Thursday, May 30, 2013

कृष्ण की नगरी द्वारका की ओर

पोरबंदर से द्वारका 100 किलोमीटर है। रास्ता समंदर के साथ साथ चलता है। पोरबंद से सोमनाथ की दूरी भी 110 किलोमीटर ही है। ये रास्ता भी समंदर के साथ साथ है। पोरबंदर के बाद हमारा अगला पड़ाव था द्वारका। हमने जीएसआरटीसी की सुबह की बस में आनलाइन टिकट बुक कराया था। बस में पहुंचने पर कंडक्टर के पास पहले से ही हमारी पीएनआर की सूची मौजूद थी।

पोरबंदर से द्वारका के रास्ते में जगह जगह पवन ऊर्जा के प्रोजेक्ट दिखाई देते हैं। हवा का रुख सही रहने पर पवन ऊर्जा की पंखियां चलती रहती हैं। विंड वर्ल्ड नामक कंपनी ने ये पवन ऊर्जा वाली पंखियां लगाई हैं। पोरबंदर से पहले लालपुर जाम में इसका बड़ा प्रोजेक्ट है।

पोरबंदर से द्वारका के रास्ते में 27 किलोमीटर आगे मूल द्वारका का मंदिर आता है। इसके आगे हरसिद्ध महादेव का मंदिर है। अगर आप सारे मंदिरों को देखते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपको निजी टैक्सी करनी चाहिए फिर निजी बस सेवा से रास्ते के ठहराव के बारे में पूछकर यात्रा करनी चाहिए। रास्ते में बस एक मनोरम स्थल पर लंच के लिए भी रुकी। हमने यहां लंच तो नहीं किया पर गुजराती ढाबे में खाट पर बैठकर खूब आराम फरमाया। बस मार्ग पर एक गांव पड़ा लांबा।

कहीं कहीं सड़कों की हालत खराब भी दिखी। यानी गुजरात के विकास का दावा खोखला। लगभग दो घंटे के बस के सफर के बाद हमें द्वारकाधीश की नगर के दर्शन हो गए। हाईवे पर शहर से कुछ किलोमीटर पहले से ही होटल और मंदिर दिखाई देने लगते हैं। बस स्टैंड में उतरने के बाद हम अपने पहले से बुक किए होटल उत्तम पहुंच गए। ये होटल जवाहर रोड पर द्वारकाधीश के मंदिर के ही पास था। हमने इसे  क्लियर ट्रिप से बुक किया था। ( http://www.hoteluttam.com/) तीन बत्ती चौक के पास दोपहर का भोजन लेने के बाद हमने द्वारा घूमने का फैसला किया।

-   -  विद्युत प्रकाश मौर्य.  (DWARKA, HOTEL UTTAM ) 

Tuesday, May 28, 2013

गुजरात की शाही सवारी छकड़ा


पोरबंदर में एक छकड़े पर अनादि। 
भले ही गुजरात ने तमाम क्षेत्रों में उपलब्धियों के झंडे गाड़े हों लेकिन यहां की शाही सवारी तो छकड़ा ही है। छकड़ा एक तरह की जुगाड़ गाड़ी है। कई राज्यों में इस तरह की गाड़ियां प्रतिबंधत हैं।  लेकिन इसका गुजरात में आरटीओ दफ्तरों में छकड़ा का पंजीकरण होता है।

गुजरात में जामनगर की एक कंपनी अतुल दो लाख रुपये में छकड़ा तैयार करके बेचती है। छकड़ा राज्य का बहु उपयोगी वाहन है। यहां गांव व शहरों में माल ढुलाई के लिए आदर्श तो है ही इससे सवारियां भी ढोई जाती हैं। छकड़ा में डीजल इंजन लगा होता है। पोरबंदर में एक छकड़ा के चालक ने बताया कि यह 30 किलोमीटर तक का औसत दे देता है। भले ही आवाज बहुत करता है लेकिन ररखाव में तो सस्ता है। यह एक टन तक वजन उठाने में सक्षम है। सवारी ढोने की बात हो तो इसमें 20 आदमी बैठ जाते हैं। कुछ लोग खड़े रहते हैं तो कुछ लटक भी जाते हैं। गुजरात के गांवों को शहर से जोड़ने में छकड़ा अहम कड़ी है।

तमाम कंपनियों के आटो रिक्शा, टेंपो, टाटा मैजिक, नैनो कार, महिंद्रा के जीओ और मैक्सिमो जैसे माडल के अच्छे पब्लिक ट्रांसपोर्ट बाजार में आ गए हैं लेकिन वे देशी जुगाड़ से बने छकड़े का रिप्लेसमेंट नहीं बन पा रहे हैं। सीट के नाम पर छकड़े में लकड़ी का पटरा रखा होता है। जब आप इसमें चलते हैं तो पर पूरा शरीर हिल उठता है लेकिन गुजरातियों को इस छकड़े से मानो प्यार है। वे इससे दूर नहीं जाना चाहते। बैठने के साथ हवा धूप और आसपास के नजारे देखने का भी आनंद मिलता है।

किसी जमाने में दिल्ली की सड़कों पर छकड़े से मिलती जुलती फटफट गाड़ी चला करती थी। इसमें बुलेट का इंजन लगा होता था। पर प्रदूषण फैलाने के नाम पर दिल्ली के फटफट को शहीद कर दिया गया। हमने सोमनाथ से लेकर दीव तक ऐसा ही छकड़ा चलते हुए देखा। माल, ढुलाई, मेला से लेकर टूरिज्म तक छकड़ा हर जगह मौजूद है। हमने भी दीव में थोड़ी देर तक छकड़े की सवारी का खूब मजा लिया।

 - vidyutp@gmail.com

Sunday, May 26, 2013

कान्हा के बाल सखा सुदामा का मंदिर

पोरबंदर शहर में एमजी रोड पर सुदामा मंदिर। यहां वही कृष्ण के बाल सखा सुदामा जी का मंदिर है। द्वारका में कृष्ण विराजते हैं तो उनके मित्र सुदामा विराजते हैं पोरबंदर में। इसलिए पोरबंदर को सुदामापुरी भी कहा जाता है। किसी जमाने में यहां जंगल हुआ करता था। यहीं पर संदीपनी ऋषि का आश्रम भी था। सुदामा मंदिर बापू के घर कीर्ति मंदिर से कुछ दूरी पर ही है। सुदामा यानी महाभारत काल के एक प्रेरक व्यक्तित्व जो अपनी गरीबी में जीते हैं लेकिन अपने बाल सखा राजा कृष्ण से कोई मदद नहीं लेना चाहते। बाद में पत्नी की सलाह पर वे कृष्ण की मदद लेने जाते हैं। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की कहानी पूरे देश में सुनाई जाती है। पर कृष्ण के मंदिर देश भर में बने हैं लेकिन सुदामा जी का एक मात्र मंदिर पोरबंदर में ही है।

सुदामा मंदिर में सुदामा जी की प्रतिमा के अलावा उनकी पत्नी सुशीला की प्रतिमा लगी है। मंदिर काफी भव्य नहीं है लेकिन इसका अपना महत्व है। सुदामा में खास तौर पर निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब लोगों की काफी आस्था है। सुदामा समाज के अंतिम लोगों के बीच प्रिय हैं जैसे की बापू। मंदिर परिसर में एक सुदामा कुंड भी है जो किसी पुरानी बावड़ी जैसा है।

और ये 84 चक्कर  
मंदिर के बगल में 84 का चक्कर है। यह 84 लाख योनियों के बीच आत्मा के भटकाव का प्रतीक है। इसमें घुसने के बाद आप निकलने की कोशिश करेंगे लेकिन निकल नहीं पाएंगे। कोई कोई निकल भी जाता है। सुदामा मंदिर परिसर में बच्चों के लिए झूले पार्क आदि बनाए गए हैं।
महिलाओं की भजन मंडलियां - 
सुदामा मंदिर में महिलाओं की मंडलियां रोज कीर्तन करने आती हैं। कीर्तन करने वाली अलग-अलग कई मंडलियां हैं। ये महिलाएं मंदिर में आने के बाद देवी देवताओं की तस्वीरें सजाती हैं। उसके बाद बैठक लगाकर पूरी आस्था से देर तक ईश्वर की वंदना में लीन हो जाती हैं।

-    माधवी रंजना  ( SUDAMA TEMPLE, PORBANDAR, GUJRAT ) 

Friday, May 24, 2013

गुजराती थाली - मतलब छककर खाओ

गुजराती थाली मतलब छक कर खाओ पर पचाने के लिए जमकर पीओ छाछ। गुजरात शाकाहारी भोजन खास तौर पर गुजराती थाली के लिए जाना जाता है। हमने पोरबंदर स्टेशन पर उतरते ही स्टेशन गेट के बाहर दाहिनी तरफ एक एसी रेस्टोरेंट में गुजराती थाली का आनंद लिया था। यहां 60 रुपये की फिक्स थाली थी। घी लगी चपाती, सब्जियां और छाछ आदि।

नीलेश भोजनालय - शाम खाना हमने जांच पड़ताल कर एसटी रोड पर नीलेश भोजनालय में करने को तय किया। यहां 70 रुपये की अनलिमिटेड थाली थी। शुरुआत गेहूं की एक घी चुपड़ी मोटी रोटी के साथ हुई। उसके बाद चाहे जितनी मर्जी चपाती और चावल खाएं आप। छाछ तो उन्होंने एक जग में लाकर रख दिया। आपकी मर्जी चाहे जितने ग्लास गटक जाओ। आनंद आ गया। वैसे पोरबंदर में मून पैलेस समेत कई और जगह गुजराती थाली खाई जा सकती है। सुबह हमने बापू के शहर में जलेबियों का भी स्वाद लिया।

केसर आम - सौराष्ट्र में इन दिनों आम का मौसम है। गुजरात का प्रसिद्ध केसर आम इसी इलाके में होता है। केसर को शौकीन इसे अपने साथ मुंबई तक ले जाते हैं। ट्रेन में हमें लोग केसर आम की पेटी अहमदाबाद और मुंबई ले जाते हुए मिले। आम को लेकर हर इलाके लोग अपने स्थानीय स्वाद को लेकर खासे शौकीन दिखते हैं। गुजरात का केसर रत्नागिरी के हापुस को चुनौती देता है।

और ये रहा सफेद जामुन - पोरबंदर के बाजार में हमें जामुन भी खूब देखने को मिला। पर सफेद जामुन तो हमने पहली बार देखा। हालांकि ये काले जामुन की तरह मीठा नहीं होता। इसका स्वाद इसके सफेदी के मुताबिक फीका भी है।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

Wednesday, May 22, 2013

पोरबंदर की चौपाटी पर मौज मस्ती

चौपाटी मतलब समंदर का किनारा। शाम गुजारने के लिए भला समंदर के किनारे से अच्छी जगह क्या हो सकती है। बापू के शहर पोरबंदर में भी चौपाटी है। काफी भव्य नहीं पर सुंदर है। बस स्टैंड के बगल में पारसी समाज का अंतिम स्थल और चौपाटी है। आप एमजी रोड से टहलते हुए चौपाटी तक पहुंच सकते हैं। 

यहां अरब सागर गर्जना करता हुआ सुनाई देता है। समुद्र का किनारा बहुत साफ नहीं है। लिहाजा यहां स्नान करने योग्य स्थान नहीं है। पर चौपाटी के किनारे रौनक है। एक जगह पक्का घाट बनाया गया है। समंदर के किनारे एक मनोरंजन पार्क भी बना है। यहां बच्चों के लिए ढेर सारे झूले खिलौने आदि हैं। निजी वाहन से आने वालों के लिए पार्किंग का भी इंतजाम है। थक गए हैं तो पेट पूजा भी कर सकते हैं।

बड़े से हाथी पर चढ़कर फिसलने में अनादि को खूब आनंद आया। हाथी एक सीमेंट कंपनी का विज्ञापन है जो मजबूती का प्रतीक है। पोरबंदर के समुद्र तट पर सबसे यादगार रहा ऊंट की सवारी। वैसे तो ऊंट की सवारी कई जगह की जा सकती है। लेकिन यहां मजह 10 रुपये में ऊंट की सवारी। बच्चों के लिए 10 तो बड़ों के लिए 20 रुपये। सो मैंने भी ऊंट की सवारी का आनंद लिया। हर चक्कर के बाद नए लोगों को उतारने और बिठाने के लिए ऊंच महाराज को बैठना और फिर उठना पड़ता है। लेकिन ऊंट की सवारी का रोमांच अद्भुत है।

ऊंट पर बैठते ही आप एक मंजिले मकान के बराबर ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। वहीं ऊंट जब चलता है तो उसकी चाल में अजब सी मस्ती होती है। ऊंट की सवारी दूसरे पर्यटक स्थलों पर भी की जा सकती है लेकिन द्वारका और पोरबंदर में जितने सस्ते में आप ऊंट की सवारी का आनंद ले सकते हैं और कहीं भी मुश्किल है।

-    
विद्युत प्रकाश मौर्य  

( (PORBANDAR, CHAUPATI, SEA, CAMEL RIDE ) 

Monday, May 20, 2013

पोरबंदर के अमीर सेठ की बेटी थीं कस्तूरबा गांधी

पोरबंदर में बा के घर के बाहर । 
बापू का घर देख लिया तो अब चलिए बा यानी बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखने चलें। जब आप पोरबंदर में बापू का घर देखने जाते हैं तो बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखना नहीं भूलें। बा का घर कीर्ति मंदिर के ठीक पीछे है। कीर्ति मंदिर देख लेने के बाद इसके पिछवाड़े से ही बा के घर जाने का रास्ता है। रास्ते में घर जाने के लिए मार्ग प्रदर्शक लगा हुआ है।


बा का घर तीन मंजिला है। घर देखकर लगता है कि बा के परिवार वाले अपने समय में काफी संपन्न रहे होंगे। बा के घर में तीन रसोई घर, कमरे में गुसलखाना और खाने के लिए डायनिंग हॉल भी बने हुए हैं।

बा का पूरा घर अभी भी अच्छी हालत में है। इसे पूरी तरह घूम कर देखा जा सकता है। घर को देखकर लगता है कि उनका संयुक्त परिवार था। घर में मेहमानों के लिए भी कमरे बने हुए हैं। बा का जन्म अप्रैल 1869 को हुआ था। उनका शादी के पहले नाम कस्तूरबा कपाडिया था। वे पोरबंदर के अमीर व्यापारी गोकुलदास माखरजी की बेटी थीं। 14 साल की उम्र में उनकी बापू से शादी हुई। हर सुख दुख में बापू का साये की तरह साथ निभाती रहीं बा। पर 22 फरवरी 1944 को वे पुणे में बापू का साथ छोड़ गईं। 
कस्तूरबा गांधी का घर 

वर्षा जल संचय का अनूठा इंतजाम  

दो सौ साल पुराने इस कस्तूरबा के घर में वर्षा जल संचय का अद्भुत इंतजाम है। छत से बारिश का पानी नीचे आने के लिए कई छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं। इससे छत का पानी पाइप के सहारे आधार तल पर आ जाता है। आधार तल पर जमीन के नीचे पानी की टंकी बनाई गई है जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाता है। इस पानी का इस्तेमाल बारिश के बाद दिनों में अलग अलग तरह के कार्यों के लिए किया जाता है। बताया जाता है पोरबंदर के तमाम संपन्न लोगों ने अपने घरों में बारिश के पानी के संचय के लिए इंतजाम कर रखे थे। बारिश के पानी के संचय का यह इंतजाम प्रेरक है। दो साल पहले भी पानी बचाने को लेकर लोगों में जिस तरह की चेतना थी यह आज भी सीखने योग्य है। आज सार्वजनिक भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की बात की जा रही है, पर ऐसा इंतजाम तो घर घर में होना चाहिए।

सात साल में सगाई 13 साल में शादी
बा और बापू की शादी कब हुई ये सही सही पता नहीं चलता। किसी भी पुस्तक में उनकी शादी की तारीख नहीं मिलती। इतना लिखा हुआ मिलता है कि मई 1883 में मोहनदास और कस्तूरबा का विवाह धूमधाम से हुआ। पर तारीख नहीं पता चलता। वैसे उन दोनों का विवाह होना 7 साल की उम्र में ही तय हो गया था। तय होने पर सगाई कर दी गई। पर शादी 1883 में हुई। तब बापू साढ़े 13 साल के थे और बा 14 साल की। वनमाला पारिख अपनी पुस्तक में बा का जन्म अप्रैल 1869 लिखती हैं। जन्म तारीख स्पष्ट नहीं है। ठीक इसी तरह शादी की तारीख भी स्पष्ट नहीं है। बा के पिता का नाम गोकुल दास मकन जी था। मां का नाम ब्रज कुअंर। वैष्णव परिवार था। बा के तीन भाई और दो बहनें थीं। पर लंबे समय तक जीवित बा और उनके भाई माधवदास ही रहे।

अक्षर ज्ञान से दूर बा थीं विदूषी महिला – 
काठिवाड़ में उस जमाने में लड़कियों को कोई पढ़ता ही नहीं था इसलिए बा भी पढ़ी लिखी बिल्कुल नहीं थीं। शादी के बाद बापू ने अलग अलग समय में बा को पढ़ाने की कोशिश की। तब बा गुजरात में लिखना पढ़ना सीख गई थीं। पर बापू बा के विद्वता और मानसिक स्तर की बहुत तारीफ करते हैं। अगर मौका मिला होता तो बा पढ़ने के बाद उच्च कोटि की विदूषी महिलाओं में गिनी जातीं। शादी के बाद बा और बापू के बीच अक्सर  विवाद होते थे। बापू के एक अपनी बातमनवाने वाले पति के तौर पर व्यवहार करते पर धीरे धीरे बा समझ गईं कि बापू किस मिट्टी के बने हैं। बा ने खुद को सामंजित किया और बापू के सामाजिक जीवन में उनकी बहुत बड़ी सहयोगी बनकर उभरीं। अपने आखिरी दिनों तक वे बापू के सुख दुख का ख्याल रखने में लगी रहीं। इससे बापू को अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में काफी सुविधा हुई।

बा पर पुस्तकें –
कुछ किताबें कस्तूरबा गांधी पर केंद्रित लिखी गई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है वनमाला पारिख और सुशीला नय्यर की हमारी बा। यह गुजराती के अलावा हिंदी में भी उपलब्ध है। 

नवजीवन प्रकाशन मंदिर की इस पुस्तक में बा के बारे में प्रमाणिक जानकारियां हैं। पहली बार 1945 में प्रकाशित इस पुस्तक को खुद बापू ने भी देखा था और उसकी प्रस्तावना भी लिखी है। मूल रूप से यह पुस्तक वनमाला पारिख का प्रयास है। इस पुस्तक में गांधी जी सचिव रहे प्यारे लाल की बहन सुशीला नय्यर ने भी सहयोग किया है। पुस्तक में बा का लिखा एक दुर्लभ पत्र भी है जिसमें बा ने खुद को गांधी जी की सहधर्मिणी होने पर गर्व किया है। बा लिखती हैं – मुझे जैसा पति मिला है वैसा तो दुनिया में किसी स्त्री को नहीं मिला होगा। मेरे पति के कारण ही मैं सारे जगत में पूजी जाती हूं।

दूसरी पुस्तक बा और बापू को मुकुल भाई कलार्थी ने लिखा है। यह पुस्तक बा और बापू के बारे में संस्मरण के तौर पर है। यह भी नवजीवन प्रकाशन मंदिर से प्रकाशित है। पहली बार प्रकाशन 1962 में हुआ। इसकी प्रस्तावना मगन भाई देसाई ने लिखी है। कुल 175 पृष्ठों की पुस्तक में बा और बापू पर 120 संस्मरण हैं। पुस्तक पढ़ने पर बा और बापू के जीवन के बड़े ही सरल तरीके से चित्रात्मक स्वरूप में दृष्टिपात किया जा सकता है।

कस्तूरबा गांधी पर तीसरी पुस्तक का नाम है- बा। पहला गिरिमिटिया लिखकर चर्चित हुए गिरिराज किशोर की यह नई पुस्तक आई है – बा। यह पुस्तक भी उपन्यास शैली में लिखी गई है। गिरिराज किशोर ने पुस्तक लिखने से पहले बा के जीवन पर गहन शोध किया है। ठीक उसी तरह जैसे पहल गिरमिटिया लिखने से पहले किया था। पुस्तक 600 रुपये की है। हार्ड बांड में संस्करण में प्रकाशित है। एक अंग्रेजी लेखिका की पुस्तक भी बा पर मुझे देखने को मिली पर उसकी जानकारियां ज्यादा भरोसेमंद नहीं हैं।



-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( KASTURBA GANDHI, PORBANDAR )

Saturday, May 18, 2013

पोरबंदर का कीर्ति मंदिर जहां मोहन जन्मे


गुजरात का पोरबंदर यानी बापू का शहर। दो अक्टूबर 1869 को यहीं मोहन दास करमचंदर गांधी का जन्म हुआ जिसे दुनिया महात्मा गांधी के नाम से जानती है। बापू की जन्मस्थली को कीर्ति मंदिर के नाम से जाना जाता है। कीर्ति मंदिर का महत्व देश के तमाम देवी देवताओं के मंदिरों की ही तरह है। अब यहां हर रोज देश के कोने कोने से लोग पहुंचते हैं। बापू का सम्मान करने वालों के लिए यह स्थल तो सचमुच मंदिर ही है। वह कमरा जहां बापू का जन्म हुआ उसे देखने दूर दूर से लोग आते हैं। कीर्ति मंदिर तीन मंजिला है। इस घर को बापू के पिता करमचंद गांधी ने खरीदा था बाद में उसे अपनी सुविधा के अनुसार और बड़ा बनवाया। 



कीर्ति मंदिर - यहीं हुआ था बापू का जन्म। 
कीर्ति मंदिर के तीन मंजिल में 20 से ज्यादा कमरे हैं। घर की संरचना आंगन वाली है। आंगन के चारों तरफ कमरे बने हैं। ऊपर की मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। इनमें कुछ सीढियां लकड़ी की हैं। तीसरी मंजिल पर नन्हे मोहन का अध्ययन कक्ष है। घर के हर कमरे को लोगों के दर्शन के लिए खुला रखा गया है।सभी कमरे में ठंडी ठंडी हवा आती है। दुनिया भर के गांधी प्रेमियों के 
लिए कीर्ति मंदिर किसी तीर्थ की तरह है। प्रेरणा का स्थल है। अब कीर्ति मंदिर के पास के हिस्से को भव्य रूप देकर यहां एक बड़ी फोटो गैलरी बना दी गई है जहां बापू का पूरा जीवन परिचय तस्वीरों में देखा जा सकता है। कीर्ति मंदिर पोरबंदर में एमजी रोड पर शहर के बीचों बीच है।


बापू के पिता का नाम वैसे तो करमचंद गांधी था पर लोग उन्हें प्यारा से काबा गांधी कहते थे। उनके पिताका नाम उत्तम चंद गांधी था। काबा गांधी पहले पोरबंदर राजघराने के दीवान थे। बाद में राजकोट के दीवान बने। दीवान मतलब प्रधानमंत्री। जाहिर है बापू खाते पीते घर से आते थे। करमचंद गांधी ने चार शादियां की। दो पत्नियां जल्दी मर गईं. उनकी चौथी शादी पुतली बाई से हुई। पुतली बाई ने चार संतानों को जन्म दिया। सबसे बड़े लक्ष्मी दास, दूसरे करसन दास और तीसरे मोहन दास। एक बेटी भी हुई रायलता बेन। मोहन दास इनमें सबसे छोटे थे। 1869 में जन्में बापू का मई 1883 में 13 साल 6 माह की उम्र में शादी कर दी गई। कस्तूरबा उनसे कुछ महीने  बड़ी थीं। बालपन में तो बापू शादी से काफी खुश थे। नए कपड़े पहनने को मिलेंगे और खाना पीना होगा। पर बाद में बापू बाल विवाह के बड़े विरोधी हो गए। 1885 में जब मोहनदास 16 साल के थे तब पिता करमचंद गांधी स्वर्ग सिधार गए। कीर्ति मंदिर वह जगह है जहां बापू का जन्म हुआ और उनका बालपन यहां गुजरा। 
अपने स्कूली दिनों मोहनदास। 


कहां ठहरें - पोरबंदर रेलवे स्टेशन से यह दो किलोमीटर है। अगर पोरबंदर जा रहे हैं तो एमजी रोड पर होटल नटराज में ठहर सकते हैं। इसके बगल में मून पैलेस भी किफायती होटल है।


कैसे पहुंचे - पोरबंदर गुजरात का एक छोटा सा समुद्र तटीय शहर है। पोरबंदर आने के लिए दिल्ली और अहमदाबाद से सीधी रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं। कई शहरों से विमान सेवा भी है। पोरबंदर रेलवे स्टेशन से कीर्ति मंदिर की दूरी दो किलोमीटर के आसपास है। बापू का घर शहर के मुख्य बाजार में ही स्थित है। अगर आप रेलवे स्टेशन की तरफ से आ रहे हैं। तो मुख्य बाजार के चौक पर दाहिनी तरफ मुड़े, कीर्ति मंदिर नजर आ जाएगा।


बापू के घर कीर्ति मंदिर में पहली मंजिल पर अनादि। ( मई 2013)

क्या देखें - पोरबंदर में बापू के घर कीर्ति मंदिर के अलावा कस्तूरबा का घर, सुदामा जी का मंदिर, चौपाटी, समुद्र तट, कथावाचक रमेश भाई ओझा का आश्रम ( संदीपनी आश्रम ) देखा जा सकता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( ( BAPU, KIRTI MANDIR, PORBANDAR, BIRTH PLACE ) 

Thursday, May 16, 2013

सराय रोहिला रेलवे स्टेशन से गुजरात की ओर

बापू की धरती पर ( 17 मई 2013) 

नई दिल्ली का सराय रोहिला रेलवे स्टेशन। गुजरात और राजस्थान जाने वाली ज्यादातर रेलगाडियां यहीं से खुलती हैं। लेकिन सराय रोहिला दिल्ली के बाकी चार रेलवे स्टेशनों की तुलना में यात्री सुविधाओं के नाम पर काफी पिछड़ा हुआ है। यहां पहुंचकर लगता ही नहीं है कि आप देश राजधानी दिल्ली के किसी स्टेशन पर हैं। दिल्ली के शास्त्री नगर मेट्रो स्टेशन से एक किलोमीटर दूर स्टेशन का सड़क से पहुंच मार्ग अत्यंत संकरा है। करोलबाग की तरफ से रोहतक रोड से स्टेशन पहुंचने का रास्ता गलियों से होकर है। इस गली में गाड़िया अक्सर जाम में फंस जाती हैं।
सराय रोहिला स्टेशन भवन काफी पुराना है। प्लेटफार्म और फुटओवर ब्रिज टूटे फूटे हैं। प्लेटफार्म पर शेड्स की कमी है। कैंटीन, वेटिंग हॉल के नाम पर भी खानापूर्ति है।


दिल्ली के बाकी स्टेशनों को वर्ल्ड क्लास बनाने की कवायद चल रही है। पर सराय रोहिला स्टेशन पर रेलवे की नजरें इनायत क्यों नहीं हैं। जबकि यहां से रेलवे को बड़ा राजस्व मिलता है। यहां से गुजरात की कई ट्रेनें, मुंबई गरीब रथ, जयपुर के लिए डबल डेकर जैसी रेलगाड़ियां रोज खुलती हैं। पर स्टेशन पर इंतजाम के नाम पर कुछ भी नहीं। सराय रोहिला किसी जमाने में मीटर गेज का स्टेशन हुआ करता था। पर राजस्थान और गुजरात की ज्यादातर लाइनें ब्राडगेज हो जाने के बाद अब स्टेशन से मीटर गेज खत्म हो चुका है। 


रेलवे केटरिंग का घटिया खाना

जामनगर के बाद एक स्टेशन पर खड़ी पोरबंदर एक्सप्रेस 
अब बात दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस की। 19264 पोरबंदर एक्सप्रेस सोमवार और गुरुवार को यहां से चलती है। हमारी यात्रा 16 मई गुरुवार के दिन आरंभ हुई। ट्रेन दिल्ली से समय पर यानी सुबह 8.20 बजे खुल गई। माउंट आबू के रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म पर मिलने वाली रबड़ी की खूब तारीफ सुनी थी। पर खाया तो उसका स्वाद औसत निकला।
हमने इस सफर में पाया कि गुजरात जाने वाली इस महत्वपूर्ण ट्रेन की रखरखाव के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। सबसे बुरा हाल ट्रेन की केटरिंग व्यवस्था का है। हमने रात का खाना आर्डर किया। 85 रुपये की थाली। इस थाली में मटर बिल्कुल कच्चे थे। दाल अधपकी थी। पराठे भी पके हुए नहीं थे। चावल घटिया क्वालिटी का था। ये समझ में नहीं आया कि 85 रुपये किस बात के लिए जा रहे हैं। वहीं जब हमने महाराष्ट्र में सतारा कोपरगांव के बीच महाराष्ट्र एक्सप्रेस में खाना आर्डर किया तो महज 50 रुपये में इससे काफी बेहतर खाना मिला। कई ट्रेनों में आईआरसीटीसी के ठेकेदार खाने के नाम पर रेल यात्रियों को लूट रहे हैं। खासतौर पर दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस की केटरिंग ठीक किए जाने की जरूरत है। इससे तो अच्छा हो कि गुजरात के लोकप्रिय रेस्टोरेंट्स को ट्रेन में गुजराती थाली परोसने की व्यवस्था की जाए। इससे गुजरात जाने वाली ट्रेन में खूशबू गुजरात की महसूस की जा सकेगी।

17 मई की सुबह हुई तो हम गुजरात में थे। अहमदाबाद पीछे छूट गया था। हमने सुबह का नास्ता राजकोट जंक्शन में लिया। यहां ट्रेन का ठहराव 15 मिनट का था। नास्ते में अगर गुजरात में हैं तो भला ढोकला के अलावा और क्या हो सकता है। हमारा आरक्षण जामनगर तक का ही था। पहले हम जामनगर से द्वारका जाने वाले थे। पर अब हमने योजना में थोड़ा बदलाव किया था। हम पहले पोरबंदर जाना चाहते थे। चलती ट्रेन में टिकट का विस्तार कराया।



ट्रेन जामनगर से आगे भाग रही थी। हरियाली कम होती जा रही है। आसपास में पवन ऊर्जा से बिजली बनाने वाली इकाइयां दिखाई दे रही हैं। ट्रेन दोपहर एक बजे द्वारका पहुंच गई। ट्रेन से उतरते ही हमने बापू की जन्मभूमि की मिट्टी को नमन किया। हमने होटल नटराज में ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। पर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही भूख लग रही थी, सो होटल पहुंचे से पहले जो शाकाहारी भोजनालय दिखा वहां खाने के लिए बैठ गए। खाने के बाद होटल नटराज पहुंचकर यात्रा की सारी थकान जाती रही। होटल का कमरा और साफ सफाई और बाकी इंतजाम काफी बेहतर था। कमरे का किराया महज 500 रुपये। होटल एमजी रोड पर मु्ख्य बाजार में स्थित है। रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है।  
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- -  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( यात्रा का मार्ग - दिल्ली- माउंट आबू- अहमदाबाद - पोरबंदर - द्वारका - ओखा-भेट द्वारका - सोमनाथ- वेरावल- दीव- वेरावल- अहमदाबाद - गांधीनगर - वडोदरा -मुंबई - पूणे - पंचगनी- महाबलेश्वर- वाई- सतारा- कोपरगांव- शिरडी - नासिक - खंडवा- ओंकारेश्वर -उज्जैन - दिल्ली ) 


( PORBANDAR, RAIL , GANDHI, SRAI ROHILLA, PANTRY CAR FOOD  )

Wednesday, May 8, 2013

शानदार 150 साल - दिल्ली का पुराना लोहे का पुल

आपकी रेलगाड़ी कई बार दिल्ली के पुराने लोहे के पुल से गुजरी होगी। आपको पता है कि यमुना नदी पर बना ये पुल सिर्फ दिल्ली का ही नहीं बल्कि देश के सबसे पुराने रेल पुल में से एक है। रेलवे के नंबरिंग के हिसाब से ब्रिज नंबर 249 इस पुल के पर यातायात चालू होने के बाद ही दिल्ली हावड़ा से जुड़ सका। यह एक रेल कम रोड ब्रिज है। यानी नीचे नीचे सड़क मार्ग और ऊपर ऊपर रेल।

इस पुल का निर्माण 1863 में आरंभ हुआ यानी 1857 की क्रांतिके छह साल बाद। पुल तीन साल में बनकर तैयार हो गया। 1866 में इस पर यातायात आरंभ हो गया। पहले यह सिंगल ट्रैक वाला पुल था पर 1913 में इसे डबल ट्रैक वाले रेल में पुल में बदला गया। इस पुल के निर्माण में 16 लाख 16 हजार 335 रुपये की कुल लागत आई थी। 1913 में डाउन लाइन बिछाने के लिए इसमें 12 स्पैन और दो एन्ड स्पैन जोड़े गए।

साल 2016 में दिल्ली के इस लोहा पुल ने अपनी सेवा के स्वर्णिम 150 साल पूरे किए। पर पुल का सड़क मार्ग और रेल मार्ग दुरुस्त है। इसपुल की खास बात है कि यह ऐतिहासिक लालकिला के बिल्कुल बगल में है। पुल पार करने के बाद ट्रेन तुरंत दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर जाती है। पुल के तरफ दिल्ली के जमुना बाजार का इलाका है। इसी तरह के लोहे के पुल दिल्ली हावड़ा मार्ग पर इलाहाबाद के नैनी में और पटना के पास कोईलवर में सोन नदी पर बनाए गए हैं।
अब दिल्ली में यमुना नदी पर कई नए सड़क पुल बन गए हैं पर अभी भी बड़ी संख्या में ट्रैफिक हर रोज पुराने लोहे के पुल से होकर गुजरता है। इसके सड़क मार्ग पर रिक्शे ठेले चलते नजर आते हैं जो होल सेल बाजार गांधीनगर और चांदनी चौक के बीच आवाजाही करते हैं। कभी कभी तो पुल पर जाम लगने के हालात बन आते हैं। पुराने लोहे के पुल ने दिल्ली के बसते हुए  देखा और आबादी का बोझ बढ़ते हुए देखा है।
बारिश के दिनों बंद करना पड़ता है - दिल्ली में हर साल बढ़ने वाले यमुना के जलस्तर का यह पुल साक्षी रहा है। 1978 में यमुना में सबसे बड़ी बाढ़ को देखा है, जब पानी खतरे के निसान से काफी ऊपर आ गया था। तब दिल्ली के कई इलाके डूब गए थे। हर साल यमुना का जल स्तर बढ़ने पर पुराने लोहे के पुल पर रेल यातायात एहतियात के तौर पर कुछ दिनों के लिए रोक दिया जाता है। पर बाढ़ से पुल को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 150 साल में इस पुल की कई बार मरम्मत की गई है। पर इसका सुपर स्ट्रक्टचर आज भी बेहतर है।
आसपास कई नए पुल बने- भारतीय रेलवे ने 1997-98 में इस पुल के बगल में ही एक नया रेलवे पुल बनाने की योजना बनी। 2003 में काम शुरू हुआ। पिलर डाल दिए गए पर पर्यावरण और ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के मुद्दे पर 2008 में काम रुक गया। नए पुल के राह में ऐतिहासिक सलीमगढ़ का किला आ रहा था। अब यह विवाद दूर हो गया है। पर जब तक नया पुल नहीं तैयार हो जाता यह पुराना लोहे का पुल अपनी सेवाएं बदस्तूर जारी रखेगा।
- vidyutp@gmail.com

( OLD YAMUNA BRIDGE, DELHI, RAIL ) 

Saturday, May 4, 2013

एक बार फिर काशी की धरती पर..

छह साल बाद बनारस जाना हुआ। वही बनारस जहां मैंने छह साल पढ़ाई की। जिंदगी का अब तक का सबसे लंबा वक्त गुजारा है। वैसे तो बनारस वह शहर है जिसपर 300 से ज्यादा किताबें लिखी गई हैं। लेकिन बनारस की फिंजा में कुछ ऐसी मस्ती घुली है कि वहां बार बार जाने का जी करता है। बार बार में सोचता हूं कि जिंदगी आखिरी वक्त मैं वहीं गुजारूंगा। उन्ही बनारस की गलियों में। शादी के बाद से पत्नी को बार बार कहता था कि कभी हम बनारस चलेंगे लेकिन पूरा देश घूमते घूमते कभी बनारस जाने का सुयोग ही नहीं बन रहा था। सो इस बार तय किया कि बार बार सीधे पटना चले जाते हैं। इस बार तो बनारस रूकने के बाद ही आगे की यात्रा होगी। 

दिल्ली से वाराणसी का हमारा सफर शुरू ही नई ट्रेन दिल्ली वाराणसी गरीब रथ के साथ। वाराणसी गरीब रथ दूसरी गरीब रथ से भी एडवांस है। इसके हर कोच में इलेक्ट्रानिक डिस्पले लगा है जो रेलगाडी की स्पीड आने वाले स्टेशन का नाम, स्टेशन की कितनी दूरी रह गई है। सब कुछ बताता है। यानी यात्रियों की सारी जिज्ञासा शांत करता है। आपको बार बार खिड़की से बाहर देखने की जरूरत नहीं कि कौन सा स्टेशन आ गया या आने वाला है। यह एक नई व्वस्था है जो बड़ी अच्छी लगी।

दशाश्वमेध घाट पर साधु बाबा 
खैर गरीब रथ वाराणसी में सुबह नौ बजे पहुंचती है। मैं पहली बार वाराणसी में एक सैलानी के रूप में था। वैसे टूरिस्ट के रूप में जो छह साल वहां गुजार चुका है। फर्क इतना है कि वाराणसी जो भी पहली बार जाए उसके ठगे जाने की प्रबल संभावना रहती है। लेकिन मुझे वाराणसी के भूगोल का खूब पता था। समय कम था इसलिए मैं अपने दोस्तों से शहर में नहीं मिल कर, सिर्फ अपने चार साल के बेटे को शहर दिखाना चाहता था। सो हम स्टेशन से सीधे गोदौलिया चौराहा गए। यहां पर है जयपरिया निवास अतिथि गृह। पर वहां नो रूम के हालात थे। पास में होटल मिला आराम। बड़ादेव में। यह वाराणसी के शहर दक्षिण से विधायक रहे श्यामदेव राय चौधरी दादा का होटल है। स्नानादि से निवृत होने के बाद सबसे पहले हमलोग विश्ननाथ मंदिर की ओर चले।
बताते चलें कि वाराणसी में दो विश्वनाथ मंदिर हैं एक नया एक पुराना। पुराना मंदिर गंगा तट के पास दशाश्वमेध घाट के निकट है। आतंकी हमले के बाद अब काशी विश्ननाथ मंदिर के आसपास सुरक्षा बहुत बढ गई है। 



पुराने विश्वनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार 
गोदौलिया चौराहा से जब आप दशाश्वमेध घाट की ओर बढ़ते हैं तो विश्ननाथ मंदिर का गेट आता है। प्रशासन ने अब यहां पर एक द्वार बनवा दिया है और यहीं से शुरू हो जाती है मंदिर की सुरक्षा चेकिंग। विश्ननाथ गली में बहुत अच्छा सा बाजार है। जो देश भऱ से आने वाले लोगो को लुभाता है। अब मंदिर में मोबाइल फोन ले जाने पर भी पाबंदी है। दुकानदार लाकरों में मोबाइल जमा हो जाता है। विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए सालों भर भीड़ होती है। यहां देश के हर कोने से श्रद्धालु आते हैं लेकिन दक्षिण भारत के लोग कुछ ज्यादा ही आते हैं। आजकल विश्वनाथ मंदिर के आंतरिक सौंदर्यीकरण का काम तेजी से चल रहा है। कई बार पहले भी मैं विश्वनाथ मंदिर गया हूं। लेकिन मैंने पाया कि यहां उत्तर से ज्यादा दक्षिण भारत के लोग आ रहे हैं। 
विश्वनाथ मंदिर के ठीक बगल में मां अन्नपूर्णा का मंदिर है। कहा जाता है कि काशी में मां अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से कोई भी भूखा नहीं सोता है। मां अन्नपूर्णा के मंदिर में दक्षिण भारत के लोग अन्न क्षेत्र भी चलाते हैं। यहां आप लंगर जीम सकते हैं। दश्वाश्वमेध घाट के पास रहने का एक खास कारण था। बनारस की सुबह को निहारने की इच्छा। अगले दिन सुबह सुबह सुबह हमलोग दशाश्मेध घाट पर गए। काशी में गंगाजी उत्तरायण बहती हैं। सो सूरज की पहली किरण आकर घाट पर पड़ती है। स्नान करने वालों की भीड़। मुंडन कराने वाले श्रद्धालु। छतरियां लगाए पंडा। दशाश्वमेध घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, प्रह्ललाद घाट, मीर घाट ये सब मिल कर बनारस की सुबह की एक अनुपम छटा बनाते हैं। 


तत्कालीन वीसी डा. आरपी रस्तोगी के साथ कोचीन हाउस में। ( 1992 )
वही बनारस की सुबह जिस पर कवियों साहित्यकारों ने काफी कुछ लिखा है। लेकिन मुझे तो दशाश्वमेध घाट की शाम भी खूब भाती है। जब मैं अनिर्णयकी स्थिति में होता हूं तो इन्हीं घाटों पर बैठकर घंटो सोचता हूं। उसके बाद जो अंदर आवाज आती है वही फैसला ले लेता हूं। फैसला हमेशा सही होता है। मई मे गर्मी बुहत थी। सो दशाश्वमेध घाट पर देर रात तक बैठने का भी अपना अलग आनंद है। छिटकती चांदनी आकर इन घाटों पर पड़ती है। नाव वाले आकर नौका विहार करने के लिए मनुहार करते हैं। बनारस में गंगा नदी में बैठकर नाव से शहर को निहारने का अपना अलग आनंद है। लेकिन हमारे चार साल वंश वर्धन ने नाव पर जाने से साफ इनकार कर दिया। सो हमें भी नौका विहार का इरादा त्यागना पड़ा। 
पुराने विश्वनाथ मंदिर के आसपास दक्षिण भारतीय खाना खूब मिलता है। वही दक्षिण की तरह ही सस्ता । यानी की पांच रूपये मे दो इडली। पंद्रह रूपये में मशाला डोसा। कदाचित यह दक्षिण भारतीय सैलानियों क ज्यादा आगमन के कारण हो। 



खैर वाराणसी में एक नया विश्वनाथ मंदिर भी है। यह काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में हैं। 25 एकड़ में फैले मंदिर का गुंबद 252 फीट ऊंचा है। न सिर्फ बीएचयू में पढ़ने वाले छात्र बल्कि देश भर से आने वाले सैलानियों को भी यह मंदिर खूब पसंद आता है। मंदिर के बाहर एक दुकान है समोसे की। यहां आज भी दो रूपये में समोसा मिलता है। बनारस की दूसरी प्रसिद्ध मिठाई है लौंगलता जो हर चौक चौराहे पर मिलती है। कई साल बाद मैंने फिर से समोसा और लौंगलता का लुत्फ उठाया। 
बीएचयू के सामजिक विज्ञान संकाय में आखिरी दिनों की एक तस्वीर। ( 1995 )

बीएचयू की सड़कों पर घूमते हुए मैंने अपने चार साल के नौनिहाल को यह बताया कि यही वह स्कूल है जहां मैंने पांच साल पढ़ाई की। बेटा बोला- वाह, पापा आपका स्कूल तो बहुत सुंदर है। यहां तो हरियाली भी खूब है। शाम ढल रही थी सारे विभाग बंद थे, लेकिन एक बार फिर मैं उस समाजिक विज्ञान संकाय के चौखट तक गया जहां पांच साल की सैकड़ो खट्टी मीठी स्मृतियां जुड़ी हैं। मैत्री जलपान गृह की वह टेबल जहां कभी मैं अपने से दो साल सीनियर रहे मनोज तिवारी जो अब भोजपुरी फिल्मों के बड़े स्टार और गायक हैं, से आग्रह कर गीत सुना करता था। सब कुछ वैसा ही था। हमारी उम्र धीरे-धीरे बढती जा रही है। जवानी की उच्चश्रंखलताएं कम होती जा रही हैं, लेकिन ऐसा लगता है मानो बीएचयू अभी उसी तरह जवान है।
 वो पुल वो पुलिया.. वो मधुबन..वो कैफेटेरिया की टेबलें उसी तरह जवान है। बस वहां चेहरे हर साल बदल जाते हैं। पीढ़ियां बदल जाती हैं। 4फरवरी 1916 को स्थापित इस ज्ञान के मंदिर में हर साल कुछ नया जुड़ता है लेकिन पुरानी चीजें सब कुछ वैसी ही हैं....

-विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com  ( मई 2009 में वाराणसी में)
UTTAR PRADESH, BHU, VISHWANTH TEMPLE, MADHUBAN, SOCIAL SCIENCE )

Thursday, May 2, 2013

सोनपुर-वाराणसी पैसेंजर में पांच साल सफर

पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र रहा। 1990 से 1995 के बीच पिताश्री की पोस्टिंग हाजीपुर में हुआ करती थी। हाजीपुर से वाराणसी आने का सबसे सस्ता तरीका हुआ करता था सोनपुर वाराणसी पैसेंजर (SONEPUR ALLAHABAD CITY PASSENGER) । तब ये ट्रेन मीटर गेज पर चलती थी। किराया था 16 रुपये। शाम 5 बजे सोनपुर से खुलने वाली पैसेंजर सुबह 5 बजे से पहले वाराणसी पहुंचा देती थी। पहली बार इस ट्रेन से बनारस आया था अपने एलएस कालेज के दोस्त विष्णु वैभव के साथ। सोनपुर से परमानंदपुर, शीतलपुर, दीघवारा होते हुए छपरा कचहरी।

 फिर छपरा, गौतम स्थान, मांझी का पुल बकुलहां और ट्रेन घुस गई यूपी में। मैं अपना बैग खोलता हूं, मां ने जो राह के लिए बनाकर दिया है, पूड़ियां और भुजिया उसे उदरस्थ करता हूं। इसके बाद भी सोने का तो कोई सवाल ही नहीं होता था। वाराणसी की ओर आगे बढ़ने के साथ ही पैसेंजर ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाती थी। सुरेमनपुर, बलिया, चितबड़ागांव, फेफना जंक्शन, सागरपाली जैसे स्टेशनों के बाद आता था औरिहार जंक्शन। यहां से गोरखपुर के लिए लाइन अलग होती है। वाराणसी से पहले आता था ऐतिहास पर्यटन स्थली सारनाथ। ये सब स्टेशन रात में होते थे लेकिन भीड़ के कारण जागते रहना पड़ता था। कई बार मैं 20 रुपये अतिरिक्त देकर पैंसेजर में स्लीपर कोच में जाकर आरक्षण करा लेता था। तब सफर आरामदेह हो जाता था। पर उस समय 20 रुपये की भी बहुत कीमत थी। ये बच जाए को बनारस में कई बार लौंगलता खाया जा सकता था। लौंगलता बनारस की लोकप्रिय मिठाई है।
 वाराणसी सोनपुर पैंसेजर पहले सोनपुर से  इलाहाबाद सिटी तक जाती थी। तब वाराणसी से भुलनपुर (डीएलडब्लू) माधो सिंह होते हुए इलाहाबाद सिटी (रामबाग) के लिए मीटरगेज लाइन थी। मैं 1990 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा देने भी सोनपुर से इलाहाबाद मीटर गेज की पैसेंजर ट्रेन में ही बैठकर गया था। वह एक लबा और उबाऊ सफर था। हमारे पास पता था मालति प्रजापति का जो लाला की सराय में रहती थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया था। कविताएं भी लिखती थीं। उनके घर रहकर ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी थी। हालांकि मेरा चयन इलाहाबाद और बीएचयू दोनों जगह हो गया। पर बीएचयू का कैंपस और होस्टल मुझे भा गए थे इसलिए एडमिशन बीएचयू में लेना तय किया। यहां होस्टल मिलने की गारंटी थी क्योंकि प्रवेश परीक्षा में मैं सेकैंड टॉप था। इंडेक्स 250 में 222 आया था। 1990 के जुलाई में मैं वाराणसी आ गया।

वाराणसी सोनपुर पैसेंजर के अलावा हमारे पास विकल्प थी जीएल यान गौहाटी इलाहाबाद एक्सप्रेस। ये ट्रेन कभी गुवाहाटी से लखनऊ तक जाती थी इसलिए ये जीएल कहलाती थी। ये ट्रेन रात को 8 बजे हाजीपुर से ही मिल जाती थी। पर इसमें 50 रुपये के करीब टिकट का लग जाता था। पीछे से आने के कारण जीएल कई बार लेट भी जाती थी। 1993-94 में वाराणसी इलाहाबाद के बीच की मीटरगेज लाइन ब्राडगेज में बदल गई। तब जीएल को वाराणसी तक ही सीमित कर दिया गया।
ओटी मेल की याद
लखनऊ के चारबाग स्थित लखनऊ जंक्शन स्टेशन से उन दिनों सुबह आठ बजे पूर्वोत्तर रेलवे की प्रतिष्ठित ट्रेन लखनऊ-गुवाहाटी (तत्कालीन गौहाटी) अवध तिरहुत मेल ( OUDH TIRHUT MAIL) रवाना हुआ करती थी। यह ट्रेन ओटी मेल के संक्षिप्त नाम से लोकप्रिय थी। इस ट्रेन में शानदार डाइनिंग कार भी हुआ करता था। यह ट्रेन अपने समय देश की सबसे लंबी मीटर गेज ट्रेन थी। यह ट्रेन गुवाहाटी से लखनऊ के बीच 1427 किलोमीटर की दूरी तय करती थी। बाद में मीटर गेज का संभवतः पहला डीजल इंजन भी इसी ट्रेन को मिला था। तब लखनऊ जंक्शन स्टेशन पर सिर्फ मीटर गेज की ट्रेनें आती-जाती थीं। अस्सी के दशक में लखनऊ-गोरखपुर-बरौनी-गुवाहाटी रूट मीटर गेज से ब्रॉड गेज में बदले जाने के साथ ही इस प्रतिष्ठित ट्रेन का मार्ग बदल दिया गया। यह ट्रेन गेज गुवाहाटी से बरौनी, हाजीपुर, सोनपुर, छपरा, बलिया वाराणसी होकर इलाहाबाद के बीच चलने लगी। वाराणसी से इलाहाबाद के बीच आमान परिवर्तन हो जाने के बाद ये सीमित तौर पर वाराणसी से सिलिगुड़ी के बीच चलती रही। एक दिन ऐसा आया जब इस ट्रेन की पटिरयों विदाई हो गई। आज भारतीय रेलवे के यात्री डिब्बों के लिए जो नीला और आसमानी रंग सामान्यतः प्रयुक्त होता है वह बहुत पहले ही ओटी मेल के डिब्बों पर देखा जा सकता था। तब अन्य यात्री ट्रेनों में डिब्बे आमतौर पर लाल रंग के हुआ करते थे।  1996 में औरिहार छपरा खंड बड़ी लाइन में बदल गया। इसके साथ ही बलिया जिला छोटी लाइन इतिहास हो गई। हालांकि तब मैं वाराणसी छोड़कर दिल्ली आ गया था। बाद में ओटी मेल मीटरगेज पर लखनऊ से लालकुआं के बीच चल रही थी।

दिसंबर 2011 के आखिरी दिन के साथ ही बरेली से लालकुंआ तक जाने वाली मीटर गेज की रेलगाड़ी भी इतिहास बन गई। तकरीबन 126 साल का इस रेलगाड़ी का यह सफर 1 जनवरी 2012 से इतिहास में दर्ज हो गया। लाल कुंआ से चलने वाली  छोटी लाइन की सभी रेल गाड़ियां भी बंद हो गई। लालकुआं रेलवे स्टेशन से नवाबों के शहर लखनऊ तक, छोटी लाईन की यह रेल 23 अप्रैल 1882 को अवध तिरहुत मेल के नाम से शुरू हुई थी। भारत में पहली बार रेल का संचालन 16 अप्रैल 1853 को होने के लगभग 30 साल बाद रेल लाल कुंआ के रास्ते काठगोदाम पहुंची और काठगोदाम रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली ये ट्रेन कभी पूर्वोत्तर के शहर गुवाहाटी तक का लंबा सफर तय करती थी।
vidyutp@gmail.com

(BHU, BIHAR, RAIL, UTTAR PRADESH, SONEPUR, VARANASI )