Friday, February 28, 2014

आल्हा उदल की आराध्या - मैहर की मां शारदा देवी

देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है मैहर का मां शारदा देवी का मंदिर। सतना जिले के मैहर कस्बे में मैहर शहर है मां शारदा का मंदिर। यहां श्रद्धालुगण माता का दर्शन कर आशीर्वाद लेने उसी तरह पहुंचते हैं जैसे जम्मू में मां वैष्णो देवी का दर्शन करने जाते हैं। मां शारदा लोकगाथाओं के महान वीर आल्हा और उदल की देवी हैं।

मैहर मतलब मां का हार - मैहर शब्द का का मतलब है मां का हार। कहा जाता है यहां सति का हार गिरा था। मां शारदा देवी महान वीर आल्हा और उदल की देवी हैं। मां शारदा देवी के मंदिर के आसपास इसी पहाड़ी पर कालभैरवी, हनुमानजी, देवी काली, दुर्गा, गौरीशंकर, शेषनाग, फूलमति माता, ब्रह्मदेव और जलापा देवी के भी मंदिर हैं।

कहा जाता है वीर अल्हा और उदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे माता शारदा के बड़े भक्त थे। इन्ही वीरों ने सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की। आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने आल्हा को अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आल्हा माता को शारदा माई कह कर पुकारता था। तभी से ये मंदिर माता शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 
आज भी कहा जाता है कि माता शारदा के दर्शन हररोज सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है। तालाब से 2 किलोमीटर और आगे एक अखाड़ा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा-उदल कुश्ती लड़ते थे। मां शारदा देवी के मंदिर में बलि देने की प्रथा थी जिसे 1922 में सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने प्रतिबंधित कराया।

सीढ़ियां और रोपवे का है विकल्प - मां मैहर देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। सीढ़ियां चढ़ने से पहले छोटा सा बाजार है जहां आप प्रसाद ले सकते हैं। अपना भारी भरकम सामान छोड़ कर चढ़ाई शुरू कर सकते हैं। हालांकि 2009 के बाद अब यहां रोपवे बन गया है। जो श्रद्धालु सीढिया नहीं चढ़ना चाहते वे रोपवे से जा सकते हैं। रोपवे का संचालन दामोदर रोपवे कंपनी करती है। कंपनी की वेबसाइट है- www.ropeways.com/ropeway_completed.html

कैसे पहुंचे – सतना-कटनी रेलमार्ग पर मैहर रेलवे स्टेशन है। मैहर शहर मां शारदा देवी के अलावा मैहर सीमेंट फैक्ट्री के लिए जाना जाता है। रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर की दूरी पर त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित है मां शारदा देवी का मंदिर। मैहर पहुंचने के लिए इलाहाबाद, जबलपुर,  दिल्ली से सीधी रेलगाड़ियां हैं। आप अगर मैहर आ रहे हैं बांधवगढ़ नेशनल पार्क जाने का भी कार्यक्रम बना सकतें हैं।

शास्त्रीय संगीत का मैहर घराना - मैहर शहर शास्त्रीय संगीत के मैहर घराने के लिए लोकप्रिय है। दिग्गज संगीतकार उस्ताद अलाउद्दीन खान (1972 मृत्यु ) यहां रहते थे। इस घराने की परंपरा में अन्नपूर्णा देवी (अलाउद्दीन खान की बेटी) उस्ताद अली अकबर खान (अलाउद्दीन खान के पुत्र), पंडित रविशंकर,  पंडित पन्नालाल घोष, पंडित निखिल बनर्जी जैसे प्रसिद्ध नाम हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
(MAIHAR DEVI, SHAKTIPEETH) 

Thursday, February 27, 2014

दक्षिणेश्वर की काली और बेलुर मठ

कोलकाता के काली घाट में मां काली का प्रचीन मंदिर है तो शहर के उत्तरी हिस्से दक्षिणेश्वर में मां काली का भव्य मंदिर है। स्वामी विवेकानंद के गुरू रामकृष्म परमहंस इस मंदिर में मां काली की उपासना किया करते थे। इस मंदिर की काफी मान्यता है, क्योंकि मंदिर से विवेकानंद के गुरु से इस मंदिर का नाता है। दक्षिणेश्वर में हुगली नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित काली के इस मंदिर को सारी दुनिया रामकृष्ण परमहंस की वजह से ज्यादा जानती है। यहां काली का भवतरणी के स्वरूप में विराजती हैं।


काली मां का मंदिर 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊंचा है। इस मंदिर में 12 गुंबद हैं जिनका संयुक्त सौंदर्य दूर से भी विलक्षण प्रतीत होता है। दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। गुंबदों की छत पर सुंदर आकृतियां बनाई गई हैं।
मंदिर के गर्भगृह में शिव की छाती पर पांव रखकर खड़ी काली की प्रतिमा चांदी के हजार पंखुडि़यों वाले कमल पर स्थापित है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ 12 एक जैसे शिव मंदिर बने हैं। गंगा के किनारे बने शिव मंदिर छह और छह की दो श्रंखला में हैं। मंदिर परिसर में एक विष्णु मंदिर और एक राधाकृष्ण मंदिर भी है। इस मंदिर के पास पवित्र हुगली नदी जो बहती है। इन नदी में खिले कमल के पुष्प से मां काली की पूजा की जाती है।

मंदिर का इतिहास -  मंदिर का निर्माण सन 1847 में प्रारम्भ हुआ था। जान बाजार की महारानी रासमणि ने स्वप्न देखा था, जिसके अनुसार मां काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। कहा जाता है कि रानी रासमणि चूंकि निम्न जाति से आती थीं, इसलिए मंदिर में देवी की स्थापना के समय काफी विवाद हुआ। 

इस मंदिर के पहले पुजारी रामकुमार चट्टोपाध्याय बने। बाद में उनके छोटे भाई गदई या गदाधर भी उनके साथ रहने लगे। ये गदाधर ही बाद में रामकृष्ण परमहंस बने। एक साल बाद रामकुमार की मृत्यु हो जाने पर रामकृष्ण यहां के मुख्य पुजारी बन गए। तब से तीस साल बाद 1886 में अपनी मृत्यु तक रामकृष्ण इसी मंदिर में बने रहे। प्रसिद्ध विचारक रामकृष्ण परमहंस ने मां काली के मंदिर में देवी की आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त की थी। इसी स्थल पर बैठ कर उन्होंने धर्म-एकता के लिए प्रवचन दिए थे।

कैसे पहुंचे  दक्षिणेश्वर की काली मां के दर्शन के लिए आपको कोलकाता के मुख्य बस स्टैंड धर्मतल्ला या हावड़ा से स्थानीय बसें मिल जाएंगी। लोकल ट्रेन से भी आप बेलुर स्टेशन आकर वहां से पुल से हुगली नदी पार कर दक्षिणेश्वर पहुंच सकते हैं। बेलुर मठ से दक्षिणेश्वर के लिए लगातार फेरी सेवा भी चलती है जिससे दक्षिणेश्वर पहुंचा जा सकता है। आप कोलकाता के किसी भी कोने से टैक्सी बुक करके भी यहां तक पहुंच सकते हैं। सियालदह डानकुनी रेल मार्ग पर दक्षिणेश्वर रेलवे स्टेशन भी है। यहां सियालदह रेलवे स्टेशन से भी पहुंचा जा सकता है। यह रेलवे स्टेशन हुगली नदी पर बने विवेकानंद ब्रिज से ठीक पहले आता है। 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर परिसर में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति ( मार्च 2014 ) 
मंदिर खुलने का समय- मंदिर सुबह 6.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक खुला रहता है। इसके बाद मंदिर दुबारा दोपहर 3.30 बजे खुलता है। मंदिर शाम को 8.30 बजे तक ही खुला रहता है। वहीं अप्रैल से सितंबर तक मंदिर रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KALI, KOLKATA, DEVI, VIVEKANAND, RAM KRISHNA PARAMHANS ) 



Wednesday, February 26, 2014

कालीघाट – यहां देवी का प्रचंड रूप देखें

कोलकाता का कालीघाट क्षेत्र अपने काली माता के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। कालीघाट का काली मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पौराणिक कथाओं के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। इसलिए ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाए। कालीघाट भी उन्हीं में से एक है। 


सती के पांव की उंगली गिरी थी यहां - ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के ताण्डव के समय सती के दाहिने पैर की ऊंगली इसी जगह पर गिरी थी।कालीघाट में देवी काली के प्रचंड रुप की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में देवी काली भगवान शिव के छाती पर पैर रखी हुई हैं। उनके गले में नरमुण्डों  की माला है। उनके हाथ में कुल्हाड़ी है। सुंदर मंदिर के अंदर माता काली की लाल-काली रंग की कास्टिक पत्थर की मूर्ति स्थापित है। 


एक अनुश्रुति के अनुसार देवी किसी बात पर गुस्‍सा हो गई थीं। इसके बाद उन्‍होंने नरसंहार शुरू कर दिया। उनके मार्ग में जो भी आता‍ वह मारा जाता। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्‍ते में लेट गए। देवी ने गुस्‍से में उनकी छाती पर भी पांव रख दिया। इसी दौरान उन्‍होंने शिव को पहचान लिया। इसके बाद ही उनका गुस्‍सा शांत हुआ और उन्‍होंने नरसंहार बंद कर दिया।
ये मंदिर 1809 का बना हुआ बताया जाता है। कालीघाट शक्तिपीठ में स्थित प्रतिमा की प्रतिष्ठा कामदेव ब्रह्मचारी (संन्यास पूर्व नाम जिया गंगोपाध्याय) ने की थी। 1836 में धार्मिक आस्था संपन्न जमींदार काशीनाथ राय ने इसका निर्माण कराया था।  पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक दस महाविद्याओं में प्रमुख और शक्ति-प्रभाव की अधिष्ठात्री देवी काली का प्रभाव लाखों कोलकाता वासियों के मन पर है।

मां काली का मुख काले पत्थरों से निर्मित है। उनकी जीभ, हाथ और दांत सोने से मढ़े हुए हैं। उनको लेकर भक्तों में नारा प्रसिद्ध है-  जय काली कलकत्तेवाली तेरा वचन न जाए खाली..... कहा जाता है कि कलकत्ता में काली की दया से आदमी भूखा नहीं सोता। ऐसे मुहावरों और शक्ति की देवी की कथाएं इसी सोने की जीभ के कारण ही पैदा हुई हैं।

गर्भगृह के ठीक सामने बने नाट्य मंदिर से देवी की प्रतिमा का भव्य दर्शन मिलता है। मंदिर में ही बने जोर बंगला में देवी पूजन का कर्मकांड होता है। यहां काली के अलावा शीतला, षष्ठी और मंगलाचंडी के भी स्थान है।


सचिन तेंदुलकर ने की थी पूजा - महानगर के दक्षिणी हिस्से में गंगा के तट पर बसे कालीघाट में न सिर्फ कोलकाता वासी बल्कि दूर दूर से श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने आते हैं। 99 शतक लगाने के बाद क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने भी यहां आकर मां की पूजा की थी।

अघोर साधना और तांत्रिक साधना के लिए प्रसिद्ध - कालीघाट का मंदिर अघोर साधना और तांत्रिक साधना के लिए भी प्रसिद्ध है। कालीघाट के पास स्थित केवड़तला श्मशान घाट को किसी जमाने में शव साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता था।  
कालीघाट परिसर में मां शीतला का मंदिर भी है। मां शीतला को भोग में समिष भोज चढ़ाया जाता है। यानी मांस, मछली अंडा सब कुछ।  मंदिर में मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा होती है। मैंने देखा लोग मंदिर में बने काउंटर से से मांसाहारी प्रसाद खरीदते हैं और मां को अर्पित कर उसे प्रसाद के रुप में वहीं ग्रहण करते हैं। 

खुलने का समय -  कालीघाट मां का मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है।  दोपहर 12 से 3.30 बजे तक बंद रहता है। शाम को 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक फिर मंदिर खुला रहता है। अगर आप मंदिर दर्शन करने आए हैं तो यहां पंडों से सावधान रहें। विजयादशमी और बंगला नव वर्ष के दिन यहां अपार भीड़ उमड़ती है।

काली घाट स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का कार्यालय। 
कैसे पहुंचे -  अगर आप कोलकाता में हैं तो यहां के मुख्य स्थल धर्मतल्ला से बस मेट्रो और ट्राम से कालीघाट पहुंचा जा कता है। कालीघाट में कोलकाता मेट्रो का स्टेशन भी है। कालीघाट ट्राम से भी पहुंचा जा सकता है। हावड़ा रेलवे स्टेशन से कालीघाट की दूरी सात किलोमीटर है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पुश्तैनी घर काली घाट इलाके में ही है।

मुख्य सड़क जहां आप ट्राम से उतरते हैं, कालीघाट मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस सड़क पर आधा किलोमीटर चलने के बाद बायीं तरफ मां काली का मंदिर नजर में आ जाता है।

मिशनरीज ऑफ चेरिटी का मुख्यालय बगल में -  


काली घाट की ही सड़क पर मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज आफ चेरिटी यानी निर्मल हृदय का मुख्यालय भी है। यहीं से महान समाज सेविका मदर टेरेसा ने कई दशक तक अपनी गतिविधियों का संचालन किया। उन्हें अपने महान कार्यों के लिए सेवा का नोबल पुरस्कार भी मिला। 
इस मार्ग पर एक ओर प्रचंड रुप में कालीघाट में देवी मां यहां विराज रही हैं पर कालीघाट के मंदिर के मार्ग पर कोलकाता का सबसे पुराना रेडलाइट एरिया भी है। यहां भरी दोपहरी में भी महिलाएं अपने ग्राहकों का इंतजार करती नजर आती हैं। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के मंदिर के पास नारी शक्ति की ये कैसी विवशता है मां... 
 -    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA, KALIGHAT, DEVI ) 

Tuesday, February 25, 2014

मन की इच्छा पूरी करती हैं मां मनसा देवी


पंचकूला में स्थित मां मनसा देवी नौ देवियों में से एक हैं। यह 51 शक्तिपीठों में से भी एक है। कहा जाता है कि यहां मां का मस्तक गिरा था। मां का मंदिर चंडीगढ़ शहर के बिल्कुल पास पंचकूला (हरियाणा) में है। मंदिर का परिसर विशाल है। यह 100 एकड़ में फैला हुआ है। शिवालिक श्रेणी की पर्वतमाला की तलहटी में होने के कारण मंदिर के आसपास का वातावरण बड़ा मनोरम है। इस मंदिर की व्यवस्था एक सरकारी ट्रस्ट देखता है। यह ट्रस्ट हरियाणा सरकार के अधीन है।

चैत्र नवरात्र के समय यहां विशाल मेला लगता है। तब यहां लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। वैसे मंदिर में सालों भर चहल पहल रहती है। बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालु यहां समय समय पर लंगर भी लगाते हैं।

मनसा देवी मंदिर का निर्माण -  मनसा देवी मंदिर का निर्माण उन्नीसवीं सदी में हुआ। निर्माण के लिहाज से यह ज्यादा प्राचीन नहीं है। इसका निर्माण  1811-1815 के बीच मनी माजरा के राजा गोपाल सिंह ने कराया था। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर पटियाला के महाराजा करम सिंह ने 1840 में एक और मंदिर बनवाया जिसे पटियाला मंदिर कहा जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु पटियाला मंदिर के भी दर्शन करने जाते हैं। 

राजा को सपने में आई देवी - इस मंदिर के निर्माण को लेकर एक कथा है। कहा जाता है कि एक बार महाराजा गोपाल सिंह को देवी सपने में आईं। उन्होंने राजा को इस स्थल पर मंदिर बनवाने का कहा। देवी के निर्देश को मानते हुए राजा ने यहां पर भव्य मंदिर बनवाया। 

मंदिर में मनसा देवी की प्रतिमा तीन सिर और पांच भुजाओं वाली है। मंदिर परिसर में ही चामुंडा और लक्ष्मीनारायण का मंदिर है। मंदिर के परिक्रमा में भी विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां बनाई गई हैं। इससे मंदिर का परिसर काफी मनोरम लगता है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां 40 दिन नियमित आकर पूजा करने वाले की मुरादें मां पूरी करती हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर के मनोरम परिसर में खो जाते हैं। वे कई घंटे मंदिर परिसर में ही गुजारते हैं। आजादी के बाद इस मंदिर का प्रबंधन निजी हाथों में था। तब इसकी व्यवस्था अच्छी नहीं रहती थी। बाद में हरियाणा सरकार ने इसका अधिग्रहण कर ट्रस्ट का निर्माण किया। इसके बाद इसके इंतजामात में काफी सुधार हुआ है। मंदिर की अधिकृत वेबसाइट पर जा सकते हैं - http://mansadevi.nic.in/ 


चंडीगढ़ और उसके आसपास के लोगों की मां मनसा देवी में अगाध श्रद्धा देखने को मिलती है। मुरादें पूरी होने पर लोग यहां लंगर लगाते हैं। मनसा देवी मंदिर के परिसर में हमेशा आप भंडारा चलता देख सकते हैं। कई संस्थाओं द्वारा यहां सालों भर भंडारा चलाया जाता है।


आवास की भी सुविधा - मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए निशुल्क आवास की सुविधा भी उपलब्ध है।इसके अलावा 200 रुपये प्रतिदिन पर सुविधायुक्त आवास भी उपलब्ध है। मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सालय तथा कई और सेवाएं भी संचालित की जाती हैं।सरकार के प्रयास से मंदिर परिसर में लगातार विकास और जन कल्याण से जुड़ी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। 

हरिद्वार में भी मनसा देवी मंदिर - मनसा देवी नाम का एक मंदिर हरिद्वार में भी है। हालांकि ये शक्तिपीठ में नहीं गिना जाता पर इस मंदिर की लोकप्रियता काफी है। हर की पैड़ी के पास से मनसा देवी के मंदिर के लिए रोपवे संचालित होता है। वैसे आप 20 मिनट की पैदल चढ़ाई करके भी हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में जा सकते हैं।

कैसे पहुंचे - यह मंदिर मनीमाजरा से आगे पंचकूला के बिलासपुर गांव में स्थित है। यह चंडीगढ़ मुख्य बस स्टैंड से 10 किलोमीटर और पंचकूला बस स्टैंड से 4 किलोमीटर की दूरी पर है। आप चंडीगढ़ शहर से पंचकूला की ओर जाने वाली बसों से मनसा देवी पहुंच सकते हैं। मनसा देवी का मंदिर मनी माजरा की पहाड़ियों पर स्थित है। यह चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से भी काफी करीब है।चंडीगढ शहर और पंचकूला के किसी भी हिस्से से मनसा देवी आसानी से पहुंचा जा सकता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
MANSA DEVI,  TEMPLE, PANCHKULA HARYANA, SHAKTIPEETH )



पंचकूला के मनसा देवी मंदिर परिसर स्थित यज्ञशाला 

Monday, February 24, 2014

नैना देवी - जो देती हैं रोशनी

मां जोता वाली यानी नैना देवी। नैना देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में शिवालिक पर्वत पर  है। नैना देवी नौ देवियों और 51 शक्तिपीठों में से एक हैं। वैसे यहां पहुंचने का सुगम रास्ता पंजाब के रुपनगर जिले में नंगल से निकट है। जो श्रद्धालु आनंदपुर साहिब जा रहे हों तो वहां से नैना देवी कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर हैं। आनंदपुर साहिब के आगे नंगल आता है। वही नंगल जहां भाखड़ा नदी पर विशाल भाखड़ा डैम बना है। इस डैम से होकर नैना देवी का रास्ता आगे जाता है। 

नंगल के आगे का आप पंजाब से हिमाचल प्रदेश में प्रवेश कर जाते हैं। आगे का रास्ता पहाड़ी है। नैना देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को बस स्टाप से 500 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ये सीढ़ियां हालांकि सीधी नहीं हैं। घुमावदार सीढ़ियों के आसपास लोगों के घर और बाजार भी आते हैं। आप धीरे धीरे आराम फरमाते हुए नैना देवी के दरबार तक पहुंच सकते हैं। वहीं बस स्टैंड से नैना देवी तक रोपवे से भी पहुंचा जा सकता है। इसका टिकट सौ रुपये प्रति व्यक्ति ( टैक्स अतिरिक्त) है। http://www.nainadeviropeways.com/

नैना देवी की कहानी नैना देवी देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि यहां सती के दो नेत्र गिरे थे इसलिए नाम है नैना देवी।कहा जाता है कि नैना गूजर देवी का बड़ा भक्त था। जब अपनी गाय चराते हुए वह वर्तमान मंदिर स्थल के पास पहुंचा तो उसकी अनब्याही गायों से अपने आप दूध निकलने लगे। इसे देवी का चमत्कार मानकर उस स्थल को हटायातो वहां पिंडी रूप में उसे देवी के दर्शन हुए। तब माता ने उसे सपने में आकर इस स्थल पर मंदिर बनवाने को कहा। नैना देवी के मंदिर में श्रावण मास के अष्टमी पर सर्वाधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं।


नैना देवी के मंदिर के पास रहने के लिए धर्मशाला उपलब्ध है। वहीं मंदिर के आसपास के लोग श्रद्धालुओं को उचित राशि लेकर अपने घरों में ठहरने के लिए कमरा देते हैं। नैना देवी मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क लंगर भी चलाया जाता है। लंगर का समय तय है। नैना देवी की चढ़ाई में थकान हो जाती है। इसलिए कई श्रद्धालु यहां पहुंचने और मंदिर दर्शन के बाद यहीं रूक जाना पसंद करते हैं। नैना देवी की पहाड़ी से रात को आनंदपुर साहिब शहर का नजारा जरूर करें। पूरा शहर दिवाली मनाता हुआ नजर आता है। नवरात्र के समय नैना देवी मंदिर में काफी भीड़ होती है। अगर बाकी समय में यहां पहुंचते हैं तो दर्शन आसानी से हो जाता है। पंजाब के रुपनगर जिले की वेबसाइट पर नैना देवी के बारे में जानकारी -
अन्य वेबसाइटों पर नैना देवी के बारे में जानकारी -  


-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
(NAINA DEVI, HIMACHAL, PUNJAB, VYAS RIVER, ROAPWAY )