Monday, February 29, 2016

कविगुरु एक्सप्रेस से महामना एक्सप्रेस तक

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के नाम पर 22 जनवरी 2016 से वाराणसी और दिल्ली के बीच नई ट्रेन महामना एक्सप्रेस चलाई गई है। संयोग है कि इस ट्रेन का संचालन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के 100 साल पूरे होने के मौके पर किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना 4 फरवरी 1916 को हुई थी।
देश में ज्यादातर रेलगाडियों के नाम वैसे तो नदियों के नाम पर हैं या फिर जिन राज्यों से ट्रेन गुजरती हैं उनका कनेक्शन नाम में दिखाई देता है। जैसे गंगा कावेरी एक्सप्रेस जो वाराणसी को चेन्नई से जोड़ती है। सरयू यमुना एक्सप्रेस, ब्रह्मपुत्र मेल, कालिंदी एक्स्प्रेस, गोदावरी एक्सप्रेस (हैदराबाद –विशाखापत्तनम), क्षिप्रा एक्सप्रेस, तीस्ता तोरसा एक्सप्रेस,  आदि। राज्यों और क्षेत्रों के नाम देखें- पंजाब मेल, शाने पंजाब एक्सप्रेस, सिक्किम महानंदा एक्सप्रेस, मंगला लक्षदीप  एक्सप्रेस, महाकौशल एक्सप्रेस इस्टकोस्ट एक्सप्रेस ।

महापुरुषों के नाम पर ट्रेनों के नाम रखे जाने की परंपरा कम रही है। पर रविंद्र नाथ टैगोर के नाम पर हमें कविगुरु एक्सप्रेस नाम मिलता है। कविगुरु एक्सप्रेस नाम से तो ट्रेनों सीरीज है। स्वामी विवेकानंद के नाम पर विवेक एक्सप्रेस सीरीज की रेलगाड़ियां दौड़ती है।

साहित्यिक रचनाओं पर ट्रेनों के नाम 
वहीं इलाहाबाद मुंबई के बीच तुलसी एक्सप्रेस भी चलती है। यह महाकवि तुलसी दास के नाम पर है। टैगोर की रचना गीतांजलि के नाम पर गीतांजलि एक्सप्रेस दौड़ती है। मशहूर कवि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना को याद दिलाती हुई पदमावत एक्सप्रेस भी दौड़ती है।
 तो बांग्ला के एक और प्रसिद्ध कवि सुभाष मुखोपाध्याय की काव्य रचना पर पदातिक के नाम पर पदातिक एक्सप्रेस दौड़ती है। जय शंकर प्रसाद की रचना कामायनी के नाम पर कामायनी एक्सप्रेस दौड़ती है। प्रेमचंद की मशहूर कृति के नाम पर गोदान एक्सप्रेस नामक ट्रेन है। शायर कैफी आजमी के नाम पर कैफियत एक्सप्रेस चलती है। काजी नजरूल इस्लाम की काव्य रचना अग्निवीणा के नाम पर अग्निवीणा एक्सप्रेस दौड़ती है। पदातिक औ अग्निवीणा जैसे नामों का चयन ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के कार्यकाल में हुआ।

ऐतिहासिक घटनाओं को याद दिलाती हुई भी ट्रेनों के तमाम नाम हैं – प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक्सप्रेस, सत्याग्रह एक्सप्रेस, नवजीवन एक्सप्रेस, सेवाग्राम एक्सप्रेस, आश्रम एक्सप्रेस, दीक्षाभूमि एक्सप्रेस, संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, आजाद हिंद एक्सप्रेस, अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस । संपूर्ण क्रांति और सत्याग्रह जैसे नाम नीतीश कुमार के रेलमंत्री रहने के कार्यकाल में सुझाए गए थे।

बहुत सी रेलगाड़ियों के नाम धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। इनकी बानगी भी देखिए - गरीब नवाज एक्सप्रेस, काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस, शिवगंगा एक्सप्रेस, गोल्डेन टेंपल मेल, गोरखधाम एक्सप्रेस, प्रयागराज एक्सप्रेस, सचखंड एक्सप्रेस, महाबोधि एक्सप्रेस, सारनाथ एक्सप्रेस । इनमें हिंदू, मुस्लिम, सिख आस्था की झलक दिखाई दे जाती है। अलग अलग रेलगाड़ियों के नामों पर गौर करें तो इसमें हमारी राष्ट्रीय एकता, संस्कृति की झलक बखूबी मिलती है।
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( RAIL, MAHAMANA, BHU, VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)


Saturday, February 27, 2016

न्यू जलापाईगुड़ी में खड़ा मीटरगेज का स्टीम लोकोमोटिव

लोगों को रेलवे के इतिहास से रूबरू कराने के लिए कई रेलवे स्टेशनों के बाहर पुराने लोकोमोटिव को सजा संवार कर प्रदर्शित किया गया है। न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन के बाहर निकलने पर दाहिनी तरफ एक विशाल लोकोमोटिव आराम फरमाता हुआ दिखाई देता है। यह एक मीटर गेज नेटवर्क पर चलने वाला इंजन है। इंजन का नाम एमएडब्यूडी 1798 ( MAWD 1798)  है। साल 1944 में निर्मित ये लोकोमोटिव अमेरिकी युद्ध के दौरान डिस्पोज किया गया स्टीम लोकोमोटिव है। इसका निर्माण ब्लाडविन लोकोमोटिव वर्क्स में किया गया था।

अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित ब्लाडविन कंपनी की स्थापना 1825 में हुई थी। ब्लाडविन मूल रूप से स्टीम लोकोमोटिव बनाने वाली कंपनी थी। जब स्टीम का दौर खत्म होकर डीजल का दौर आया तो ये कंपनी बाजार में मजबूती से कायम नहीं रह सकी। करीब 70 हजार स्टीम लोकोमोटिव का निर्माण करने वाली कंपनी ब्लाडविन एक दिन दीवालिया हो गई। बहरहाल हम बात कर रहे हैं एनजेपी स्टेशन के बाहर खडे एमडब्लूडी 1798 लोको की। तो इसकी क्षमता 8.12 टन कोयला ग्रहण करने की है। जबकि इसका वाटर टैंक 10 हजार गैलन का है। लोकोमोटिव का बायलर 24 टन का है। लोकोमोटिव का कुल वजन 41 टन है।

1993 में आखिरी बार दौड़ा - इस लोकोमोटिव को मैकआर्थर नाम से बुलाया जाता था। वे दूसरे विश्व युद्ध के लोकप्रिय अमेरिकी जनरल थे। यह लोकोमोटिव 2-8-2 कनफिगरेशन का है। आमतौर पर यह शंटिंग संबंधी कार्यों के लिए काफी मुफीद था। इसे बहुत तेज गति के ट्रेनों के खीचने की अनुमति नहीं दी जाती थी क्योंकि इससे डिब्बो के पटरी से उतर जाने का खतरा था। अपनी स्टोव जैसी चिमनी, बार फ्रेम और सेंट्रल हैंडलैंप के कारण यह एक पारंपरिक अमेरिकी लोकोमोटिव जैसा दिखाई देता है। भारत में यह लोकोमोटिव 1948 में सेवा में आया। 1993 में इसने आखिरी बार अलीपुर दुआर और गीतालदह के बीच अपनी सेवाएं दी थी। इन क्षेत्र से स्टीम इंजन की विदाई के बाद यह लोकोमोटिव कई सालों तक गुवाहाटी के पास न्यू गुवाहाटी लोको शेड में आराम फरमाता रहा। बाद में रेलवे की रेल पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना तहत इसे रिस्टोर किया गया। बाद में इसे न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन के बाहर लाकर खड़ा कर दिया गया।  

साल 2001 में दुबारा लगाई दौड़ - साल 2001 में इस स्टीम लोकोमोटिव को रिस्टोर करने की योजना बनी। कुछ पुराने रेल कर्मियों के  23 दिन के प्रयास के बाद 20 फरवरी को इस स्टीम लोकोमोटिव ने एक बार फिर पटरियों पर दौड़ लगाई। यह स्टीम इंजन गुवाहाटी से पांडु के बीच दौड़ा। तमाम जगह सड़कों पर इस स्टीम लोकोमोटिव की चलते देखने के लिए लोग रूक गए।


 रेलवे ने इस स्टीम लोकोमोटिव को रिस्टोर करने में डेढ़ लाख रुपये खर्च किए। बाद में इस लोकोमोटिव को न्यू जलपाईगुड़ी  लाने का फैसला किया गया जो पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है। अब आते जाते हजारों लोग रोज रूक रूक कर इस लोकोमोटिव को देखते हैं। हालांकि लोकोमोटिव के आसपास इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है।
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Thursday, February 25, 2016

कब बजेगी शिलांग में रेल की सिटी

वह साल 2014 में 29 नवंबर का दिन था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेघालय के लिए पहली ट्रेन को झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके साथ ही आजादी के छह दशक से अधिक समय बाद मेघालय देश के रेल नक्शे पर आ गया। 

मेंदीपथार-गुवाहाटी के बीच पहली पैसेंजर ट्रेन के संचालन की शुरूआत हुई। पर राजधानी शिलांग को ट्रेन से जोड़ने की योजना अभी दूर की कौड़ी है। मेंदीपथार (MNDP)  तक रेल दूधनोई से पहुंचाई गई है। दूधनोई गुवाहाटी कामाख्या गोलपाड़ा न्यू बंगाई गांव लाइन पर रेलवे स्टेशन है। गुवाहाटी की ओर से चलने पर दूधनोई गोलपारा टाउन से 20 किलोमीटर पहले आता है। इस तरह से दूधनोई (DDNI) अब जंक्शन बन गया है। पर दूधनोई से मेंदीपथार की दूरी महज 20 किलोमीटर है। राज्य बनने के बीस साल बाद रेल प्रवेश जरूर कर गई है पर महज कुछ किलोमीटर तक। इससे बहुत छोटी आबादी को लाभ हो रहा है। कुल 9.36 किलोमीटर रेलवे ट्रैक अभी मेघालय में है। 916 मीटर की ऊंचाई पर मेंदीपथार वेस्ट गारो हिल्स जिले में पड़ता है। सिर्फ दो रेलवे स्टेशन अभी मेघालय में हैं। पहला स्टेशन नोलबाड़ी 10वें किलोमीटर पर है। आखिरी स्टेशन मेंदीपथार 19वें किलोमीटर पर।
दूधनोई की सुबह में उगता सूर्य। 

मेघालय को दूसरा रेल लिंक दिया जा रहा है तेतेलिया से जो राज्य की राजधानी शिलांग को जोड़ेगा। तेतेलिया ( TTLA) गुवाहाटी से लमडिंग के बीच 39वें किलोमीटर पर एक छोटा सा स्टेशन है। यह स्टेशन जागी रोड से 19 किलोमीटर पहले है। यहां से बिरनी हाट तक 21.5 किलोमीटर रेलवे लाइन बनाए जाने पर काम चल रहा है। वास्तव में यही लाइन राजधानी शिलांग तक जाएगी। पर इसमें अभी कई साल लगेंगे। इस लाइन के लिए साल 2015 तक लोकेशन सर्वे पूरा हुआ है। बिरनी हाट तक पहुंचने वाली लाइन में केवल 2.5 किलोमीटर का ट्रैक मेघालय में पड़ेगा। एक मुश्किल और भी है। मेघालय के कई एनजीओ रेलवे लिंक का विरोध कर रहे हैं जिससे प्रोजेक्ट में देरी हो रही है। हालांकि ये एक नेशनल प्रोजेक्ट है। बिरनी हाट गुवाहाटी शिलांग नेशनल हाईवे नंबर 40 पर नोंगपो से पहले पड़ता है। बिरनी हाट में औद्योगिक क्षेत्र भी है। इसके बाद शिलांग तक जाने वाली लाइन एनएच 40 के आसपास से गुजरेगी।



ब्रिटिश काल में 1880 में चेरापूंजी तक रेल पहुंचाने की योजना बनी थी पर वह परवान नहीं चढ़ सकी। इसका एक खंड तो पूरा हो गया था पर बाकी दो खंड पर काम नहीं हो सका। कुछ तकनीकी बाधाओं के कारण ब्रिटिश काल में चेरापूंजी तक रेल ले जाने की योजना परवान नहीं चढ़ सकी। उसके बाद से 100 साल से ज्यादा गुजर गए यह सुंदर इलाका रेलवे की सिटी सुनने के लिए तरस रहा है।

दो राज्यों के बीच बंटा जोराबात - अगर आप गुवाहाटी से शिलांग की ओर चलते हैं तो गुवाहाटी शहर के बाहरी इलाके से मेघालय राज्य शुरू हो जाता है। एनएच 37 से एनएच 40 के जंक्शन यानी तिनाली जंक्शन के बीच खानपारा, बरिदुआ और जोराबात मेघालय में पड़ते हैं। तिनाली जंक्शन पर एक भद्रकालेश्वरी मंदिर भी है। वास्तव में एनएच 37 एक तरफ असम पड़ता है दूसरी तरफ मेघालय। यह आप जोराबात से गुजरते हुए खूब देख सकते हैं। एक तरफ के दुकानों की साइन बोर्ड पर मेघालय लिखा नजर आता है तो दूसरी तरफ असम। जोराबात रीभोई जिले में पड़ता है जबकि उसका एनएच के इस पार वाला हिस्सा असम के कामरूप जिले में। मेघालय के जोराबात का पिन कोड है 793101  जबकि असम इलाके के जोराबात का पिन कोड 781026 है। जोराबात में नेपाली और बिहारी लोगों की बड़ी संख्या है। यह बड़ा व्यापारिक इलाका है। भले ही मेघालय की भौगोलिक सीमा गुवाहाटी के काफी करीब तक पहुंचती हो पर राजधानी शिलांग तक रेल की सिटी बजने मे अभी काफी वक्त लगेगा।

( SHILLONG, MEGHALYA, RAIL )


Tuesday, February 23, 2016

मिनी इंडिया है - शिलांग का बाजार

मेघालय की राजधानी शिलांग है तो शिलांग शहर की धड़कन है पुलिस बाजार। अब भला इसका नाम पुलिस बाजार क्यों पड़ा ये खोज का विषय हो सकता है। पर पुलिस बाजार शिलांग शहर का केंद्र है। कई बड़े आवासीय होटल, खाने पीने के रेस्टोरेंट, शापिंग के लिए बाजार यहां हैं। साथ ही मेघालय राज्य का सरकारी बस स्टैंड और राज्य की विधान सभा भी पुलिस बाजार में ही है। पुलिस बाजार के चौराहा काफी विस्तारित है। यहां से आपको कहीं भी जाने के लिए टैक्सियां मिल सकती हैं। अब पुलिस बाजार में नन्हें शापिंग मॉल भी बन गए हैं। केएफसी भी शिलांग के पुलिस बाजार में पहुंच गया है। पहाड़ी शहरों में बडे मॉल तो बनाए भी नहीं जा सकते हैं ना। किसी जमाने में यहां पुलिस मुख्यालय होने के कारण लोग इसे पुलिस बाजार कहने लगे होंगे ऐसा प्रतीत होता है। शिलांग शहर के हर कोने में रहने वाले लोग शापिंग और खाने पीने के लिए पुलिस बाजार आते हैं। पुलिस बाजार में स्ट्रीट शापिंग का भी आनंद लिया जा सकता है। फुटपाथ पर बड़ी संख्या में दुकाने हैं। आसपास की कई गलियों में भी अच्छा खासा बाजार है।


तांबुल और भोजपुरी - पुलिस बाजार में सुबह से ही फुटपाथ पर तांबूल की दुकानें सजी नजर आती हैं। तांबूल बेचने वाली ज्यादातर महिलाएं हैं। कुछ खासी हैं तो कई भोजपुरी बोलने वाली। ये भोजपुरी बोलने वाली महिलाएं पूरी तरह से शिलांग की संस्कृति में भले रच बस गई हों पर जुबान पर वही भोजपुरी है। तांबुल बेच रही हैं और आपस में पटर पटर संवाद कर रही हैं। वैसे तांबुल मेघालय की संस्कृति का खास हिस्सा है। हरा पान और कच्ची सुपारी तांबुल का खास हिस्सा है। दस रुपये का एक तांबुल बिकता है। आप मेघालय में किसी के घर जाएं तो भी वे सम्मान मे तांबुल पेश करते हैं। महिलाएं और पुरुष सभी जमकर तांबुल खातें हैं और उनके दांत धीरे धीरे सड़ने लगते हैं।
पुलिस बाजार से आगे चलते हैं अब।  सही मायने में शिलांग का सबसे बड़ा बाजार है उसका नाम ही बड़ा बाजार है। यह पूरी तरह से स्थानीय बाजार है। पुलिस बाजार से इसकी दूरी ज्यादा नहीं है। पर इस बाजार में स्थानीय दुकानें हैं और सस्ती चीजें मिलती हैं। बड़ा बाजार में हर तरह की दुकाने हैं। अनाज, चावल दाल सब्जियां से लेकर सब कुछ। बड़ा बाजार में स्थानीय खासी लोगों की दुकानें ज्यादा हैं।

कई पीढ़ी से सिख रहते हैं पंजाबी कालोनी में - 
बड़ा बाजार से लगी हुई पंजाबी बस्ती है। यहां हजारों की संख्या में पंजाबी लोग रहते हैं। यहां पर इनका गुरुद्वारा भी है। पंजाबी समुदाय के लोग यहां कई सौ साल पहले आकर बस गए थे। पंजाब के सिख लोगों की जीने की इच्छा यानी जीजिविषा प्रेरणा लेने लायक होती है। ये लोग विपरीत परिस्थितियों व्यापार करना और जीना जानते हैं। हजारों पंजाबियों के लिए शिलांग अब घर बन चुका है। पुलिस बाजार की गलियों में घूमते हुए मुझे राणी सती मंदिर नजर आता है। इसके ये अंदाज लगाया जा सकता है कि यहां राजस्थानी लोग भी बड़ी संख्या में हैं। यहां मारवाड़ी बासा होटल की मौजूदगी भी यही बताती है। बाजार में बाबा रामदेव (राजस्थान वाले) का मंदिर भी नजर आता है। यानी यहां पर राजस्थान के बाबारामदेव के भक्त भी बड़ी संख्या में है। अगर आपको मेघालय के हस्तशिल्प की खरीददारी करनी है तो पूरबाश्री के शोरुम में पहुंच सकते हैं। चींजें थोड़ी महंगी हैं पर हाथ से बनी चीजें भला सस्ती भी कैसे हो सकती हैं।

आईआईएम शिलांग- भारतीय प्रबंधन संस्थान की शिलांग शाखा है। आपको याद होगा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब का यहीं पर व्याख्यान देने के दौरान निधन हो गया था। अब देश में कुल 19 आईआईएम हो गए हैं, पर शिलांग का आईआईएम पुराना है। यह सातवें नंबर पर आता है। इसकी स्थापना 2004 में हुई। संस्थान का संचालन चीड़ के हरे भरे पेड़ों से आच्छादित मयूरभंज कांप्लेक्स में हो रहा है। यह मयूरभंज के राजघराने का निवास हुआ करता था।

नार्थ ईस्ट हिल यूनीवर्सिटी शिलांग – यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1973 में हुई। इसका मुख्य परिसर शिलांग में है तो दूसरा तुर्रा में। शिलांग में इसका कैंपस शहर से थोड़ा किनारे माउकिनरो में है। परिसर 1025 एकड़ में विस्तारित है। विश्वविद्यालय से संबंद्ध पूर्वोत्तर के 53 कालेज हैं।


( SHILLONG, MEGHALYA ) 

Sunday, February 21, 2016

शिलांग में लें उत्तर भारतीय खाने का स्वाद

वैसे तो मेघालय पूर्वोत्तर का वैसा राज्य है जहां ईसाई संस्कृति हावी है। पर यहां आपको उत्तर भारतीय भोजन का स्वाद लेने में कोई परेशानी नहीं आएगी। खास तौस पर शिलांग शहर में कई ऐसे भोजनालय और मिठाइयों की दुकानें है जहां पर उत्तर भारतीय भोजन का स्वाद ले सकते हैं।

सबसे पहले बाद पुलिस बाजार में स्थित दिल्ली स्वीट्स की। दिल्ली स्वीट्स शिलांग की मिठाइयों की सबसे लोकप्रिय दुकान है। इतनी लोकप्रिय की यहां बैठने की जगह के लिए इंतजार करना पड़ जाता है। मिठाइयों का स्वाद बिल्कुल यूपी या दिल्ली जैसा है और दरें भी काफी वाजिब हैं। दिल्ली स्वीट्स के नाम पर मत जाएं यहां मिठाइयों के अलावा समोसा, चाट, पूड़ी, मासाला डोसा आदि सब कुछ मिल जाता है। बैठ कर खाने के अलावा टेक अवे यानी लेकर जाने का भी इंतजाम है। काउंटर पर हमेशा भीड़ रहती है। आपको आर्डर देकर इंतजार करना पड़ सकता है। दिल्ली स्वीट्स के चाट और समोसे का स्वाद लाजवाब है। साफ सफाई भी काफी बेहतर है। इन सबके बीच दरे भी वाजिब हैं। 30 रुपये की चाट की प्लेट का स्वाद याद रहता है।

मारवाडी बासा – जैसा की नाम से ही जाहिर है मारवाड़ी बासा खाने के लिए बेहतरीन जगह है। यहां पर खाने की शाकाहारी थाली मिलती है। संभवतः यहां थाली 80 रुपये की है। हालांकि मैं जिस दिन पहुंचा मारवाड़ी बासा का भोजनालय बंद था। इसके प्रोपराइटर बाहर खड़े थे उन्होंने ही मुझे शाकाहारी थाली के लिए हरिओम भोजनालय जाने की सलाह दी। वैसे मारवाड़ी बासा शिलांग का आवासीय होटल भी है। यहां सस्ते आवासीय कमरे उपलब्ध हैं पर यहां के कमरे अटैच टायलेट वाले नहीं हैं। फिर भी शिलांग में रहने के लिए यह प्राइम लोकेशन पर सस्ती और अच्छी जगह है।

हरिओम होटल हरिओम होटल क्विंटन रोड पर स्थित है। यह भोजनालय के साथ एक आवासीय होटल भी है। पर यहां खाने में थाली नहीं मिलती, आप अपनी पसंद के अलग अलग व्यंजन मंगा सकते हैं। मैं दोपहर में यहां खाने पहुंचा तो मैंने रोटी, दाल और मिक्स वेजीटेबल आर्डर किया. पर मैंने देखा काफी स्थानीय लोग यहां आकर दोपहर में भी पराठे का आर्डर दे रहे थे। शायद उनका पराठा लोगों को पसंद आता है। नीचे भोजनालय है तो उपर आवासीय होटल है। यहां पर भी सस्ते कमरे उपलब्ध हैं, पर कमरे अटैच टायलेट वाले नहीं हैं। पर हिंदी प्रदेश से आने वाले लोगो को ये होटल काफी पसंद है।

यूपी स्वीट एंड मीट – मुख्य बाजार में यूपी स्वीट एंड मीट दिखाई देता है। यहां पर कई किस्म की मिठाइयां उपलब्ध हैं। इसके साथ ही समोसे और पूड़ी आदि का भी आर्डर दे सकते हैं। यहां भी स्थानीय निवासी बड़ी संख्या में खाने पीने पहुंचते हैं।

आलू मूरी का स्वाद - लेडी हैदरी पार्क पास मिले एक युवक जो बिहार के वैशाली जिले के रहने वाले हैं। यहां पर सालों से आलू मूरी बेचते हैं। वे आलू उबालते हैं रात को। उसमें मसाले मिलाते हैं, दिन भर मूरी (दाना) के साथ मिलाकर बेचते हैं। उनकी आलू मूरी के दीवाने स्थानीय खासी लोग भी इस कदर हैं कि पैक कराकर घर भी ले जाते हैं। पुलिस बाजार के चौराहे पर सुबह सुबह अंडा, आमलेट, पूड़ी, पराठे बेचने वालों की भरमार रहती है। ज्यादातर दुकानदार बिहार के हैं। हालांकि यहां पर खाने के स्टाल पर साफ सफाई थोड़ी कम दिखाई देती है।
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( SHILLONG, FOOD, MARWARI BASA, HARI OM HOTEL) 


Saturday, February 20, 2016

मेघालय का सबसे बड़ा कैथोलिक चर्च

शिलांग शहर में वैसे तो कई चर्च हैं पर इन सबके बीच सबसे बड़ा और खूबसूरत चर्च है कैथोलिक चर्च। कैथेड्रल ऑफ मेरी हेल्प ऑफ क्रिसचियन्स लाइतुमखारा ( LAITUMKHARAH) में स्थित है। चर्च सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। 1913 में इस चर्च का निर्माण कैथोलिक जर्मन मिशनरीज की ओर से किया गया। पर 1936 में यह चर्च आग में तबाह हो गया। उसी पुराने चर्च के अवशेषों पर नए चर्च का निर्माण 15 नवंबर 1947 को पूरा हुआ। इसके निर्माण में शिलांग के दूसरे बिशॉप स्टीफेन फेरांडो की बड़ा योगदान रहा। चर्च के दूसरी तरफ सड़क के उस पार प्रभू यीशू का बलिदान स्थल ( CALVARY)  बना है। इसकी भव्यता भी देखते ही बनती है। दोनों की ईमारतों का रंग आसमानी है। नीले रंग का यह चर्च अति विशाल है। 


आसमान के नीले रंग के साथ जोड़कर देखने पर यह प्रकृति की कोई शानदार चित्रकारी सा नजर आता है। मेघालय के खासी समाज के उत्थान में चर्च की बड़ी भूमिका रही है। भले ही चर्च ने खासी समाज को ईसाई बनाया हो पर उनके बीच शिक्षा के प्रसार में भी चर्च की बड़ी भूमिका रही है। चर्च परिसर में फोरोटो हेफेनमूलर एसडीएस की प्रतिमा लगी है जिसके नीचे उनका वाक्य लिखा है- ईफ वी कैन नाट बिल्ड अप ए कम्युनिटी आफ खासी वी आर यूजलेस हियर...


चर्च परिसर में कैथोलिक इन्फारमेशन सेंटर और काउंसलिंग सेंटर की विशाल बिल्डिंग बनी है। परिसर में प्रभू यीशू के जीवन से जुडी कई झांकियां भी हैं। वहीं परिसर में विशाल बियांची मेमोरियल हाल भी बना है। सभी इमारतें मिलकर चर्च परिसर को काफी भव्यता प्रदान करती हैं। कैथेड्रल ऑफ मेरी हेल्प ऑफ क्रिसचियन्स देश के चंद सबसे खूबसूरत चर्च में से है।

दूर-दूर से आए सैलानी इस चर्च को देखने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। पूरे चर्च की नक्काशी को देखने के लिए आप एक घंटे का समय जरूर अपने पास रखें। कैथोलिक चर्च गोरोटो चापेल चर्च में रविवार को सुबह 7 बजे अंगरेजी में और सुबह 10 बजे हिंदी में प्रार्थना होती है।
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Wednesday, February 17, 2016

शिलांग की चोटी – यहां से शहर को देखो

लेटकोर पीक यानी शिलांग पीक। यहां से पूरे शिलांग शहर का नजारा देखना अदभुत अनुभव है। चोटी से जो विहंगम नजारा दिखाई देता है उसे आप कभी भूल नहीं सकते। वास्तव में ये शिलांग की सबसे ऊंची जगह है। पूरे शिलांग शहर की तुलना में यहां ठंड भी थोडी ज्यादा रहती है। सुबह से लेकर शाम तक सूरज की चटकीली धूप में शिलांग पीक से शहर को अलग अलग कोण से निहारिए। हर कोण से एक नया शहर दिखाई देता है। यही कारण है शिलांग आने वाले लोग यहां जरूर पहुंचते हैं और उस हरे भरे हिल स्टेशन को निहारते हैं। शिलांग पीक की ऊंचाई 1965 मीटर यानी 6446 फीट है ।

 यह न सिर्फ शिलांग का बल्कि पूरे मेघालय का सबसे ऊंचा प्वाईंट है। यहां से बांग्लादेश की सीमा भी दिखाई दे जाती है। वास्तव में मेघालय देश के सबसे पूराने पर्वत श्रंखला का हिस्सा जो कोयला और लोहा से भरपूर है। शिलांग पीक का वास्तविक नाम लेटकोर है। यह मूल शिलांग शहर यानी पुलिस बाजार से 15 किलोमीटर के आसपास दूरी पर स्थित है।
वास्तव में शिलांग पीक लेटकोर में स्थित वायु सेना के स्टेशन के अंदर स्थित है। इसलिए यहां पहुंचने वालों को कड़ी जांच पड़ताल से गुजरना पड़ता है। सिर्फ स्थानीय टैक्सियां ही वायुसेना स्टेशन के प्रवेश द्वार के अंदर जा सकती है। प्रवेश द्वार पर ड्राईवर का ड्राईविंग लाइसेंस जमा कर लिया जाता है। सैलानी का आई कार्ड चेक किया जाता है। एयर स्टेशन के प्रवेश द्वार और अंदर वायुसेना स्टेशन के इमारतों की फोटोग्राफी भी प्रतिबंधित है। आप शिलांग पीक से नजारों की चाहे जितनी मर्जी फोटो लें उस पर कोई रोक नहीं है। शिलांग पीक पर कार पार्किंग का टिकट सैलानी को देना पड़ता है। यहां खाने पीने का कोई इंतजाम नहीं है। बहुत ज्यादा वक्त तक रुकने भी अनुमति नहीं है। वायुसेना स्टेशन के अंदर एक केंद्रीय विद्यालय लेटकोर भी है। वायुसेना कर्मियों के परिवार के बच्चों के लिए इस स्कूल की स्थापना 1985 में हुई।  यहां वायु सेना का रडार स्टेशन भी है।


बारिश के दिनों में शिलांग पीक पर बादल दिखाई देते हैं तो सरदी की सुबह में यहां बर्फ की हल्की सी चादर भी जमी हुई दिखाई देती है। शिलांग पीक पर भी आप परंपरागत खासी परिधान में फोटो खिंचवा सकते हैं। इसके लिए थोड़ा सा किराया देना पड़ेगा।

शिलांग पीक पर फोटो खींचते समय एक सज्जन मिलते हैं जो अपने मोबाइल कैमरे से मुझे फोटो खींचने का आग्रह करते हैं। मैं फोटो खींचने के साथ उनका परिचय पूछता हूं। पता चला बिहार के रहने वाले हैं और यहीं लोकटर वायुसेना स्टेशन में कार्यरत हैं। तीन से यहां पर हैं। पर अब तबादला हो गया है। इसलिए आखिरी दिन शिलांग पीक पर अपनी फोटो लेकर यहां के निवास को यादगार बनाना चाहते हैं। सचमुच कोई जगह छोड़ना हो तो उसका असली महत्व पता चलता है। रास्ते में वायुसेना का एक और परिवार मिलता है जो बताता है कि सुबह लेटकोर में तेज ठंड पड़ती है। साथ ही यहां से शहर जाने के लिए वाहनों की बहुत कमी है।


कैसे पहुंचे – शिलांग के बाजार से शिलांग पीक पहुंचने के लिए आपको टैक्सी बुक करनी पड़ेगी। सार्वजनिक वाहन से यहां पहुंचने का इंतजाम नहीं है। आप शिलांग भ्रमण के पैकेज में भी शिलांग पीक को शामिल करके टैक्सी बुक कर सकते हैं। मुझे पूरा शिलांग घूमाने वाले टैक्सी ड्राईवर वांकी हैं। वे खासी समुदाय से आते हैं। अपनी टैक्सी से लोकल साइट के अलावा सैलानियों को चेरापूंजी भी ले जाते हैं। मस्त आदमी हैं उनका फोन नंबर है -87229 54465 वे फेसबुक और वाट्सएप पर भी हैं। आप शिलांग चेरापूंजी घूमने के लिए उनकी सेवाएं ले सकते हैं। उनके साथ घूमते हुए मजा आएगा।  
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Monday, February 15, 2016

हरे-भरे पार्कों का शहर शिलांग

वार्ड लेक पार्क, बोटानिकल गार्डन, लेडी, हैदरी पार्क, एलिफैंट फाल्स पार्क जैसे तमाम सुंदर पार्कों से सुसज्जित शिलांग शहर को पार्कों का शहर कहें तो गलत नहीं होगा। इन पार्कों में सुबह की हवा दिलोदिमाग को काफी सुकुन पहुंचाती है। सुबह सुबह पुलिस बाजार पहुंचने के बाद मैंने जानना चाहा आसपास में क्या देखा जा सकता है। चौराहे पर एक तरफ ऐतिहासिक ब्रह्म समाज का भवन और उसका गेस्ट हाउस नजर आया। यहां ब्रह्म समाज की स्थापना 1894 में हुई थी। ऐसा इसका साइन बोर्ड बता रहा है। इस भवन में एक गेस्ट हाउस भी है। साथ ही रविंद्र नाथ टैगोर की याद में टैगोर मेमोरियल लाइब्रेरी भी है। इसके ठीक दूसरी तरफ पुलिस बाजार चौराहे पर मेघालय की विधानसभा का नन्हा सा सुंदर भवन दिखाई देता है। विधानसभा भवन से जुड़ा उसका प्रशासनिक ब्लाक और उसकी लाइब्रेरी भी है। विधानसभा भवन के गेट पर उसका एक चौकीदार तैनात है। किसी जमाने में मेघालय का विधानसभा भवन लकड़ी का हुआ करता था पर उसमें आग लग गई।

घोड़े के खुर के आकार का वार्ड लेक -
विधानसभा देखकर आगे बढ़ने पर लोगों ने बताया कि महज 200 मीटर की दूरी पर सुंदर वार्ड लेक है। मैं टहलते हुए वहां पहुंच जाता हूं। असम के दो बार चीफ कमिश्नर रहे सर विलियम एर्सकिन वार्ड के नाम पर इस सुंदर झील का नाम रखा गया है। यह झील घोड़े के खुर के आकार की है। झील के किनारे किनारे सुंदर पेड़ और फूलों की क्यारियां बनी हैं। आरामतलब तरीके से सुबह सुबह ठहलने के लिए बेहतरीन जगह है। दिल करे तो यहां झील में बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। झील के बीचों बीच एक पुल बना है जहां से झील का विहंगम नजारा दिखाई देता है। यहां आप मछलियों को दाना भी डाल सकते हैं। यह झील 1880 से 1894 के बीच बनी है। इस झील को लेकर एक दिलचस्प कथा है।

 एक खासी कैदी जिस्मत चीनी को जयंतिया हिल्स से पकड़ कर शिलांग जेल में डाला गया। उसने जेल में कुछ शारीरिक श्रम करने की इच्छ जताई। उसे जमीन के एक हिस्से में खुदाई का काम दिया गया। कुछ दिनों तक खुदाई करते करते पानी निकल आया। उसने जेल अधिकारियों को ये जानकारी दी। तब कर्नल हापकिंसन ने खुदाई जारी रखने के आदेश दिए। इस तरह झील आकार लेने लगी। बाद में असम के चीफ कमिश्नर सर विलियम एर्सकिन वार्ड ने निजी रुचि लेकर झील का सौंदर्यीकरण कराया। पूर्वोत्तर का सुंदर हिल स्टेशन होने के कारण ब्रिटिश अधिकारियों को शिलांग हमेशा से पसंद रहा है। 1893-94 के दौरान झील बनकर पूरी तरह तैयार हो गई। ब्रिटिश राज में शिलांग पूरे असम का मुख्यालय था और यह एक चीफ कमिश्नर के शासन में था।


वार्ड लेक के बगल में एक पुराना बोटानिकल गार्डन भी है। इसमें कई तरह के पेड़ लगे हैं। इसमें टहलते हुए आपको प्रदूषण मुक्त आबोहवा मिलती है। यार्ड लेक में प्रवेश टिकट 10 रुपये का है। कैमरा के लिए 20 रुपये का टिकट अलग से लेना पड़ता है।



एक टिकट में कई मजा - लेडी हैदरी पार्क - 

शिलांग शहर का दूसरा लोकप्रिय पार्क है लेडी हैदरी पार्क। यह पुलिस बाजार से तकरीबन दो किलोमीटर है। इस पार्क का नाम असम के चीफ कमिश्नर की पत्नी लेडी हैदरी के नाम पर रखा गया। पार्क तकरीबन एक किलोमीटर में फैला है। लंबे हरे भरे पथ के साथ पार्क में सुंदर जलाशय है जिसमें पक्षी कलरव करते नजर आते हैं। इसके अलावा एक मिनी चिड़िया घर भी है जिसमें कई तरह के पशु पक्षी हैं। बच्चों को यह पार्क खूब पसंद आता है। चिड़िया घर में पक्षियों की 73 प्रजातियां हैं। 

पार्क में आर्किड समेत कई स्थानीय पेड़ पौधे हैं जिन्हें जापानी स्टाईल में नियोजित किया गया है। लेडी हैदरी पार्क को सुंदर गुलाब के फूलों के लिए जाना जाता है। पार्क में बच्चों के खेलने के लिए खास कोना बनाया गया है। पार्क के एक हिस्से में बटरफ्लाई म्युजियम भी बना है जो प्राणी विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए खास आकर्षण है। परिवार और दोस्तो के साथ कुछ घंटे गुजारने के लिए बेहतरीन जगह है ये।

 वैसे तो पार्क सालों भर खुला रहता है पर सर्दियों में घूमने का अपना मजा है। बटरफ्लाई म्यूजियम देखना है तो 11 से 4 के बीच ही पहुंचे। पार्क में प्रवेश का टिकट 10 रुपये और कैमरे का 20 रुपये का टिकट है। पार्क के गेट पर खाने पीने की चीजें उपलब्ध हैं।

तीन झरनों वाला एलिफैंट फाल्स ( हाथी झरना ) 





शिलांग की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक एलीफैंट फाल्स। यहां प्रवेश द्वार से अंदर जान के बाद एक के बाद एक तीन झरने हैं। इन झरनों को सौंदर्य का रसपान करने के लिए आपको थोड़ा वक्त तो यहां देना ही पड़ेगा। प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है पर इसकी खूबसूरती के सामने वह राशि तो कुछ भी नहीं है। वैसे तो खासी लोगों ने इन झरनों का नाम अपनी भाषा में तीन कदम वाला झरना रखा था। पर ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे देखा तो इसका नाम एलिफैंट फाल्स रख दिया क्योंकि इन झरनों के सामने जो पहाड़ी है उसका आकार हाथी जैसा है। पर 1897 में आए एक भूकंप में वह पहाड़ी बरबाद हो गई। पर इन झरनों का नाम एलिफैंट फाल्स तो रह ही गया। आप जब एलिफैंट फाल्स के पास जाएं तो वहां परंपरागत खासी परिधान में सज कर फोटो यादगारी फोटो भी खिंचवा सकते हैं।
शिलांग का एलिफैंट फाल्स - हर वक्त रहता है गुलजार। 


शिलांग का एलिफैंट फाल्स - हर वक्त रहता है गुलजार। 




Saturday, February 13, 2016

मेघालय यानी बादलों का घर

मेघालय यानी मेघों (बादलों) का घर। घर इसलिए की सबसे ज्यादा बारिश वाला इलाका चेरापूंजी मेघालय में ही आता है। 21 जनवरी 1972 को ये छोटा सा राज्य अस्तित्व में आया। साल 2011 की जनगणना में आबादी 30 लाख के करीब है। इसकी सीमाएं असम और बांग्लादेश से लगती हैं। इस पहाड़ी राज्य में पूरी तरह आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। खासी, गारो और जयंतिया तीन किस्म के आदिवासी मूल रूप से राज्य में है। इन्ही के हिसाब से भूभाग और जिलों का भी बंटवारा किया गया है। नदियों और पहाड़ों से आच्छादित राज्य में हरियाली सर्वत्र विराजती है। बागवानी और कृषि यहां की मुख्य पहचान है।

मेघालय में प्रकृति अपने भव्य रूप में दिखाई देती है। राजधानी शिलांग में ही कई रमणीक स्थल हैं। इनमें यार्ड लेक, लेडी हैदरी पार्क, पोलो ग्राउंड, मिनी चिड़ियाघर, एलीफेंट फाल्स और शिलांग चोटी खास हैं। यहां का गोल्फ कोर्स देश के बेहतरीन गोल्फ कोर्सों में से एक है। मेघालय विधानसभा में कुल 60 सदस्य हैं। आबादी के हिसाब से देखें तो हर 50 हजार पर एक सदस्य। हाल में मेघालय को हाईकोर्ट भी मिल गया है। साल 2013 में मेघालय में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। इसके पहले यहां गुवाहाटी हाईकोर्ट की बेंच हुआ करती थी।

राज्य में तीन प्रमुख जनजातियां खासी, गारो और जयंतिया। मेघालय की विधानसभा में 29 सदस्य खासी हिल्स से चुने जाते हैं जबकि 24 सदस्य गारो हिल्स से चुने जाते हैं, जबकि 7 सदस्य जयंतिया हिल्स से चुने जाते हैं। मजे की बात की इन तीनों को चेहरे मोहरे यानी नैन नक्श से पहचाना जा सकता है। लेडी हैदरी पार्क के पास आलू मूरी बेचने वाला एक बिहारी युवा कहता है मैं गारो और खासी लोगों को देखकर पहचान लेता हूं। कैसे। वह मुझसे पूछता है आप भी अलग अलग वस्तुओं या रंगों को कैसे पहचानते हैं। इसी जनजातीय पहचान के आधार पर ही मेघालय के जिलों का भी विभाजन किया गया है। राज्य में कुल सात जिले हैं तीन खासी बहुल तीन गारो बहुल और एक जयंतिया बहुल जिला है।


मेघालय के जिले - 1 रीभोई ( खासी जिला)  2 ईस्ट खासी हिल्स  3 वेस्ट खासी हिल्स
4 जयंतिया हिल्स 5 वेस्ट गारो हिल्स  6 ईस्ट गारो हिल्स  7 साउथ गारो हिल्स
मेरी मुलाकात वार्ड लेक के पार्क में पी एम सईम से होती है। सईम (Pynshai  Manik Syiem ) साल 1993 से 2008 तक तीन बार लगातार विधायक रह चुके हैं उनका क्षेत्र मेलियम (MYLLIEM) रहा है जो  ईस्ट खासी हिल्स में आता है। सईम साहब सुबह सुबह सैर करने के लिए आए हैं। रास्ता पूछने के क्रम मे उनसे परिचय होता है फिर मेघालय की राजनीति पर बातचीत होती है। अब उनकी ब टी राजनीति में है और वे कारोबार करते हैं। सईम अपनी नैनो में मुझे कैथोलिक चर्च और लेडी हैदरी पार्क तक घुमाते हैं।


पीए संगमा तुर्रा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं जो गारो हिल्स में आता है। पूर्ण ऐजिटक संगमा मेघालय के लोकप्रिय राजनेता हैं। वे मेघालय के मुख्यमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। वे राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़े। वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सह-संस्थापक हैं। वे आठ बार लोकसभा-सदस्य रह चुके हैं। बेटी अगाथा संगमा राजनीति में हैं। बेटा कोनार्ड संगमा भी विधायक और विपक्ष के नेता हैं। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री मुकुल संगमा वेस्ट गारो हिल्स से आते हैं।

संगमा के बाद खासी दूसरी प्रमुख उपाधि है मेघालय की लिंगदोह। जेम्स माइकल लिंगदोह चर्चित आईएएस और देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके हैं। उन्हें प्रतिष्ठित मैग्सेसे पुरस्कार भी मिल चुका है। जेएम लिंदगोह शिलांग में स्कूली पढ़ाई के दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़े। जानी मानी लेखिका अरुंधति राय भी शिलांग में पैदा हुई थीं। फिल्मकार और इतिहासकार चिदानंद दास गुप्ता का संबंध भी शिलांग से है।

Thursday, February 11, 2016

पलटन बाजार से पुलिस बाजार तक

गुवाहाटी से मेघालय की राजधानी शिलांग का दूरी सड़क मार्ग से तकरीबन 90 किलोमीटर है। नेशनल हाईवे नंबर 40 दोनों शहरों को जोड़ती है। यह सड़क अब हर मौसम के लिए मुफीद है। अगर आप बिना रूके चलें तो दो से ढाई घंटे में शिलांग पहुंच जाते हैं। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पलटन बाजार वाले बस स्टैंड के आसपास से शिलांग के लिए टैक्सी और सूमो आदि मिलती हैं। अगर आप छोटी टैक्सी शेयरिंग में करते हैं तो किराया 300 रुपये है और सूमो में किराया 170 रुपये प्रति व्यक्ति है। वैसे मेघालय ट्रांसपोर्ट और असम रोडवेज की बसें भी गुवाहाटी से शिलांग के बीच चलती हैं। पर बसें कम हैं। अगर आप वायु सेवा से आते हैं। गुवाहाटी एयरपोर्ट से ही सीधे शिलांग के लिए टैक्सी मिल जाती है। गुवाहाटी से शिलांग के बीच चलने वाली टैक्सियां आमतौर पर गुवाहाटी में पलटन बाजार से चलती हैं और शिलांग में पुलिस बाजार में जाकर खत्म होती हैं।

गुवाहाटी पहुंचने वाली तमाम रेलगाड़ियों से सवारियों के उतरने के बाद पलटन बाजार इलाके मे शिलांग जाने वाले टैक्सी और सूमो वाले सवारी ढूंढना शुरु कर देते हैं। गाड़ी भरते ही चल पड़ते हैं शिलांग की ओर। अगर जीएस रोड पर जाम नहीं हुआ तो आप जल्द ही शहर से बाहर निकल जाएंगे। पलटन बाजार के बाद दिसपुर आता है। रास्ते में गुवाहाटी का साइंस सेंटर और जू भी है। थोड़ा आगे खानपाड़ा में जो गुवाहाटी का बाहरी इलाका कहा जा सकता है असम एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी का कैंपस आता है। यह यूनीवर्सिटी का पोस्ट ग्रेजुएट कैंपस है। सुबह मे सड़क खाली दिखाई देती है पर शाम को खानपाड़ा से पलटन बाजार के बीच भारी जाम लगता है।
शिलांग की ओर - एनएच 40 पर। 

नए साल की नई सुबह। अभी सूरज नहीं निकला है। मैं एक सूमो में जगह लेता हूं। ड्राईवर साहब बिहार के मोतिहारी के रहने वाले हैं। लंबे समय से गुवाहाटी में ही सूमो चला रहे हैं। सूरज निकलने के साथ ही टैक्सी नेशनल हाईवे नंबर 40 पर दौड़ना शुरू कर देती है। गुवाहाटी और शिलांग के बीच में आता है नोंगपो। नोंगपो ( NONGPOH) 48वें किलोमीटर पर आता है। यहां सड़क के किनारे बाजार है। नोंगपो मेघालय के रीभोई जिले का मुख्यालय है। भोई खासी आदिवासी होते हैं उनके नाम पर जिले का नाम रखा गया है। ज्यादातर शिलांग जा रही टैक्सियां चाय नास्ते के लिए नोंगपो में रूकती हैं। पर हमारे ड्राईवर साहब ने नहीं रोका। सुबह सुबह नोंगपो में एक भी दुकान नहीं खुली थी। कुछ यात्री नहीं रोकने पर नाराज हुए। वे बिहारी अंदाज में बोले- एको दुकान नहीं खुला है...आलू छीलने के लिए रूकें क्या..
शिलांग का पुलिस बाजार। 

खैर उन्होंने आगे गाड़ी रोकी। उमियाम लेक यानी बड़ा पानी के पास। यह विशाल झील है शिलांग से तकरीबन 20 किलोमीटर पहले। यहां लोग वाटर स्पोर्ट्स के मजे लेने आते हैं। स्थानीय लोगों में बड़ा पानी केनाम से मशहूर इस जगह में लोग बोटिंग, वाटर स्पोर्ट्स और कैंपिंग का आनंद उठाते हैं। यहां से शिलांग के एयरपोर्ट के लिए रास्ता बदलता है। बड़ापानी के बाद आप राजधानी शिलांग की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। शहर मे सबसे पहले आटो मार्केट आता है। उसके बाद आगे बढ़ने पर सिविल हास्पीटल चौराहा। काफी गाड़ियां यहीं पर खत्म हो जाती हैं। बहुत सी टैक्सियां पुलिस बाजार तक जाती हैं। एमएसटी का बस स्टैंड भी पुलिस बाजार में ही है। हमारे टैक्सी वाले ने आग्रह पर मुझे पुलिस बाजार छोड़ा। पुलिस बाजार मतलब शिलांग का दिल।






Monday, February 8, 2016

न्यू जलपाईगुड़ी से गुवाहाटी - कंचनजंगा एक्सप्रेस से

पश्चिम बंगाल में दुआर्स के चाय बगान। 
दानापानी पर आने वाले पाठकों का शुक्रिया.  आपके स्नेह से पाठकों की संख्या. एक लाख से पार कर चुकी है. पढ़ते रहिए. दानापानी और घूमते रहिए हमारे साथ... देश....

न्यू जलपाईगुड़ी से गुवाहाटी के मार्ग में बंगाल का दुआर्स इलाका आता है। इस रास्ते में सुंदर चाय के बगान नजर आते हैं। फकीराग्राम से पहले श्रीरामपुर असम नामक स्टेशन पर ट्रेन असम में प्रवेश कर जाती है। ये असम का बोडोलैंड वाला इलाका है। इस बार मैं कंचनजंगा एक्सप्रेस में हूं। कोलकाता से चलने वाली इस लंबी दूरी की ट्रेन में सिटिंग क्लास भी है। संयोग से मुझे सिटिंग क्लास में ही आरक्षण मिल पाया। न्यू जलपाईगुड़ी गुवाहाटी कोई आठ घंटे का सफर है। मेरे सामने की सीट पर अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट में बागवानी एवं वानिकी कॉलेज
(http://www.chfcau.org.in/) के छात्र –छात्राओं की टोली है। उनका कालेज सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी, इंफाल के तहत आता है। छात्रों से उनकी पढ़ाई के बारे में थोड़ी बातें करता हूं। सभी मस्ती भरे मूड में हैं। मेरे सामने की सीट पर लक्ष्मी है जो इंफाल (मणिपुर) की है। मैं उससे कहता हूं कि तुम मणिपुरी तो कहीं से नहीं लगती हो, हमारे यूपी की लड़कियों जैसी हो। बैठे बैठे मुझे नींद आ जाती है तभी छात्रों की टोली मुझे जगाकर हैप्पी न्यू ईयर कहती है। रात के 12 बजे हैं और हम साल 2016 में प्रवेश कर चुके हैं।

असम रेल लिंक - न्यू जलपाईगुड़ी से न्यू कूचबिहार जाने के रास्ते में फालाकाटा रेलवे स्टेशन बाद आता है तोरसा नदी पर बना तोरसा ब्रिज। ये पुल संख्या 227 है और तकरीबन आधा किलोमीटर (417 मीटर ) लंबा है। तोरसा नदी तिब्बत से निकलती है और भूटान होते हुए बंगाल में प्रवेश करती है। फुटशिलांग, जयगांव, कूचबिहार जैसे शहर तोरसा नदी के किनारे पड़ते हैं। आगे तोरसा ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। गुवाहाटी जाने वाले रेल मार्ग पर ये महत्वपूर्ण रेल पुल है। ये पुल सिंगल लाइन का है। इस क्षेत्र में अभी दोहरीकरण नहीं हुआ है। न्यू जलपाईगुड़ी के बाद रानीनगर से लेकर न्यू कुचबिहार तक की रेलवे लाइन अभी सिंगल ही है। हालांकि न्यू जलपाईगुड़ी से न्यू अलीपुर दुआर जाने के लिए सेवक होकर दूसरे मार्ग का विकल्प भी उपलब्ध है। कुछ रेलगाड़ियां दूसरे मार्ग से जाती हैं।

1947 में आजादी और देश विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) बनने के बाद पूर्वोत्तर के सभी राज्य रेल लिंक से कट गए क्योंकि तब न्यू जलपाईगुड़ी होकर गुवाहाटी जाने के लिए रेलवे लाइन नहीं थी। तब आनन फानन में बिहार के किशनगंज ( अवध तिरहुत रेलवे का स्टेशन) और असम के आरनीगांव के बीच रेलवे मार्ग बनाने की योजना बनी। महज दो सालों में कुल 142 मील ( 210 किलोमीटर) की रेलवे लाइन की विपरीत हालात में निर्माण कर लिया गया। यह आजाद भारत में सबसे तेजी से पूरा होने वाला प्रोजेक्ट था।
न्यू बंगाई गांव जंक्शन में प्रवेश करती पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस। 

 नौ दिसंबर 1949 को इस मार्ग पर रेल परिवहन चालू हो गया। इस मार्ग पर किशनगंज से सिलिगुड़ी के बीच 66 मील की दो फीट चौड़ाई वाली नैरोगेज लाइन थी जिसे मीटर गेज में बदला गया। सिलिगुडी से बागरकोट के 22 मील की लाइन पर बीच में तीस्ता नदी पर पुल बनाना भी चुनौतीपूर्ण कार्य था। वहीं मदारीहाट और हासीमारा के बीच 9 मील के मार्ग पर तोरसा नदी पर पुल का निर्माण किया गया। चौथा खंड था अलीपुर दुआर से फकीराग्राम का, इसका निर्माण बिना मुश्किल के हुआ।
गोलापारा टाउन के पास ब्रह्मपुत्र नदी का विस्तार 

 तीस्ता और तोरसा पर पुल बनाने के लिए पहली बार प्री स्ट्रेस्ड कंक्रीट गार्डर का इस्तेमाल किया गया। तब कुल असम रेल लिंक प्रोजोक्ट पर 9.3 करोड़ का खर्च आया था, यानी 6.5 लाख प्रति मील का खर्च आया। इस मार्ग में किशनगंज (बिहार), दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार ( बंगाल) और गोलापाड़ा (असम) के जिले आते हैं। ( The Economic weekly – 18 Apr 1953 )  कई दशक बाद इस लाइन को ब्राडगेज में बदला गया। वहीं सत्तर के दशक में न्यू जलपाईगुड़ी, न्यू कूचबिहार, न्यू अलीपुर दुआर से न्यू बंगाई गांव के बीच दूसरी वैकल्पिक ब्राडगेज लाइन बिछाई गई। यह लाइन 1966 में संचालन में आई। साल 1964 में न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन अस्तित्व में आया। जो अब इस मार्ग का अति व्यस्त और विशाल स्टेशन बन चुका है। ( The Economic weekly – 18 Apr 1953 )
कोकराझार रेलवे स्टेशन। 

गुवाहाटी जाने के दो रास्ते -  न्यू  बंगाई गांव से गुवाहाटी के बीच दो रास्ते हैं एक वाया रंगिया होकर और दूसरा गोलापाड़ा होकर। वाया रंगिया मार्ग पर बारपेटा रोड, नलबड़ी, रंगिया, चांगसारी और कामाख्या जैसे स्टेशन आते हैं। इस मार्ग पर कामाख्या से पहले ब्रह्मपुत्र नदी पर सरायघाट पुल आता है।  जबकि दूसरे मार्ग पर न्यू बंगाई गांव के बाद जोगीगुफा, गोलपाड़ा टाउन, दूधनोई, धूपधारा कामाख्या जंक्शन जैसे स्टेशन आते हैं। दोनों मार्ग कामाख्या जंक्शन में जाकर मिलते हैं। जोगीगुफा और गोलपाड़ा के बीच ब्रह्मपुत्र नदी पर विशाल पुल आता है। जबकि दूधनोई नामक छोटे से स्टेशन से मेघालय के मेंदीपाठर के लिए रेलवे लाइन निकली है।

एक पुल ऐसा भी 

ये है जीव दया का अदभुत नमूना – रेलवे जंगल के जानवरों का कितना ख्याल रखता है ये इस पुल को देखकर पता चलता है। इस कैनोपी ब्रिज का निर्माण इसलिए किया गया है कि ट्रेन आती जाती रहे तो भी लंगूर आदि हल्के फुल्के जानवार पटरी के इस पार से उस पार जा सके।

भारतीय रेलवे पर ये पुल बना है असम के जोरहट जिले में होलोंगपार अभ्यारण्य के बीच।
( Holongpar Reserve Forest) तो देखिए इस हर भरे पुल को और जानवरों पर दया करने का विचार मन मे ं हमेशा बनाए रखिए। 
-vidyutp@gmail.com