Monday, February 29, 2016

साहित्यिक रचनाओं पर रेलगाड़ियों के नाम

देश में चलने वाली तमाम रेलगाड़ियों के नाम बहुत गहरा अर्थ भी रखते हैं। इन नामों में इतिहास, भूगोल, आस्था, साहित्य संस्कृति, का मेल देखने को मिलता है। तो आइए नजर डालते हैं इन नामों पर। 

कई रेलगाड़ियों के नाम तो लेखकों की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं के नाम पर रखे गए हैं। बांग्ला के महान कवि लेखक रविंद्र नाथ टैगोर की नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रचना गीतांजलि के नाम पर गीतांजलि एक्सप्रेस ( मुंबई- हावड़ा - 12859 ) दौड़ती है। 

बंगाल में ही सियालदह से सहरसा के बीच एक ट्रेन चलती है हाटे बाजारे एक्सप्रेस (13163)। सहरसा से सियालदह के बीच चलनेवाली हाटे बजारे एक्सप्रेस मानसी होते हुए महेशखूंट, थाना विहपुर, नवगछिया होते हुए कटिहार होकर सियालदह जाती है।


आपको पता है हाटे बाजारे बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक बनफूल की कहानी है जो अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष करती है। 1962 में उन्हे इस कृति के लिए रविंद्र पुरस्कार मिला था। वैसे बनफूल साहित्यिक नाम है लेखक का पूरा नाम बलाई चंद मुखोपाध्याय था। हाटे बाजारे नाम से 1967 में बांग्ला में एक सुपरहिट फिल्म भी बनी थी जिसमें अशोक कुमार और वैजयंती माला ने अभिनय किया था। फिल्म का निर्माण मशहूर फिल्मकार तपन सिन्हा ने किया था। 

बांग्ला के एक और प्रसिद्ध कवि सुभाष मुखोपाध्याय की काव्य रचना पर पदातिक के नाम पर पदातिक एक्सप्रेस ( सियालदह से न्यू जलपाई गुड़ी -12377 )  दौड़ती है। वहीं काजी नजरूल इस्लाम की काव्य रचना अग्निवीणा के नाम पर अग्निवीणा एक्सप्रेस ( हावड़ा आसनसोल 12341 )  दौड़ती है। पदातिक और अग्निवीणा जैसे साहित्यिक नामों का चयन ममता बनर्जी के रेल मंत्री के कार्यकाल में हुआ।

अब हिंदी पट्टी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ते हैं। मशहूर कवि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना को याद दिलाती हुई पदमावत एक्सप्रेस ( दिल्ली से प्रतापगढ़ - 14208) भी दौड़ती है। जायसी राय बरेली के पास जायस के रहने वाले थे। मशहूर शायर कैफी आजमी की लोकप्रिय कृति कैफियात के नाम पर कैफियात एक्सप्रेस ( दिल्ली से आजमगढ़ - 12225 )  चलती है। कैफी आजमी का मूल घर आजमगढ़ जिले के मिजवां में था। इसलिए उनके सम्मान में आजमगढ़ से चलने वाली इस ट्रेन का नाम कैफियात एक्सप्रेस रखा गया। 

वाराणसी के निवासी महान हिंदी साहित्यकार जय शंकर प्रसाद की काव्य रचना कामायनी के नाम पर कामायनी एक्सप्रेस ( मुंबई-वाराणसी -11071 ) दौड़ती है। वहीं हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद की मशहूर कृति गोदान के नाम पर गोदान एक्सप्रेस ( गोरखपुर - मुंबई एलटीटी -11055 ) नामक ट्रेन है। 

कविगुरु एक्सप्रेस से महामना एक्सप्रेस तक

महापुरुषों के नाम पर ट्रेनों के नाम रखे जाने की परंपरा कम रही है। पर रविंद्र नाथ टैगोर के नाम पर हमें कविगुरु एक्सप्रेस नाम मिलता है। कविगुरु एक्सप्रेस नाम से तो ट्रेनों सीरीज है। स्वामी विवेकानंद के नाम पर विवेक एक्सप्रेस सीरीज की रेलगाड़ियां दौड़ती है।इलाहाबाद मुंबई के बीच तुलसी एक्सप्रेस भी चलती है। यह महाकवि तुलसी दास के नाम पर है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के नाम पर 22 जनवरी 2016 से वाराणसी और दिल्ली के बीच नई ट्रेन महामना एक्सप्रेस चलाई गई है। अब रेलवे ने महामना नाम से एक नई सीरीज ही शुरू करने का फैसला लिया है। 
संयोग है कि इस ट्रेन का संचालन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के 100 साल पूरे होने के मौके पर किया गया । इस विश्वविद्यालय की स्थापना 4 फरवरी 1916 को हुई थी।

देश में ज्यादातर रेलगाडियों के नाम वैसे तो नदियों के नाम पर हैं या फिर जिन राज्यों से ट्रेन गुजरती हैं उनका कनेक्शन नाम में दिखाई देता है। जैसे गंगा कावेरी एक्सप्रेस जो वाराणसी को चेन्नई से जोड़ती है। सरयू यमुना एक्सप्रेस, ब्रह्मपुत्र मेल, कालिंदी एक्स्प्रेस, गोदावरी एक्सप्रेस (हैदराबाद –विशाखापत्तनम), क्षिप्रा एक्सप्रेस, तीस्ता तोरसा एक्सप्रेस,  आदि। राज्यों और क्षेत्रों के नाम देखें- पंजाब मेल, शाने पंजाब एक्सप्रेस, सिक्किम महानंदा एक्सप्रेस, मंगला लक्षदीप  एक्सप्रेस, महाकौशल एक्सप्रेस इस्टकोस्ट एक्सप्रेस ।


ऐतिहासिक घटनाओं को याद दिलाती हुई भी ट्रेनों के तमाम नाम हैं – प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक्सप्रेस, सत्याग्रह एक्सप्रेस, जलियांवाला बाग एक्सप्रेस, नवजीवन एक्सप्रेस, सेवाग्राम एक्सप्रेस, आश्रम एक्सप्रेस, दीक्षाभूमि एक्सप्रेस, संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, आजाद हिंद एक्सप्रेस, अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस। संपूर्ण क्रांति और सत्याग्रह जैसे नाम नीतीश कुमार के रेलमंत्री रहने के कार्यकाल में सुझाए गए थे।

धार्मिक आस्था से जुड़े नाम -  बहुत सी रेलगाड़ियों के नाम धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। इनकी बानगी भी देखिए - गरीब नवाज एक्सप्रेस, काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस, शिवगंगा एक्सप्रेस, गोल्डेन टेंपल मेल, गोरखधाम एक्सप्रेस, प्रयागराज एक्सप्रेस, सचखंड एक्सप्रेस, महाबोधि एक्सप्रेस, सारनाथ एक्सप्रेस । इनमें हिंदू, मुस्लिम, सिख आस्था की झलक दिखाई दे जाती है। अलग अलग रेलगाड़ियों के नामों पर गौर करें तो इसमें हमारी राष्ट्रीय एकता, संस्कृति की झलक बखूबी मिलती है।
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( RAIL, MAHAMANA, BHU, VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)


Saturday, February 27, 2016

न्यू जलापाईगुड़ी में खड़ा मीटरगेज का स्टीम लोकोमोटिव

लोगों को रेलवे के इतिहास से रूबरू कराने के लिए कई रेलवे स्टेशनों के बाहर पुराने लोकोमोटिव को सजा संवार कर प्रदर्शित किया गया है। न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन के बाहर निकलने पर दाहिनी तरफ एक विशाल लोकोमोटिव आराम फरमाता हुआ दिखाई देता है। यह एक मीटर गेज नेटवर्क पर चलने वाला इंजन है। इंजन का नाम एमएडब्यूडी 1798 ( MAWD 1798)  है। साल 1944 में निर्मित ये लोकोमोटिव अमेरिकी युद्ध के दौरान डिस्पोज किया गया स्टीम लोकोमोटिव है। इसका निर्माण ब्लाडविन लोकोमोटिव वर्क्स में किया गया था।

अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित ब्लाडविन कंपनी की स्थापना 1825 में हुई थी। ब्लाडविन मूल रूप से स्टीम लोकोमोटिव बनाने वाली कंपनी थी। जब स्टीम का दौर खत्म होकर डीजल का दौर आया तो ये कंपनी बाजार में मजबूती से कायम नहीं रह सकी। करीब 70 हजार स्टीम लोकोमोटिव का निर्माण करने वाली कंपनी ब्लाडविन एक दिन दीवालिया हो गई। बहरहाल हम बात कर रहे हैं एनजेपी स्टेशन के बाहर खडे एमडब्लूडी 1798 लोको की। तो इसकी क्षमता 8.12 टन कोयला ग्रहण करने की है। जबकि इसका वाटर टैंक 10 हजार गैलन का है। लोकोमोटिव का बायलर 24 टन का है। लोकोमोटिव का कुल वजन 41 टन है।

1993 में आखिरी बार दौड़ा - इस लोकोमोटिव को मैकआर्थर नाम से बुलाया जाता था। वे दूसरे विश्व युद्ध के लोकप्रिय अमेरिकी जनरल थे। यह लोकोमोटिव 2-8-2 कनफिगरेशन का है। आमतौर पर यह शंटिंग संबंधी कार्यों के लिए काफी मुफीद था। इसे बहुत तेज गति के ट्रेनों के खीचने की अनुमति नहीं दी जाती थी क्योंकि इससे डिब्बो के पटरी से उतर जाने का खतरा था। अपनी स्टोव जैसी चिमनी, बार फ्रेम और सेंट्रल हैंडलैंप के कारण यह एक पारंपरिक अमेरिकी लोकोमोटिव जैसा दिखाई देता है। भारत में यह लोकोमोटिव 1948 में सेवा में आया। 1993 में इसने आखिरी बार अलीपुर दुआर और गीतालदह के बीच अपनी सेवाएं दी थी। इन क्षेत्र से स्टीम इंजन की विदाई के बाद यह लोकोमोटिव कई सालों तक गुवाहाटी के पास न्यू गुवाहाटी लोको शेड में आराम फरमाता रहा। बाद में रेलवे की रेल पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना तहत इसे रिस्टोर किया गया। बाद में इसे न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन के बाहर लाकर खड़ा कर दिया गया।  

साल 2001 में दुबारा लगाई दौड़ - साल 2001 में इस स्टीम लोकोमोटिव को रिस्टोर करने की योजना बनी। कुछ पुराने रेल कर्मियों के  23 दिन के प्रयास के बाद 20 फरवरी को इस स्टीम लोकोमोटिव ने एक बार फिर पटरियों पर दौड़ लगाई। यह स्टीम इंजन गुवाहाटी से पांडु के बीच दौड़ा। तमाम जगह सड़कों पर इस स्टीम लोकोमोटिव की चलते देखने के लिए लोग रूक गए।


 रेलवे ने इस स्टीम लोकोमोटिव को रिस्टोर करने में डेढ़ लाख रुपये खर्च किए। बाद में इस लोकोमोटिव को न्यू जलपाईगुड़ी  लाने का फैसला किया गया जो पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है। अब आते जाते हजारों लोग रोज रूक रूक कर इस लोकोमोटिव को देखते हैं। हालांकि लोकोमोटिव के आसपास इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है।
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Thursday, February 25, 2016

कब बजेगी शिलांग में रेल की सिटी

वह साल 2014 में 29 नवंबर का दिन था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेघालय के लिए पहली ट्रेन को झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके साथ ही आजादी के छह दशक से अधिक समय बाद मेघालय देश के रेल नक्शे पर आ गया। 

मेंदीपथार-गुवाहाटी के बीच पहली पैसेंजर ट्रेन के संचालन की शुरूआत हुई। पर राजधानी शिलांग को ट्रेन से जोड़ने की योजना अभी दूर की कौड़ी है। मेंदीपथार (MNDP)  तक रेल दूधनोई से पहुंचाई गई है। दूधनोई गुवाहाटी कामाख्या गोलपाड़ा न्यू बंगाई गांव लाइन पर रेलवे स्टेशन है। गुवाहाटी की ओर से चलने पर दूधनोई गोलपारा टाउन से 20 किलोमीटर पहले आता है। इस तरह से दूधनोई (DDNI) अब जंक्शन बन गया है। पर दूधनोई से मेंदीपथार की दूरी महज 20 किलोमीटर है। राज्य बनने के बीस साल बाद रेल प्रवेश जरूर कर गई है पर महज कुछ किलोमीटर तक। इससे बहुत छोटी आबादी को लाभ हो रहा है। कुल 9.36 किलोमीटर रेलवे ट्रैक अभी मेघालय में है। 916 मीटर की ऊंचाई पर मेंदीपथार वेस्ट गारो हिल्स जिले में पड़ता है। सिर्फ दो रेलवे स्टेशन अभी मेघालय में हैं। पहला स्टेशन नोलबाड़ी 10वें किलोमीटर पर है। आखिरी स्टेशन मेंदीपथार 19वें किलोमीटर पर।
दूधनोई की सुबह में उगता सूर्य। 

मेघालय को दूसरा रेल लिंक दिया जा रहा है तेतेलिया से जो राज्य की राजधानी शिलांग को जोड़ेगा। तेतेलिया ( TTLA) गुवाहाटी से लमडिंग के बीच 39वें किलोमीटर पर एक छोटा सा स्टेशन है। यह स्टेशन जागी रोड से 19 किलोमीटर पहले है। यहां से बिरनी हाट तक 21.5 किलोमीटर रेलवे लाइन बनाए जाने पर काम चल रहा है। वास्तव में यही लाइन राजधानी शिलांग तक जाएगी। पर इसमें अभी कई साल लगेंगे। इस लाइन के लिए साल 2015 तक लोकेशन सर्वे पूरा हुआ है। बिरनी हाट तक पहुंचने वाली लाइन में केवल 2.5 किलोमीटर का ट्रैक मेघालय में पड़ेगा। एक मुश्किल और भी है। मेघालय के कई एनजीओ रेलवे लिंक का विरोध कर रहे हैं जिससे प्रोजेक्ट में देरी हो रही है। हालांकि ये एक नेशनल प्रोजेक्ट है। बिरनी हाट गुवाहाटी शिलांग नेशनल हाईवे नंबर 40 पर नोंगपो से पहले पड़ता है। बिरनी हाट में औद्योगिक क्षेत्र भी है। इसके बाद शिलांग तक जाने वाली लाइन एनएच 40 के आसपास से गुजरेगी।



ब्रिटिश काल में 1880 में चेरापूंजी तक रेल पहुंचाने की योजना बनी थी पर वह परवान नहीं चढ़ सकी। इसका एक खंड तो पूरा हो गया था पर बाकी दो खंड पर काम नहीं हो सका। कुछ तकनीकी बाधाओं के कारण ब्रिटिश काल में चेरापूंजी तक रेल ले जाने की योजना परवान नहीं चढ़ सकी। उसके बाद से 100 साल से ज्यादा गुजर गए यह सुंदर इलाका रेलवे की सिटी सुनने के लिए तरस रहा है।

दो राज्यों के बीच बंटा जोराबात - अगर आप गुवाहाटी से शिलांग की ओर चलते हैं तो गुवाहाटी शहर के बाहरी इलाके से मेघालय राज्य शुरू हो जाता है। एनएच 37 से एनएच 40 के जंक्शन यानी तिनाली जंक्शन के बीच खानपारा, बरिदुआ और जोराबात मेघालय में पड़ते हैं। तिनाली जंक्शन पर एक भद्रकालेश्वरी मंदिर भी है। वास्तव में एनएच 37 एक तरफ असम पड़ता है दूसरी तरफ मेघालय।

यह आप जोराबात से गुजरते हुए खूब देख सकते हैं। एक तरफ के दुकानों की साइन बोर्ड पर मेघालय लिखा नजर आता है तो दूसरी तरफ असम। जोराबात रीभोई जिले में पड़ता है जबकि उसका एनएच के इस पार वाला हिस्सा असम के कामरूप जिले में। मेघालय के जोराबात का पिन कोड है 793101  जबकि असम इलाके के जोराबात का पिन कोड 781026 है। जोराबात में नेपाली और बिहारी लोगों की बड़ी संख्या है। यह बड़ा व्यापारिक इलाका है। भले ही मेघालय की भौगोलिक सीमा गुवाहाटी के काफी करीब तक पहुंचती हो पर राजधानी शिलांग तक रेल की सिटी बजने मे अभी काफी वक्त लगेगा।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

( SHILLONG, MEGHALYA, RAIL )


Wednesday, February 24, 2016

मेघालय का महान क्रांतिवीर शहीद कियांग नांगबा

शिलांग से गुवाहाटी के लिए वापस चल पड़ा हूं। टैक्सी की तलाश करते हुए एक चौराहे पर पहुंता हूं, वहां मेघालय के एक वीर सपूत की प्रतिमा स्थापित की गई है। सहज ही उस वीर सपूत के बारे में जानने की इच्छा होती है।

देश की आजादी की लड़ाई शुरुआती योद्धाओं में कई ऐसे वीर सपूत हैं जिन्हें इतिहास के पन्नों में कम जगह मिली है, लेकिन उनकी बहादुरी की दास्तां नमन करने योग्य है। ऐसा ही एक नाम कियांग नांगबा का है। मेघालय में जनजातीय वीर नांगबा का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।

युवा अवस्था में ही  कियांग को अंग्रेजों ने 1862 में फांसी पर लटका दिया था। 30 दिसंबर को गिरफ्तारी की कुछ घंटे बाद ही सार्वजनिक स्थल पर उन्हें फांसी दे दी गई। नांगबा का नाम भी उन लोगों में शामिल है जो आजादी की लड़ाई के शुरुआती दिनों में शहीद हो गए। नांगबा की सही जन्मतिथि का पता नहीं है लेकिन ये कहा जाता है कि फांसी के समय उनकी उम्र 30 साल से ज्यादा नहीं थी। नांगबा ने खासी जनजाति के प्रमुख उत्सव बेडिनख्लाम पर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाई थी। इसके साथ ही 1860 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए हाउस टैक्स का पुरजोर विरोध किया था। नांगबा और उनके साथियों ने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर दिया।


खासी जनजाति के प्रमुख उत्सव बेडिनख्लाम पर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाने के कारण नांगबा को ब्रितानिया जुल्म का शिकार होना पड़ा था। यह उत्सव उत्तर भारत की जगन्नाथ रथ यात्रा के समय बिल्कुल उसी अंदाज में मनाया जाता है। नांगबा की प्रतिष्ठा मेघालय में आजादी की लड़ाई के हीरो के साथ ही एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के तौर पर भी है। वह संगीत से भी काफी लगाव रखते थे। वे बांसुरी बजाने में सिद्धहस्त थे।

फांसी पर लटकाए जाने से पहले कियांग का लोगों को संबोधित किया हुआ आखिरी संदेश अदभुत था। उसने कहा था कि फांसी पर लटकने के बाद यदि उनकी गर्दन पूरब की ओर झुकेगी तो देश सौ साल में आजाद हो जाएगा। अगर पश्चिम की तरफ झुकेगी तो देश को लंबे समय तक गुलामी झेलनी पड़ेगी। फांसी के बाद कियांग का सिर पूरब की ओर ही झुका और उनके कहे अनुसार देश सौ साल के अंदर आजाद हुआ।

वीर सपूत नांगबा के शहादत के 152वें साल मे 30 दिसंबर 2014 को शिलांग के मुख्य चौराहे पर नांगबा की विशाल प्रतिमा खासी स्टूडेंट यूनियन द्वारा स्थापित की गई। इस प्रतिमा में वह तीर कमान और ढाल लिए हुए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनकी शहादत दिवस पर हर साल शिलांग में आयोजन होता है और लोग उनकी प्रतिमा के चरणों में श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं। भारत सरकार ने साल 2001 में मेघालय के इस वीर सपूत के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था।  


शहादत को सलाम 

1860 में ब्रिटिश सरकार के हाउस टैक्स लगाने का विरोध किया।

1862 में 30 दिसंबर को नांगबा को फांसी दी गई

2014 में शिलांग मे नांगबा की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई


1967 में नांगबा की याद में मेघालय के जोवाई में एक सरकारी कॉलेज खोला गया। 


मेघालय के इस महान शहीद के नाम पर राज्य के वेस्ट जयंतिया हिल्स जिले में एक सरकारी कालेज भी है। वास्तव में 1967 में खुले कालेज का नाम 1983 में कियांग नांगबा के नाम पर रख कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

मेघालय के महान शहीद नांगबा वास्तव में मणिपुर के पाओना ब्रजबासी, असम की किशोर वीरांगना कनकलता, कर्नाटक के क्रांतिवीर संगोली रायणा, बिहार के खुदीरामबोस की श्रेणी में आकर खड़े होते हैं। जिनके मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ शुरुआती दिनों से विरोध की ज्वाला थी। इन वीरों ने उग्र विरोध करते हुए युवा अवस्था में ही विदेशी शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकते हुए अपने प्राणों की आहूति दे दी। 

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( MEGHALYA, KIANG NANGBAH, FREEDOM FIGHTER  , JOWAI GOVT COLLEGE, WEST JAINTIA HILLS, SHILLONG ) 

Tuesday, February 23, 2016

आदिवासी संस्कृति की झलक देखें डॉन बास्को म्युजियम में

मेघालय की राजधानी शिलांग में देखी जाने वाली जगहों में प्रमुख है डॉन बास्को म्युजियम। इस संग्रहालय में आप मानव विकास की झलक के साथ पूर्वोत्तर की आदिवासी संस्कृति को समझने की कोशिश कर सकते है। पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में वहां की संस्कृति को समझने के लिए ये सबसे बेहतरीन संग्रहालय है। साल 1994 में संग्रहालय के निर्माण की नींव रखी गई। उसके बाद लगातार इसमें विस्तार हो रहा है। वैसे संग्रहालय का औपचारिक उदघाटन 5 मार्च 2010 को कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। इस संग्रहालय का प्रबंधन काफी बेहतरीन है। यह एक सरकारी संग्रहालय है जिसका प्रबंधन कला और संस्कृति मंत्रालय करता है।

स्काई वाक से शिलांग का नजारा -   डॉन बास्को म्युजियम का भवन भी काफी कलात्मक बना हुआ है। यह कुल सात मंजिलों का है। इस भवन के पास एक लंबा स्काई वाक बना है। इस स्काई वाक से पूरे शिलांग शहर का बेहतरीन नजारा देख सकते हैं। 


इस संग्रहालय में कुल 17 दीर्घाएं हैं। इनमें आप पूर्वोत्तर के अलग अलग जनजातियों की रहन सहन की झांकियां देख सकते हैं।  मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया जनजातियों के बारे में यहां जाना ही जा सकता है साथ ही पूरे पूर्वोत्तर के बारे में जानने और समझने के लिए ये एक बेहतरीन संग्रहालय है। 
कृषि गैलरी में पूर्वोत्तर की खेतीबाड़ी के बारे में जाना जा सकता है। इसके अलावा आर्ट, खानपान, बास्केटरी, एलकोव्स, वस्त्र और आभूषण, मछली पकड़ना और शिकार, मकान बनाने की शैली, पूर्वोत्तर की भाषाओं के बारे में भी आप अलग अलग गैलरियों में जाकर जान सकते हैं।

संग्रहालय का भवन भी विशाल है। डॉन बॉस्को म्यूजियम का अपना शोध और प्रकाशन का विभाग भी है। संग्रहालय के साथ ही राज्य का सेंट्रल लाइब्रेरी का परिसर भी है। यह म्युजिम लोगों से सहयोग की अपेक्षा रखता है। आप संग्रहालय को धन और संरक्षण योग्य सामग्री दान में दे सकते हैं। 
शिलांग शहर के मावलाई में स्थित इस संग्रहालय में आप एक छत के नीचे पूरे पूर्वोत्तर को बेहतर तरीके से देख समझ और महसूस कर सकते हैं। संग्रहालय को अच्छी तरह देखने के लिए कुछ घंटे का समय निकाल कर रखें। अगर आप कला संस्कृति से ज्यादा लगाव रखते हैं तो यहां सारा दिन दे सकते हैं। 

खुलने का समय - संग्रहालय सोमवार से शनिवार को सुबह 9 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुला रहता है। रविवार को संग्रहालय बंद रहता है। प्रवेश टिकट  भारतीय नागरिकों के लिए 100 रुपये का है। विदेशी नागरिकों के लिए यह टिकट 200 रुपये का है। छात्रों को टिकट में 50 फीसदी की रियायत दी जाती है। इसके लिए परिचय पत्र होना आवश्यक है।

इंटर्नशिप का भी मौका -  संग्रहालय के बारे में  ज्यादा जानकारी के लिए संग्रहालय की वेबसाइट (http://www.dbcic.org ) पर भी जा सकते हैं। संग्रहालय कला में रुचि रखने वाले युवाओं कुछ समय के लिए अपने यहां इंटर्नशिप करने का भी मौका प्रदान करता है। इसके लिए संग्रहालय प्रशासन से संपर्क किया जा सकता है। 

- vidyutp@gmail.com
( MEGHALAYA, SHILLONG, DON BOSCO MUSEUM, TRIBAL CULTURE OF NORTH EAST ) 

Monday, February 22, 2016

मिनी इंडिया है, शिलांग के बाजार

मेघालय की राजधानी शिलांग है तो शिलांग शहर की धड़कन है पुलिस बाजार। अब भला इसका नाम पुलिस बाजार क्यों पड़ा ये खोज का विषय हो सकता है। पर पुलिस बाजार शिलांग शहर का केंद्र है। कई बड़े आवासीय होटल, खाने पीने के रेस्टोरेंट, शापिंग के लिए बाजार यहां हैं। साथ ही मेघालय राज्य का सरकारी बस स्टैंड और राज्य की विधान सभा भी पुलिस बाजार में ही है। 

पुलिस बाजार के चौराहा काफी विस्तारित है। यहां से आपको कहीं भी जाने के लिए टैक्सियां मिल सकती हैं। अब पुलिस बाजार में नन्हें शापिंग मॉल भी बन गए हैं। केएफसी भी शिलांग के पुलिस बाजार में पहुंच गया है। पहाड़ी शहरों में बडे मॉल तो बनाए भी नहीं जा सकते हैं ना। किसी जमाने में यहां पुलिस मुख्यालय होने के कारण लोग इसे पुलिस बाजार कहने लगे होंगे ऐसा प्रतीत होता है। शिलांग शहर के हर कोने में रहने वाले लोग शापिंग और खाने पीने के लिए पुलिस बाजार आते हैं। पुलिस बाजार में स्ट्रीट शापिंग का भी आनंद लिया जा सकता है। फुटपाथ पर बड़ी संख्या में दुकाने हैं। आसपास की कई गलियों में भी अच्छा खासा बाजार है।

तांबुल और भोजपुरी - पुलिस बाजार में सुबह से ही फुटपाथ पर तांबूल की दुकानें सजी नजर आती हैं। तांबूल बेचने वाली ज्यादातर महिलाएं हैं। कुछ खासी हैं तो कई भोजपुरी बोलने वाली। ये भोजपुरी बोलने वाली महिलाएं पूरी तरह से शिलांग की संस्कृति में भले रच बस गई हों पर जुबान पर वही भोजपुरी है। तांबुल बेच रही हैं और आपस में पटर पटर संवाद कर रही हैं। वैसे तांबुल मेघालय की संस्कृति का खास हिस्सा है। हरा पान और कच्ची सुपारी तांबुल का खास हिस्सा है। दस रुपये का एक तांबुल बिकता है। आप मेघालय में किसी के घर जाएं तो भी वे सम्मान मे तांबुल पेश करते हैं। महिलाएं और पुरुष सभी जमकर तांबुल खातें हैं और उनके दांत धीरे धीरे सड़ने लगते हैं।


पुलिस बाजार से आगे चलते हैं अब।  सही मायने में शिलांग का सबसे बड़ा बाजार है उसका नाम ही बड़ा बाजार है। यह पूरी तरह से स्थानीय बाजार है। पुलिस बाजार से इसकी दूरी ज्यादा नहीं है। पर इस बाजार में स्थानीय दुकानें हैं और सस्ती चीजें मिलती हैं। बड़ा बाजार में हर तरह की दुकाने हैं। अनाज, चावल दाल सब्जियां से लेकर सब कुछ। बड़ा बाजार में स्थानीय खासी लोगों की दुकानें ज्यादा हैं।

कई पीढ़ी से सिख रहते हैं पंजाबी कालोनी में - 
बड़ा बाजार से लगी हुई पंजाबी बस्ती है। यहां हजारों की संख्या में पंजाबी लोग रहते हैं। यहां पर इनका गुरुद्वारा भी है। पंजाबी समुदाय के लोग यहां कई सौ साल पहले आकर बस गए थे। पंजाब के सिख लोगों की जीने की इच्छा यानी जीजिविषा प्रेरणा लेने लायक होती है। ये लोग विपरीत परिस्थितियों व्यापार करना और जीना जानते हैं। हजारों पंजाबियों के लिए शिलांग अब घर बन चुका है।

पुलिस बाजार की गलियों में घूमते हुए मुझे राणी सती मंदिर नजर आता है। इसके ये अंदाज लगाया जा सकता है कि यहां राजस्थानी लोग भी बड़ी संख्या में हैं। यहां मारवाड़ी बासा होटल की मौजूदगी भी यही बताती है। बाजार में बाबा रामदेव (राजस्थान वाले) का मंदिर भी नजर आता है। यानी यहां पर राजस्थान के बाबारामदेव के भक्त भी बड़ी संख्या में है। अगर आपको मेघालय के हस्तशिल्प की खरीददारी करनी है तो पूरबाश्री के शोरुम में पहुंच सकते हैं। चींजें थोड़ी महंगी हैं पर हाथ से बनी चीजें भला सस्ती भी कैसे हो सकती हैं।

आईआईएम शिलांग- भारतीय प्रबंधन संस्थान की शिलांग शाखा है। आपको याद होगा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब का यहीं पर व्याख्यान देने के दौरान निधन हो गया था। अब देश में कुल 19 आईआईएम हो गए हैं, पर शिलांग का आईआईएम पुराना है। यह सातवें नंबर पर आता है। इसकी स्थापना 2004 में हुई। संस्थान का संचालन चीड़ के हरे भरे पेड़ों से आच्छादित मयूरभंज कांप्लेक्स में हो रहा है। यह मयूरभंज के राजघराने का निवास हुआ करता था।

नार्थ ईस्ट हिल यूनीवर्सिटी शिलांग – यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1973 में हुई। इसका मुख्य परिसर शिलांग में है तो दूसरा तुर्रा में। शिलांग में इसका कैंपस शहर से थोड़ा किनारे माउकिनरो में है। परिसर 1025 एकड़ में विस्तारित है। विश्वविद्यालय से संबंद्ध पूर्वोत्तर के 53 कालेज हैं।


( SHILLONG, MEGHALYA, PUNJABI BASTI, BHOJPURI, NEHU, IIM ) 

Sunday, February 21, 2016

शिलांग में लें उत्तर भारतीय खाने का स्वाद

वैसे तो मेघालय पूर्वोत्तर का वैसा राज्य है जहां ईसाई संस्कृति हावी है। पर यहां आपको उत्तर भारतीय भोजन का स्वाद लेने में कोई परेशानी नहीं आएगी। खास तौस पर शिलांग शहर में कई ऐसे भोजनालय और मिठाइयों की दुकानें है जहां पर उत्तर भारतीय भोजन का स्वाद ले सकते हैं। 

यहां शाकाहारी लोगों को भी नागालैंड या मिजोरम की तरह कोई परेशानी नहीं पेश आती है। शहर के व्यस्त बाजार में आप छोले भठूरे, पूरी सब्जी, रसगुल्ले, समोसे, खीरकदम आदि का स्वाद ले सकते हैं। यहां तक की स्ट्रीट फूड्स भी आजमा सकते हैं।  

सबसे पहले बाद पुलिस बाजार में स्थित दिल्ली मिष्टान भंडार की करते हैं। दिल्ली स्वीट्स शिलांग की मिठाइयों की सबसे लोकप्रिय दुकानों में से एक है। इतनी लोकप्रिय की यहां बैठने की जगह के लिए इंतजार करना पड़ जाता है। 

यहां की मिठाइयों का स्वाद बिल्कुल यूपी या दिल्ली जैसा है और दरें भी काफी वाजिब हैं। दिल्ली स्वीट्स के नाम पर मत जाएं यहां मिठाइयों के अलावा समोसा, चाट, पूड़ी, मासाला डोसा आदि सब कुछ मिल जाता है। बैठ कर खाने के अलावा टेक अवे यानी लेकर जाने का भी इंतजाम है। काउंटर पर हमेशा भीड़ रहती है। आपको आर्डर देकर इंतजार करना पड़ सकता है। दिल्ली स्वीट्स के चाट और समोसे का स्वाद लाजवाब है। साफ सफाई भी काफी बेहतर है। इन सबके बीच दरे भी वाजिब हैं। 30 रुपये की चाट की प्लेट का स्वाद याद रहता है।

लोकप्रिय है शिलांग का मारवाडी बासा – 

जैसा की नाम से ही जाहिर है मारवाड़ी बासा खाने के लिए बेहतरीन जगह है। यहां पर खाने की शाकाहारी थाली मिलती है। संभवतः यहां थाली 80 रुपये की है। हालांकि मैं जिस दिन पहुंचा मारवाड़ी बासा का भोजनालय बंद था। 

इसके प्रोपराइटर बाहर खड़े थे उन्होंने ही मुझे शाकाहारी थाली के लिए हरिओम भोजनालय जाने की सलाह दी। वैसे मारवाड़ी बासा शिलांग का आवासीय होटल भी है। यहां सस्ते आवासीय कमरे उपलब्ध हैं पर यहां के कमरे अटैच टायलेट वाले नहीं हैं। फिर भी शिलांग में रहने के लिए यह प्राइम लोकेशन पर सस्ती और अच्छी जगह है।

हरिओम होटल में दोपहर का खाना  मैं खाने की थाली की तलाश में हरिओम होटल पहुंचता हूं। यह क्विंटन रोड पर स्थित है। यह भोजनालय के साथ एक आवासीय होटल भी है। पर यहां खाने में थाली नहीं मिलती, आप अपनी पसंद के अलग अलग व्यंजन मंगा सकते हैं। मैं दोपहर में यहां खाने पहुंचा तो मैंने रोटी, दाल और मिक्स वेजीटेबल आर्डर किया. पर मैंने देखा काफी स्थानीय लोग यहां आकर दोपहर में भी पराठे का आर्डर दे रहे थे। शायद उनका पराठा लोगों को पसंद आता है। नीचे भोजनालय है तो उपर आवासीय होटल है। यहां पर भी सस्ते कमरे उपलब्ध हैं, पर कमरे अटैच टायलेट वाले नहीं हैं। पर हिंदी प्रदेश से आने वाले लोगो को ये होटल काफी पसंद है।

यूपी स्वीट एंड मीट – मुख्य बाजार में मुझे यूपी स्वीट एंड मीट दिखाई देता है। यहां पर कई किस्म की मिठाइयां उपलब्ध हैं। इसके साथ ही समोसे और पूड़ी आदि का भी आर्डर दे सकते हैं। यहां भी स्थानीय निवासी बड़ी संख्या में खाने पीने पहुंचते हैं। शिलांग के अन्य हिस्सों में भी उत्तर भारतीय खाने पीने के स्टाल और दुकाने हैं। 


लेडी हैदरी पार्क के बाहर आलू मूरी का स्वाद - 

शिलांग के लेडी हैदरी पार्क पास मिले एक युवक जो बिहार के वैशाली जिले के रहने वाले हैं। उनका घर लालगंज के पास गांव में है। मेरा बचपन वैशाली जिले मे गुजरा है इसलिए उनसे बातें करके भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है। यहां पर सालों से आलू मूरी बेचते हैं।

मूरी मतलब चावल का दाना यानी फरही। वे बताते हैं कि आलू उबालते हैं रोज रात को। उसमें मसाले मिलाते हैं। इसके बाद दिन भर मूरी (दाना) के साथ मिलाकर बेचते हैं। दस रुपये की एक प्लेट।  उनकी आलू मूरी के दीवाने स्थानीय खासी लोग भी इस कदर हैं कि पैक कराकर घर भी ले जाते हैं। वे साफ सफाई का काफी ख्याल रखते हैं। पैकिंग के लिए अच्छा सा डिब्बा भी देते हैं।

आलू मूरी का उनका ये काराबोर सीखने लायक है कि आप किसी नई जगह में जाकर भी अपने राज्य के खानपान की दुकानें खोल सकते हैं और वहां के लोगों में पंरपरा से हटकर स्वाद को लोकप्रिय बना सकते हैं। 
शिलांग में लेडी हैदरी पार्क के बाहर आलू मूरी बेचते बिहार के वैशाली जिले के युवक। 

वैसे पुलिस बाजार के चौराहे पर सुबह सुबह अंडा, आमलेट, पूड़ी, पराठे बेचने वालों की भरमार रहती है। इनमें से ज्यादातर दुकानदार बिहार के हैं।इन दुकानदारों में महिलाएं भी हैं जो सुबह सुबह फर्राटे से भोजपुरी बोलती हुई सुनाई देती हैं। मेघालय में रहते हुए वे भी जमकर तांबूल खाने लगी हैं, पर अपनी जुबान को नहीं भूली हैं। हालांकि यहां पर खाने के स्टाल पर साफ सफाई की थोड़ी कमी दिखाई देती है। बाकी आप जमकर खाइए पर अपने पेट का ख्याल रखिए। खाना तो आपको ही है मेरा काम तो सिर्फ बताना  है। 
 -vidyutp@gmail.com

( SHILLONG, FOOD, MARWARI BASA, HARI OM HOTEL) 


Saturday, February 20, 2016

मेघालय का सबसे बड़ा कैथोलिक चर्च - गोरोटो चापेल

शिलांग शहर में वैसे तो कई चर्च हैं पर इन सबके बीच सबसे बड़ा और खूबसूरत चर्च है कैथोलिक चर्च। कैथेड्रल ऑफ मेरी हेल्प ऑफ क्रिसचियन्स लाइतुमखारा ( LAITUMKHARAH) में स्थित है। चर्च सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। 

इस विशाल चर्च का निर्माण 1913 में कैथोलिक जर्मन मिशनरीज की ओर से किया गया। पर 1936 में यह चर्च आग में तबाह हो गया। उसी पुराने चर्च के अवशेषों पर नए चर्च का निर्माण 15 नवंबर 1947 को पूरा हुआ। इसके निर्माण में शिलांग के दूसरे बिशॉप स्टीफेन फेरांडो की बड़ा योगदान रहा। चर्च के दूसरी तरफ सड़क के उस पार प्रभू यीशू का बलिदान स्थल ( CALVARY)  बना है। इसकी भव्यता भी देखते ही बनती है। दोनों की ईमारतों का रंग आसमानी है। नीले रंग का यह चर्च अति विशाल है। 


आसमान के नीले रंग के साथ जोड़कर देखने पर यह प्रकृति की कोई शानदार चित्रकारी सा नजर आता है। मेघालय के जनजातीय खासी समाज के उत्थान में चर्च की बड़ी भूमिका रही है। भले ही चर्च ने खासी समाज को ईसाई बनाया हो पर उनके बीच शिक्षा के प्रसार में भी चर्च की बड़ी भूमिका रही है। चर्च परिसर में फोरोटो हेफेनमूलर एसडीएस की प्रतिमा लगी है जिसके नीचे उनका वाक्य लिखा है- ईफ वी कैन नॉट बिल्ड अप ए कम्युनिटी ऑफ खासी वी आर यूजलेस हियर...


चर्च परिसर में कैथोलिक इन्फारमेशन सेंटर और काउंसलिंग सेंटर की विशाल बिल्डिंग बनी है। परिसर में प्रभू यीशू के जीवन से जुडी कई झांकियां भी हैं। वहीं परिसर में विशाल बियांची मेमोरियल हाल भी बना है। सभी इमारतें मिलकर चर्च परिसर को काफी भव्यता प्रदान करती हैं। कैथेड्रल ऑफ मेरी हेल्प ऑफ क्रिसचियन्स देश के चंद सबसे खूबसूरत चर्च में से है।

दूर-दूर से आए सैलानी इस चर्च को देखने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। पूरे चर्च की नक्काशी को देखने के लिए आप एक घंटे का समय जरूर अपने पास रखें। कैथोलिक चर्च गोरोटो चापेल चर्च में रविवार को सुबह 7 बजे अंगरेजी में और सुबह 10 बजे हिंदी में प्रार्थना होती है।
-vidyutp@gmail.com  
(SHILLONG, CHURCH, LAITUMKHARAH 

Wednesday, February 17, 2016

शिलांग की चोटी – यहां से शहर को देखो

लेटकोर पीक यानी शिलांग पीक। यहां से पूरे शिलांग शहर का नजारा देखना अदभुत अनुभव है। चोटी से जो विहंगम नजारा दिखाई देता है उसे आप कभी भूल नहीं सकते। वास्तव में ये शिलांग की सबसे ऊंची जगह है। पूरे शिलांग शहर की तुलना में यहां ठंड भी थोडी ज्यादा रहती है। सुबह से लेकर शाम तक सूरज की चटकीली धूप में शिलांग पीक से शहर को अलग अलग कोण से निहारिए। हर कोण से एक नया शहर दिखाई देता है। यही कारण है शिलांग आने वाले लोग यहां जरूर पहुंचते हैं और उस हरे भरे हिल स्टेशन को निहारते हैं। शिलांग पीक की ऊंचाई 1965 मीटर यानी 6446 फीट है ।

 यह न सिर्फ शिलांग का बल्कि पूरे मेघालय का सबसे ऊंचा प्वाईंट है। यहां से बांग्लादेश की सीमा भी दिखाई दे जाती है। वास्तव में मेघालय देश के सबसे पूराने पर्वत श्रंखला का हिस्सा जो कोयला और लोहा से भरपूर है। शिलांग पीक का वास्तविक नाम लेटकोर है। यह मूल शिलांग शहर यानी पुलिस बाजार से 15 किलोमीटर के आसपास दूरी पर स्थित है।
वास्तव में शिलांग पीक लेटकोर में स्थित वायु सेना के स्टेशन के अंदर स्थित है। इसलिए यहां पहुंचने वालों को कड़ी जांच पड़ताल से गुजरना पड़ता है। सिर्फ स्थानीय टैक्सियां ही वायुसेना स्टेशन के प्रवेश द्वार के अंदर जा सकती है। प्रवेश द्वार पर ड्राईवर का ड्राईविंग लाइसेंस जमा कर लिया जाता है। सैलानी का आई कार्ड चेक किया जाता है।

 एयर स्टेशन के प्रवेश द्वार और अंदर वायुसेना स्टेशन के इमारतों की फोटोग्राफी भी प्रतिबंधित है। आप शिलांग पीक से नजारों की चाहे जितनी मर्जी फोटो लें उस पर कोई रोक नहीं है। शिलांग पीक पर कार पार्किंग का टिकट सैलानी को देना पड़ता है। यहां खाने पीने का कोई इंतजाम नहीं है। बहुत ज्यादा वक्त तक रुकने भी अनुमति नहीं है। वायुसेना स्टेशन के अंदर एक केंद्रीय विद्यालय लेटकोर भी है। वायुसेना कर्मियों के परिवार के बच्चों के लिए इस स्कूल की स्थापना 1985 में हुई।  यहां वायु सेना का रडार स्टेशन भी है।


बारिश के दिनों में शिलांग पीक पर बादल दिखाई देते हैं तो सरदी की सुबह में यहां बर्फ की हल्की सी चादर भी जमी हुई दिखाई देती है। शिलांग पीक पर भी आप परंपरागत खासी परिधान में फोटो खिंचवा सकते हैं। इसके लिए थोड़ा सा किराया देना पड़ेगा।

शिलांग पीक पर फोटो खींचते समय एक सज्जन मिलते हैं जो अपने मोबाइल कैमरे से मुझे फोटो खींचने का आग्रह करते हैं। मैं फोटो खींचने के साथ उनका परिचय पूछता हूं। पता चला बिहार के रहने वाले हैं और यहीं लोकटर वायुसेना स्टेशन में कार्यरत हैं। तीन से यहां पर हैं। पर अब तबादला हो गया है। इसलिए आखिरी दिन शिलांग पीक पर अपनी फोटो लेकर यहां के निवास को यादगार बनाना चाहते हैं।

सचमुच कोई जगह छोड़ना हो तो उसका असली महत्व पता चलता है। रास्ते में वायुसेना का एक और परिवार मिलता है जो बताता है कि सुबह लेटकोर में तेज ठंड पड़ती है। साथ ही यहां से शहर जाने के लिए वाहनों की बहुत कमी है।

वांकी के साथ शिलांग पीक की ओर....

कैसे पहुंचे – शिलांग के बाजार से शिलांग पीक पहुंचने के लिए आपको टैक्सी बुक करनी पड़ेगी। सार्वजनिक वाहन से यहां पहुंचने का इंतजाम नहीं है। आप शिलांग भ्रमण के पैकेज में भी शिलांग पीक को शामिल करके टैक्सी बुक कर सकते हैं। मैंने लेडी हैदरी पार्क के गेट पर शिलांग पीक और एलीफैंट फॉल्स जाने के लिए एक टैक्सी बुक की। 

मुझे पूरा शिलांग घूमाने वाले टैक्सी ड्राईवर वांकी हैं। वे खासी समुदाय से आते हैं। अपनी टैक्सी से लोकल साइट के अलावा सैलानियों को चेरापूंजी भी ले जाते हैं। मस्त आदमी हैं उनका फोन नंबर है -87229 54465 वे फेसबुक और वाट्सएप पर भी हैं। आप शिलांग चेरापूंजी घूमने के लिए उनकी सेवाएं ले सकते हैं। उनके साथ घूमते हुए मजा आएगा।  
- vidyutp@gmail.com 
 ( SHILLONG PEAK, AIR FORCE, STATION ) 

Monday, February 15, 2016

हरे-भरे पार्कों का खुशनुमा शहर शिलांग

वार्ड लेक पार्क, बोटानिकल गार्डन, लेडी, हैदरी पार्क, एलिफैंट फाल्स पार्क जैसे तमाम सुंदर पार्कों से सुसज्जित शिलांग शहर को पार्कों का शहर कहें तो गलत नहीं होगा। इन पार्कों में सुबह की हवा दिलोदिमाग को काफी सुकुन पहुंचाती है। सुबह सुबह पुलिस बाजार पहुंचने के बाद मैंने जानना चाहा आसपास में क्या देखा जा सकता है। चौराहे पर एक तरफ ऐतिहासिक ब्रह्म समाज का भवन और उसका गेस्ट हाउस नजर आया। यहां ब्रह्म समाज की स्थापना 1894 में हुई थी। ऐसा इसका साइन बोर्ड बता रहा है। इस भवन में एक गेस्ट हाउस भी है। साथ ही रविंद्र नाथ टैगोर की याद में टैगोर मेमोरियल लाइब्रेरी भी है। इसके ठीक दूसरी तरफ पुलिस बाजार चौराहे पर मेघालय की विधानसभा का नन्हा सा सुंदर भवन दिखाई देता है। विधानसभा भवन से जुड़ा उसका प्रशासनिक ब्लाक और उसकी लाइब्रेरी भी है। विधानसभा भवन के गेट पर उसका एक चौकीदार तैनात है। किसी जमाने में मेघालय का विधानसभा भवन लकड़ी का हुआ करता था पर उसमें आग लग गई।

घोड़े के खुर के आकार का वार्ड लेक -
विधानसभा देखकर आगे बढ़ने पर लोगों ने बताया कि महज 200 मीटर की दूरी पर सुंदर वार्ड लेक है। मैं टहलते हुए वहां पहुंच जाता हूं। असम के दो बार चीफ कमिश्नर रहे सर विलियम एर्सकिन वार्ड के नाम पर इस सुंदर झील का नाम रखा गया है। यह झील घोड़े के खुर के आकार की है। झील के किनारे किनारे सुंदर पेड़ और फूलों की क्यारियां बनी हैं।

 आरामतलब तरीके से सुबह सुबह ठहलने के लिए बेहतरीन जगह है। दिल करे तो यहां झील में बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। झील के बीचों बीच एक पुल बना है जहां से झील का विहंगम नजारा दिखाई देता है। यहां आप मछलियों को दाना भी डाल सकते हैं। यह झील 1880 से 1894 के बीच बनी है। इस झील को लेकर एक दिलचस्प कथा है।

 ऐसे बना वार्ड लेक - एक खासी कैदी जिस्मत चीनी को जयंतिया हिल्स से पकड़ कर शिलांग जेल में डाला गया। उसने जेल में कुछ शारीरिक श्रम करने की इच्छ जताई। उसे जमीन के एक हिस्से में खुदाई का काम दिया गया। कुछ दिनों तक खुदाई करते करते पानी निकल आया। उसने जेल अधिकारियों को ये जानकारी दी। तब कर्नल हापकिंसन ने खुदाई जारी रखने के आदेश दिए। इस तरह झील आकार लेने लगी। बाद में असम के चीफ कमिश्नर सर विलियम एर्सकिन वार्ड ने निजी रुचि लेकर झील का सौंदर्यीकरण कराया। पूर्वोत्तर का सुंदर हिल स्टेशन होने के कारण ब्रिटिश अधिकारियों को शिलांग हमेशा से पसंद रहा है। 1893-94 के दौरान झील बनकर पूरी तरह तैयार हो गई। ब्रिटिश राज में शिलांग पूरे असम का मुख्यालय था और यह एक चीफ कमिश्नर के शासन में था।


वार्ड लेक के बगल में एक पुराना बोटानिकल गार्डन भी है। इसमें कई तरह के पेड़ लगे हैं। इसमें टहलते हुए आपको प्रदूषण मुक्त आबोहवा मिलती है। वार्ड लेक में प्रवेश टिकट 10 रुपये का है। कैमरा के लिए 20 रुपये का टिकट अलग से लेना पड़ता है।



एक टिकट में कई मजा लें लेडी हैदरी पार्क में

शिलांग शहर का दूसरा लोकप्रिय पार्क है लेडी हैदरी पार्क। यह पुलिस बाजार से तकरीबन दो किलोमीटर है। इस पार्क का नाम असम के चीफ कमिश्नर की पत्नी लेडी हैदरी के नाम पर रखा गया। पार्क तकरीबन एक किलोमीटर में फैला है। 

इस पार्क में  लंबे हरे भरे पथ के साथ पार्क में सुंदर जलाशय है जिसमें पक्षी कलरव करते नजर आते हैं। इसके अलावा एक मिनी चिड़िया घर भी है जिसमें कई तरह के पशु पक्षी हैं। बच्चों को यह पार्क खूब पसंद आता है। चिड़िया घर में पक्षियों की 73 प्रजातियां हैं। 

पार्क में आर्किड समेत कई स्थानीय पेड़ पौधे हैं जिन्हें जापानी स्टाईल में नियोजित किया गया है। लेडी हैदरी पार्क को सुंदर गुलाब के फूलों के लिए जाना जाता है। पार्क में बच्चों के खेलने के लिए खास कोना बनाया गया है। पार्क के एक हिस्से में बटरफ्लाई म्युजियम भी बना है जो प्राणी विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए खास आकर्षण है। परिवार और दोस्तो के साथ कुछ घंटे गुजारने के लिए बेहतरीन जगह है ये।

 वैसे तो पार्क सालों भर खुला रहता है पर सर्दियों में घूमने का अपना मजा है। बटरफ्लाई म्यूजियम देखना है तो 11 से 4 के बीच ही पहुंचे। पार्क में प्रवेश का टिकट 10 रुपये और कैमरे का 20 रुपये का टिकट है। पार्क के गेट पर खाने पीने की चीजें उपलब्ध हैं।

तीन झरनों वाला एलिफैंट फॉल्स ( हाथी झरना ) 





शिलांग की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक एलीफैंट फॉल्स। यहां प्रवेश द्वार से अंदर जान के बाद एक के बाद एक तीन झरने हैं। इन झरनों को सौंदर्य का रसपान करने के लिए आपको थोड़ा वक्त तो यहां देना ही पड़ेगा।

प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है पर इसकी खूबसूरती के सामने वह राशि तो कुछ भी नहीं है। वैसे तो खासी लोगों ने इन झरनों का नाम अपनी भाषा में तीन कदम वाला झरना रखा था। पर ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे देखा तो इसका नाम एलिफैंट फाल्स रख दिया क्योंकि इन झरनों के सामने जो पहाड़ी है उसका आकार हाथी जैसा है।

पर 1897 में आए एक भूकंप में वह पहाड़ी बरबाद हो गई। पर इन झरनों का नाम एलिफैंट फाल्स तो रह ही गया। आप जब एलिफैंट फॉल्स के पास जाएं तो वहां परंपरागत खासी परिधान में सज कर फोटो यादगारी फोटो भी खिंचवा सकते हैं।
शिलांग का एलिफैंट फाल्स - हर वक्त रहता है गुलजार। 


शिलांग का एलिफैंट फाल्स - हर वक्त रहता है गुलजार।