Saturday, March 29, 2014

आधा आना में मोनो रेल का सफर ((03 ))

पंजाब के पटियाला स्टेट मोनो रेल में सफर के लिए 1908 में किराया महज आधा आना हुआ करता था। यह किराया पूरे सफऱ के लिए था। जबकि माल ढुलाई का किराया एक आना से शुरू होता था। इसके 1927 में बंद होने तक किराया यही रहा। सरहिंद मोरिंडा लाइन में 1908 में तकरीबन 20 हजार लोग इस रेल पर हर महीने सफर किया करते थे।


कनक यानी गेहूं की ढुलाई - पटियाला मोनो रेल जिस मार्ग पर चलती थी वह पंजाब का कनक ( गेहूं) उत्पादन करने वाला इलाका है। इस रेल से न सिर्फ लोग सवारी करते थे बल्कि इसमें कनक भी ढोई जाती थी।

बंदी की ओर पटियाला मोनो रेल  1912 के बाद पंजाब की सड़कों पर मोटर वाहन आने लगे थे। सड़कों पर तेज गति वाले मोटर आ जाने के कारण 1927 आते आते मोनो रेल की लोकप्रियता काफी कम हो गई थी। लिहाजा इस सेवा को 1 अक्तूबर 1927 को महाराजा ने बंद करवा दिया। इसके बाद 1938 में महाराजा भूपिंदर सिंह की मौत हो गई। पर इसके कोच और इंजन कई दशक तक पटियाला के पीडब्लूडी शेड में अपनी जगह पर ही आराम फरमाते रहे।

रेल म्यूजिम में पटियाला मोनो रेल
यह संयोग है कि पटियाला मोनो रेल का एक इंजन और एक कोच आज भी चालू हालत में नई दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित नेशनल रेल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसके सवारी डिब्बे पूरी तरह लकड़ी के बने हुए थे। जो किसी बग्घी के जैसे लगते हैं।


रेलों के इतिहास में रूचि रखने वाले लेख मि. माइक स्टा ने 1962 में इन्हें ढूंढा। बाद में उनके प्रयास से पटियाला मोनो रेल के कोच और लोको को अमृतसर में रेल यार्ड में संरक्षित किया गया। दिल्ली में रेल म्यूजियम बनाए जाने के बाद इसे दिल्ली लाया गया। इसका इंजन पीएसएमटी 4 रेल म्यूजियम में आराम फरमा रहा है। लंबे समय तक रेल संग्रहालय में इसे हर रविवार को छोटे से मार्ग पर चलाया जाता था। 

फिल्मों में पटियाला मोनो रेल - 1980 में आई बीआर चोपड़ा की लोकप्रिय  फिल्म द बर्निंग ट्रेन में पटियाला के मोनो रेल को चलता हुआ देखा जा सकता है। रेलगाड़ी पर केंद्रित इस फिल्म की कहानी के शुरुआती दृश्यों में ही मोनो रेल पर बच्चे चलते हुए दिखाए जाते हैं। इस फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग दिल्ली के नेशनल रेल म्यूजियम में की गई थी। 
-- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( Email - vidyutp@gmail.com) 
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 


Friday, March 28, 2014

पटियाला मोनो रेल का 80 किलोमीटर का सफर ((02))

पटियाला स्टेट मोनो रेल का कुल नेटवर्क 80 किलोमीटर का था। इसमें दो लाइनें थी। पहली लाइन सरहिंद से मोरिंडा के बीच 24 किलोमीटर की थी। इसे रोपड़ तक आगे बढ़ाने का प्रस्ताव था जो आकार नहीं ले सका। दूसरी लाइन 56 किलोमीटर की थी जो पटियाला से सुनाम के बीच चलाई गई थी। इस लाइन का निर्माण मुंबई की मार्सलैंड एंड प्राइस नामक कंपनी ने किया था। तब ट्रैक बिछाने में 70 हजार रुपये का खर्च आया था। 

हालांकि आज की तारीख में इस ट्रैक का कोई स्मृति चिन्ह पटियाला, सुनाम, सरहिंद, मोरिंडा मार्ग पर नजर नहीं आता है। हालांकि इस लाइन के निर्माण से जुडे चीफ इंजीनियर कर्नल बावेल एक पत्र में लिखते हैं कि 
पटियाला शहर की लाइन नार्थ वेस्टर्न रेलवे के माल गोदाम से आरंभ होती थी। इसके बाद लाइन पटियाला शहर में मुख्य रेलवे लाइन को क्रास कर शहर की मंडी से होते हुए कैंटोनमेंट इलाके में जाती थी। वहां से भवानीगढ़ होते हुए सुनाम तक जाती थी।  

पहले खींचते थे खच्चर – पटियाला मोनो रेल को खींचने के लिए लंबे समय तक खच्चरों का इस्तेमाल किया गया है। राजा के अस्तबल में बड़ी संख्या में खच्चर थे, जिन्हें मोनोरेल को खींचने के लिए लगाया गया। दरअसल ये खच्चर युद्धकाल के लिए लाए गए थे। पर इनके खाली होने के कारण इनका इस्तेमाल परिवहन में किया गया। ऐसा पता चलता है कि पटियाला से सुनाम वाली लाइन  में स्टीम इंजन का इस्तेमाल किया गया। जबकि सरहिंद मोरिंडा लाइन के कोच को खच्चर ही खींचते रहे। पहले स्टीम इंजन का इस्तेमाल पटियाला स्टेशन और शहर की मंडी के बीच के एक किलोमीटर मार्ग में किया गया।

मोनो रेल का लोको ( इंजन) – पटियाला मोनो रेल में 0-3-0 माडल का लोको इस्तेमाल हुआ।ये ओरेनस्टीन एंड कोपेल ( ओ एंड के) द्वारा बनाया गया था। बर्लिन की कंपनी से इंजन 500 और 600 पाउंड में खरीदा गया था। डोनाल्ड डब्लू डीकेन्स अपने लेख में लोको के बारे में बताते हैं कि दाहिने तरफ का वाटर टैंक बड़ा था इसलिए इंजन का वजन लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर शिफ्ट कर जाता था। पटरी वाले  पहिए का व्यास 39 ईंच ( 990एमएम ) था। लोको पायलट के खड़े होने की जगह में अच्छा खासा केबिन स्पेस था।

मोनो रेल के कोच – पटियाला मोनो रेल के कोच 8 फीट लंबे और 6 फीट चौड़े थे। 1908 में पटियाला मोनो रेल के पास 15 पैसेंजर कोच और 75 मालगाड़ी के डिब्बे थे। इन डिब्बों का इस्तेमाल कनक (गेहूं) की ढुलाई के लिए भी किया जाता था। इनमें कुछ माल गाड़ी के डिब्बे ऐसे भी थे जिन्हें जरूरत पड़ने पर सवारी डिब्बे में भी बदल दिया जाता था। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 

Thursday, March 27, 2014

राजा पटियाला ने चलवाई अनूठी मोनो रेल (01)

मोनो रेल मतलब एक पहिए पर चलने वाली रेल। मुंबई में 2 फरवरी 2014 से आसमान में खंभो पर चलने वाली मोनो रेल सेवा आरंभ हुई है। पर हम मोनो रेल के इतिहास में जाएं तो मूल रूप से मोनो रेल मतलब जिसका एक पहिया लोहे की पटरी पर चलता हो और दूसरा पहिया सड़क पर। इस तरह की मोनो रेल भारत में सबसे पहले महाराजा पटियाला ने अपने रियासत में चलवाई थी। मजे की बात कि इस मोनो रेल को पहले कोई इंजन नहीं बल्कि खच्चर खींचते थे। बाद में इसमें स्टीम इंजन लगाया गया।

पटियाला रियासत में मोनो रेल सेवा 1907 में आरंभ हुई और दो दशक तक अपनी सेवा देती रही। इसे 1927 में बंद कर दिया गया। कुल 80 किलोमीटर रेल सेवा के लिए दो लाइनें बिछाई गई थीं। इसकी कंपनी का नाम पटियाला स्टेट मोनो रेल ट्रामवे ( पीएसएमटी) था।

केरल के मुन्नार में कांडला वैली रेलवे के बाद ये भारत की अपने तरह की दूसरी मोनो रेल सेवा थी। हालांकि 1908 में कांडला वैली मोनो रेल के नैरोगेज में बदल दिया गया पर पटियाला मोनो रेल 1927 तक सरपट दौड़ती रही।
महाराजा भूपिंदर सिंह का कोशिश रंग लाई - महाराजा सर भूपिंदर सिंह को अपने राज्य की जनता के लिए अनूठी रेल सेवा शुरू करने का ख्याल आया। इस परियोजना के चीफ इंजीनियर कर्नल सी डब्लू बावेल्स बनाए गए। कर्नल बावेल्स इस तरह के मोनो रेल तकनीक का प्रयोग पहले भी बंगाल नागपुर रेलवे में माल ढुलाई के ट्रैक के लिए कर चुके थे। महाराजा भूपिंदर सिंह ने उन्हें पीएसटीएम प्रोजेक्ट का मुख्य इंजीनियर नियुक्त किया। इस रेल के बग्घियों के खींचने के लिए रियासत में पाले गए 560 खच्चरों का इस्तेमाल किया गया। खच्चरों के अलावा इस मोनो रेल में बैलों और सांडों का भी इस्तेमाल किया गया।

पीएसएमटी के बारे में  1908 के इंपेरियल गजट के अलावा छपी हुई जानकारी कहीं नहीं मिलती है। इसमें लिखा गया है कि 1907 में एक मोने रेल सेवा आरंभ की गई है जो मोरिंडा को सरहिंद शहर से जोड़ती है।
दिल्ली के नेशनल रेल म्युजियम में संरक्षित पटियाला मोनोरेल का लोकोमोटिव। 

अनूठा एविंग सिस्टम – पटियाला मोनो रेल के संचालन में एविंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसमें किसी कोच का 95 फीसदी भार लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर पड़ता है जबकि महज 5 फीसदी भार सड़क पर चलने वाले पहिए पर पडता है। इस तरह संतुलन बना रहता है। जबकि समान्य रेल गाड़ियों में बराबर बराबर भार रेल के दोनो पटरियों पर चलने वाले पहियों में बंट जाता है। लोहे की पटरी पर चलने वाला पहिया छोटा था जबकि सड़क पर चलने वाला बड़ा।

मोनो रेल में समान्य रेल की तरह डिरेलिंग यानी पटरी से उतर जाने की समस्या नहीं रहती है। इसके साथ ही सड़क का समतल होना भी काफी जरूरी नहीं होता। साथ ही मोनो रेल की पटरियां बिछाने का खर्च भी समान्य रेल से काफी कम आता है। मोनो रेल को परंपरागत रेल से घुमाव के लिए कोण भी बहुत कम चाहिए।

पटियाला मोनो रेल पटियाला शहर के घनी आबादी के बीच भी आसानी से चलती थी। इससे सड़क पर चल रहे समान्य ट्रैफिक को कोई दिक्कत नहीं आती थी। मोनो रेल की ये तकनीक वास्तव में आज भी उन इलाकों के लिए लाभकारी हो सकती है जो भीड़ भाड वाले इलाके हैं जहां जगह की कमी के कारण मेट्रो ट्रेन या फिर ट्राम चलाना संभव नहीं है।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 

Tuesday, March 25, 2014

बच्चा बाबू का जहाज और एलसीटी सेवा

पहलेजा घाट पर पीएस गोमती ( फोटो सौ - आर वी स्मिथ) 
महात्मा गांधी सेतु बनने से पहले रेलवे स्टीमर के अलावा पटना और पहलेजा घाट के बीच लोगों के लिए दो और स्टीमर सेवा चलती थी। बांस घाट से बच्चा बाबू की स्टीमर सेवा भी काफी लोकप्रिय थी। बच्चा बाबू सोनपुर के रईस थे जिनकी निजी कंपनी बांस घाट से पहलेजा घाट के बीच स्टीमर सेवा का संचालन करती थी। बड़ी संख्या में लोग इस सेवा से भी आते जाते थे। जब लोग राजधानी पटना से सफर करके अपने गांव पहुंचते लोग हालचाल के साथ ये भी पूछते कौन से जहाज से आए तो लोग जवाब देते बच्चा बाबू के जहाज से।

जहाज के इस सफर में इंतजार और सफर में काफी वक्त जाया हो जाता था। इसलिए पढाकू विद्यार्थी अपनी किताबें खोलकर जहाज में पढ़ने बैठ जाते थे। समय का सदुपयोग करने के लिए। वहीं पटना के कुर्जी के पास मैनपुरा से चलती थी गंगा एलसीटी सर्विस की सेवा। 

अरे सब कुछ लाद दो - एलसीटी मतलब लैंडिग क्राफ्ट टैंक। ऐसी फेरी का इस्तेमाल माल ढुलाई के लिए किया जाता था। तो गंगा एलसीटी सर्विस पटना और पहलेजा के बीच माल ढुलाई का महत्वपूर्ण साधन थी। इसके आधार तल पर माल लोड किया जाता था वहीं ऊपरी तल पर लोग सफर करते थे। आधार तल पर दो ट्रक, कुछ जीप, ढेर सारा खाने पीने का सामान, मोटर साइकिलें आदि बुक करके लादी जाती थीं। वहीं एलसीटी सेवा से सोनपुर मेले के समय बड़ी संख्या में हाथी घोडे और दूसरे जानवर भी लादकर इस पार से उस पार लाए जाते थे।

हमने अपनी मोटरसाइकिल भी लाद दी - मुझे याद है एलसीटी सेवा से कई बार हमलोग अपनी प्यारी राजदूत मोटर साइकिल को लादकर पटना आते थे। इसका फायदा ये था कि बाइक से पहलेजा घाटतक पहुंचो। बाइक को जहाज में लाद दो खुद भी उसी जहाज में सवार हो जाओ। जब पटना पहुंचो तो अपनी बाइक उतारो और पटना में जहां जाना है निकल पड़ो। पर गंगा एलसीटी सर्विस लोगों में इतनी लोकप्रिय थी कि इसपर वाहन लादने के लिए नंबर लगता था। कई बार क्षमता के बराबर भर जाने पर आपको अगली सेवा के लिए 4 से 6 घंटे इंतजार भी करना पड़ता था।

हम यूं मान सकते हैं कि गंगा एलसीटी सेवा एक समय में पटना में गंगा नदी पर एक बंदरगाह की तरह हुआ करता था। अब ये सेवा बंद हो चुकी है। पर पटना के मैनपुरा में एलसीटी घाट नाम से इलाके का नाम अब भी मशहूर है। जहाज नहीं है बंदरगाह नहीं पर नाम में उसकी स्मृतियां कायम है।  
एलसीटी के लिए पटना में इस्तेमाल में लाए जाने वाले जहाज मूल ब्रिटिश रॉयल नेवी की ओर विकसित किए गए थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इनका कई जगह इस्तेमाल हुआ। पहले इनका नाम टैंक लैंडिग क्राफ्ट हुआ करता था। बाद में अमेरिका नामकरण प्रणाली के मुताबिक इनका नाम एलसीटी (लैंडिंग क्राफ्ट वेसल) हो गया।
पटना के पास गंगा में गंडक और सोन नदियों का संगम होता है....

कुलियों की मारामारी- कोई भी जहाज जब अपने मंजिल तक पहुंचने वाला होता था। चाहे पहलेजा की तरफ हो या फिर पटना तरफ। जहाज किनारे लगने से पहले ही बड़ी संख्या में कुली पानी में  कूद कूद कर तेजी से चारों तरफ से जहाज में घुस आते थे। मानो वे जहाज पर हमला करने आए हों। उसके बाद वे अपने ग्राहकों की तलाश में जुट जाते किसे कुली चाहिए। जो हां कहता उसके सामान पर कब्जा कर लेते। दूसरी कक्षा के छात्र के तौर पर अक्तूबर 1978 में जब हमारा रेलवे स्टीमर अंधेरी सुबह में पहलेजा घाट पर किनारे लगा तो कुलियों की मारामारी देखकर मेरा बाल मन भयाक्रांत हो गया। पर यह तो उनकी रोज की दिनचर्या थी। पापी पेट का सवाल जो था।
  
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
(GANGA, BIHAR, PATNA, PAHLEJA GHAT, STEAMER) 

Monday, March 24, 2014

महेंद्रू से पहलेजा घाट - रेलवे की स्टीमर सेवा

पहलेजा घाट पर खड़ा स्टीमर पीएस गोमती ( फोटो सौ- राबर्ट वी स्मिथ) 
उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को जोड़ने के लिए पटना के महेंद्रू घाट से सोनपुर के पास पहलेजा घाट के बीच रेलवे की स्टीमर सेवा काफी लोकप्रिय थी। महेंद्र घाट से हर रोज सुबह 3.50, सुबह 8.30, दोपहर 11.15 13.10, शाम 17.30 रात 20 50 और 23.30 रात्रि में आखिरी स्टीमर सेवा पहलेजा घाट के लिए खुलती थी। महेंद्रू से पहलेजा घाट का सफर नदी की धारा के विपरीत था। ये रास्ता स्टीमर डेढ़ घंटे में तय करता था।

वहीं पहलेजा घाट से पटना आने में स्टीमर को एक घंटे 10 मिनट का समय लगता था। पहलेजाघाट से सुबह 5.30 में पहली स्टीमर सेवा खुलती थी। इसके बाद 8.50, 11.15, 14.00, 17.45, 21.35 और रात के 23.30 बजे आखिरी स्टीमर सेवा चलती थी। ये समय अक्तूबर 1977 में प्रकाशित न्यूमैन इंडियन ब्राड शा के मुताबिक हैं। पटना जंक्शन से सोनपुर तक के रेल टिकट पर दूरी 42 किलोमीटर अंकित रहती थी। हालांकि ये दूरी बिल्कुल सही नहीं कही जा सकती थी। पहलेजा घाट से सोनपुर रेलवे स्टेसन की दूरी 11 किलोमीटर थी।

पटना के महेंद्रू घाट की तरफ गंगा नदी की धारा होती थी। इसलिए स्टीमर से सड़क बिल्कुल पास होता था। पर पहलेजा घाट से पहलेजा रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए गंगा की रेत पर आधा किलोमीटर से कुछ अधिक चलना पड़ता था।

गंगा में गोमती और यमुना – रेलवे की ओर संचालित दो स्टीमरों के नाम पीएस गोमती और पीएस यमुना हुआ करता था। दोनों स्टीमर पहलेजा घाट और महेंद्रू घाट के बीच अनवरत सेवाएं दिया करते थे। गोमती का निर्माण कलकत्ता की स्टीमर कंपनी डिस्टांट ने किया था। (  अ हिस्ट्री आफ इंडियन म्यूटिनी, जार्ज डब्लू फारेस्ट )
अपने सफर पर स्टिमर (  फोटो सौ- राबर्ट वी स्मिथ) 
रेल न्यूज विक्टोरिया के संपादक राबर्ट बी स्मिथ ने अपने महेंद्रू से पहलेजा के एक स्टीमर सफर के दौरान इन स्टीमर की तस्वीरें संग्रहित की। उन्होंने इस सफर को शानदार बताया और स्टीमर सेवा की खूब तारीफ की थी।

इस फेरी सेवा का स्टीमर इसलिए कहते थे क्योंकि ये भाप इंजन से संचालित किए जाते थे। स्टीमर में कोयला जलाकर भाप तैयार किया जाता था जिसकी शक्ति से स्टीमर के पानी को काटने वाले चप्पू तेज गति से चलते थे। कई कुली बहाल थे जो बायलर से कोयला जलने के बाद राख को बाल्टी से निकाल कर तेजी से दूसरी तरफ रखते जाते थे।
गंगा में सफर पर पीएस गोमती   (फोटो सौ- राबर्ट वी स्मिथ) 

फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास – स्टीमर में दो क्लास थे। नीचे का सारा  हिस्सा सेकेंड क्लास होता था। बैठने के लिए कोई बेंच कुरसी नहीं चाहे जहां मर्जी बैठ जाओ। खड़े रहो या फिर जहाज में घूमते फिरते रहो। सेकेंड क्लास में आमतौर पर काफी भीड़ रहती थी। बड़ी संख्या में सामान बेचने वाले वेंडर भी होते थे। वहीं उपरी मंजिल पर फर्स्ट क्लास का केबिन था। इसमें बैठने के लिए गद्देदार बेंच बने हुए होते थे। मुझे याद है कि हमलोग सेकेंड क्लास का टिकट लेकर ही पटना से पहलेजा घाट जाते थे। पर मैं जहाज में जाने के बाद पूरे जहाज में चहल कदमी करता था। पिताजी मुझे जहाज में कहीं भी घूमने की छूट दे दे देते थे। तो मैं सीढ़ियां चढ़कर फर्स्ट क्लास में भी चला जाता था। उसके ऊपर जहाज के कप्तान का केबिन होता था। मैं उसके करीब जाकर उन्हें जहाज को चलाते हुए देखकर आनंदित होता था। जब बोर होने लगता तो जहाज के डेक पर चला जाता और पानी को पीछे की ओर भागते हुए देखता था। इसमें काफी आनंद आता था। जब घाट नजदीक आने लगता तो फिर जहाज में पिताजी को ढूंढ कर उनके पास पहुंच जाता था। रेलवे के स्टीमर में एक कैंटीन भी हुआ करती थी। वहां चाय बिस्कुट और हल्का नास्ता मिल जाता था।
  
साल 1982 के बाद गंगा में पुल बन जाने पर रेलवे की ये स्टीमर सेवा बंद हो गई। उसके बाद इन जहाजों का क्या हुआ। लंबे समय तक यू हीं खड़ी रहीं। बाद में उन्हें पर्यटन के लिए इस्तेमाल किए जाने की योजना बनी।

-    ----- विद्युत प्रकाश मौर्य 
(GANGA, BIHAR, PATNA, PAHLEJA GHAT, STEAMER) 

Sunday, March 23, 2014

पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह सैंया..

पटना से पहलेजा घाट वाया स्टीमर
पानी के जहाज पर पहला सफर भला कौन भूल सकता है। भोजपुरी में शारदा सिन्हा का लोकप्रिय गीत है...पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह सैंया... तो पहले उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार के बीच पानी का जहाज ही चलता था। पटना हाजीपुर के बीच गंगा नदी पर 1984 में महात्मा गांधी सेतु पुल बनने से पहले राजधानी पटना से उत्तर बिहार जाने का एक मात्र साधन स्टीमर थे। तब छपरा, सोनपुर, हाजीपुर के लोगों को राजधानी पटना पहुंचने में स्टीमर या नाव से लंबा वक्त लग जाया करता था। पटना के दीघा घाट से पहलेजा घाट के बीच निर्माणाधीन रेल सह सड़क पुल के आरंभ हो जाने के बाद एक नए युग की शुरूआत हो चुकी है।

तीन जगह से स्टीमर सेवा - 1984 से पहले पटना के गंगा घाट पर तीन अलग अलग जगह से स्टीमर चलते थे। पटना के बीएन कालेज के पास महेंद्रू घाट से रेलवे की ओर से संचालित स्टीमर चलता था जो सोनपुर के पास पहलेजा घाट को जोड़ता था।

दूसरा स्टीमर निजी कंपनी का बांसघाट से चलता था। तीसरी स्टीमर सेवा कुर्जी के पास मैनपुरा से चलती थी जिसका नाम गंगा एलसीटी सर्विसेज था। एलसीटी मतलब लैंडिग क्राफ्ट टैंक। यानी ऐसे स्टीमर जिनसे वाहनों ढुलाई की जाती हो।

नदी जल परिवहन और स्टीमर - बात रेलवे और स्टीमर की। रेलवे की यात्रियों के लिए स्टीमर सेवा महेंद्रू घाट से चलती थी। और अतीत में चलें तो दीघा घाट स्टीमर सेवा का बड़ा केंद्र हुआ करता था। दीघा से माल ढुलाई के लिए और यात्री सेवा वाले स्टीमर चला करते थे। इंडियन नेविगेशन कंपनी द्वारा स्टीमर दीघा घाट से चलाए जाते थे। पटना जंक्शन जिसका नाम पहले बांकीपुर रेलवे स्टेशन था, वहां से दीघा घाट तक एक ब्रांच रेलवे लाइन बिछाई गई थी। पटना जंक्शन से जो यात्री महेंद्रू घाट जाकर स्टीमर पकड़ना चाहते हों उनके लिए रेलवे स्टेशन से तांगा या आटो रिक्शा का विकल्प था। चूंकि स्टीमर सेवा रेलवे की थी इसलिए आप इसके टिकट रेलवे स्टेशन से भी खरीद सकते थे।


जल परिवहन का बड़ा केंद्र था पटना -  कभी पटना नदी से परिवहन का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। यहां गंगा नदी पर 100 घाट थे जहां से नावें चलती थीं। वहीं पटना से हावड़ा के बीच नदी से जल से सामान ढोया जाता था। 1862 में रेल मार्ग आरंभ होने से पहले गंगा नदी परिवहन का बड़ा माध्यम थी। ( इंट्रा अर्बन मार्केट ज्योग्राफी – ए केस स्टडी ऑफ पटना, अबदुस सामी)

बिहार एंड ओडिशा डिस्ट्रिक्ट गजट के अनुसार गंगा नदी पर हरदी छपरा, दीघा, मारूफगंज, मोकामा, फतुहा, बैकुंठपुर, बाढ़ पटना जिले में स्टीमर के महत्वपूर्ण स्टेशन थे। दीघा से बक्सर के बीच परिवहन के लिए स्टीमर चलते थे। रेलवे कंपनी बंगाल एंड नार्थ वेस्टर्न रेलवे और इंडियन नेविगेशन मिलकर नदी में स्टीमर का संचालन करते थे। दीघा घाट से बंगाल ( अब बांग्लादेश) के ढाका पासा राजाबाड़ी जिले के गोआलुंदो घाट के लिए नियमित स्टीमर सेवा संचालित हुआ करती थी। गोआलुंदो पद्मा नदी (गंगा) और ब्रह्मपुत्र के संगम के पास है।

रेलवे के विकास के साथ इन स्टीमर सेवाओं की जरूरत खत्म होने लगी और दीघा घाट रेलवे स्टेशन तक रेलगाडियों की आवाजाही भी बंद कर दी गई। हालांकि लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री बनने पर दीघा घाट और पटना घाट के बीच पैसेंजर सेवा का संचालन आरंभ कराया पर यह रेलवे के लिए लाभकारी सौदा नहीं साबित हुआ। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( GANGA, BIHAR, PATNA, PAHLEJA GHAT, STEAMER ) 

Saturday, March 22, 2014

रॉक गार्डन - बेकार की चीजों से बना नायाब संग्रहालय

अक्सर हम जिन चीजों को बेकार समझ कर फेंक देते हैं, उन्ही बेकारी चीजों से रचा गया ऐसा नायाब संसार जिसे दुनिया भर ने सराहा। हम बात कर रहे हैं नेकचंद सैनी की कल्पना के साकार रुप रॉक गार्डन की। चंडीगढ़ के सेक्टर एक स्थित इस नायाब दुनिया को देखे बिना कोई दर्शक नहीं लौटना चाहता।

फ्रेंच वास्तुविद ला कार्बुजिए द्वारा डिजाइन किए गए शहर चंडीगढ़ का सबसे लोकप्रिय दर्शनीय स्थल बन चुका है रॉक गार्डन। 25 एकड़ में फैला ये रॉक गार्डन चंडीगढ़ के सेक्टर एक में स्थित है। दर्शकों के लिए गार्डन सप्ताह में सातो दिन खुला रहता है। प्रवेश शुल्क मामूली सा है। इतना बड़ा दायरा की आप घूमते घूमते थक जाएं। रूचिकर इतना है कि बच्चे, बूढ़े जवान सबको पसंद आता है। नदी, पहाड़, झरने, गुफाएं, झूले सब कुछ देखिए यहां। थक जाएं तो खाने पीने का भी इंतजाम है।
प्रतिदिन 5000 से ज्यादा लोग रॉक गार्डन देखने पहुंचते हैं। साल में एक करोड़ से ज्यादा लोग। देश में ये ताजमहल के बाद दूसरा लोकप्रिय दर्शनीय स्थल बन चुका है।
कई सालों अगर आप रॉक गार्डन जाते हैं तो यहां कुछ बदलाव भी नजर आता है। यहां मूर्तिकला से जुड़े कलाकार अपनी सेवाएं देकर इसे और सुंदर बनाने में लगे हैं। रॉक गार्डन के विकास के लिए नेकचंद फाउंडेशन की स्थापना की गई है। जब नेकचंद सैनी चंडीगढ़ में होते हैं तो एक खास समय में रॉक गार्डन घूमने आने वाले लोगों से मुलाकात भी करते हैं। इस दौरान वे लोगों के सलाह सुझाव लेते हैं।
दक्षिण भारत में रॉक गार्डन - केरल सरकार ने नेकचंद सैनी को अपने यहां भी इसी तरह का गार्डन विकसित करने के लिए आमंत्रित किया। केरल पर्यटन की कोशिश से नेकचंद सैनी के मार्गदर्शन में पालघाट शहर में लघु रॉक गार्डन दर्शकों का मन मोह रहा है। डेढ़ एकड़ के दायरे में इसी तरह का गार्डन 1993 से 1995 के बीच बनाया गया। केरल सरकार को ये परिकल्पना साकार हुई तो इतनी पसंद आई की  मालापुझा में भी इस तरह का एक और बागीचा बनाया गया है। यह गार्डन पश्चिमी घाट के सौंदर्य को और बढ़ा रहा है। सिर्फ दक्षिण भारत ही नहीं नेकचंद सैनी दुनिया के कई देशों  भी आमंत्रण पर जाकर वहां रॉक गार्डन जैसे ही संसार का सृजन कर चुके हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, March 21, 2014

दिल में दिल का प्यारा है मगर मिलता नहीं

छ्न्नूलाल के सुरों का अनूठा जादू
अच्छा संगीत भी भूख मिटाता है। यह दिल और दिमाग का भोजन है। भले ही आप अच्छा गा नहीं हो सकते हैं पर अच्छा सुनना भला किसके कानों को सुखकर नहीं लगता। जब गाने वाला अपने सुरों के माध्यम से आपको एक साथ कई तरह के संगीत का रसास्वादन कराए तो मजा और भी बढ़ जाता है। 
ऐसी ही एक शाम सजी थी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में और गायक थे पंडित छन्नूलाल मिश्रा तो सुनने वालों में थे लार्ड मेघनाद देसाई, बाल्मिकी प्रसाद सिंह, भीष्म नारायण सिंह समेत 200 से ज्यादा सुधी श्रोता। बनारस के शास्त्रीय संगीत के ये महान सुरों के साधक जब मंच पर आए तो कहा नोम तोम करूंगा तो काफी वक्त चला जाएगा। इसलिए एक घंटे में आपको संगीत के कई रंग में डुबाने की कोशिश करूंगा। और उन्होंने कजरी, सोहर, ठुमरी सब कुछ सुनाया। हालांकि वे पूरबी अंग की ठुमरी के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं पर उन्होंने लाजवाब कर दिया ऊर्दू के शायर अनवर की नज्मों को शास्त्रीय धुन में सुनाकर...
दिल में दिल का प्यारा है मगर मिलता नहीं
आंखों में आंखों का तारा है मगर मिलता नहीं
ढूंढते फिरते हैं उसको दर बदर और खू ब खू
हर तरफ हर नजर
है मगर मिलता नहीं
शेख ढूंढे हरम में  बरहम दैर में
हर जगह वो आशिकारा है मगर मिलता नहीं
मेरे दिल में वही खेले और खेला मुझसे वो दुलारा
है मगर मिलता नहीं
क्या कहूं कुछ बस में नहीं अनवर
दिलबर हमारा यहां बज्म में है मगर मिलता नहीं
( भटियाली धुन में )

लोकप्रिय शास्त्रीय सुरों के साधक छन्नू लाल मिश्र जब उर्दू शायर की इन पंक्तियों को शास्त्रीय धुनों में पिरोकर श्रोताओं के सामने पेश करते हैं तो शास्त्रीय और सूफी का अदभुत संगम नजर आता है और श्रोता उसमें डूबते चले जाते हैं।

 शास्त्रीय संगीत में भोजपुरी के गीत और कबीर के पद तो सुनने को मिलते हैं तो पर उर्दू के नज्म दुर्लभ हैं। कुमार गंधर्व ने ज्यादातर कबीर के भजनों को सुर दिया। पर छन्नूलाल ख्याल गायकी के हर फन के मौला हैं। वे ऐसे लोगों का भी मनोरंजन करने में कामयाब हैं जो शास्त्रीय संगीत की एबीसी नहीं समझते। हर कोई छन्नू लाल की ओर से तुरत-फुरत में सुरों के बसाए संसार में रम जाता है।
पर पद्मभूषण छन्नूलाल मिश्र जाने जाते हैं अपनी खास काशी की होली के लिए जो वे हर जगह सुनाते हैं। शिव की होली। दिगंबर खेले मशाने मे होली....
और अंत में उनकी आवाज में.ये निर्गुण – दुनिया दर्शन का है मेला...अपनी करनी पार उतरनी...चाहे गुरू चाहे चेला...कंकड चुनि चुनि महल बनाया...लोग कहें घर मेरा...न घर तेरा न घर मेरा...चिड़िया  रैन बसेरा।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( 25 दिसंबर 2013, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, महामना मालवीय जयंती, BHU, DELHI, VARANASI, MAHAMANA, MALVIYA, OLD STUDENT MEET ) 

Thursday, March 20, 2014

प्रकट सिया सुख दईया, जनकपुर में बाजे बधईया...

नेपाल का शहर जनकपुर विदेह राजा जनक की नगरी है। यहां पर मां जानकी का विशाल मंदिर है। जनकपुर प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी थी। यह वो पवित्र स्थान है जिसका धर्मग्रंथों, काव्यों एवं रामायण में उत्कृष्ट वर्णन है। धार्मिक ग्रंथों में उसे स्वर्ग से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। जनकपुर धाम प्राचीन काल से ही हिंदुओं का आस्था केंद्र रहा है। यहां स्थित जानकी मंदिर देवी सीता को समर्पित है।
नौलखा मंदिर - कहा जाता है कि इस के निर्माण में नौ लाख रुपए खर्च हुए थे। इसलिए इसे नौलखा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। सीता माता को समर्पित जानकी मंदिर जनकपुर बाज़ार के उत्तर पश्चिम में स्थित है।
वर्तमान जानकी मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुंअरि जी द्वारा 1967 में करवाया गया। मंदिर दूर से देखने में किसी महल सा लगता है। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में माता जानकी, राजा रामचंद्र और लक्ष्मण जी की प्रतिमा है। मंदिर के गर्भ गृह की फोटोग्राफी वर्जित है। मंदिर के बाहर विशाल प्रांगण है जिसमें एक साथ हजारों लोग बैठ सकते हैं। मंदिर परिसर में सरकार की ओर से सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

सुंदर प्रदर्शनी गैलरी -  मंदिर के अंदर 2012 में एक सुंदर गैलरी का निर्माण हुआ है। इसमें राम जी के जन्म से जुड़ी कथा झांकियों में देखी जा सकती है। झांकियों के साथ यहां मधुबनी पेंटिंग का सुंदर संकलन है जिसमें रामकथा के कई प्रसंग है। झांकी में मंदिर में माता सीता को किए जाने वाले श्रंगार के सामान में देखे जा सकते है। इस गैलरी का प्रवेश टिकट नेपाली रुपये मे 15 रुपये है। 
अखंड सीताराम धुन - जानकी मंदिर में पिछले कुछ सालों से अखंड सीताराम धुन जारी है। मंदिर के बाईं तरफ के बरामदे में एक मंडली वाद्य यंत्रों के साथ सीताराम धुन गाती रहती है। 
जनकपुर में होने वाली शादियों में लोग शादी की रात से पहले माता का सीता का आशीर्वाद लेने के लिए दुल्हन को लेकर जानकी मंदिर आते हैं। मंदिर में दर्शन के लिए आने वाली महिलाएं मैथली में सुंदर धुन में सीता जी की प्रार्थना करती हैं। 
जनकपुर आने वाले हिंदू श्रद्धालु मिथिला परिक्रमा भी करते हैं जिसमें सीताजी से जु़ड़े हुए सारे तीर्थ स्थल आते हैं। मंदिर परिसर में मिथिला परिक्रमा का मार्ग चित्र लगा हुआ है। 
सीता जी का जन्म - 'प्रकट सिया सुख दईया, जनकपुर में बाजे बधईया... कहा जाता है जनकपुर में ही वैशाख शुक्ल नवमी को मां जानकी का अवतार हुआ था। इस मौके पर जानकी नवमी के रूप में मनाया जाता है। जनकपुर का दूसरा प्रमुख त्योहार विवाह पंचमी का है। इसी दिन सीता जी का रामचंद्र जी से विवाह हुआ था। तब जनकपुर का ये मंदिर खूब सजाया जाता है।
वैसे सीतामढ़ी शहर में एक जानकी मंदिर है। शहर के पास ही पुनौरा गांव में एक जानकी मंदिर है। कई लोग इसे वही जगह मानते हैं जहां राजा जनक ने खेत में सोने का हल चलाया था और सीता माता प्रकट हुई थीं।

धनुष धाम - कहते हैं राजा जनक के दरबार में जब रामचंद्र जी ने शिव का धनुष तोड़ा तो उसके तीन टुकड़े हुए थे। एक टुकडा जनकपुर से 40 किलोमीटर दूर धनुषधाम में जाकर गिरा था। वहां एक बड़ी पहाड़ी सी संरचना है जिसे लोग धनुष का एक टुकड़ा बताते हैं। 
जनकपुर धाम मंदिर में जारी अखंड सीताराम की धुन। 

कैसे पहुंचे - बिहार के सीतामढ़ी से करीब 42 किलोमीटर उत्तर और नेपाल की तराई में स्थित जनकपुर है। वैसे तो जनकपुर नेपाल में है पर यहां पहुंचने का सुगम रास्ता बिहार के सीतामढ़ी शहर से है। सीतामढ़ी तक आप रेलगाड़ी से पहुंच सकते हैं। वहां से बस से नेपाल का सीमांत बाजार भिट्ठामोड। भिट्ठामोड ने नेपाल रोडवेज की बसों से जनकपुर पहुंचा जा सकता है। सीतामढ़ी से दिन भर में जनकपुर घूम कर लौटा जा सकता है। जनकपुर ने नेपाल की राजधानी काठमांडू का बस का सफर 10 घंटे का है। 
रहना खाना - जनकपुर में रहने के लिए कुछ धर्मशालाएं और होटल उपलब्ध हैं। मंदिर के आसपास शाकाहारी होटल हैं। यहां भारतीय रुपये चलते हैं। आप 50 रुपये से 500 रुपये में यहां ठहर सकते हैं। अच्छा शाकाहारी खाना और बेहतरीन मिठाइयों का स्वाद भी जनकपुर में लिया जा सकता है। 

- ( JANAKPUR, NEPAL, SITA MATA ) 


Wednesday, March 19, 2014

जयनगर जनकपुर अंतरराष्ट्रीय रेल मार्ग

जयनगर जनकपुर नैरोगेज रेलवे ( फोटो सौ - इकांतिपुर टाइम्स, नेपाल ) 
भारत से जनकपुर पहुंचने का एक रास्ता बिहार के मधुबनी जिले के जयनगर से है। भारत के शहर जयनगर से जनकपुर के बीच नेपाल रेलवे की नैरोगेज रेलवे लाइन हुआ करती थी। इस मार्ग से रेल से नेपाल के धार्मिक शहर जनकपुर पहुंचा जा सकता था। जयनगर बिजलीपुरा नौरोगेज लाइन का सफर 50 किलोमीटर का था। यह भारत नेपाल को जोडने वाली अंतरराष्ट्रीय रेलवे लाइन हुआ करती थी। जयनगर से जनकपुर की दूरी 28 किलोमीटर है। इस रेलमार्ग पर चलने वाली पैसेंजर ट्रेन में अत्याधिक भीड़ हुआ करती थी। इसलिए सैलानियों के लिए ये सफर मुश्किल भरा हुआ करता था।

जनकपुर से जयनगर के लिए सुबह 7 बजे 11 बजे और 4 बजे रेलगाडियां चलाई जाती थीं। देश में अटारी-लाहौर और कोलकाता-ढाका के अलावा एक और रेलमार्ग है जो दो देशों को जोड़ता है। पर जयनगर जनकपुर रेल मार्ग जो बिहार के एक शहर को पडोसी देश नेपाल से जोड़ता है। पर ये रेल मार्ग भारत पाकिस्तान और भारत बांग्लादेश अंतराष्ट्रीय रेल मार्ग की तरह ब्राडगेज नहीं था।
जयनगर से नेपाल को जाने वाली छुक छुक गाड़ी लंबे समय तक नैरो गेज की पटरियों पर ही दौड़ती रही। इस रेलमार्ग के पटरियों की चौड़ाई ढाई फीट यानी 762 सेंटीमीटर है।

1928 में हुई शुरुआत - जयनगर जनकपुर रेलमार्ग की शुरूआत 1928 में हुई। नेपाल के राजा शमशेर राणा एवं दरभंगा महाराज के बीच हुए समझौते के आधार पर जयनगर में नेपाल रेलवे के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई थी। जिसमें रेलवे लाइन के साथ नेपाल रेलवे के महाप्रबंधक कार्यालय का निर्माण भी जयनगर में किया गयाजो बाद में पहले जनकपुर और बाद में काठमांडु स्थानांतरित कर दिया गया।
नेपाल सरकार द्वारा संचालित ये मार्ग भारत के बिहार राज्य से नेपाल के तराई क्षेत्र को जोड़ता था। इस मार्ग की अहमियत इसलिए भी थी क्योंकि ये हिंदू धर्म के प्रसिद्ध तीर्थ जनकपुर को रेल मार्ग के मानचित्र पर लाता है। नेपाल की राजधानी काठमांडु से 100 किलोमीटर दूर धनुषा प्रांत में स्थित ये रेलमार्ग नेपाल का सबसे लंबा रेलमार्ग हुआ करता था। रेलमार्ग की लंबाई 51 किलोमीटर थी। धार्मिक शहर जनकपुर से आगे इस रेलवे लाइन का आखिरी रेलवे स्टेशन बिजलीपुरा था। इस रेलवे का संचालन पहले ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन आफ नेपाल-जनकपुर रेलवे करती थी।

 जनकपुरधाम  पर खड़े कोच।  कभी पटरी पर दौड़ती थी अब इतिहास हुई। 
बाद में 2004 में इस कंपनी का नाम बदलकर नेपाल रेलवे कारपोरेशन लिमिटेड कर दिया गया। यह नेपाल सरकार की सरकारी कंपनी हुआ करती थी। धार्मिक शहर जनकपुर के साथ जुड़ा होना इस रेलमार्ग की प्रमुख विशेषता है। इस मार्ग पर सिर्फ सवारी गाड़ियां चलाई जाती थीं। पर इसमें  जरूरत के हिसाब से मालगाड़ी के डिब्बे भी जोड़े जाते थे।
तराई क्षेत्र के लोगों के लिए ये रेलमार्ग परिवहन का मुख्य साधन हुआ करती थी। इसलिए आमतौर पर सात यात्री डिब्बों वाले इस रेल में हमेशा ठसाठस भीड़ चलती थी। इस रेलमार्ग के समांतर बेहतर सड़क नहीं होने के कारण जनकपुर मार्ग के लोगों के लिए ये रेल जीवन रेखा थी। कम किराया में जयनगर से जनकपुर पहुंचने के लिए ये रेलमार्ग लोकप्रिय साधन रहा। रेलगाड़ी के डिब्बे काफी बुरे हाल में थे। इनकी प्रकाश व्यवस्था काफी खराब थी। रात में अक्सर डिब्बों में रोशनी के इंतजाम नहीं रहते थे।   

रेलवे लाइन दो खंडों में विभाजित थी। जयनगर से जनकपुर 29 किलोमीटर और जनकपुर से बिजलीपुरा 22 किलोमीटर। पर साल 2001 में जनकपुर से बिजलीपुरा के बीच रेल का संचालन बंद कर दिया गया, क्योंकि इस खंड पर दो रेल पुलों की हालत जर्जर हो चुकी थी। ये लाइन जयनगर से उत्तर की ओर नेपाल सीमा तक जाती है। इसके बाद इसका मार्ग पश्चिम की ओर जनकपुर की तरफ मुड़ जाता था। जनकपुर से बिजलीपुरा का मार्ग फिर उत्तर की ओर मुड़ जाता था।

जयनगर जनकपुर में भाप इंजन का दौर
जनकपुर धान (नेपाल) रेलवे स्टेशन के बाहर। 
जयनगर जनकपुर मार्ग पर रेल के संचालन के लिए 1928 में जिस पहले स्टीम लोको का इस्तेमाल किया गया उसका नाम हिंदू देवता के नाम पर विष्णु रखा गया। दस लाख किलोमीटर से ज्यादा सफर के बाद भी ये इंजन हाल के सालों तक संचालन में था।
साल 1994 में विष्णु ने अपना आखिरी सफर पूरा किया। इस मार्ग पर भाप इंजन के दौर में सात लोकोमोटिव चलते थे। इन सबके नाम देवी देवताओं पर रखे गए थे। इनके नाम श्री विष्णु के अलावा सीताराम, महाबीर और पशुपति हुआ करते थे। इनके रखरखाव के लिए नेपाल के खजूरी में लोको शेड का निर्माण किया गया था।

आया डीजल इंजन का दौर
जयनगर जनकपुर रेलमार्ग पर पुराने पड़ चुके स्टीम इंजन को बदलने की शुरुआत नब्बे के दशक में की गई। पर नेपाल की एकमात्र रेलवे होने के कारण इसमें भारतीय रेल ने सहयोग किया। खराब रखरखाव के कारण पुराने स्टीम इंजन की लोकप्रियता में कमी आ रही थी। 1994 के बाद  इस मार्ग डीजल इंजन से रेल का संचालन होने लगा। जेडीएम 5 माडल का इंजन अब डिब्बों को लेकर जनकपुर की ओर दौड़ने लगा। 1994 में इस माडल के चार रेल इंजन भारत सरकार ने नेपाल सरकार को उपहार स्वरूप दिए थे। जेडीएम5 के 524, 533 और 535 नंबरों वाले इंजन 2013 तक संचालन में रहे। वहीं जेडीएम5 536 को पहले ही रिटायर कर दिया गया। यह जनकपुर धाम के लोको शेड में आराम फरमा रहा है।

जनकपुर में मेले के दौरान 24 घंटे रेलगाड़ी 
आमतौर पर जयनगर जनकपुर मार्ग पर रोज तीन रेलगाड़ियों का संचालन दोनों तरफ से होता था। एक सुबह में एक दोपहर में और एक दोपहर के बाद। लेकिन जनकपुर में त्योहार के समय में इस रेल मार्ग पर 24 घंटे ट्रेनें चलाई जाती थी। तब इसका कोई टाइम टेबल नहीं होता था। इस दौरान यात्रियों की भीड़ भी काफी बढ़ जाती थी। लेकिन कई बार इंजन में खराबी आने के कारण इस रेलमार्ग पर परिचालन बंद करना पड़ता था, जिससे क्षेत्र के लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती थी। पर साल 2014 में जयनगर जनकपुर खंड पर रेलगाड़ियों का संचालन बंद कर दिया गया।
जयनगर जनकपुर रेल लाइन का भविष्य - 2010 में ममता बनर्जी के रेलमंत्रीत्व काल में जयनगर जनकपुर रेल मार्ग को ब्राडगेज में बदलने का प्रस्ताव भारत सरकार की ओर से रखा गया। ऐसा हो जाने के बाद भारत की ब्राडगेज ट्रेनों का नेटवर्क नेपाल के अंदर जा सकेगा। साथ ही ऐतिहासिक और धार्मिक शहर जनकपुर सीधे भारतीय रेल के ब्राडगेज नेटवर्क से जुड़ जाएगा। भारतीय रेल का समस्तीपुर रेल मंडल इस मार्ग पर नई रेल लाइन का निर्माण शुरू किया। 

जनकपुरधाम रेलवे स्टेशन के पास एक सुंदर मंदिर। 
 जयनगर से नेपाल के बर्दीवास तक बड़ी रेल लाइन बिछाने की अनुमति रेल मंत्रालय ने दे दी है। इसमें से 40 किलोमीटर लंबा रेलमार्ग हिस्सा नेपाल में पड़ता है। इस रेलमार्ग निर्माण का बजट लगभग 470 करोड़ रुपये का है। जयनगर से जनकपुर तक 30 किलोमीटर लंबी नैरोगेज लाइन को बड़ी लाइन में बदलने का काम सर्वेक्षण कार्य पूरा हो चुका है। निर्माण कार्य भी शुरू हो चुका है। निर्माण कार्य शुरू होने के बाद 2014 में इस मार्ग पर रेलों का संचालन बंद कर दिया गया। 

जयनगर जनकपुर रेलमार्ग नेपाल के व्यापारियों में भी काफी लोकप्रिय था। जयनगर जनकपुर रेल सेवा अमान परिवर्तन के कारण बंद रहने से जनकपुर के व्यापारियों को समान ले जाने में भारी परेशानी हो रही है। जयनगर- मारड़ सड़क मार्ग का उपयोग करने की मजबूरी बनी हुई है। इस सड़क मार्ग की हालत खस्ता है। 
भारत सरकार की योजना जोगबनी से नेपाल के बिराटनगर को भी ब्राडगेज रेल नेटवर्क से जोड़ने की है। इन दोनों शहरों की दूरी महज 10 किलोमीटर है। वहीं नेपाल के लिए तीसरा रेल नेटवर्क न्यू जलपाईगुड़ी से भी जोड़े जाने की भी योजना है।

जयनगर जनकपुर मार्ग के स्टेशन
1       जयनगर    2 खजूरी
3       महिनाथपुर  4. शहीद सरोजनगर हॉल्ट
5       बैदेही       6. प्रभा
7       जनकपुरधाम  ( जयनगर से जनकपुर के बीच रेलों का संचालन  2014 में बंद हो गया ) 
8. पीपराढी  9       लोहारपट्टी
10 सिंगाही   11 बिजलीपुरा
( जनकपुर धाम से आगे रेलों का संचालन 2001 में बंद हो गया ) 

जयनगर जनकपुर मार्ग – एक नजर

शुरुआत 1928  बंद 2014 

गेज – नैरोगेज ,  2 फीट 6 इंच ( 762 मिलीमीटर)

कुल स्टेशन - 11 ,  कुल दूरी - 50 किलोमीटर

कहां से कहां तक – जयनगर (भारत) से बिजलीपुरा ( नेपाल)

- विद्युत प्रकाश मौर्य
(JANAKPUR DHAM, JAINAGAR, NARROW GAUGE RAIL, NEPAL, BIHAR )