Tuesday, February 26, 2013

लाइट रेल - शाहदरा से सहारनपुर तक का सफर

शाहदरा से सहारनपुर के बीच नैरोगेज नेटवर्क पर कुल 32 रेलवे स्टेशन और हाल्ट हुआ करते थे। इसमें पहला स्टेशन शाहदरा दिल्ली से 6 किलोमीटर आगे यमुना नदी के पार ब्राडगेज रेलवे का पहला स्टेशन है। ब्राडगेज लाइन से बगल में बायीं तरफ नैरो गेज की लाइन मिलती थी। पर ब्राडगेज की पटरी और नैरोगेज की पटरी के बीच ऊंचाई में काफी अंतर था। नैरो गेज लाइन शाहदरा के रामनगर मुहल्ले से लगती थी। शाहदरा बीसवीं सदी के शुरुआत में भी जब लाइट रेलवे आरंभ हुई दिल्ली से अलग एक स्वतंत्र कस्बा था, जहां भरा पूरा बाजार और मंडी हुआ करती थी।

शाहदरा सहरानपुर लाइट रेलवे के स्टेशन
1दिल्ली शाहदरा ( कोड – डीएसए) – पुरानी दिल्ली से छह किलोमीटर दूर दिल्ली का रेलवे स्टेशन है। यह एसएसएलआर का एकमात्र स्टेशन था जो दिल्ली में पड़ता था। इसके बाद यह रेल मार्ग उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर जाता है।

 2. बेहटा हाजीपुर (12 किमी)- उत्तर प्रदेश में पड़ने वाला गाजियाबाद जिले का छोटा सा ठहराव है।
3. नोली ( 15 किमी) – इस शहर का नाम लोनी है पर स्टेशन का नाम नोली। अब यह गाजियाबाद जिले की एक तहसील है और दिल्ली एनसीआर में आने वाला शहर है।
4.  नूरस्ताबाद (18 किमी) 5. गोतरा (22 किमी)
6. फक्रपुर हाल्ट  (25 किमी ) 7. खेकड़ा ( 28 किमी)
8. अहेरा (35 किमी ) 9 . बागपत रोड (38 किमी) – यहां से बागपत शहर की दूरी 5 किलोमीटर है। यह रेलवे स्टेशन अग्रवाल मंडी में है।
10 . सुजरा (44 किमी पर ) 11. अलावलपुर इद्रीसपुर (48 किमी)
12.  बड़का हाल्ट (51 किमी ) 13 बड़ौत ( 54 किमी पर )- बड़ौत इस मार्ग का प्रमुख रेलवे स्टेशन और बड़ा शहर भी है।
14 बावली हाल्ट (59 किमी) 15 . कासिमपुर खेड़ी ( 63 किमी)
16 भूडपुर (67 किमी) 17.  असरा हाल्ट (71 किमी)
18. एलम हाल्ट (73 किमी)  19. कांधला (79 किमी पर )
20. खन्द्रावली हाल्ट (86 किमी) 21. गुजरां बलवा (89 किमी)

22. शामली (93 किमी पर ) – नैरोगेज रेल मार्ग का सबसे बड़ा ठहराव था। जिला मुख्यालय होने के साथ पुराना औद्योगिक शहर है। यहां स्टीम इंजन के लिए पानी लेने का भी इंतजाम था।

23. सिलावार (100 किमी) 24. हींड (104 किमी )
25. हाहर फतेहपुर ( 108 किमी) 26. थानाभवन (113 किमी)
27. ननौता (129 किमी) 28. सोना अर्जुनपुर (132 )
29. रामपुर मनिहारन (136 किमी)  30. भानुकाला हाल्ट (141 किमी) 31. मानानी (146 किमी) 32. सहारनपुर ( स्टेशन कोड – एसआरई )  

शाहदरा सहारनपुर नैरो गेज - 1973 में ब्राडगेज में बदला 

साल 1970 में जब शाहदरा सहारनपुर नैरो गेज लाइन बंद हो गई तो इसके भविष्य को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं हो रही थीं। खास तौर पर इस रेलमार्ग पर कार्यरत स्टाफ के बेरोजगार हो जाने का मुद्दा और लाखों क्षेत्रवासियों के परेशानी का मुद्दा। रेलमार्ग के बंद होने के बाद संसद में सवाल पूछे गए। 1970 मे जनसंघ के सांसद बेनी शंकर बर्मा ने लोकसभा में ये मुद्दा उठाया। सहारनपुर के उद्योगों से जुड़े ट्रेड यूनियन नेताओं ने शाहदरा सहारनपुर लाइन का राष्ट्रीयकरण कर इसे  जल्द चालू करने की मांग की। अगर राष्ट्रीयकरण न हो तो इसे एक सहकारी समिति बनाकर रेल लाइन चलाने का भी विचार आया। इसके साथ ही कर्मचारियों का बकाया भत्ता नहीं देने के लिए कंपनी पर उचित कार्रवाई करने की भी मांग की गई।
स्व . रामचंद्र विकल ( सांसद, पांचवी लोकसभा, बागपत) 
पर बागपत से कांग्रेस पार्टी के सांसद रामचंद्र विकल की ओर से इस लाइन को बड़ी लाइन में बदलवाने के लिए काफी मजबूती से वकालत की गई। उनकी कोशिशें रंग भी लाईं। 1971 के आरंभ में हुए पांचवी लोकसभा चुनाव में बंद पड़ा शाहदरा सहारनपुर लाइट रेलवे बड़ा मुद्दा बन गया था। बागपत से कांग्रेस उम्मीवार क्षेत्र के लोकप्रिय गुर्जर समाज के नेता रामचंद्र विकल ने चुनाव प्रचार के दौरान क्षेत्र के लोगों को वादा किया कि वे एसएसएलआर को बड़ी लाइन में बदलवा देंगे। वे चुनाव जीते और जीतने के बाद इंदिरा सरकार में इस रेलमार्ग के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।

बागपत, बड़ौत, शामली क्षेत्र के राजनीतिक महत्व के कारण ही तब इस रेल लाइन को ब्राडगेज में बदले जाने पर तेजी से अमल हुआ। विवेक देवराय लिखते हैं - अगर बागपत संसदीय क्षेत्र सन 1970 में इतना अहम नहीं होता तो शायद ही उस वक्त इस लाइन को बड़ी लाइन में बदलने का काम शुरू होता। वास्तव में यह कोई रेलवे का वाणिज्यिक निर्णय नहीं था।


बीस फरवरी 1973 को तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा ने वर्ष 1973-74 का रेल बजट पेश किया था। उनके भाषण में लाइट रेलवे के लिए अलग से एक पूरा हिस्सा रखा था। पर इस पर अमल नहीं हो सका। इससे पहले 1972 में पेश अंतरिम रेल बजट में भी लाइट रेलवे पर काफी बात की गई थी। बजट भाषण में कहा गया कि मार्टिन एंड कंपनी की 1970 में बंद हुई तीन रेलवे नेटवर्क  36 लाख रुपये के घाटे में थीं जिनमें शाहदरा सहारनपुर नेटवर्क भी एक था। वास्तव में इन लाइनों का बंद होना इनकी नियती बन चुका था। आगे के दौर में सड़क परिवहन के विकास ने लाइट रेलवे को खत्म कर दिया। 

नैरोगेज के एलिवेशन पर ही ब्राडगेज
जब इस लाइन को ब्राडगेज में बदला गया तो दिल्ली से सहारनपुर के मार्ग में सारे रेलवे स्टेशन वही रहे जो नैरो गेज के समय में भी थे। ट्रैक का एलिवेशन भी वही रहा। बस सहारनपुर के पास टपरी में एलिवेशन में थोड़ा बदलाव किया गया। नैरोगेज की लाइन टपरी से नहीं गुजरती थी। पर ब्राडगेज को टपरी जंक्शन से जोड़ा गया। 1973 में जब इस मार्ग को बड़ी लाइन में बदला गया तो खेकड़ा रेलवे स्टेशन के नए भवन का उदघाटन करने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यहां आईं थीं। तब ललित नारायण मिश्रा केंद्र में रेल मंत्री हुआ करते थे।

ब्राडगेज बनने के बाद इस खंड का प्रबंधन अब उत्तर रेलवे के अंतर्गत है। इसे दिल्ली-शामली-सहारनपुर सेक्शन के नाम से जाना जाता है। इस मार्ग पर पैसेंजर, डीएमयू, एक्सप्रेस और मालगाड़ियों का संचालन होता है। इस मार्ग की ज्यादातर रेलगाड़ियों हमेशा यात्रियों से भरी रहती हैं।

शाहदरा सहारनपुर लाइट रेल - खास बातें –

कुल लंबाई – 165 किलोमीटर , आरंभ – 07 मई 1907

बंदी – 1 सितंबर 1970,    ब्राडगेज – 1973

ट्रैक – 762 मिलीमीटर,  दैनिक यात्री - 12,000 

संदर्भ -
9 .Book - Lok Sabha Debates, Volume 46, Issues 16-20, Contributor-India. Parliament. Lok Sabha. Secretariat, Publisher, Lok Sabha Secretariat, 1970
10. BOOK- Indian Railways: The Weaving of a National Tapestry, By Bibek Debroy, Sanjay Chadha, Vidya Krishnamurthi


13. Indian Railways Budget Speech 1971-72 (Interim) by k Hanumanthappa  -  23 MAR 1971

14. The Economic Weekly - Feb 1965 - Annual Number. 

- विद्युत प्रकाश मौर्य

 (SHAHDARA SAHARNPUR LIGHT RAILWAY, MARTIN RAIL, NARROW GAUGE, SSLR-4 ) 

Sunday, February 24, 2013

शाहदरा सहारनपुर – दूधवालों की रेलवे लाइन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बागपत, बड़ौत इलाका खेती के लिहाज से काफी उर्वर रहा है। यहां बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। साथ ही दूध का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है। इसलिए शाहदरा सहारनपुर रेल मार्ग पर गन्ने को चीनी मिलों तक पहुंचाने का काम और इसके साथ ही कैंटर में भर कर दिल्ली दूध बेचने का काम भी इस रेल मार्ग के सहारे होता रहा है। शामली क्षेत्र हमेशा से बड़ा गन्ना उत्पादक इलाका रहा है।
शामली में स्थित अपर दोआब शुगर मिल्स लिमिटेड लिमिटेड ( अब सर शादीलाल शुगर मिल्स लिमिटेड ) के लिए गन्ने की ढुलाई के लिए शाहदरा सहारनपुर लाइट रेलवे का इस्तेमाल हुआ करता था। 1962 में रेलवे रेट्स ट्रिब्यूनल में हुए एक मुकदमे से पता चलता है कि शुगर मिल ने एसएसएलआर पर गन्ना ढुलाई का सही रेट नहीं लिए जाने पर अपनी ओर से शिकायत की। एएसएलआर द्वारा 1960 में गन्ना ढुलाई की दरें बढ़ाए जाने से कंपनी नाराज थी। हालांकि ट्रिब्यूनल चीनी मिल कंपनी के तर्कों से सहमत नहीं हुआ।

शाहदरा सहारनपुर रेल खंड पर रोजाना सहारनपुर से दिल्ली के बीच इस मार्ग पर चलने वाली पैसेंजर ट्रेनों में आपको बड़ी संख्या में दूध का कैंटर लेकर दिल्ली आने वाले लोग सफर करते हुए मिल जाएंगे। नैरोगेज के जमाने से दूध वालों के सफर का ये सिलसिला चलता आ रहा है।


बागपत रोड रेलवे स्टेशन के पास टीटरी मंडी के निवासी विजय कुमार दीक्षित जो यहां के प्रसिद्ध मिठाई दुकान भगतजी स्वीट्स से जुड़े हैं, एसएसएलआर नैरोगेज के सफर को याद करते है। वे बताते हैं कि 1970 में इस रेलवे लाइन के बंदी के समय मैं 18 साल का था। उस छोटी लाइन पर मैं 80 पैसे का टिकट खरीदकर दिल्ली आ जाता था। दिन भर दिल्ली में कामकाज निपटाकर शाम को वापस लौट आता था। बागपत रोड रेलवे स्टेशन के पास टीटरी मंडी या अग्रवाल मंडी के नाम से मशहूर बाजार ब्रिटिशकालीन बाजार है। किसी जमाने में यह इलाके की प्रसिद्ध मंडी हुआ करता था। तब मंडी के दुकानदार दिल्ली आने जाने के लिए इस लाइट रेलवे का खूब इस्तेमाल करते थे।

लेखक आर शिवरामकृष्णन अपने एक आलेख में जून 1968 में शहादरा सहारनपुर लाइट रेलवे पर अपनी यात्रा का रोचक और जीवंत विवरण प्रस्तुत करते हैं।
शाहदरा रेलवे स्टेशन पर ब्राडगेज से इतर एक नैरोगेज का एक प्लेटफार्म हुआ करता था। एक ही प्लेटफार्म बीच में था। इसके दोनों तरफ आने वाली और जाने वाली ट्रेनें खड़ी होती थीं। इसके अलावा यहां गुड्स शेड, ट्रांसफर यार्ड और लोकोशेड आदि भी निर्मित था। शिवरामकृष्णन लिखते हैं कि दिल्ली से सहारनपुर जाने वाले कम ही लोग इस मार्ग पर रेल टिकट खरीदकर सफर करते थे।
सुबह 7.05 बजे 0-6-2 श्रेणी का टैंक इंजन डिब्बों के साथ जोडा गया। पर सहारनपुर की तरफ ट्रेन चलने से पहले उधर से आने वाली डाउन ट्रेन का इंतजार था। तमाम डिब्बों में दूधवाले पहले ही सीटों पर कब्जा कर चुके थे। सीट के आसपास खाली जगहों पर उनके मिल्क कैन विराजमान हो गए थे। ऐसा लग रहा थाकि वे शाहदरा के आसपास के घरों में दूध की सप्लाई करने के बाद अपने गांव की ओर लौट रहे थे। एक बाहरी आदमी को देखकर उन लोगों ने मुझसे कई सवाल पूछने शुरू कर दिए। जब उन्होंने जाना कि मैं मद्रास से हूं तो उनका चेहरा उतर गया। क्योंकि थोड़े साल पहले ही मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन हुआ था। लोगों को इस बात को लेकर अचरज हो रहा था कि एक भारतीय होकर भी मुझे राष्ट्रीय भाषा हिंदी का ज्ञान क्यों नहीं है।


खैर 7.28 बजे ट्रेन सहारनपुर की ओर चल पड़ी। कुछ सहयात्री लोकगीत गाने लगे। एक दूधवाले ने तो चलती ट्रेन के डिब्बे में किरासन तेल से चलने वाला स्टोव जला लिया। उसने बचे हुए दूध से गाढ़ी चाय बनाई. इसमें मिठास के लिए गुड़ डाला गया। मेरे न चाहते हुए भी मुझे एक लोटा चाय पीने को ऑफर किया गया। ये दूधवाले अलग अलग समूह में थे जो नोली के बाच अलग अलग स्टेशनों पर उतरते गए। बागपत रोड में काफी दूधवाले उतर चुके थे।

बागपत रोड स्टेशन पर इंजन को पानी देने का इंतजाम था। इसके बाद ट्रेन बड़ौत, शामली और ननौता में भी पानी लेने के लिए रूकी। बड़ौत में कोई उत्सव में मनाया जा रहा था। यहां बहुत बड़ी भीड़ आई जो ट्रेन  सवार हो गई। बड़ौत में ट्रेन से दो डिब्बे काटकर अलग कर दिए गए। अब मुझे दूसरे डिब्बे में जाकर जगह लेनी पड़ी। पर बाकी डिब्बे पूरी तरह भर चुके थे। अब लोग इन डिब्बों की छत पर जाकर जगह ले रहे थे। काफी संकोच करते हुए और यह आश्वत हो लेने के बाद कि आगे कोई नदी पुल या संकरा पुल नहीं आएगा, मैं भी ट्रेन की छत पर सवार हो गया।

ट्रेन 28 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति स्टेशनों के बीच चल रही थी। इसी बीच हमने साफ मौसम के बाद बादलों से घिरा हुआ मौसम देखा। बारिश की कुछ बूंदे भी पड़ी। शामली स्टेशन आने के बाद ट्रेन खाली हुई। मैं अब नीचे उतर आया और कंपार्टमेंट में जाकर ली। एक आदमी ने घर से बनाकर लाई दो रोटियां मुझे खाने को आफर किया। रास्ते में ननौता शुगर मिल आय़ा। अन्य में दोपरह 3.50 मिनट पर मैं सहारनपुर पहुंच चुका था। तो इस तरह दिल्ली से सहारनपुर का सफर नौ घंटे में पूरा हुआ।


- विद्युत प्रकाश मौर्य


 (SHAHDARA SAHARNPUR LIGHT RAILWAY, MARTIN RAIL, NARROW GAUGE, SSLR-3 ) 

Friday, February 22, 2013

शहादरा -सहारनपुर - रोजाना 12 हजार लोग करते थे सफर

साल 1970 में बंदी से पूर्व शहादरा सहारनपुर लाइट रेलवे के मार्ग पर हर रोज 12 हजार लोग यात्रा कर रहे थे। ये अलग बात है कि तब ये रेल नेटवर्क घाटे में आ चुका था। साल 1911 तक यह रेल नेटवर्क 1 लाख 37 हजार मील का सफर तय कर चुका था। इसी तरह 1912 में इस नेटवर्क पर 9 लाख 94 हजार 100 लोग सफर तक चुके थे। वहीं 1912 में कुल 1 लाख छह हजार टन माल का परिवहन किया जा चुका था। साल 1913 में एसएसएलआर नेटवर्क हर साल 10 लाख यात्रियों को ढो रहा था। वहीं एक लाख टन से ज्यादा माल की सालाना ढुलाई हो रही थी। इस रेल नेटवर्क पर रेलवे को मुख्य कमाई माल ढुलाई से हो रही थी। जो हर साल बढ़ रहा था। 

इस मार्ग पर पैसेंजर ट्रेनें और मालगाड़ियां दोनों ही संचालित की जाती थीं।मालगाड़ियों से मुख्य रुप से गन्ने और चीनी का परिवहन किया जाता था।एसएसएलआर नेटवर्क का संचालन कार्यालय मुख्य रूप से सहारनपुर शहर में स्थित था। मार्टिन एंड बर्न का मुख्यालय कोलकाता में था। इसका एक आपरेशन दफ्तर दिल्ली के जनपथ मार्ग पर प्यारे लाल भवन में भी था। तब सहारनपुर में इंडियन टूबैको कंपनी हुआ करती थी। 1930 के दशक में मार्टिन एंड कंपनी छोटे से शहर सहारनपुर में लोगों को रोजगार देने वाली बड़ी कंपनी थी। 
हंसले द्वारा 1907 में निर्मित कलेक्टर टैंक लोकोमोटिव। 

एसएसएलआर का लोकोमोटिव और रोलिंग स्टॉक
एसएसएलआर के पहले आठ लोकोमोटिव 2-6-2 माडल के स्टीम लोकोमोटिव थे, जो 1907 में हंसले से मंगाए गए थे।  इसके बाद 2-6-4 श्रेणी के शाडा क्लास के लोकोमोटिव मंगाए गए। ये भी हंसले द्वारा निर्मित थे। वहीं इस क्लास के दो लोकोमोटिव का निर्माण 1945-46 में सहारनपुर में ही किया गया। इसके निर्माण के लिए स्पेयर और फ्रेम आदि हंसले से ही मंगाए गए थे।

शहादरा सहारनपुर मार्ग पर दो लोकोमोटिव मार्टिन के दूसरे नेटवर्क से भी मंगाए गए। इसी क्रम में 0-8-0 श्रेणी का टैंक इंजन को बंगाल के बशीरहाट लाइट रेलवे से 1941 में मंगाया गया था। पर यह साल 1948 में संचालन से बाहर हो गया।  साल 1962-63 में जब बख्तियारपुर-बिहार लाइट रेलवे का संचालन बंद हुआ तो वहां से 0-6-2 श्रेणी के हंसले निर्मित एक लोकोमोटिव को यहां लाया गया। साल 1967 में एसएसएलआर ने कालका शिमला नेटवर्क से सेकेंड हैंड इंजन केसी 524 को भी खरीदा। अपने 63 साल के सेवाकाल में एसएसएलआर के पास इस तरह कुल 22 स्टीम लोकोमोटिव थे। इसके अलावा इस नेटवर्क के पास तीन रेल कार भी थे।

शामली महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन – दिल्ली से 100 किलोमीटर आगे शामली इस मार्ग का प्रमुख रेलवे स्टेशन था। शामली में अपर दोआब शुगर मिल होने कारण का इसका सामरिक महत्व था। शहादरा और सहारनपुर के बीच यह बड़ा रेलवे स्टेशन हुआ करता था। यहां पैसेंजर ट्रेनों का बड़ा ठहराव होता था। यहां पर कोच और लोकोमोटिव के लिए रखरखाव का केंद्र भी बनाया गया था। 

एसएसएलआर बंदी की ओर  - साठ के दशक के आखिरी दिनों में एसएसएलआर को संचालन में काफी घाटा होने लगा था। इसलिए कंपनी ने भारत सरकार को रेलवे लाइन बंद करने के लिए नोटिस दिया। शाहदरा साहरनपुर लाइट रेलवे ने 01 सितंबर 1970 को अपना आखिरी सफर किया। इसी साल मार्टिन की दो और रेलवे लाइनों का संचालन घाटे के कारण बंद हुआ। बंगाल में हावड़ा आम्टा और हावड़ा शियालखल्ला लाइनें भी इसी साल बंद हुईं। बंद होने का मुख्य कारण मार्टिन एंड कंपनी को इन लाइनों से लगातार घाटा होना था।

मार्टिन प्रबंधन ने घोषणा की कि साल दर साल घाटा होने के कारण कंपनियों को तालाबंदी पर मजबूर होना पड़ा। इस दौरान इन इलाकों में सड़क परिवहन की ओर से जबरदस्त प्रतिस्पर्धा मिल रही थी। इन रेलमार्ग के रोलिंग स्टॉकपटरियां और अन्य परिसंपत्तियों का भी उचित रखरखाव नहीं हो पा रहा था। उनकी हालत बहुत बुरी थी और उनके रखरखाव के लिए उचित काफी खर्च की आवश्यकता थी। इन लाइट रेलवे पर यात्री सुविधाओं का स्तर भी भारतीय रेल की तुलना में काफी कमजोर था। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य

 (SHAHDARA SAHARNPUR LIGHT RAILWAY, MARTIN RAIL, NARROW GAUGE, SSLR-2) 

Wednesday, February 20, 2013

शाहदरा सहारनपुर लाइट रेलवे- मार्टिन का सबसे बड़ा नेटवर्क

दिल्ली के शाहदरा जंक्शन से सहारनपुर के लिए वाया बागपत- बड़ौत-शामली होकर रेलवे मार्ग संचालन में है। किसी जमाने में ये नैरो गेज लाइन हुआ करती थी।
मार्टिन एंड कंपनी ने  1907 में शाहदरा (दिल्ली) -सहारनपुर लाइट रेलवे का संचालन आरंभ किया था। 2 फीट 6 ईंच ( 762 मिली मीटर) की पटरियों वाले इस रेल नेटवर्क की लंबाई 92 मील ( 165 किलोमीटर)  थी। इस रेल नेटवर्क ने 63 साल तक क्षेत्रवासियों को सफलतापूर्वक अपनी सेवाएं दीं।  

मार्टिन का सबसे लंबा रेल नेटवर्क -  लंबाई के लिहाज से देखें तो यह निजी कंपनी मार्टिन एंड बर्न द्वारा संचालित नैरो गेज रेलवे में सबसे लंबा नेटवर्क था। बिहार बंगाल में संचालित मार्टिन की सभी रेल सेवाएं लंबाई की लिहाज से इससे छोटी थीं। यों कहें कि यह मार्टिन की सबसे लंबी और सबसे बड़ी परियोजना थी तो यह गलत नहीं होगा। यह मार्टिन द्वारा उत्तर प्रदेश ( तब यूनाइटेड प्रॉविंस) में संचालित एकमात्र रेलवे लाइन थी।  
मार्टिन एंड कंपनी कुल आठ लाइट रेलवे का संचालन कर रही थी। इनमें शहादरा-सहारनपुर रेलमार्ग सबसे लंबा नेटवर्क था। बंगाल में चार, बंगाल में हावड़ा-आम्टा (70.3 किमी), हावड़ा-शियाखल्ला रेल लाइन (27.1 किमी), बारासात-बशीरघाट लाइट रेलवे  (53 किमी) और शांतिपुर-कृषनगर- नवाद्वीप लाइट रेलवे  ( 45 किमी ) संचालन में थीं।

बिहार में तीन बिहार में बख्तियारपुर-बिहार लाइट रेलवे ( 53 किमी), फतवा-इस्लामपुर लाइट रेलवे ( 64 किमी) और आरा सासाराम लाइट रेलवे  ( 111 किमी) संचालन में थी। 

साल 1973 में शाहदरा सहारनपुर रेलमार्ग को ब्राड गेज में बदला गया। बागपत के तत्कालीन कांग्रेस सांसद रामचंद्र विकल के प्रयासों से यह लाइन नैरोगेज लाइन के बंद होने के बाद जल्द ही ब्राड गेज में परिवर्तित हो गई। अब यह लाइन उत्तर रेलवे का हिस्सा है। शाहदरा से सहारनपुर के बीच ब्राडगेज पर यह सिंगल लाइन का नेटवर्क है। इसे डबल और विद्युतीकृत किए जाने पर यह दिल्ली से यूपी, उत्तराखंड हरियाणा और पंजाब की तरफ ट्रेनों को निकालने का अच्छा वैकल्पिक मार्ग हो सकता है। इसलिए रेलवे ने इस मार्ग को 2016 में डबल लाइन में परिवर्तित करने का फैसला लिया।

हंसले निर्मित शादा लोकोमोटिव 1948 में पैसेंजर कोचों को खींचता हुआ।  ( सौ. कांटिनेंटल रेलवे सर्किल यूके ) 
एसएसएलआर - रेलवे लाइन का निर्माण – शहादरा-सहारनपुर लाइट रेलवे निजी क्षेत्र की प्रमुख रेलवे कंपनी, मार्टिन एंड कंपनी द्वारा देश के अलग अलग हिस्सों में संचालित नैरो गेज रेलवे नेटवर्क का हिस्सा था। इस रेलवे लाइन के लिए मार्टिन एंड कंपनी ने 28 नवंबर 1905 में शहादरा-सहारनपुर लाइट रेलवे कंपनी नाम से अलग कंपनी का गठन किया। यह एक ट्रामवे कंपनी के तौर पर रजिस्टर हुई थी। तब इसका शेयर कैपिटल 39 लाख रुपये था। इसका मुख्यालय कोलकाता में था। इस लाइन को बिछाने का काम दो साल में बड़े ही तीव्र गति से किया गया।

रेलमार्ग के निर्माण के लिए तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस सरकार और कंपनी के बीच एक अनुबंध पर हस्ताक्षर हुआ। हालांकि सरकार की ओर से रेलवे कंपनी को कोई गारंटी नहीं दी गई पर रेलवे लाइन निर्माण के लिए जमीन फ्री में उपलब्ध कराई गई। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतीबाड़ी योग्य बेहतर गुणवत्ता की जमीन थी, जो नहर से सींचित इलाके में थी। मार्टिन एंड कंपनी ने कुल 92.63 मील लंबा रेलवे लाइन बिछाया।

सात मई 1907 को इस रेल मार्ग का शाहदरा शामली तक का तकरीबन 100 किलोमीटर का रेलवे खंड चालू हो गया।इसके बाद इसी साल 15 अक्तूबर 1907 को शामली सहारनपुर खंड पर रेल यातायात चालू कर दिया गया।
शुरुआत में इस रेल मार्ग पर कुल आठ लोकोमोटिव की सेवाएं ली गईं। कुल 35 कोच यात्रियों को ढोने के लिए मंगाए गए थे। वहीं माल ढुलाई के लिए कुल 189 वैगन भी इस रेल मार्ग पर उपलब्ध थे।

सहारनपुर में लाइट रेलवे की काफी परिसंपत्तियां थीं। यहां पर रेलवे का भवन, बच्चों का पार्क, एक कैंटीन, एक डिस्पेंसरी, प्रशासनिक दफ्तर, रेस्ट हाउस, आउट हाउस, अधिकारियों के आवास आदि थे। रेलवे कंपनी पर जिला म्युनिसपल बोर्ड द्वारा इन भवनों के लिए 3957.75 रुपये सालाना कर तय किया गया था। जिसकी वसूली के लिए मुकदमेबाजी भी हुई। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य

 (SHAHDARA SAHARNPUR LIGHT RAILWAY, MARTIN RAIL, NARROW GAUGE, SSLR-1) 

Saturday, February 16, 2013

अत्यंत गुणकारी है बेल का शरबत

गरमी की तपिश से बचने के लिए आपने बेल का शर्बत तो जरूर पिया होगा। इसकी तासीर ठंडी होती है। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंडी होती है इसलिए भगवान शिव को बेल और बेल के पत्ते अर्पित किए जाते हैं। 

पूरे देश में मिलता है बेल - सारे भारत में खासकर हिमालय की तराई मेंसूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 4 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल में फैला पाया जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। उष्ण कटिबंधीय फल बेल के वृक्ष हिमालय की तराईमध्य एवं दक्षिण भारत बिहारतथा बंगाल में घने जंगलों में अधिकता से पाए जाते हैं। चूर्ण आदि औषधीय प्रयोग में बेल का कच्चा फलमुरब्बे के लिए अधपक्का फल और शर्बत के लिए पका फल काम में लाया जाता है।


बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए । दोनों के गुण समान हैं। इसका संस्कृत नाम है बिल्व तो वनस्पति विज्ञान में इसका नाम इगल मार्मेलोज है। बिल्व (बेल) के बारे में कहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व ।अर्थात् रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। बेल के पत्तों से भगवान शिव की पूजा होती है।


कई तरह की बीमारियों में लाभकारी - बेल की पत्तियों को पीसकर उसके रस का दिन में दो बार सेवन करने से डायबिटीज की बीमारी में काफी राहत मिलती है। रक्ताल्पता में पके हुए सूखे बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर गर्म दूध में मिश्री के साथ एक चम्मच पावडर प्रतिदिन देने से शरीर में नया रक्त बनता है

गैस्ट्रोएण्टेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोपो (महामारी) में अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है । विषाणु को परास्त करने की इसमें क्षमता है। कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेण्ट) होता है। यह टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है। पुरानी पेचिसअल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। बेल में म्यूसिलेज की मात्रा अधिक होती है। यह डायरिया के तुरंत बाद वह घावों को भरकर आंतों को स्वस्थ बनाने में समर्थ है। मल संचित नहीं हो पाता और आंतें कमजोर होने से बच जाती हैं।

होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं। खूनी बवासीर व पुरानी पेचिश में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । अलग-अलग पोटेन्सी में बिल्व टिंक्चर का प्रयोग कर आशातीत लाभ देखे गए हैं। यूनानी मतानुसार इसका नाम है- सफरजले हिन्द। यह दूसरे दर्जे में सर्द और तीसरे में खुश्क है।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य 
( बेल, श्रीफल, AEGLE MARMELOS, JUICE  ) 

Thursday, February 14, 2013

महेंद्र कपूर - अभी अलविदा न कहो दोस्तो....


महेंद्र कपूर नहीं रहे, क्या वे सचमुच नहीं रहे। भला एक गायक की भी कभी मौत होती है, वह तो अपने स्वर से पूरा दुनिया को आवाज दे जाता है। भले उसका शरीर जीवित नहीं होता, लेकिन उसकी आवाज तो फिजाओं में हमेशा गूंजती रहती है। आज वारिस सुनाए कहानी...ए दुनिया तू याद रखना....जी हां महेंद्र कपूर को भी हम नहीं भूला सकते।

कुछ लोग महेंद्र कपूर को देशभक्ति गीतों को स्वर देने वाला मानते हैं। मेरे देश की धरती सोना उगले....के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। उन्होंने है प्रीत जहां की रीत सदा...जैसे गीत गाए।


मुझे महेंद्र कपूर का एक साक्षात्कार करने का मौका मिला था। पिछले दो दशक से वे यूं तो हिंदी फिल्मों में बहुत कम गा रहे थे। पर बात 1997 की है, वे अपने बेटे रोहन कपूर का एक शो आवाज की दुनिया के प्रोमोशन सिलसिले में दिल्ली आए थे। संसद मार्ग स्थित  पार्क होटल में मुलाकात हुई। शो के होस्ट रोहन थे, इसलिए मुझे महेंद्र कपूर से बातें करने का मौका मिल गया सो तफ्शील से बातें की। लगभग एक घंटे। तब मीडिया में नवागंतुक पत्रकार था। मेरे लिए महेंद्र कपूर का साक्षात्कार करना एक बड़ा अनुभव था। लिहाजा मैंने बहुत सी बातें उनसे पूछ ही डालीं।

रोमांटिक गीत ज्यादा गाए

महेंद्र कपूर ने बताया था कि बार बार लोग कहते हैं कि मैंने देशभक्ति गीत ज्यादा गाए हैं, पर मेरे रोमांटिक गीतों की लिस्ट ज्यादा लंबी है। तो देखिए बानगी...

...हुश्न चला है इश्क से मिलने गजब की बदली छाई.... 

आधा है चंद्रमा रात आधी रह न जाए तेरी मेरी बात आधी

नीले गगन के तले धऱती का प्यार फले

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं वफा कर रहा हूं वफा चाहता हूं (धूल का फूल)

किसी पत्थर की मूरत से....

मेरा प्यार वो है....( ये रात फिर ना आएगी)

तेरे प्यार की तमन्ना....

तुम अगर साथ देने का वादा करो मैं यूं हीं मस्त नगमें.... (हमराज) 

ऐसे न जाने कितने गीत हैं जो प्यार करने वाले लोगों की जुबां पर हमेशा थिरकते रहते हैं। पर महेंद्र कपूर को इस बात का भी कत्तई मलाल नहीं था कि उन्हें लोग देशभक्ति गीतों के चीतेरे के रूप में जाने।

म्यूजिक कंप्टिशन की देन थे...

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को गायक महेंद्र कपूर एक म्यूजिक कंप्टिशन की देन थे। जैसे आज के दौर में श्रेया घोषाल या सुनिधि चौहान। उस दौर में टीवी नहीं था। ऐसे म्यूजिक कंप्टिशन बहुत कम होते थे। पर महेंद्र कपूर को मोहम्मद रफी जैसे लोगों ने बहुत प्रोमोट किया था।
सबस बडी बात कि महेंद्र कपूर को पर शुरुआती दौर में भी किसी गायक की नकल का आरोप नहीं लगा जैसा कि रफी साहब और मुकेश पर कुंदनलाल सहगल की नकल का आरोप लगता है। पर महेंद्र कपूर उसी पंजाब से आए थे जिस पंजाब ने हमें कुंदन लाल सहगल और मोहम्मद रफी जैसे सूरमा दिए। महेंद्र कपूर का खानदानी बिजनेस था जरी के काम का जिससे वे गायकी के साथ आजीवन जुड़े रहे।

जब फिल्मों में तेज बीट वाले गीत आने लगे तब महेंद्र कपूर अत्याधिक चयनशील हो गए थे। उन्होंने बीआर चोपड़ा की सुपर हिट फिल्म निकाह के गीतों को स्वर दिया जिसके लिए उन्हें खूब याद किया जाता है। ....अभी अलविदा न कहो दोस्तों न जाने फिर कहां मुलाकात होगी....बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी। ख्वाबों में ही हो चाहे मुलाकात तो होगी....

भोजपुरी फिल्मों में भी गीत गाए...

हिंदी पंजाबी के अलावा महेंद्र कपूर ने भोजपुरी फिल्मों के लिए भी खूब गीत गाए...भोजपुरी की सुपर डुपर हिट फिल्म बिदेशिया में उनका गीत...हंसी हंसी पनवा खिववले बेइमनवा....एक विरह का गीत था...जिसको भोजपुरी संगीत के सुधी श्रोता कभी नहीं भूल पाएंगे। जब इंटरव्यू के दौरान मैंने महेंद्र कपूर से एक भोजपुरी गीत गुनगुनाने को कहा तो उन्होंने यही गीत मुझे गुनगुना कर सुना दिया।
( महेंद्र कपूर 9 जनवरी 1937 - 27 दिसंबर 2008 ) 

पटना  शहर से  खास लगाव -    महेंद्र कपूर को पटना शहर से खास लगाव था। वे दुर्गा पूजा के आसपास होने वाले संगीत समारोहों में कई बार पटना जाकर मंच पर गा चुके थे। वहां के श्रोताओं की वे खूब तारीफ करते थे। बीआर चोपड़ा की तो खास पसंद थे महेंद्र कपूर। उनकी कई फिल्मों में स्वर तो दिया ही था....टीवी पर जब महाभारत धारावाहिक बना तो उसका टाइटिल गीत....जी हां....सीख हम बीते युगों से नए युग का करें स्वागत....जी हां महेंद्र कपूर साहब नया युग आपको हमेशा याद रखेगा। कभी नहीं भूलेगा।
महेंद्र कपूर का जन्म 9 जनवरी 1937 को हुआ था, 27  दिसंबर 2008 को उन्होंने आखिरी सांस ली।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 


( MAHENDRA KAPUR, DELHI, BIHAR, BHOJPURI  ) 

Tuesday, February 12, 2013

सुरेश वाडेकर के गीतों की एक यादगार शाम

मालवीय जयंती पर गीत पेश करते सुरेश वाडेकर।
दिसंबर की एक सर्द शाम। कमानी आडोटिरयम। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती पर बीएचयू के पूर्व छात्रों का जमावड़ा। महामना की 150वीं जयंती के मौके पर हर साल की तरह दिल्ली में पूर्व छात्रों का जुटान हुआ। युवा और बुजुर्ग सभी एक साथ। इस शाम को सुरमई बनाया बालीवुड के जाने माने पार्श्व गायक सुरेश वाडेकर ने। सुरेश वाडेकर ने मंच पर आते ही सीने में जलन सी क्यूं है...आंखों में तूफान सा क्यूं है गाना शुरू किया तो हर उम्र के लोग संजीदा हो गए। इस सिलसिले में सुरेश वाडेकर ने अपना एक और लोकप्रिय गीत – ए जिदंगी गले लगा ले पेश किया। इस गीत में उनका साथ दिया उनकी पत्नी रत्ना ने।

सुरेश वाडेकर और उनकी पत्नी रत्ना ( 25 दिस 2011)
लेकिन राजकपूर जैसे निर्माता के विशेष पसंद सुरेश वाडेकर ने श्रोताओं की विशेष मांग पर प्रेमरोग फिल्म का गीत - मैं हूं प्रेम रोगी भी पेश किया। इस पर पर सार हॉल झूम उठा। इसके बाद राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते....हुश्न पहाड़ों का क्या कहना की बारहों महीने यहां मौसम जाड़ों का...., मैं देर करता नहीं देर हो जाती है....( फिल्म – हीना ) पेश किया। ये सभी गीत राजकपूर की फिल्मों से थे। एक बार फिर घड़ी थी संजीदा होने की...लगी आज सावन की फिर वो घड़ी है....( फिल्म- चांदनी ) के गीत के साथ। लेकिन सुरेश वाडेकर और इस दिल में क्या रखा है....बस तेरा ही प्यार छुपा रखा है...मेघा रे मेघा रे मत परदेश जा रे जैसे गीत पेश किए। युगल गीतों में सुरेश वाडेकर का साथ दिया उनकी पत्नी रत्ना ने। सुरेश वाडेकर के गीतों पर संगीत की धुन में साथ दे रहे थे दिल्ली के जाने माने सुर साधक पंडित ज्वाला प्रसाद जी को बांसुरी पर थे अजय प्रसन्ना।
कुल मिलाकर एक ऐसी शाम रही जो श्रोताओं को लंबे समय तक याद रहेगी। अपने गीतों के दौरान सुरेश वाडेकर आज के दौर में लिखे जा रहे डिंका चीका.. टाइप के गानों से काफी खफा दीखे। बकौल सुरेश वे ऐसे गीतों में खुद को फीट नहीं पाते। 
 (  25 दिसंबर 2011 )
-         विद्युत प्रकाश मौर्य 

( BHU, SURESH WADEKAR, DELHI, VARANASI, OLD STUDENT MEET ) 

Sunday, February 10, 2013

बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए...अटरिया सुनी पड़ी...

कई साल पुराने कई दोस्त एक साथ मिल जाएं तो अनुभव कितना सुखद हो सकता है, इसे सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है। दिल्ली की एक सर्द भरी शाम में ऐसे ही कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हो गई। मौका था 25 दिसंबर 2010 को मालवीय जयंती का। वैसे तो मालवीय जयंती हर साल मनाई जाती है। लेकिन दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर नव निर्मित मालवीय स्मृति भवन में इस बार मेरे बैच के कई दोस्तों ने तय किया कि हमलोग आयोजन में पहुंचने की कोशिश करेंगे। तो 1993 बैच के स्नातक और 1995 बैच के एमए के कई साथ मिल गए इस मौके पर। संजीव गुप्ता, राजेश गुप्ता बंधु तो कई सालों से दिल्ली में हैं।  अमिताभ चतुर्वेदी, गाजियाबाद, शक्तिशरण सिंह, उत्तम कुमार, ज्ञान प्रकाश, अमित कौशिक का एक साथ मिल जाना महज संयोग ही था। बीएचयू एलुमिनी एशोसिएशन में सक्रिय रोहित सिन्हा जो दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं हमारे समकालीन ही हैं। आदर्श सिंह, ( जनसत्ता में कार्यरत ) और हरिकेश बहादुर (दूरदर्शन ) और चंदन कुमार पहुंच नहीं सके। लेकिन सबसे सुखद रहा अलख निरंजन से मिलना। मनोविज्ञान के साथी अलख इन दिनों अरूणाचल प्रदेश खोन्सा में एक आवासीय विद्यालय चला रहे हैं। वे अपनी पत्नी और नन्ही सी बिटिया के साथ थे। दक्षिण भारत दौरे से लौटे अलख अपने दोस्तों से मुलाकात के लिए ही दिल्ली में रूक गए थे।

मालिनी अवस्थी ने बहाई सुर सरिता....  
इस बार के हुए कार्यक्रम में लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने सुरों की धार बहाई।
अब थोड़ी सी बात मालिनी के गीतों की कर लें तो मालिनी जी की स्टेज परफारमेंस बड़ा ही रोचक, मनभावन और नाट्य प्रस्तुति लिए होता है। उन्हें टीवी पर सुनना और लाइव सुनना दोनो ही अलग अलग अनुभूति है। गिराजा देवी की शिष्या मालिनी अपने ट्रूप के साथ आई थीं। ईश वंदना के बाद उन्होने सोहर पेश किया। इस मौके पर सोहर का इतिहास और उसकी बारिकियां भी बताती गईं। उनकी दूसरी प्रस्तुति मां शारदे का गीत था। और फूट पड़ी बनारस की कजरी...मिर्जापुर कइल गुलजार कचौड़ी गली सुन कईल बलमू....इस कजरी की रचयिता गौहर जान की कहानी भी मालिनी जी ने साथ साथ सुनाई....
और पुराना लोकगीत...बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए...अटरिया सुनी पड़ी...( दूर कोई गाए धुन ये सुनाए....तेरे बिन छलिया रे...ये फिल्मी गीत इसी धुन पर है)  इसके बाद रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे.....तो सुरों की गंगा बहती रही घंटो... मालिनी गिरिजा देवी की शिष्या हैं जिनका संबंध वाराणसी से है।
इसके साथ ही मालवीय स्मृति भवन में सभी पूर्व छात्रों के लिए भोजन का भी उम्दा प्रबंध था। सबसे पुराने एलुमनी डा. पन्ना लाल जायसवाल, एल एंड टी में कार्यरत आईटी बीएचयू के एलुमनी शक्तिधर सुमन की मेहनत आयोजन में साथ झलक रही थी....

- विद्युत प्रकाश ( MA BHU, 1993-95 .  25 दिसंबर 2010 )

( DELHI, MALVIYA BHAWAN, DDU MARG, BHU, OLD STUDENT MEET, VARANASI  )