Wednesday, September 11, 2013

दक्षिण भारत में हिंदी से चलता है काम

दक्षिण भारत में हिंदी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आप दक्षिण भारत के तमाम पर्यटक स्थलों पर जाएं आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। कोच्चि, त्रिवेंद्रम के होटल वाले, आटो वाले और दुकानदार हिंदी बोलते, समझते हैं। कन्याकुमारी तमिलनाडु में है लेकिन वहां हर तरफ हिंदी समझी जाती है। दुकानों के साइन बोर्ड भी हिंदी में दिखाई देते हैं। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के परंपरागत शहर मदुरै में रेलवे स्टेशन के बाहर होटलों के साइन बोर्ड और विजिटिंग कार्ड पर हिंदी में नाम प्रकाशित है।
मदुराई में रेलवे स्टेशन के आसपास होटलों के बाहर हिंदी में लिखा दिखाई देता है- यहां कमरे किराए पर मिलते हैं। जाहिर है यह बाजार का असर है। उत्तर भारत के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ लगी है। शापिंग माल्स और शोरूम के सेल्समैन हिंदी बोलते हैं। जिन सेल्समैन को हिंदी आती है उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाती है। मैं मदुरै एक सेल में घुसता हूं। मैं हिंदी में संवाद शुरू करता हूं। तुरंत एक हिंदी वाला सेल्समैन हाजिर हो जाता है। वह पूछता है कहिए क्या सेवा करूं। सेल्समैन ने कहा उसे चार भाषाएं आती है। इस प्लस प्वाइंट के कारण उसे वेतन ज्यादा मिलता है। वह एक नौकरी छोड़े तो कई नौकरियां उसे आफर हो जाती हैं। रामेश्वरम शहर में सारे आटो रिक्शा वाले हिंदी समझ और बोल लेते हैं।

ऊटी के बोटानिकल गार्डन में...
हिल स्टेशन ऊटी में जाकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप किसी दक्षिण के शहर में हैं। हर दुकान, हर फुटपाथ पर सामान बेचने वाले को हिंदी आती है। होटलों के रिसेप्शन पर भी आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। वहीं तिरूपति में हिंदी को लेकर कोई समस्या नहीं आती। बेंगलुरु और मैसूर में आप हिंदी बोलकर आराम से काम चला सकते हैं। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा कई दशक से सक्रिय है। इस संस्था को डिम्ड यूनीवर्सिटी का दर्जा है। यह कई तरह के कोर्स कराता है। लेकिन अब टेलीविजन, फिल्मों और लगातार सैलानियों की आवाजाही के कारण हिंदी का प्रसार दक्षिण में खूब हो रहा है। 

अगर अखबारों की बात करें तो बेंगलुरु से हिंदी दैनिक अखबार राजस्थान पत्रिका प्रकाशन दो दशक से हो रहा है। पत्रिका अपना चेन्नई संस्करण भी शुरू कर चुका है। साल 2012 की यात्रा में  मैंने वहां दक्षिणभारत राष्ट्रमत नामक नया अखबार देखा जो बहुत अच्छे लेआउट डिजाइन में प्रकाशित हो रहा है। यह अखबार भी बेंगलुरु के साथ चेन्नई से भी प्रकाशित होता है।



-  ----  विद्युत प्रकाश  
http://www.dbhpsabha.org/   

( (HINDI, SOUTH, KERALA, TAMILNADU )     

Tuesday, September 10, 2013

श्रीकृष्ण म्युजियम- यहां देखिए कान्हा के अनेक रूप


माखनचोर, नंदकिशोर, मनमोहन,घनश्याम रे...

कितने तेरे रूप हैं , और कितने तेरे नाम रे...

वाकई नटवर नागर के अनंत रूप हैं, जिनका बखान करना आसान नहीं है। वे कवियों की कल्पना में बसते हैं तो कलाकारों की कूचियों के अनगिनत रंगों में भी पूरी तरह समाहित नहीं हो पाते। कान्हा के बहुत सारे रुप देखने हों तो कुरूक्षेत्र पहुंचिए। यहां महाभारत की लड़ाई हुई थी लेकिन कुरुक्षेत्र में बना श्रीकृष्ण संग्रहालय आपको कान्हा के कई रुपों से मिलवाता है। कुरुक्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है श्रीकृष्ण संग्रहालय। 1991 में बना ये संग्रहालय अब भव्य रूप ले चुका है। 1995 में संग्रहालय में नया ब्लाक शामिल किया गया। वहीं 2012 में इसमें मल्टी मीडिया गैलरी को जोड़ा गया। 

तीन मंजिले संग्रहालय में महाभारत के युद्ध को मल्टीमीडिया स्वरूप देखा जा सकता है। संग्रहालय की उपर वाली मंजिल पर बने इस प्रदर्शनी में महाभारत की युद्ध भूमि का बड़ा ही विशाल स्वरूप दिखाई देता है। खास तौर पर ये बच्चों को काफी पसंद आता है।



संग्रहालय में सातों दिन प्रवेश -  श्रीकृष्ण संग्रहालय सालों भर खुला रहता है। यहां सातों दिन यानी रविवार को भी जाया जा सकता है। यहां प्रवेश का टिकट 30 रुपये का है। संग्रहालय के भवन के मुख्य भवन पर महाभारत के युद्ध में रथ पर सवार अर्जुन व श्रीकृष्ण की तस्वीर है। संग्रहालय के अंदर श्रीकृष्ण को विविध रूपों में देखा जा सकता है। यह संग्रहालय भारत के दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारी नंदा का ड्रीम प्रोजेक्ट था जिसने धीरे धीरे आकार लिया।

अलग चित्रकला शैली में देखें कान्हा को -  कान्हा के प्रेम में हर प्रांत के कलाकार रंगे हैं। तो इस संग्रहालय में देश के प्रमुख पेंटिंग शैली में श्रीकृष्ण की तस्वीरें यहां देखी जा सकती हैं। कांगड़ा शैली में, दक्षिण भारत के तंजौर शैली में तो बिहार की मधुबनी पेटिंग में बाल गोपाल के मोहक चित्र यहां देखे जा सकते हैं। न सिर्फ पेंटिंग, बल्कि मूर्तिकला, स्थापत्य कला में भी कान्हा के विविध रूप आप यहां देख सकते हैं। श्री कृष्ण म्यूजियम ने कवाड पेंटिंग देख सकते हैं। कवाड विधा में लकड़ी के बक्से में कई दरवाजे होते हैंजिसमें तस्वीरें बनी होती हैं।

मल्टी मीडिया में गीता गैलरी -  संग्रहालय में गीता गैलरी भी है। साथ ही धर्म का ज्ञान बढ़ाने मल्टीमीडिया में सवाल जवाब वाले रोचक कियोस्क लगाए गए हैं जो बच्चों को काफी आकर्षित करते हैं। यहां आप अभिमन्यु का चक्रव्यूह का भी शानदार चित्रण देख सकते हैं, जो काफी रोचक है। कान्हा संग्रहालय के बारे में 
कुछ और जानना है तो आप म्यूजियम के ब्लॉग पर भी जा सकते हैं -  www.srikrishnamuseum.blogspot.in

रोचक है श्रीकृष्ण पैनोरमा - म्यूजियम के परिसर में ही श्रीकृष्ण पैनोरमा बना है। यह वास्तव में साइंस सेंटर है जो न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी लुभाता है। यहां टेलीविजन का वर्चुअल स्टूडियो जैसी कई रोचक चीजें देखी जा सकती हैं।


जब भी आप श्रीकृष्ण म्युजियम पहुंचे तो अपने पास कुछ घंटे रखें इसे अच्छी तरह से देखने के लिए। संग्रहालय के परिसर के बाहर विशाल पार्क भी है जहां कई तरह के रोचक खेल हैं। संग्रहालय से लगा हुए इस सुंदर हरे भरे पार्क में बैठकर आप यात्रा की थकान भी मिटा सकते हैं।

कुरुक्षेत्र का श्री कृष्ण संग्रहालय महाभारत और गीता पर आधारित कलाकृतियों के लिए जाना जाता है लेकिन अब इस संग्राहलय की खूबियों में दुर्लभ पौधे भी शुमार हो गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां पारिजात समेत कई महाभारतकालीन पौधे भी लगाए गए हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   
 ( KURUKSHETRA, SRI KRISHNA, MUSSEUM) 

Monday, September 9, 2013

स्थानेश्वर महादेव - यहां पांडवों ने की थी शिव की पूजा

नरकातारी के दर्शन के बाद हमारे आटो रिक्शा वाले हमें लेकर पहुंचे हैं स्थानेश्वर शिव मंदिर। शिव के इस मंदिर का महाभारत के युद्ध में खास महत्व है।  वैसे तो देश भर में शिव के कई प्रसिद्ध मंदिर है। शिव के 12 ज्योतिर्लिंग के अलावा भी कई शिव मंदिर हैं जिनका खास महत्व है। इन्हीं मंदिरों में एक है कुरूक्षेत्र स्थित स्थानेश्वर का शिव मंदिर।

स्थानेश्वर महादेव वह मंदिर है जहां पांडवों ने महाभारत के युद्ध से पहले अपने विजय की कामना करते हुए भगवान शिव की पूजा की थी। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र आने वाले श्रद्धालुओं की इस धार्मिक नगरी में यात्रा का पूरा पुण्य तब तक नहीं मिलता है जब तक कि वे स्थानेश्वर मंदिर में भगवान शिव के दर्शन न कर लें। यहां आने वाले शिव भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए विधिपूर्वक अभिषेक कराते हैं।



 पुराणों के मुताबिक सकाम या फिर निष्काम भाव से स्थाणु मंदिर में प्रवेश करने वाला मनुष्य पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है। स्थानेश्वर मंदिर से लगा हुआ एक सुंदर सरोवर भी है। कहा जाता है इस सरोवर के जलार्पण से तमाम रोग दूर हो जाते हैं।

कहा जाता है कि इस सरोवर के जल के स्पर्श से राजा वेन के सारे कष्ट दूर हो गए थे। इस सरोवर में स्नान करने के लिए घाट बने हुए हैं। स्त्रियों के स्नान करने के लिए अलग से घाट बने हुए हैं। कुरुक्षेत्र में शिव का एक और मंदिर दुखभंजन महादेव मंदिर भी है। इस मंदिर से लगा हुआ एक सरोवर भी है। 




कैसे पहुंचे - स्थानेश्वर शिव का ये मंदिर कुरुक्षेत्र शहर में थानेश्वर से तीन किलोमीटर दूर झांसा रोड पर स्थित है। आप कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर या पैनोरमा के आसपास से यहां जाने के लिए आटो रिक्शा करके जा सकते हैं।



शक्तिपीठ है मां भद्रकाली का मंदिर – 

कान्हा और शिव की इस नगरी में शक्ति की देवी का भी मंदिर है। शिव मंदिर के दर्शन के बाद हमलोग पहुंचे हैं मां काली के मंदिर में।
 आस्था की नगरी कुरुक्षेत्र में स्थित है मां भद्रकाली का प्रसिद्ध मंदिर। भद्रकाली मां दुर्गा का ही एक रूप हैं। यह सती के 51 शक्ति पीठ में से एक  माना जाता है। यहां सालों भर हर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते रहते हैं। भद्रकाली मंदिर स्थानेश्वर मंदिर से थोड़ी दूर पर ही स्थित है। कहा जाता है कि यहां भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर सती के दाहिने पाव की एड़ी कट कर गिरी थी।

इसे सिद्ध पीठ माना जाता है और यहां दशहरे पर मेला लगता है। मंदिर परिसर में कूप है जिसमें लोगो मनोकामना पूर्ति के लिए मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि यही वह जगह है जहां महाभारत के युद्ध से पूर्व अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर दुर्गा स्तोत्र का पाठ किया था।


गुरुद्वारा छठी पातशाही -  कुरुक्षेत्र मे कई गुरुद्वारे हैं जो अलग अलग गुरुओं से जुडे हुए हैं। यह दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी के आने का प्रकरण मिलता है। एक बार वे सूर्य ग्रहण के समय आए थे और ब्रह्म सरोवर के पास निवास किया था। उनकी याद में यहां गुरुद्वारा राजघाट दसवीं पातशाही बना हुआ है।
सिखों के नौंवे गुरु तेगबहादुर जी के  कुरुक्षेत्र में आने का भी प्रकरण मिलता है। स्थानेश्वर  मंदिर से बिल्कुल सटे उनकी याद में गुरुद्वारा नौवीं पातशाही बना हुआ है। यहां बड़ी संख्या में सिख सगंत दर्शन करने आते हैं। कुरूक्षेत्र में इस स्थल पर शिव मंदिर और गुरुद्वारे का आसपास में बिल्कुल अनूठा संयोग दुर्लभ है। दोनों मिलकर यहां अदभुत सुरम्य वातावरण का संचार करते हैं।

कुरुक्षेत्र का गुरुद्वारा छठी पातशाही भी काफी प्रसिद्ध है। यह गुरु हरगोबिंद की याद में बना है। इसके परिसर में विशाल सरोवर है। यहां श्रद्धालुओं के लिए लंगर भी संचालित होता है। 

मां भद्रकाली के दर्शन के बाद हमारा अगला और आखिरी पड़ाव होगा श्री कृष्ण संग्रहालय और पैनोरमा विज्ञान केंद्र। जहां हम काफी समय देने वाले हैं तो चलिए आगे चलते हैं...
  - माधवी रंजना   ( BHADRA KALI TEMPLE, KURUKSHETRA )

Sunday, September 8, 2013

कुरूक्षेत्र में नरकातारी तीर्थ और बाणगंगा

कुरूक्षेत्र में थानेसर से ज्योतिसर के रास्ते में 5 किलोमीटर की दूरी पर नरकातारी तीर्थ स्थित है। वर्तमान में नरकातारी तीर्थ में आप वाणगंगा देख सकते हैं जो एक कुएं के समान है। यहां परिसर में कई मंदिर बने हैं। यहां भीष्म पितामह की माता गंगाजी की मूर्ति, बाण शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह की विशाल मूर्ति, पांचों पांडव और द्रौपदी की मूर्तियां स्थापित है। परिसर में 26 फीट ऊंची हनुमान जी की भी विशाल मूर्ति है।
कहा जाता है महाभारत के युद्ध में घायल भीष्म पितामह बाण शैय्या पर लेटे थे तब उन्होंने अर्जुन से पानी मांगा। अर्जुन ने यहीं भूमि में शक्तिशाली बाण मारा तो भूमि से गंगा का एक स्रोत फूट पड़ा। पुराणों के अनुसार महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पांडव हस्तिनापुर चले गए। एक माह 26 दिन बाद नरकातारी तीर्थ पर पांच पांडव द्रौपदी व नारद जी कई ऋषियों समेत भीष्म से मिलने पहुंचे। यहीं पर भीष्म पितामह ने महाभारत का शांतिपर्व और विष्णु सहस्त्रनाम सुनाया था। भीष्म पुराणों के बहुत बड़े ज्ञाता थे।

भीष्म जब महाभारत के युद्ध 10वें दिन घायल होकर गिर पड़े तो उस समय सूर्य दक्षिणायन था इसलिए वे परलोक नहीं जाना चाहते थे। उन्हें पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था। लिहाजा वे अर्जुन द्वारा बनाई गई बाणों की शैय्या पर ही लेटे रहे।

नरकातारी में किया था भीष्म पितामह ने देहत्याग 
महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद जब सूर्य उत्तरायण हो गए तब माघ मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को नरकातारी में ही भीष्म ने अपने प्राण त्यागे।

महाभारत के मैदान में भीष्म महाभारत में सबसे बलशाली पुरूष थे। वे एक पल में युद्ध को खत्म कर सकते थे, लेकिन उन्होंने शस्त्र नहीं उठाने का प्रण ले रखा था।

कहा जाता है भीष्म ने लगातार गायत्री मंत्र के उपासना से ये शक्तियां अर्जित की थीं। भीष्म ने अर्जुन को वरदान दिया था कि यदि कोई व्यक्ति पाप का अन्न खा ले, उसका मन मलिन हो जाए तो मेरे दर्शन मात्र से ही वह निर्मल हो जाएगा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( NARKATARI TIRTH, BANGANGA, KURUKSHETRA ) 




Saturday, September 7, 2013

ज्योतिसर – यहां श्रीकृष्ण ने दिया गीता का उपदेश


कुरुक्षेत्र शहर से आठ किलोमीटर आगे पेहवा रोड पर स्थित है ज्योतिसर। ज्योतिसर वही जगह है जहां पर महाभारत के युद्ध से पहले  श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का संदेश दिया था। उन्होने अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुनाने के बाद युद्ध के लिए तैयार किया था। ब्रह्म सरोवर से ज्योतिसर आटो रिक्शा या फिर पेहवा जाने वाली लोकल बस से जाया जा सकता है। रास्ते में कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय का परिसर और कल्पना चावला तारामंडल आता है।

संकट में है वट वृक्ष -  ज्योतिसर में पुराना वट वृक्ष है। कहा जाता है इसी पेड़ के नीचे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुनाए थेजब अर्जुन ने अपने ही बंधु बांधवों के खिलाफ शस्त्र उठाने से इनकार कर दिया था। वट वृक्ष ही गीता की घटना का एक मात्र साक्षी है। यहां आने वाले श्रद्धालु इसी वृक्ष के आगे सिर नवाते हैं। ज्योतिसर नाम इसलिए कि यहां एक बड़ा सरोवर है जिसे ज्योति सर कहते हैं। ज्योति सर यानी ज्ञान का सरोवर। भला गीता के ज्ञान से बड़ा ज्ञान क्या हो सकता है। हालांकि कुछ लोग इसे ज्योतिश्वर महादेव भी कहते हैं। कहा जाता हैं यहां कभी एक प्रचीन शिव मंदिर हुआ करता था। 

आदि शंकराचार्य भी यहां गीता के बारे में चिंतन मनन के लिए पधारे थे। ज्योतिसर के परिसर में एक प्राचीन दिखाई देता शिवमंदिर कहा जाता है कि ये मंदिर कश्मीर के राजा ने बनवाया था। परिसर में कई और छोटे छोटे मंदिर हैं। ज्योतिसर में लंबे समय से लाइट एंड साउंड शो चलाया जा रहा था जिसे अब वट वृक्ष को संरक्षित रखने के लिए बंद कर दिया गया है।

कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य के प्रयासों से वर्ष 1967 में अक्षय वृक्ष के निकट एक सुंदर कृष्ण-अर्जुन रथ का निर्माण किया गया तथा साथ ही शंकराचार्य मंदिर का भी निर्माण हुआ। इस तीर्थ की व्यवस्था कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के हाथों में है। मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात् श्री गीता जयन्ती के दिन कुरुक्षेत्र उत्सव का आयोजन किया जाता है। 

ज्योतिसर का पवित्र तीर्थ स्थान सरस्वती नदी के किनारे है। पर ये नदी अब लुप्त प्राय है। कुरुक्षेत्र  के धार्मिक महत्त्व को देखते हुए यहां पर श्री अक्षरधाम और तिरुपति बाला जी का मंदिर बनाया जा रहा है। इससे श्रद्धालुओं के साथ-साथ धार्मिक पर्यटक भी कुरुक्षेत्र आएंगे। 




साल 1960 में दरभंगा महाराज ने इस वटवृक्ष के आसपास पक्का चबूतरा बनवा दिया। हालांकि अब इस पक्के चबूतरे के कारण पेड़ पर संकट आ गया है। पेड़ की जड़ों को आगे फैलने की जगह नहीं मिल पा रही है।
 पर्यावरणविद अब इस चबूतरे को हटाने की बात कर रहे हैं ताकि इस वृक्ष को जिंदा रखा जा सके। यहां एक छोटा सा कृष्ण मंदिर भी बना हुआ है। यहां का सरवोर अति पवित्र माना जाता है। यहां भी स्नान करने के लिए पक्के घाट बने हुए हैं।
ज्योतिसर का वातावरण समग्र में बहुत ही रमणीक है। यहां हरियाली विराजती है। कमल पुष्पों को निहारते हुए बड़ा भला लगता है। ज्योतिसर के इस सरवोर में आजकल खिलते हैं कमल के बड़े बड़े फूल। यहां से आप फूल खरीद कर ले जा भी सकते हैं।
-    - विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, September 6, 2013

कुरुक्षेत्र में राजस्थानी थाली का स्वाद

ब्रह्म सरोवर में आस्था की डुबकी लगाने के बाद भूख लग गई थी। तो सरोवर के पास के बाजार में एक राजस्थानी भोजनालय नजर आए। तो मैं और अनादि वहीं पहुंच गए। दोपहर होने वाली है। खाने वाले ज्यादा नहीं है। हम उनके पहले ग्राहक हैं।

वैसे तो पूरे हरियाणा में आपको पंजाबी खाना हर जगह मिल जाता है। पंजाबी खाने की अपनी अलग विशेषता होती है। तंदूरी रोटी और तेज मसाले। पर राजस्थान का खाना हो तो तवे की रोटी और दाल सब्जी का अपना अलग स्वाद। अगर आप कुरूक्षेत्र में शुद्ध राजस्थानी खाने का भी स्वाद ले सकते हैं। हम पहुंचे ब्रह्रम सरोवर के पास बिरला मंदिर लेन में नए खुले राजस्थान फूड प्लाजा में। 

यहां 50 रुपये की समान्य थाली तो 90 रुपये की स्पेशल थाली है। हमने मंगाई स्पेशल थाली। चपाती बनाई गई थी राजस्थानी स्टाइल में। यानी इसमें कसूरी मेथी का स्वाद। घी चुपड़ी और अपेक्षाकृत मोटी। बस मजा आ गया। साथ में चावल, पनीर की सब्जी, आलू की सब्जी, दाल, रायता, दो मिठाइयां, पापड़, सलाद और अचार। और क्या चाहिए। वैसे आप थाली के अलावा यहां अपनी पसंद के मुताबिक खाने का अलग अलग आर्डर भी दे सकते हैं। 

राजस्थान फूड प्लाजा में भी शाम को गोलगप्पे, टिक्की चाट खाए जा सकते हैं। ( फोन- 07206668721, 07206667781)
हमें बातों बातों में पता चला कि कुरुक्षेत्र में सालों भर बड़ी संख्या में राजस्थान से श्रद्धालु भी आते रहते हैं। इसलिए यहां कई राजस्थानी भोजनालयो का संचालन होता है।

वैसे कुरुक्षेत्र की सड़कों पर शाम को स्ट्रीट फूड का भी मजा ले सकते हैं। अगर आप सुबह-सुबह कुरुक्षेत्र में हैं तो कई जगह नास्ते में पंजाबी पराठे का भी स्वाद ले सकते हैं। पंजाबी पराठा बोले तो नास्ते में एक ही काफी है। अगर आपने दो खा लिया तो खाने के बराबर हो गया। 

आटो से घूमे कुरुक्षेत्र -  कुरुक्षेत्र के सभी प्रमुख दर्शनीय स्थल घूमना हो तो सबसे सुगम साधन एक आटो रिक्शा बुक कर लेना है। सारे मंदिर और दर्शनीय स्थल कुछ किलोमीटर की दूरी पर हैं, इसलिए पैदल या सार्वजनिक वाहन से घूम माना सहज नहीं है। यहां आटो रिक्शा वालों से मोलभाव करके हमने 200 रुपये में सभी प्रमुख स्थलों को घूमाने का तय कर लिया।आप अगर कुरुक्षेत्र घूमने पहुंचे हैं तो कम से कम दिन भर का समय अपने पास इस शहर के लिए निकाल कर रखें।  
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---  विद्युत प्रकाश मौर्य 
   ( RAJSTHANI VEG FOOD IN KURUKSHETRA)  




Thursday, September 5, 2013

कुरुक्षेत्र - ब्रह्म सरोवर में आस्था की डुबकी


दिल्ली के आसपास एक दिन में कहीं घूमने जाना हो तो कुरुक्षेत्र अच्छा विकल्प हो सकता है। यहां महाभारत काल से जुड़े कई मंदिर और दूसरे दर्शनीय स्थल हैं। आप सुबह जाकर शाम तक लौटकर आ भी सकते हैं।

ब्रह्मसरोवर कुरुक्षेत्र का प्रमुख ऐतिहासिक सरोवर है। इसकी लंबाई 3600 फीट और चौड़ाई 1200 फीट है। सरोवर के चारों ओर यात्रियों के विश्राम के लिए बरामदे बने हैं। कम पानी में स्नान के लिए रेलिंग बनी है। महिलाओं के स्नान के लिए कई घाट हैं। जगह जगह शौचालय भी बने हैं।

ब्रह्म सरोवर को सरस्वती फीडर से सदैव पानी मिलता रहता है। सरोवर में 15 फीट गहरा पानी हमेशा रहता है। देश के दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारीलाल नंदा का सहयोग से ब्रह्म सरोवर का कायाकल्प किया गया।

शिव का प्राचीन सर्वेश्वर मंदिर 
ब्रह्म सरोवर के बीचों बीच शिव का प्रचीन सर्वेश्वर महादेव मंदिर है। इसे बताते हैं कि 17वीं सदी में बाबा श्रवणनाथ ने बनवाया था। सरोवर के बीच में द्रौपदी कूप मंदिर भी है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद द्रौपदी ने यहीं अपने खून से सने बाल धोए थे। सरोवर के मध्य में 2008 में रथ पर सवार अर्जुन और श्रीकृष्ण की विशाल प्रतिमा है। चांदनी रात में ब्रह्म सरोवर की आभा देखते ही बनती है।


बिड़ला मंदिर -  ब्रह्म सरोवर के द्वार के पास ही बिड़ला मंदिर है। यहां भी श्रीकृष्ण की मनोहारी मूर्तियां हैं। ब्रह्म सरोवर से थोड़ी दूरी पर ही सन्नहित सरोवर है। यहां लोग  ग्रहण काल में स्नान के लिए आते हैं। हर अमावस को भी यहां श्रद्धालु स्नान के लिए आते हैं। कहा जाता है यहां युद्धिष्ठिर ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। इसलिए यहां पिंडदान की पंरपरा है। जो लोग फल्गू तट पर पिंडदान के लिए गया नहीं जा पाते वे यहां आते हैं।

यह भी कहा जाता है कि इसी  सरोवर के तट पर कर्ण ने अपने कवच कुंडल ब्राह्रमणों को दान किए थे। सरोवर के परिसर में सालों भर साधु महात्माओं का वास होता है। हर साल गीता जयंती पर यहां विशाल मेला लगता है। सन्हित सरोवर के ठीक सामने प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर और छठी पातशाही गुरुद्वारा भी है।

कैसे पहुंचे - दिल्ली से कुरुक्षेत्र की दूरी 156 किलोमीटर है। कुरुक्षेत्र के लिए दिल्ली से बसें 24 घंटे मिलती रहती हैं। दिल्ली अंबाला मार्ग पर चलने वाली रेलगाड़ियों से भी यहां पहुंच सकते हैं। यहां अंबाला की ओर जाने वाली बसों से आप पिपली में उतरें। पिपली से आप सीधा आटो करके पहुंचे ब्रह्म सरोवर। यह कुरुक्षेत्र का मुख्य आकर्षण है। सरोवर को केंद्र बनाकर आप आसपास के प्रमुख स्थलों को घूम सकते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KURUKSHETRA, MAHABHART, BRAHAM SAROVAR )