Sunday, April 28, 2013

हरे हरे सहजन में इतने सारे गुण

सहजन या मुनगा ऐसी वनस्पति है जो जड़ से लेकर पत्ती और फूल तक इंसान के काम आती है। यथा बंगाल में 'सजिना', महाराष्ट्र में 'शेगटा', तेलगु में 'मुनग', और हिंदी पट्टी में 'सहजनके अलावा 'सैजन 'मुनगकहा जाता है। दक्षिण भारत के प्रायः हर भोजन में सहजन की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है। दक्षिण में हर घर में इसे सांबर में जरूर डाला जाता है। 

सहजन यानी DRUMSTICK TREE  का वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा ( Moringa Oleifera)  है।  एक एक बहुत उपयोगी पेड़ है। इसे हिन्दी में सहजनासुजनासेंजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है। हम इसके महत्व को नहीं जानते हैं. यह फ़ूड नहीं सुपर फ़ूड है।

आयुर्वेद में 300 रोगों का सहजन से उपचार बताया गया है। इसकी फलीहरी पत्तियों व सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेटप्रोटीनकैल्शियमपोटेशियमआयरनमैग्नीशियमविटामिन-एसी और बी कॉम्पलैक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।



इस पेड़ के विभिन्न भाग अनेकानेक पोषक तत्वों से भरपूर पाये गये हैं सहजन के पेड़ के लगभग सभी भागों में औषधीय गुण पाया जाता हैं। यह औषधीय गुण कई बीमारियों के उपचार में विशेष रूप से फायदेमंद होते हैं। सहजन के पत्तेछालफूलफल सभी उपयोगी हैं। यह जहां सर्दी में गरमी का अहसास देता हैवहीं भोजन में पाचन में भी मदद करता है।

त्वचा की कई समस्याओं का इलाज सहजन में छिपा है। इनमें कई तरह के हारमोन्स और प्राकृतिक तत्व होते हैंजो त्वचा की सेहत के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इसके फूलपत्तों की कई स्वास्थ्य संबंधी लाभ है। यह मानव शरीर के यौन शक्ति को बढ़ाने में प्रधान रूप से काम करता है। जो पुरूष लो लिबीडो (कम सेक्स की इच्छा) और इरेक्टाइल डिसफंक्शन (स्तंभन दोष)सेक्स में अरूचि जैसे मर्ज को दूर करता है। सहजन की छाल का पावडर रोज लेने से वीर्य की स्थिरता तथा पुरुषों में शीघ्रपतन की समस्या भी दूर होती है।

बनाएं अचार - सहजन के अचार का स्वाद भी अनूठा होता है। सहजन के अचार के लिए एकदम कच्ची और बिना बीज वाली नरम-नरम सहजन की फलियों का इस्तेमाल किया जाता है। सहजन का ये आचार खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है। सहजन की फली जब एकदम नरम होती हैउनके अन्दर बीज नहीं बन पाते तब ऐसी ही एकदम कच्ची नरम मुलायम सहजन की फली से ही अचार बनता है। 
-        ---  विद्युत प्रकाश मौर्य  
 DRUMSTICK TREE, SUPER FOOD ) 

Wednesday, April 24, 2013

तीन ऐतिहासिक लड़ाइयों का साक्षी - पानीपत

हरियाणा का शहर पानीपत। दिल्ली से 90 किलोमीटर उत्तर की ओर। पानीपत को इतिहास में तीन बड़ी लड़ाइयों के लिए जाना जाता है। पर पानीपत के साथ इतिहास के कई और रोचक पन्ने जुड़े हुए हैं।

पानीपत की इन ऐतिहासिक लड़ाइयों पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। इसका पता मुझे पानीपत जाने के बाद चला। वह
 2005 का साल था।  तब मैं दैनिक जागरण के लुधियाना संस्करण में कार्यरत था जब मुझे पानीपत में काम करने का मौका मिला।

दिल्ली के पास और एक ऐतिहासिक स्थल इसलिए मैंने हां कर दी। यहां मेरे एक पुराने वकील दोस्त हैं जसबीर राठी। हमने एक साथ एमएमसी का पत्रचार पाठ्यक्रम किया था गुरू जांभेश्वर यूनिवर्सिटी
हिसार से। सो पानीपत आने पर मैं दस दिन जसबीर राठी के घर में ही रहा। पानीपत के ऐतिहासिक सलारजंग गेट पास है उनका घर।


पानीपत का ऐतिहासिक सलारजंग गेट 


हालांकि पानीपत शहर कहीं से खूबसूरत नहीं नजर आता। पर कई यादें पानीपत के साथ जुड़ी हैं। तीन ऐतिहासिक लड़ाईयों के अलावा भी पानीपत में कई ऐसी चीजें हैं जो शहर की पहचान है। इब्राहिम लोदी की मजारकाबुली बाग मस्जिदमराठों का बनवाया हुआ देवी मंदिर,  तीसरी लड़ाई की स्मृतियां संजोए काला अंब के अलावा यहां महान सूफी संत बू अली शाह कलंदर की दरगाह है।

मलाईमच्छर और मुसलमान - आजादी से पहले पानीपत मूल रूप से मुसलमानों का शहर था। यहां घर घर में करघे चलते थे। बेडशीटचादर आदि बुनाई का काम तेजी से होता था। हमारे एक दोस्त एडवोकेट राम मोहन सैनी बताते हैं कि पानीपत शहर तीन म के लिए जाना जाता था। मलाईमच्छर और मुसलमान। अब न मुसलमान हैं न मलाई पर मच्छर जरूर हैं। 1947 में बंटवारे के बाद ज्यादातर मुसलमान पाकिस्तान चले गए। बाद में पाकिस्तान से आए हिंदू बुनकर परिवारों को यहां बसाया गया।
पचरंगा अचार का शहर - अब पानीपत हैंडलूम और पचरंगा अचार के शहर के रूप में जाना जाता है। बेडशीटचादरतौलियासस्ती दरियां और कंबल के निर्माण का बहुत बड़ा केंद्र है।


पानपीत में सस्ती दरियां और कंबल रैग्स से बनाई जाती हैं। रैग्स यानी पुराने कपड़े को मशीन से कुतर कर उनसे धागा बनाया जाता है फिर उनसे कंबल और दरियां। पूरे देश और विदेशों में भी बड़ी संख्या में इन उत्पादों की पानीपत से सप्लाई है। वैसे अगर सडक से पानीपत जाएं तो आपको यहां के पंचरंगा अचार के बारे में भी काफी कुछ देखने के मिल जाएगा। मेन जीटी रोड पर सबसे ज्यादा पंचरंगा अचार की ही दुकाने हैं। हालांकि शहर में जीटी रोड के ऊपर लंबा फ्लाईओवर बन जाऩे से इन दुकानों की रौनक खत्म हो गी है। पानीपत में इंडियन आयल की बड़ी रिफायनरी भी है। इसका रास्ता शहर से दक्षिणी छोर से पूरब की ओर जाता है।


-विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com 

( PANIPAT, HARYANA, PICKLE, RAM MOHAN SAINI, RICE, DARI ) 

Saturday, April 20, 2013

पुराना किला – कई अफसाने हैं दफन

दिल्ली को जानना है तो पुराना किला गए बिना बात अधूरी रह जानी है। पुराना किला के साथ कई पुरानी यादें जुड़ी हैं। लोग तो कहते हैं कि यह पांडव कालीन है। पर किले के साथ मुगलकाल की कई स्मृतियां जुडी है। कहते हैं कि ठीक इसी जगह पर पांडवों ने इंद्रप्रस्थ शहर बसाया था। पर वर्तमान पुराना किला की इमारत को अफगान शासक शेरशाह ने बनवाया था। वास्तव में इसका निर्माण कार्य हुमायूं ने शुरू कराया था।पर  बाद में शेरशाह ने इसका विस्तार कराया। उसने महज 5 साल दिल्ली पर शासन किया। पर शेरशाह को इतिहास में कई बड़े योगदान के लिए याद किया जाता है। पुराना किला तकरीबन एक मील के परिधि में फैला हुआ है। मजे की बात 1914 से पहले तक यहां एक गांव का अस्तित्व हुआ करता था।
पुराना किला में कुल तीन प्रवेश द्वार हैं। एक का नाम हुमायूं दरवाजा  दूसरे का नाम तलाकी दरवाजा है तो तीसरे का नाम बड़ा दरवाजा है। किले के चारों तरफ काफी मोटी सुरक्षा दीवार है। इस दीवार के चारों तरफ गहरी खाई थी। इस मोटी दीवार के अवशेष को आज भी देखा जा सकता है।

हुमायूं ने अपने 1531 से 1540 के शासन काल के दौरान पुराना किला का निर्माण शुरू कराया। उसने नाम दिया था दीनपनाह नगर। साल 1533 में किले का निर्माण शुरू हुआ। पांच साल में किला लगभग बनकर तैयार हो गया। 1540 में दिल्ली पर अधिकार के बाद यह किला शेरशाह के अधिकार में आ गया। पांच साल शेरशाह ने इस किले से पूरे हिंदुस्तान पर हुकुमत चलाई। पर 13 मई 1545 को कालिंजर के युद्ध में शेरशाह की मृत्यु हो गई। अब किला शेरशाह के बेटे सलीम शाह के अधिकार में आ गया। पर 1555 में एक बार फिर हुमायूं ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और किला एक बार फिर हुमायूं के अधीन हो गया।

शेरमंडल के सामने। यहीं हुमायूं की मौत हुई। 
हुमायूं सीढ़ियों से फिसल गया आखिरी हुमायूं की मृत्यु कैसे हुई थी। सीढियों से फिसलकर न। वह अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसल गया था। पढ़ने का बड़ा शौक था उसे। एक दिन पढ़ते हुए शेर मंडल ( पुस्तकालय) की सीढ़ियों से फिसल गया। फिर नहीं उठ सका। शेर मंडल शेरशाह द्वारा निर्मित दो मंजिला अष्टकोणीय भवन है। इसे हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनवा दिया था। हुमायूं को पढ़ने का काफी शौक था। इन्ही किताबों के बीच 27 जनवरी 1556 की एक सुबह वह सीढ़ियों से फिसल गया फिर बच नहीं सका। किले के अंदर कौन्हा मसजिद भी है जो इंडो इस्लामिक वास्तु कला का सुंदर उदाहरण है।    
पुराने किले की मोटी दीवार पर। चाहे हाथी दौड़ा लो। 
लाइट एंड साउंड शो  - पुराना किला में रोज शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो न सिर्फ पुराना किला बल्कि दिल्ली की कहानी सुनाता है। अतीत के हर मोड की दास्तां रोचक अंदाज में। शो हिंदी और अंग्रेजी में प्रस्तुत किया जाता है। अगर समय है तो इस शो को जरूर देखें। 

कई बार बना पनाहगार – दूसरे विश्व युद्ध के समय पुराना किला को जापान की फौज ने अपनी शरण स्थली बनाया। यहां 3000 फौज ने लंबे समय तक शरण ली। 1947 में देश आजाद होने पर पाकिस्तान से आए हिंदु परिवारों ने पुराने किले में शरण ली। हजारों परिवार यहां लंबे समय तक रहे।

भारतीय पुरात्तव विभाग द्वारा संरक्षित पुराना किला अब दिल्ली का प्रमुख पर्यटक स्थल है। किले में प्रवेश के लिए 15 रुपये का टिकट है। लाइट एंड साउंड शो का टिकट अलग से है। किले के बाहर सुंदर तालाब है जिसमें पैडल बोटिंग का आनंद उठाया जा सकता है। किले के अंदर कई जगह सुंदर फूलों की क्यारियां हैं। दिन भर पुराना किला दिल्ली के प्रेमी युगलों से भी गुलजार रहता है। अगर आप पूरा किला घूमना चाहते हैं तो तीन चार घंटे का वक्त जरूर निकालिए। निकटतम मेट्रो या रेलवे स्टेशन प्रगति मैदान है।
-vidyutp@gmail.com

Thursday, April 18, 2013

कटनी से अमलोरी कोलफील्ड्स वाया सतना रीवा सीधी

साल 1995 में कटनी जाना हुआ था। एमए में पढ़ते हुए पीसीएस की परीक्षा देने की सूझी थी। हालांकि मैं कभी सिविल सेवाओं में नहीं जाना चाहता था। पर एक बार परीक्षा दे दी थी। एमपी  पीसीएस का केंद्र आया कटनी। तो वाराणसी से कटनी जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ। एक सहयात्री मिल गए, डीएलडब्लू की पंडित जी, जो कई बार से पीसीएस की परीक्षा दे रहे थे। रेल यात्रा के दौरान कई संभावित सवालों के जवाब उन्होंने मुझे बता दिए। आश्चर्य ये कि उसमें से कई सवाल अगले दिन परीक्षा में आ भी गए। हालांकि इस परीक्षा में चयन न मेरा हुआ न उनका। पर रेलयात्रा में हमने तय किया कटनी में होटल एक साथ ले लेंगे जिससे कुछ रुपयों की बचत हो जाएगी। कटनी जंक्शन उतरने पर हमलोग होटल की तलाश में निकले। काफी परीक्षार्थी आ गए थे इसलिए होटलों में मारामारी थी। खैर हमें एक होटल में कमरा मिल गया। अगले दिन हमारा परीक्षा केंद्र किसी स्कूल में था।
परीक्षा से निवृत होने के बाद तय किया कि कटनी के आसपास घूम कर वाराणसी वापस जाया जाए। तब जनसत्ता में अक्सर मिश्रीलाल जायसवाल, कटनी के छोटे-छोटे पत्र छपते थे। वास्तव में उनकी ख्याति लघु कविता लेखक के तौर पर थी। मैंने उन्हें बीएचयू से ही एक पोस्टकार्ड लिख डाला था कि कटनी आ रहा हूं आपसे मुलाकात करूंगा। सुबह सुबह मैं मिश्रीलाल जी के घर जा पहुंचा। उनका घर हमारे होटल के पास ही था। बुजुर्ग मिश्रीलाल जी किसी सरकारी नौकरी से रिटायर थे। रोज कई अखबारों के पत्र लिखना उनका प्रिय शगल था। उनके साथ सुबह की चाय पी, कुछ विचार साझा किए। फिर रुखसत हुआ। बाद में पता चला सितंबर 2007 में उनका निधन हो गया। उनकी कविताओं के चार संग्रह भी आ चुके थे। खैर कटनी प्रवास के दौरान मैंने और पंडित जी मैहर देवी के दर्शन के लिए तय किया था। इसलिए हमलोग दोपहर में मैहर के लिए निकल पड़े। कटनी से मैहर की छोटी सी ट्रेन यात्रा की जनरल डिब्बे में।

मैहर में मां शारदा के दर्शन करने के बाद हमारे और पंडित जी के रास्ते अलग हो गए। मैं मैहर सीमेंट प्लांट, सरला नगर के लिए निकल गया। वहां मेरे बड़े मामा जी के दामाद कर्मचारी थे। मुनिलाल सिंह। सीमेंट प्लांट की स्टाफ कालोनी में उन्हें फ्लैट मिला हुआ था। एक दिन दीदी और जीजा जी के साथ गुजारा। ये दीदी मेरी माताजी के उम्र की थीं। मैं उनसे पहली बार मिला था। मामा जी का नाम लेकर रिश्तेदारी की याद दिलाई। उन्होंने खूब खातिर की। अगले दिन बस स्टाप तक विदा करने आए। मैहर सीमेंट का एक और ब्रांड नाम था सेंचुरी सीमेंट। अब यह बिरला गोल्ड सीमेंट के नाम से आता है। यह बीके बिरला समूह की कंपनी है।

अब शुरू होता है इस यात्रा में नए मोड़ का अचानक आ जाना। मैहर में हमारी मुलाकात गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा संचालित एक यात्रा से होती है। जीप पर आठ लोगों के साथ चल रही यह यात्रा अहिंसक समाज की रचना के लिए निकाली गई थी। इसमें हमारे राष्ट्रीय युवा योजना (एनवाईपी) के दो पुराने साथी मिल गए थे जिन्होंने मुझे पहचान लिया और यात्रा में कुछ दिन मुझे साथ रहने को आमंत्रित किया। यहीं पर पता चला कि इस यात्रा में अगले दिन महान गांधीवादी एसएन सुब्बराव जी भी आ रहे हैं। तो सुब्बराव जी से मुलाकात का लोभ देखकर मैं यात्रा का सहभागी बन गया। शाम को सुब्बराव जी आए। उनसे 1991 से ही परिचय गहरा हो गया था। उन्होंने मुझे रात को अपना एक लेख हिंदी में लिखने का काम सौंप दिया। देर रात मैं ये कार्य करता रहा। अगले दिन यात्रा के साथ हमलोग सतना शहर में थे। सतना में भी कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। इसके बाद अगले दिन मध्य प्रदेश का एक और शहर रीवा में पहुंचे। पर रीवा में मैंने दोपहर में यात्रा का साथ छोड़ दिया। यहां से मैं वाया सीधी- शक्तिनगर होते हुए वाराणसी सड़क मार्ग से जाने का मन बना चुका था।


मैं रीवा से सीधी बस से पहुंचा। सीधी मध्य प्रदेश का वह जिला है जो भोजपुरी बोलता है। सीधी के बस स्टैंड से मैंने अगली बस ली बैढ़न के लिए। बैढ़न के पास नार्दन कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के अमलोरी प्रोजेक्ट में मेरे मामाजी के बेटे कार्यरत हैं। तब यह सीधी जिले में आता था अब सिंगरौली जिले में आता है। उनके घर एक बार पहले भी जा चुका था, पर तब शक्तिनगर की ओर से आया था। बैढ़न बाजार में पहुंचते हुए बस ने रात के नौ बजा दिए थे। मेरी चिंता थी कि अगर अमलोरी कालोनी में जाने वाली आखिरी बस छूट गई तो छोटे बैढ़न कस्बे में रात कहां गुजारूंगा।

पर इसे संयोग कहिए अमलोरी कालोनी की ओर जाने वाली आखिरी बस मिल गई। मुझे जान में जान आई। रात 10 बजे के बाद भैया के फ्लैट में मैंने दस्तक दी। कई साल बाद गया था, पर भाभी ने आवाज से पहचान लिया। अगले कुछ दिन अमलोरी में गुजरे। भैया ने अमलोरी में कोयले की खुली खदानें दिखाईं। एनसीएल भारत सरकार की मिनी रत्न कंपनी है। इस इलाके में अमलोरी, जयंत और निगाही में एनसीएल की तीन प्रमुख खदानें हैं। इन सबके साथ बड़ी स्टाफ कालोनी है। अमलोरी से शक्तिनगर, चौपन, चुनार होते हुए वाराणसी वापस आ गया। 


-    - विद्युत प्रकाश मौर्य 
   (KATNI, MAIHAR, SATNA, RIWA, SIDHI, SINGRAULI, BAIDHAN, AMLORI, NCL, COALFIELDS) 
(

Tuesday, April 16, 2013

राजघाट में सो रहा है दुनिया का सबसे बड़ा फकीर

नाम राजघाट है पर यहां सो रहा है सदी का सबसे बड़ा फकीर। एक ऐसा फकीर जिसे नमन करने दुनिया भर के लोग आते हैं। शायद पूरी दुनिया में बापू ऐसे पहले आजादी की लड़ाई के अगुवा रहे होंगे जिन्होंने आजादी मिल जाने के बाद कोई सत्ता नहीं ग्रहण की। सरकार में कोई पद नहीं लिया। महलों में रहने नहीं गए। आजादी तो मिल गई पर बापू तो पीड़ित मानवता की सेवा में लगे रहे। उनके स्मृतियों को संजो कर उनकी समाधि बनाई गई तो उसका नाम राजघाट रखा गया। भला राज घाट क्यों। वे तो संत थे। उन्होंने तो अपने लिए राज पाने की कामना ही नहीं की थी। पर वे तो ऐसे असंख्य राजाओंसे काफी बड़े हैं जिन्होंने सालों राज किया हो। तभी तो भारत भूमि पर आने वाला हर शख्स चाहे वह किसी भी देश का शासनाध्यक्ष क्यों न हो, दिल्ली आने पर राजघाट पहुंचता है...नंगे पांव.... और उनकी समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करता है।
चरखा चलता बापू का - राजघाट ( जनवरी 2008) 
दिल्ली में रहते हुए जब जब जी थोड़ा उचाट होता है चुपचाप चला जाता हूं राजघाट। थोड़ी प्रेरणा पाने की आस में। यह संयोग ही है कि जब 1991 में पहली बार दिल्ली पहुंचा तो हमारा पहला पड़ाव राजघाट ही था। सितंबर 1991 में अलीगढ़ का शिविर खत्म हुआ तो दिल्ली देखने की इच्छा थी। मैं और बिपिन चतुर्वेदी बस में बैठे। आईटीओ पर रिंग रोड पर उतर गए। पैदल पैदल राजघाट की ओर। यहां पर सामने गांधी स्मृति दर्शन समिति में लोकसेवक मंडल का अंतरराष्ट्रीय शिविर लगा था। उसमें दो दिन ठहरे। इस दौरान बापू की समाधि राजघाट पर पहुंचे। इसके बाद वीरभूमि (राजीव गांधी की समाधि) शांतिवन ( पंडित नेहरू की समाधि) और विजय घाट ( लाल बहादुर शास्त्री की समाधि) के दर्शन। यह रिंग रोड ( महात्मा गांधी मार्ग) से लगता हुआ दिल्ली का बड़ा हरित क्षेत्र भी है। दूसरी बार 1992 में दुबारा एक शिविर में गांधी दर्शन में रूकना हुआ।

राजघाट में बापू की स्मृति में अखंड ज्योति जलती रहती है। इसके बगल में बापू का प्रिय चरखा भी चलता है। यहां चरखा चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। हालांकि अब बहुत कम लोग चरखा चलाना जानते हैं।

राजघाट का विस्तार 44.35 एकड़ के हरित क्षेत्र में है। निधन के एक दिन बाद 31 जनवरी 1948 को बापू का अंतिम संस्कार यहीं पर किया गया था। तब यहां लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी थी। बापू को अंतिम विदाई देने के लिए।

खुलने का समय - आम दर्शकों के लिए राजघाट हर रोज सुबह 6.30 बजे से शाम 6.00 बजे तक खुला रहता है। यहां जूता स्टैंड और पेयजल आदि का इंतजाम है।  2 अक्तूबर, 15 अगस्त और 26 जनवरी के आसपास यहां पर वीवीआईपी आयोजन के कारण आमजन का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाता है।



राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय और पुस्तकालय – राजघाट के ठीक सामने स्थित है राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय। यहां पर आप बापू और कस्तूरबा गांधी के जीवन से जुड़ी प्रदर्शनी देख सकते हैं। बापू की आवाज टेलीफोन पर सुन सकते हैं। दो मंजिला भवन में प्रदर्शनी काफी जानकारी परक है। इसमें चित्र प्रदर्शनी के अलावा बापू के आखिरी कपड़े यानी खून से सनी धोती और शॉल को देखा जा सकता है। बापू को लगी गोलियों में से एक गोली भी देखी जा सकती है।
40 किस्म के चरखे देखें यहां
सबसे नायाब है यहां का चरखा संग्रहालय। इसमें देश के अलग हिस्सों में बने चरखों का विशाल संग्रह है। यहां पर हर रोज बापू के जीवन से जुड़ी फिल्म का प्रदर्शन भी होता है। संग्रहालय के भवन में एक बेहतरीन पुस्तकालय भी है। यहां पर सुबह 10 से शाम 5 बजे तक बैठकर पुस्तकें पढ़ सकते हैं। साथ ही एक पुस्तक बिक्री केंद्र भी है। यहां बापू के जीवन और गांधी दर्शन से जुड़ी पुस्तकें और दूसरी यादगारी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। गांधी संग्रहालय भवन का उदघाटन 30 जनवरी 1961 को भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने किया था। यह संग्रहालय सुबह 9.30 से शाम 5.00 बजे तक खुला रहता है। 
-vidyutp@gmail.com

( RAJGHAT, BAPU, MAHATMA GANDHI, DELHI )

  

Sunday, April 14, 2013

वैशाली - यहां बजते थे कभी आम्रपाली के घुंघरू


बिहार में वैशाली यानी लोकतंत्र की जन्मभूमि, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि और नृत्यांगना आम्रपाली की रंगभूमि। वैशाली नाम कहते हैं राजा विशाल की नगरी के नाम पर पड़ा। वाल्मिकी रामायण में भी वैशाली का जिक्र आता है। अब वैशाली जैसा कोई बड़ा नगर नहीं है यहां। बैसोढ़ नाम का गांव है।

एक सैलानी या इतिहास में रूचि रखने वाले व्यक्ति के रुप में भी आप वैशाली घूमने जाना चाहें तो काफी कुछ देखने लायक है यहां। संयोग से मेरी 10 साल की स्कूली पढ़ाई का ज्यादातर हिस्सा वैशाली जिले के ही अलग अलग स्कूलों में गुजरा। इस दौरान कई बार वैशाली जाना हुआ। हर बार कुछ नया सा नजर आता है वैशाली। 

हर साल वैशाली महोत्सव- वैशाली के ऐतिहासिक स्मृति चिन्हों के बीच हर साल अप्रैल महीने में वैशाली महोत्सव का आयोजन होता है। ऐसे ही एक वैशाली महोत्सव में जाना हुआ। वैशाली के पुराने गौरव को याद करने के लिए आईसीएस और लेखक जगदीशचंद्र माथुर ने वैशाली महोत्सव की शुरूआत  कराई थी।

वैशाली में विशाल गजेंद्र पुष्करिणी ( सरोवर ) के साथ बना है विश्वशांति स्तूप। ये विशाल शांति स्तूप को जापान सरकार ने सहयोग देकर बनवाया है। भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के 12 साल वैशाली में गुजारे। यहीं पर आम्रपाली उनकी शिष्या बनी। कहते हैं बौद्ध भिक्षुणी बनने से पहले वह वैशाली की सबसे महंगी गणिका थी। आचार्य चतुरसेन का उपन्यास वैशाली की नगर वधु तो रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी लिखा अंबपाली। आम्रपाली एक फिल्म भी बनी थी। इसमें सुनील दत्त बने अजातशत्रु तो वैजंतीमाला बनीं थीं आम्रपाली।


यूं पहुंची आम्रपाली बुद्ध के शरण में
कोल्हुआ में अशोक स्तंभ। 
राजनर्तकी आम्रपाली ने राह में एक युवा संन्यासी को देखा। वह उसके आकर्षण में बंधकर उसके पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद संन्यासी एक वृक्ष की छाया में बैठ गया। आम्रपाली भी बैठ गई। उसने संन्यासी से प्रश्न किया, 'आपने युवावस्था में ही संन्यास क्यों ग्रहण किया?' संन्यासी ने उत्तर दिया, 'सत्य की खोज में।' आम्रपाली ने कहा, 'उस सत्य का क्या लाभ, जिसे पाने में आपका यौवन ही खत्म हो जाए।' संन्यासी ने कहा, 'पूर्ण आनंद तो साधु जीवन में ही है। और तुम जिसे सुख समझ रही हो वह तो क्षणिक है।' इस पर आम्रपाली बोली, 'आपका यह विश्वास असत्य सिद्ध होगा। आप कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें, जिसके लिए राजकुमार भी लालायित रहते हैं।' संन्यासी ने कुछ सोचकर कहा, 'यदि मेरे गुरु ने इसकी अनुमति दे दी तो मैं आऊंगा।' यह कहकर संन्यासी ने अपने झोले से एक आम निकालकर आम्रपाली को दिया और कहा, 'इसे संभालकर रखना। जब तक मैं आऊं यह खराब न हो।'

संन्यासी ने सारी घटना बुद्ध को बताई। बुद्ध ने संन्यासी को आम्रपाली का अतिथि बनने की अनुमति दे दी। इस पर कुछ अन्य शिष्यों ने आपत्ति व्यक्त की। बुद्ध ने उनकी शंका का निवारण करते हुए कहा, 'इसकी आंखों में थोड़ी भी तृष्णा या वासना नहीं है। यदि मैं मना कर देता तो भी यह मेरी बात अवश्य मानता।' इस बीच आम्रपाली आम को ताजा रखने का प्रयत्न करती रही लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों बाद संन्यासी उसके पास पहुंचा और उसने वह आम मांगा। लेकिन वह सड़ गया था, उसमें कीड़े पड़ गए थे।

संन्यासी ने उसकी गुठली निकाल ली और बाकी का हिस्सा फेंक दिया। उसने आम्रपाली से कहा, 'इस गुठली का कुछ नहीं बिगड़ा। इसमें अब भी पुन: उगने की शक्ति है। उसी तरह शरीर गल या सड़ जाएगा लेकिन आत्मा बची रहेगी। आत्मा का ध्यान करो।' यह सुनकर आम्रपाली ने भी बुद्ध की शरण में जाने का फैसला किया। 
( श्याम विलास के सौजन्य से )

कोल्हुआ गांव में अशोक की लाट- वैशाली के पास कोल्हुआ गांव में अशोक की लाट। इसी तरह का एक अशोक स्तंभ पश्चिम चंपारण जिले के लौरिया में भी है। खेतों के बीच स्थित इस अशोक की लाट की तस्वीर हमारे स्कूल के दिन में हर कॉपी पर होती थी। किसी जमाने में बिहार में बहुत लोकप्रिय थी वैशाली कॉपी। अब पता नहीं आती है या नहीं।

शांति स्तूप के पास संग्रहालय -  वैशाली में शांति स्तूप के बगल में एक बड़ा म्यूजिम भी है। म्यूजिम में ऐतिहासिक सामग्री देखी जा सकती है। हालांकि आजादी के सात दशक बाद भी वैशाली गांव जैसा ही है। यहां एक प्राकृत जैन संस्थान नामक शैक्षणिक केंद्र भी है। हरियाणा के नीलोखेड़ी गांव के रहने वाले महान समाजसेवी केडी दीवान ने वैशाली को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उनके पुनीत कार्यों के लिए उन्हें पद्मश्री भी मिला। भले ही हरियाणा में लोग दीवान साहब को नहीं जानते लेकिन वैशाली जिले में वे पूजे जाते हैं।

कैसे पहुंचे - बिहार की राजधानी पटना से हाजीपुर 20 किलोमीटर। हाजीपुर से लालगंज। और लालगंज से वैशाली। जिला मुख्यालय हाजीपुर से वैशाली तकरीबन 40 किलोमीटर है। आप हाजीपुर में रुकें और वहां से टैक्सी से वैशाली जाएं। दिन भर घूमकर शाम को वापस आ सकते हैं।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

( VASHALI, BUDDHA, AMRAPALI, HAJIPUR ) 


Saturday, April 6, 2013

हरी चाय पीएं रोगों को दूर भगाएं

सब्ज चाय, हरी चाय  या ग्रीन टी समान्य चाय से अलग चाय होती है। हरी चाय का फ्लेवर ताज़गी से भरपूर और हल्का होता है स्वाद सामान्य चाय से अलग होता है। यह कैमेलिया साइनेन्सिस  नामक पौधे की पत्तियों से बनायी जाती है। इसके बनाने की प्रक्रिया में ऑक्सीकरण न्यूनतम होता है। इसकी खोज चीन में हुई थी और आगे चलकर एशिया में जापान से मध्य पूर्व में लोकप्रिय हुई। इसके सेवन के काफी लाभ होते हैं।

हरी चाय से दिल के रोग होने की संभावनाएं कम हो जाती है। साथ ही कोलेस्ट्राल को कम करने के साथ ही शरीर के वजन को भी नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होती है। आम तौर पर लोग ग्रीन टी के बारे में जानते हैं लेकिन इसकी उचित मात्र न ले पाने की वजह से उन्हें उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता है।
ग्रीन टी पर हुए वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि यह सिरदर्द, तनाव, अल्जाइमर्स तथा एसिडिटी के लिए एक शानदार औषधि है।


एक चीनी कहावत है कि चाय के बगैर एक दिन रहने से अच्छा है तीन दिन तक भोजन के बगैर रहना। ग्रीन टी की कुछ किस्में हल्की मिठास लिए होती है, जिसे पसंद के अनुसार दूध और शक्कर के साथ बनाया जा सकता है। ग्रीन टी बनाने के लिए एक प्याले में 2 से 4 ग्राम चाय पत्ती डाली जाती है। पानी को पूरी तरह उबलने के बाद दो से तीन मिनट के लिए छोड़ देते हैं। प्याले में रखी चाय पर गर्म पानी डालकर फिर तीन मिनट छोड़ दें। इसे कुछ देर और ठंडा होने पर सेवन करते हैं।

कितनी पीएं चाय - कहा जाता है कि हर रोज कम से कम आठ कप ग्रीन टी पीना चाहिए। विभिन्न ब्रांड के अनुसार एक दिन में दो से तीन कप ग्रीन टी लाभदायक होती है। इसका अर्थ है कि एक दिन में 300 से 400 मिलीग्राम ग्रीन टी पर्याप्त होती है।

ग्रीन टी के 10 बड़े फायदे 

1 हृदय रोग :  ग्रीन टी कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करके हृदय रोग और स्ट्रोक को रोकने में मदद करता हैयहां तक कि दिल का दौरा पड़ने के बाद यह कोशिका की मृत्यु को रोकता है और हृदय कोशिकाओं के दुबारा बनने की गति को बढ़ाता है।

2 एंटी एजिंग : ग्रीन टी  में polyphenols के रूप में एक एंटी ऑक्सीडेंट होता है जो free radicals के खिलाफ लड़ता है। मतलब यह आपको दीर्घायु बनाता है।

3 कैंसर : यह कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद करता है। ग्रीन टी में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट विटामिन सी से 100 गुना और विटामिन ई से 24 गुना अधिक प्रभावी होता है। यह कैंसर से शरीर की कोशिकाओं की रक्षा करने में मदद करता है।

 4 वजन घटाना  : ग्रीन टी वसा को जलाता है  और स्वाभाविक रूप से Metabolism (उपापचय ) दर को बढ़ा देता है। यह सिर्फ एक दिन में 70 कैलोरी को जला देता है। एक वर्ष में लगभग 3-4 किलोग्राम के करीब वजन घटने के बराबर हो जाता है।

5 त्वचा: ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट free radicals से skin की रक्षा करता है। ये free radicals त्वचा में wrinkling और skin aging जैसे समस्या को जन्म देते हैं. ग्रीन टी त्वचा कैंसर के खिलाफ लड़ाई में भी मदद करता है।

6 गठिया ग्रीन टी संधिशोथ ( arthritis) के जोखिम को रोकने और कम करने में मदद करता है। यह उपास्थि को नष्ट कर देनेवाले एंजाइम को अवरुद्ध करके उपास्थि की रक्षा करता है।

7 यकृत रोग: ग्रीन टी जिगर की विफलता  के साथ लोगों में प्रत्यारोपण की विफलता को रोकने में मदद करता है। हरी चाय fatty livers में हानिकारक मुक्त कण (free radicals ) को नष्ट कर देता है। 

8 उच्च रक्तचाप ग्रीन टी उच्च रक्तचाप को रोकने में मदद करता हैहरी चाय पीने से एंजियोटेनसिन को repress ( दमनकर रक्तचाप को कम रखने में मदद मिलता है।

9 प्रतिरोधक क्षमता :  ग्रीन टी में पाया जाने वाला Polyphenols और flavonoids संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में हमारी मदद करते हैं और स्वास्थ्य प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।

10 तनाव ग्रीन टी में पाया जानेवाला एक अमीनो एसिड ( Theanine) तनाव और चिंता दूर करने में मदद कर सकते हैं।


- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य 

Thursday, April 4, 2013

सोहवलिया - अपने गांव का सफर

कई साल हो गए थे गांव गए। इस बार सोचा चलो गांव हो आते हैं। बनारस छोड़ रहा था दिल्ली जाने वाला था, सो सोचा पता नहीं अब कब गांव आना हो सके। मेरे गांव का नजदीकी रेलवे स्टेशन कुदरा है। कुदरा मुगलसराय जो मध्य भारत का बहुत बड़ा रेलवे जंक्शन है वहां से सिर्फ 75 किलोमीटर है। कुदरा रेलवे स्टेशन ग्रैंड कोर्ड पर है। यह दिल्ली कोलकाता का मुख्य रेल मार्ग है। जब से मैंने होश संभाला है यह रेलवे लाइन विद्युतीकृत है। अब माल ढुलाई की सुविधा के लिए तीसरी लाइन भी इस मार्ग पर बिछ चुकी है। यहां तक तो सब कुछ ठीक है। पर गांव जाने के लिए कुदरा से आगे जो सफर करना पड़ता है वह हमेशा से मुश्किलों भरा रहा है।
 मैंने वाराणसी से पैसेंजर ट्रेन पकड़ी दो ढाई घंटे के सफर के बाद जैसे ही प्लेटफार्म पर कुदरा लिखा हुआ नजर आया, बड़ी खुशी हुई कि अपना इलाका आ गया।


रेलवे स्टेशन से उतर कर अपने गांव की ओर जाने वाली सड़क पर आया। किसी जमाने में कुदरा से 14 किलोमीटर का सफर यानी हमारे गांव की ओर जाने के लिए तांगे यानी टमटम या घोड़ा गाड़ी चला करते थे। अब पता चला कि तांगे नहीं चल रहे हैं। सड़क बहुत खराब है, घोड़ागाड़ी चलाने वालों ने यह कारोबार छोड़ दिया है। कुदरा से परसथुआ मार्ग पर बसें भी चलती थीं। दिन में भर में दो बसें पर सड़कें बहुत खराब होने के कारण बसें चलनी भी कम हो गई हैं। लोगों ने बताया कि जोंगा मिलेगी। अब इ जोंगा का होला....जोंगा आर्मी से आक्सन की गई जीपे हैं। जो उबड़ खाबड़ में चलने के लिए अच्छी हैं। मैं अब किसी जोंगा के इंतजार में था। तब फुटपाथ पर लिट्टी चोखा खाने का आनंद उठाने की सोची। लकड़ी के कोयले पर लोहे की तार की जाली लगाकर छोटी-छोटी लिट्टी बनाकर बेचना हमारे इलाके का बड़ा प्यारा भोजन है। इसके साथ थोड़ा सा आलू-बैगन का चोखा मिलता है। यह समोसे, कुलचे या छोले भठुरे से तो अच्छा है। खैर..लिट्टी-चोखा खाके मन जुड़ा गोइल....

कुछ घंटा इंतजार करे के बाद एगो जोंगा आईल....हम दउर के ओमे एगो आगे वाला सीट पर कब्जा कर लेहलीं। जोंगा वाला कहलस गाड़ी पूरा भर जाई तबे चलब। खैर एक घंटा इंतजार करे के बाद जोंगा पूरा भर गोइल। गाड़ी चले के रहे तब तक एगो आदमी अइलन...अरे रूक रूक...हमरो चले के बा...ड्राइवर बोलल...आईं मलिकार...

सफेद पायजामा कुरता कान्ह पर गमछी लेले उ आदमी पान खात अउर मोंछ पर ताव दे रहे...हम त आगे हीं बइठब....अब आगे से एगो आदमी के हटा के पीछे भेजे के रहे। हमारा पहनावा-ओढ़ावा देखके हमारे के केहु पीछे जाए के ना कहल पर एगो दोसर आदमी के पीछे जाए के पड़ल...अब जोंगा के ड्राइवर सब केहू से भाड़ा वसूले लागल....तब उ पायजामा कुरता वाला बाबू कहलें ....हमरो से पइसा मंगबे जान नइखस हम भोखरी गांव के बाबू साहेब हईं...तोरा डर-ओर नइखे लागत का....जोंगा के ड्राइवर जैसे तइसे गाड़ी लेके चल पड़ल....गाड़ी चले पर बाबू साहेब कहलें आरे गाड़ी में कैसेट पर गाना लगाव मनोरंजन होखो...ड्राइवर बोला...मलिकार कैसेट मशीन खराब हो गोइल बा....फिर बाबू साहेब ने डांट पिलाई जल्दी मशीन ठीक कर...ड्राइवर गाड़ी रोककर कैसेट प्लेअर ठीक करने लगा। प्लेअर ठीक नहीं हुआ....

बाकी सब यात्रियों को घर जाने की जल्दी तो थी लेकिन सभी नाटक देख रहे थे। अब बाबू साहेब ने ड्राइवर को कहा..तुम गाड़ी भी चलाओ और साथ में गाना भी गाओ...मैं बजाता हूं....मजबूरी में ड्राइवर ने गाना शुरू किया.....नथुनिये प गोली मारे...ओ....नथुनिये प.....गाना सुन बाबू साहब मस्तियाने लगे...और ताली पीट पीट कर म्युजिक देने लगे....बाकी लोगों का मनोरंजन क्या हो रहा था...मैं ये ठीक ठीक नहीं बता सकता लेकिन धीरे-धीरे मंजिल की ओर लेकर जा रही जोंगा कई बार उलटते उलटते उलटते बची....

खैर चलते चलते हमारे गांव का निकटतम स्टाप आ गया..फुल्ली। यहां से तीन किलोमीटर पैदल का सफर...मैंने अपना पीट्ठू बैग लगा लिया पीठ पर.. और आंखों में गागल्स चढ़ा लिया। सिर पर टोपी भी लगा ली....जून की दोपहर थी..धूप तेज हो चली थी...कई साल बाद अपने ही गांव में जा रहा था। उसी गांव में जहां छुटपना गुजरा.. हजारों बातें उसी तरह याद हैं जैसे लगता है कल की ही तो बात हो...अब गांव तक जाने के लिए सड़क तो बन गई है पर अपना वाहन नहीं हो तो आखिरी तीन किलोमीटर का सफर पैदल ही करना पड़ता है। पैदल चलते चलते कुछ और लोग साथ थे उनसे बातें करने लगा।

 एक बुजुर्ग को मैं पहचानने की कोशिश कर रहा था। वे केदार साव थे। बगल वाले गांव के बनिया। वे मेरे दादा जी से फसल कट जाने पर धान और गेहूं खरीदा करते थे। मैंने उन्हें पहचान लिया। बातों में मैंने उन्हें बताया...हमार घर सोहवलिया ह...परिचय देने पर उन्होंने जाना...अच्छा त तू परयाग के नाती हव...कहवां बाड़...हम बतवनी की अबगे तक तक बीएचयू में पढ़त रनी हा...अब जातानी दिल्ली...जर्नलिज्म पढ़े....जर्नलिज्म माने का भइल हो...अखबार के पढ़ाई...अच्छा तब त ठीक बा..

गांव में दादाजी का बनवाया शिव मंदिर 
खैर बातों बातों में गांव आ गया...गांव के एक दादा खेतों में काम करते दिखे...हम त चिन्ह लेनी...उ शामलाल दादा रहन...दउड़ के पांव लगनी..पर उ ना चिन्हल...खैर हम आपन परिचय देनी....जान के दादा के चेहरा पर आइल मुस्कान कबो ना भुलाए जोग रहे। मूल त मूल सूद के आगे बढ़त देख के बुजुर्ग लोग के बाड़ा खुशी होखेला।

गांव में घर जाए से पहिले अपना दलान पहुंचनी...शंकर जी का मंदिर जो मेरे छोटे दादा विश्वनाथ सिंह ने बनावा था वहां जाकर शीश झुकाया। अब मेरे इस गांव में मेरे परिवार का कोई नहीं रहता। मम्मी-पापा भाई बहन तो बाहर हैं। दादा दादी कबके गुजर गए। मेरे घर में ताला लगा है। मैं एक बार फिर जा पहुंचा मंदिर की सीढ़ियों पर और बैठकर सोचने लगा अब आगे किसके घर जाऊं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य

( जून, 1995 )  ( SOHAWALIA, KUDRA, KARGHAR, ROHTAS, BIAHR) 

Tuesday, April 2, 2013

दिल्ली में आंध्र भवन की थाली


अगर आप दिल्ली में और दक्षिण भारतीय खाने का स्वाद लेना चाहते हैं तो आंध्र भवन अच्छा विकल्प हो सकता है। आंध्र भवन में रूटीन में रोज लंच और डिनर लिया जा सकता है। थाली 100 रुपये की है। डिनर का समय शाम 7.30 से रात्रि 10 बजे तक है। डिनर की थाली में चपातीचावल, ( सफेद चावल और नमकीन चावल )  रसमसांभरदालसब्जीचटनीमिक्स वेजदहीसेवईपापड़अचार सब कुछ है।
अगर आप जमकर खातें हों तो पूरी पैसा वसूल थाली है। हालांकि दक्षिण भारत में चपाती खाने की परंपरा नहीं है लेकिन दिल्ली में आकर आंध्र भवन की थाली में चपाती आ गई है। चपाती के साथ घी भी मौजूद है। कई तरह अचार भी टेबल पर मौजूद है। आप थाली के साथ कोल्ड ड्रिंक या नॉन वेज आईटम अतिरिक्त तौर जोड़ सकते हैं। आंध्र भवन में सुबह नास्ते में 55 रुपये की थाली में डोसा इडली सांभर जैसे विकल्प हैं। दिल्ली में रहने वाले दक्षिण भारतीय लोगों और दक्षिण भारतीय खाना खाने वाले लोगों की खास पसंद है आंध्र भवन थाली। रविवार की सुबह यहां बिरयानी भी मिलती है।

रोज खाने के समय अच्छी खासी भीड़ होती है लेकिन दो बड़े डायनिंग हॉल में यहां का स्टाफ अपने कस्टमर को जगह दिलाने के लिए तत्पर रहता है। अगर आप पान खाने के शौकीन हैं तो खाने के बाद मीठा पान भी ले सकते हैं 10 रुपये में।

कैसे पहुंचे - आंध्र भवन दिल्ली में इंडिया गेट के पास है। इंडिया गेट की तरफ से आप अशोक रोड पर चलें। पहले गोलंबर पर ही आंध्र भवन है। इसका मुख्य प्रवेश द्वार जसवंत सिहं रोड की ओर से है। वहां पर बाहर पार्किंग भी की जा सकती है। तो आप कभी इंडिया गेट घूमने जाएं तो आंध्र भवन की कैंटीन के खाने का स्वाद ल सकते हैं। एक दिन अचानक राहुल गांधी भी आंध्र भवन के खाने का स्वाद लेने पहुंच गए थे।



-  ---------विद्युत प्रकाश मौर्य 
( ANDHRA BHAWAN DELHI , THALI, SOUTH INDIAN FOOD )