह भव्य नहीं है। रात खाना हमलोगों ने स्टेशन की कैंटीन में ही खाया। 20 रुपये का मसाला डोसा और 25 रुपये की बिरयानी। साथ में नमकीन छाछ का पैकेट। भला आज के दौर में इतना सस्ता खाना और क्या हो सकता है। स्टेशन पर आरओ वाटर की मशीनें लग गई हैं। यहां आप 5 रुपये में एक लीटर पानी ले सकते हैं। प्लेटफार्म पर हमारी मुलाकात एक बार फिर जर्मनी की इवा और उनके दोस्त से होती है। उन्हें भी हंपी एक्सप्रेस पकड़नी है। वे मैसूर जा रहे हैं। पर वे हमारे साथ बस से नहीं आए। उन्होंने आटो बुक किया, और आटो वाले ने स्टेशन छोड़ने के 400 रुपये ले लिए। हमने उन्हें कहा अगर हमारे साथ बस से आते तो महज 36 रुपये ही लगते। 

हंपी एक्सप्रेस अपने नियत समय पर आई। हमने अपनी सीट पर जाकर जगह ले ली। मैं अगले कुछ घंटे जागता रहा। तोरांगालु जंक्शन के बाद बेल्लारी जंक्शन आया। बेल्लारी कर्नाटक का सीमांत जिला है। वही बेल्लारी जो खानों के लिए प्रसिद्ध है।
बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन यहां से आंध्र प्रदेश में प्रवेश कर जाती है। रास्ते में गुंतकल जंक्शन, अनंतपुर, धरमवरम जंक्शन, पेनुकोंडा, हिंदूपुर जैसे स्टेशन आते हैं। ये सभी आंध्र के अनंतपुर जिले में पड़ते हैं। हमारी ट्रेन दुबारा गौरी बिदानौर से कर्नाटक के चिकबालपुर जिले में प्रवेश करती है। इसके बाद डोडाबालपुर आता है जहां से बेंगलुरु की सीमा शुरू हो जाती है। हमारी ट्रेन नियत समय पर सुबह छह बजे क्रांतिवीर संगोल्ली रायणा (केएसआर बेंगलुरु) स्टेशन पर पहुंच जाती है।
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(HAMPI EXPRESS, RAIL, GOPI ROOFTOP RESTAURANT, HOSAPETE  ) 


     

Saturday, June 17, 2017

हंपी में हुआ करता था सुव्यवस्थित बाजार

सोलहवीं सदी में गुलजार नगर विजयनगर यानी हंपी में सुव्यस्थित मार्केटिंग कांप्लेक्स का निर्माण कराया गया था। इन बाजारों की रचना और उनकी वास्तुकला आज भी देखने वालों को चकित करती है। पूरे विजय नगर में एक नहीं कई बाजार हुआ करते थे। इन्हें सालू मंडप कहते थे। यह पत्थरों से निर्मित संरचना थी। पर ऐसे सुव्यवस्थित बाजार आज भी कम देखने को मिलते हैं। पहला प्रमुख बाजार विरुपाक्ष मंदिर के ठीक सामने था। मंदिर के दोनों तरफ हमें पत्थरों की बनी हुई बाजारों की संरचना दिखाई देती है। कहीं कहीं ये बाजार के भवन दो मंजिलों वाले भी हैं। इन बाजारों में एक लंबा गलियारा भी बना हुआ है। कदाचित यह बारिश के समय ग्राहकों को बचाव करता होगा। साथ ही धूप से भी बचाव होता होगा। दूसरा प्रमुख बाजार कृष्ण मंदिर के सामने कृष्णा बाजार है। तीसरा बाजार हजार राम मंदिर के सामने पान सुपारी बाजार है। तो चौथा बाजार विजय विट्ठल मंदिर के सामने का लंबा बाजार है। हर बाजार की अपनी अलग विशेषता हुआ करती थी।


हीरे जवाहरात बिकते थे विरुपाक्ष बाजार में- विरुपाक्ष मंदिर के सामने स्थित बाजार का नाम राजा बीधी ( राज वीथिका) हुआ करता था। यहां कुल 380 दुकानें बनाई गई थीं। इनका निर्माण 1422 ईश्वी में हुआ था। हर दुकान चार बड़े पत्थरों के स्तंभ और इनके उपर पत्थरों के छत से बनाई गई थी। इनमें बताया जाता है कि सोने चांदी और हीरे जवाहरात की तिजारत हुआ करती थी। यहां बड़े बड़े व्यापारी आया करते थे। विजय नगर सम्राज्य के व्यापारिक रिश्ते मालबार, गोवा और उत्तर भारत के राज्यों से मिलते हैं। वहीं कई विदेशी राज्यों व्यापारी और दूत भी विजयनगर आया करते थे। यहां पुर्तगाल और पश्चिम एशिया से मुस्लिम व्यापारियों के आने के प्रमाण मिलते हैं। यह बाजार हफ्ते में एक ही दिन खुलता था और यहां आम तौर पर हर चीज की खरीद बिक्री होती थी।

कृष्णा बाजार - कृष्णा मंदिर के ठीक सामने विशाल बाजार है। इस बाजार का नाम कृष्णा बाजार है। पत्थरों की स्थायी संरचना में कभी दुकानें लगती थीं। इस वीरान बाजार को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी जमाने में यहां कितनी रौनक रहा करती होगी। कहते हैं ना कि खंडहर बताता है कि इमारत कितनी बुलंद रही होगी। कृष्णा बाजार के ठीक बगल में एक विशाल सरोवर (पुष्करिणी) का भी निर्माण कराया गया था। नवंबर 2015 में भारी बारिश के कारण कृष्णा बाजार के मार्केटिंग कांप्लेक्स के कई हिस्से ध्वस्त हो गए।

पान सुपारी बाजार - कृष्णा बाजार की तरह का ही बाजार हमें देखने को हजार राम मंदिर के बाहर, जिसका नाम पान सुपारी बाजार था। जैसा कि नाम से जाहिर होता है कि यहां पान सुपारी जरूरत बिकता होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि यह हरी भरी सब्जियों का भी बाजार रहा होगा। यह बाजार शाही अहाता के काफी करीब है। इसलिए यहां शाही जरूरतों के अनुरुप चीजें बिकती होंगी।

घोड़ों के लिए मशहूर था विट्ठल बाजार -  विजय विट्ठल मंदिर के बाहर का बना मार्केटिंग कांप्लेक्स सबसे विशाल है। इस बाजार की लंबाई 945 मीटर है। यानी तकरीबन एक किलोमीटर। वहीं बाजार की चौड़ाई  40 मीटर है। हालांकि इस सुंदर बाजार के अब सिर्फ अवशेष देखे जा सकते हैं। पर विजय नगर सम्राज्य के समय यह विट्ठल बाजार घोड़ों की खरीद बिक्री के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध था। कई दूसरे प्रांतों के व्यापारी यहां अपने घोड़े लेकर बिक्री के लिए आते थे।

सालों अवैध कब्जे का शिकार रहा बाजार - हमारी बातचीत गोपी में रसोइया का काम करने वाली महिला से हुई। उन्होंने बताया कि पांच साल पहले तक हंपी के मंदिर के पास जो ऐतिहासिक बाजार बने हैं उन पर अवैध कब्जा था। इसमें दुकानें लगी थीं और दुकानदारों का पूरा परिवार भी इसी में रहता था। कई लोगों ने तो पीछे अस्थायी शौचालय आदि भी बनवा लिए थे। यहां तक की विरुपाक्ष मंदिर के दक्षिणी हिस्से में स्थित छोटे बाजार के ऐतिहासिक भवन और कुछ मंदिरों के प्रांगण में भी लोगों ने कब्जा करके आवास बना लिए थे। पर एक रात बुल्डोजर चलाकर इन सभी कब्जों को हटा दिया गया। यहां सालों से कब्जा जमाए लोगों को हंपी से पांच किलोमीटर दूर पुनर्वासित किया गया। उन्हें घर बनाने के लिए धनराशि भी मुहैय्या कराई गई।



पर हंपी में साल 2016 में भी दर्जनों रिजार्ट और रेस्टोरेंट अवैध तरीके से इमारतें बनाकर संचालित किए जा रहे थे। जिनको हटाने का आदेश कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ बेंच ने दिया था।
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( HAMPI SAALU MANTAPA, MARKET COMPLEX ) 



Thursday, June 15, 2017

अनूठी जल प्रणाली से लैस हंपी का शाही अहाता

हंपी में हम अब महानवमी टिब्बा पहुंच गए हैं। यह वास्तव में विशाल राज प्रांगण है। इसके प्लेटफार्म की ऊंचाई 8 मीटर है। राजकीय प्रयोग में लाया जाना वाले ग्रेनाइट पत्थरों से बना यह विशाल ढांचा है। इसमें जाने के लिए पूर्व –पश्चिम और दक्षिण दिशा से से सीढ़ियां बनी हैं। यहां पर नवमी और विजयादशमी के दिन बड़े राजकीय आयोजन हुआ करते थे। इसके अंदर एक सुंरग भी है। इससे लगा हुआ एक शाही अहाता भी है। इसका क्षेत्रफल 59,000 वर्ग मीटर है। ऊंची और दोहरी दीवारों के अंदर इस अहाते में कुल 43 इमारतें हुआ करती थीं। अहाते में जाने के लिए तीन प्रवेश द्वार बने हैं। इसी अहाते में राजा का निवास भी हुआ करता था। इस अहाते में पानी पहुंचाने के लिए सुंदर जल प्रणाली निर्मित की गई थी। इसमें कुल 23 छोटे बड़े हौज थे जिन्हें भरा जाता था।था। संभवतः इसमें तुंगभद्रा नदी से जल लाने का इंतजाम किया गया था। अहाते में एक कुआं भी है। शाही अहाता विजयनगर साम्राज्य की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। 

तो यहां नहाती थी रानी - आगे चलने पर हमें रानी स्नान कुंड दिखाई देता है, इसे क्वीन्स बाथ के नाम से जाना जाता है। जो 15 वर्ग मीटर में बना हुआ है। रानी के स्नान कुंड के बाहर विशाल उद्यान बना हुआ  है। कुंड के चारों ओर सुसज्जित बरामदे और बालकोनी बनी हुई है। इन बरामदों की नक्काशियां भी शानदार हैं। हालांकि हमें देश के अलग अलग हिस्सों में शाही बावड़ियां देखने को मिलती हैं। क्वीन्स बाथ कुछ उसी तरह का है, पर यह खास तौर पर रानी के लिए बनाया गया था। रानियां यहां रथ में सवार होकर जल क्रीड़ा करने के लिए आती थीं।

हंपी का अनूठा हजार राम मंदिर

देश भर में रामचंद्र जी के मंदिर बहुत कम ही हैं। पर हंपी का हजार राम मंदिर द्रविड़ शैली में 15वीं सदी का बना हुआ भव्य मंदिर है। जनाना प्रांगण से आगे बढ़ने के बाद हम रुकते हैं हजार राम मंदिर के सामने। इस मंदिर के उल्टी तरफ पान सुपारी बाजार हुआ करता था।

हजार राम का मंदिर विजयनगर के राजसी अंचल में स्थित है। इसे राज परिवार के अनुष्ठान के लिहाज से बनवाया गया था। मंदिर की योजना में गर्भ गृह अंतराल, मुख मंडप और उत्तर और दक्षिण में अर्ध मंडप बनाए गए हैं। महामंडप का रुख पूरब दिशा की ओर है। मुख्य मंदिर के चारों ओर तीन श्रेणियों में रामायण की कथा को मूर्तियों में उकेरा गया है। इसमें लव कुश के चित्र भी बनाए गए हैं। मंदिर में सुंदर काले पत्थरों के पालिश किए हुए स्तंभ हैं जिनकी सुंदरता देखते ही बनती है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर की सुंदरता में खो जाते हैं। यह एक ऐसा मंदिर है जिसका सौंदर्य निहारने के लिए आपके पास एक घंटे से ज्यादा का वक्त होना चाहिए।

विशाल और अदभुत है हंपी का विट्टलस्वामी मंदिर
अब हम लंबी यात्रा पर चल पड़े हैं। हम विट्टलस्वामी मंदिर की ओर जा रहे हैं। यह हंपी के बाकी स्मारकों से थोड़ी दूर पूर्वोत्तर में पहाड़ी पर स्थित है।रास्ते में सड़क पर एक चेकपोस्ट आता है, यह 16वीं सदी का ही बना हुआ है। ऐसे कई चेक पोस्ट विजय नगर सम्राज्य में बने हुए थे। 

विट्ठल स्वामी का यह मंदिर अपनी अदभुत वास्तुकला, गोपुरम, पत्थर के विशाल रथ और सारेगामा स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। विट्ठल मंदिर से एक किलोमीटर पहले आटो स्टैंड और छोटा सा बाजार है, जहां आपको खाने पीने की कुछ चीजें मिल सकती है।

नारी सशक्तिकरण का उदाहरण बैटरी कार – मंदिर से एक किलोमीटर पहले स्वामी आटो रोक कर बताते हैं मंदिर तक आटो रिक्शा या कोई भी पेट्रोल डीजल से चलने वाला वाहन नहीं जाता है। कर्नाटक टूरिज्म ने विट्ठल मंदिर जाने के लिए बैटरी कार का इंतजाम किया हुआ है। कई बैटरी कार लगातार चलती रहती हैं। 

इन सभी बैटरी कारों को महिलाएं चलाती हैं। टिकट बेचने का काम भी महिलाओं के ही हवाले है। यानी नारी सशक्तिकरण का सुंदर उदाहरण। हमलोग भी टिकट लेकर बैटरी कार में बैठ गए। जाने और आने का टिकट 20 रुपये का है। बच्चों का टिकट नहीं लगता। हंप में बैटरी कार की शुरुआत दिसंबर 2010 में हुई। कुल 20 बैटरी कारों का संचालन सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक होता है। हर बैटरी कार की लागात 7 लाख आई है। इसमें 14 लोग एक साथ बैठकर सफर करते हैं। 

विट्ठल मंदिर तक जाने के लिए कच्चा इको फ्रेंडली रास्ता है। मंदिर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। रास्ते में पुराने बाजार की संरचना और कुछ हौज दिखाई देते हैं। मंदिर के बाहर एक विशाल रथ दिखाई देता है।

विट्ठल मंदिर का निर्माण देवराय द्वितीय के काल में 1422 से 1446 के मध्य हुआ। राजा कृष्णदेव राय द्वारा 1513 के आसपास यहां 100 खंबो वाले मंडप का निर्माण कराया गया। इन स्तंभों की खास बात है कि इसको ताड़ित करने  पर संगीत की स्वर लहरियां सुनाई देती हैं। इन स्तंभों से तब की वैज्ञानिक तकनीक का पता चलता है जब पत्थरों से निकलते संगीत की रचना की गई होगी। कई लोग इसलिए इन स्तंभों को सारेगामा स्तंभ के नाम से भी जानते हैं।
हंपी के विट्ठल मंदिर का विशाल रथ। 

यहां विजयनगर की मंदिर निर्माण शैली का उत्कर्ष दिखाई देता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर आपको गाइड मिलते हैं जो मंदिर कलात्मकता बारे में बताने की बात करते हैं। मंदिर परिसर में मुख्य गोपुरम से प्रवेश करने के बाद हमें कल्याण मंडप और उत्सव मंडप दिखाई देता है। मंदिर में प्रवेश के लिए कुल तीन गोपुरम बने हैं। मंदिर परिसर में पत्थरों का बना एक विशाल रथ भी आपको चकित करता है। किसी समय में इस रथ के पहियों को घुमाया भी जा सकता था, पर अब इसे संरक्षित रखने के लिए सीमेंट से जाम कर दिया गया है। मंदिर के पास विशाल पुष्करिणी (तालाब) भी निर्मित किया गया है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  

(HAMPI, MAHNAVMI TIBBA, QUEENS BATH, HAJARRAM MANDIR, VITHHAL SWAMI TEMPLE)