Monday, October 23, 2017

हवाई यात्रा के दौरान बरतें ये सावधानियां

एक शहर से दूसरे शहर में जल्दी पहुंचने के लिए हवाई यात्रा अच्छा विकल्प है। भारतीय आसमान में कई निजी विमानन कंपनियों के आने से हवाई यात्रा मध्यम वर्ग के जेब के अनुकूल हो गई है। पर अगर आप कहीं हवाई यात्रा पर जा रहे हैं तो कुछ सावधानियां बरते तों यात्रा सुगम और सुरक्षित होगी।

-    उड़ान के समय से कम से कम डेढ़ घंटे पहले एयरपोर्ट पर जरूर पहुंच जाएं, जिससे आपको बोर्डिंग पास प्राप्त करने और सुरक्षा जांच में शामिल होने में आसानी हो।

-    अगर आपने ऑनलाइन टिकट खरीदा है तो बोर्डिग पास भी यात्रा शुरू करने से 48 घंटे पहले ऑनलाइन ही निकाल सकते हैं। इससे एयरपोर्ट पर बोर्डिंग पास बनवाने में लगने वाला समय बच जाएगा।

-    कई विमानन कंपनियां टिकट बुक करने के बाद आपको मनचाही सीट चुनने का विकल्प भी देती हैं। इसका लाभ उठाएं। घर बैठे विमानन कंपनी की वेबसाइट पर जाकर अपनी मनचाही सीट चुन लें।

-    आपके साथ जितने भी यात्री सफर कर रहे हों उन सभी का कोई सरकार द्वारा जारी परिचय पत्र साथ लेकर चलें। रेलयात्रा में किसी एक का पर हवाई यात्रा में सभी का परिचय पत्र होना जरूरी है।

-    नाम की जांच कर लें – यह सुनिश्चित कर लें कि आपके टिकट पर छपा हुआ नाम और आपके पहचान के परिचय पत्र पर छपा हुआ नाम बिल्कुल एक जैसा ही हो। नाम में अंतर होने पर परेशानी पेश आ सकती है।

-    हवाई यात्रा के दौरान अपने बैग में शेविंग ब्लेड, कैंची, चाकू आदि सामान नहीं रखें। किसी भी तरह का हथियार तो बिल्कुल ही प्रतिबंधित रहता है।   
-    अगर आप नियमित तौर पर दवाएं लेते हैं तो अपनी दवाएं हैंडबैग में ही रखें। उसे स्टोर में जाने वाले लगेज के साथ नहीं जमा कराएं।

-    ज्यादातर विमानन कंपनियां 7 किलो तक का सामान (बैग) केबिन में साथ ले जाने की अनुमति देती हैं। साथ ही 15 किलो सामान सूटकेस में ले जा सकते हैं जिसे लगेज स्टोर में जमा कराना पड़ता है। अपने सूटकेस को लॉक रखें और अपने नाम की पर्ची भी लगाकर रखें। यात्रा खत्म होने के बाद उदघोषणा सुनें और जिस हैंगर पर आपका सामान आने वाला हो वहां उसे प्राप्त करने के लिए तत्पर रहें। कई बार लोग दूसरे का सामान लेकर भी चले जाते हैं। तो कई बार लोग लापरवाही में अपना सामान छोड़कर बाहर निकल जाते हैं।

-    कई संवेदनशील एयरपोर्ट पर फोटोग्राफी की मनाही रहती है। इसका ख्याल रखें। श्रीनगर, पोर्ट ब्लेयर जैसे एयरपोर्ट पर आंतरिक फोटोग्राफी निषेधित है।

- मोबाइल चार्च करने के लिए पावर बैंक लेकर यात्रा कर रहे हैं तो उसे आप अपने केबिन बैग या हैंड बैग में ही रखें, उसे कभी भी स्टोर मे जाने वाले लगेज के साथ नहीं रखें। आग लगने की घटनाओं के कारण ऐसा करने से मनाही की जाती है। 
 - vidyutp@gmail.com


( AIR TRAVEL, FLIGHTS, BAG, POWER BANK ) 



Saturday, October 21, 2017

फिश स्पा दे आपके पांव को आराम

नन्ही नन्ही मछलियां इंसानों की कई मामले में दोस्त हो सकती हैं। आपने मछली के तेल की बात सुनी होगी जी हां काड लीवर आयल। पर नहीं मछलियां आपको पांव का पेडिक्योर भी करती हैं। इन खास मछलियों को डॉक्टर फिश या गारा रुफा के नाम से जाना जाता है। वास्तव में ये मछलियां दांत रहित होती हैं इसलिए ये पेडिक्योर करते समय काटती नहीं है। आजकल महानगरों के कई मॉल में इस तरह का फिश स्पा आप देख सकते हैं। जैसे ही आप पेडिक्योर के लिए अपने पांव पानी में डालते हैंबहुत सारी मछलियां आकर आपके पांव के चारों तरफ काटने लगती है। इस दौरान पांव में हल्की सी गुदगुदी होती है।

वास्तव में ये मछलियां फिश स्पा के दौरान आपके पांव के डेड स्किन को खा जाती हैं। फिश स्पार एक ऐसी प्रक्रिया हैजिसमें पर मछलियों का इस्तेवमाल पैरों से डेड स्किन को हटाने में किया जाता है। आम तौर पर पेडीक्योर में मृत त्वचा निकालने के लिए रेजर (ब्लेड) का प्रयोग किया जाता हैजबकि फिश पेडीक्योर में यह काम मछलियां कर देती हैं। यह एक किस्म का प्राकृतिक पेडिक्योडर है। इसके कई फायदे हैं।

चमकदार होंगे पांव -  यह पैरों से डेड स्किन हटा कर उनको चमकदार बनाता है। मछलियां पैर से बैक्टीहरिया और डेड स्किन खा जाती हैंजिससे पैरों की त्वचा पहले से निखर जाती है।



दर्द और तनाव से मुक्ति -  जब भी आप बहुत थक जाएं और अपने पैरों को आराम देना चाहेंतो तुरंत ही पास के फिश स्पा कराएंआपको आराम मिलेगा।

मन को शांति - जब पैरों को फिश टैंक में डाला जाता है और मछलियां उन पैरों पर हमला करके त्वचा को खाना शुरू कर देती हैं। इस दौरान मन को बहुत ही अच्छा महसूस होता है। यह सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि उसी समय हमारे दिमाग से इंडोर्फिन नामक रसायन निकलता है जो सुखद एहसास दिलाता है।

नई कोशिकाओं का जन्म - फिश टैंक में गर्रा रुफा नामक मछली है तो त्वचा को काफी लाभ होगा। यह मछली अपने मुंह से डिर्थनॉल नामक एंजाइमलार के रुप में निकालती है जिससे नई कोशिकाएं पैदा होती हैं।

पैर होंगे मुलायम - फिश स्पा यह न केवल पैरों को मुलायम बनाता हैबल्कि खुजली और दाग-धब्बों को भी दूर करता है। इससे शरीर में रक्त संचालन भी ठीक हो जाता है।



गर्रा रुफा मछली करती है फिश स्पा
स्पा में गर्रा रूफा नाम की मछली का इस्तेमाल एक चिकित्सा उपचार के रुप में किया जाता है।यह सिरोसिसमस्सा और कॉलयूसिस जैसे पैरों की बीमारियों को दूर करती है। 

सावधानियां – हमेशा अपने पैरों को अच्छी तरह साफ करके ही टैंक में दोनों पांव को डालें। इससे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पांव में इनफेक्शन नहीं पहुंचेगा। हमने गाजियाबाद के पेसफिक मॉल में गर्रा रुफा मछलियों द्वारा संचालित फिश स्पा सेंटर देखा। पर आप इस तरह के फिश स्पा सेंटर जगह जगह देख सकते हैं। तो कभी आजमा कर देखिए। 

 vidyutp@gmail.com
( GARRA RUFA, FISH SPA, PEDICURE  )


Thursday, October 19, 2017

दिल्ली में शाकाहारी थाली श्रीहरिशरणम की...

दिल्ली में कभी शाकाहारी थाली खाने की इच्छा हो तो श्री हरि शरणम का रुख करें। कहां है, और कहां पुरानी दिल्ली में। कश्मीरी गेट बस अड्डे के बिल्कुल पास। कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन के पास स्थित है हरि शरणम। ऐतिहासिक कश्मीरी गेट के सामने एक सुंदर, सुसज्जित शाकाहारी रेस्टोरेंट है श्री हरि शरणम। यह भोजनालय पहली मंजिल पर स्थित है। प्रबंधन का आवासीय होटल भी है।

सीढ़िया चढ़ते ही दो हाल हैं एक एसी और एक बैगेर एसी वाला। रेस्टोरेंट की सजावट काफी सुरुचि से की गई है। जगह कृष्ण से जुड़ी कथाएं और भगवान विष्णु की अराधना के मंत्र लिखे गए हैं। भोजनालय का प्रबंधन देख रहे गौरव जी का ग्राहकों के प्रति व्यवहार भी काफी अच्छा है।

तो हमने पहले दिन यहां पर आर्डर की 150 रुपये वाली शाकाहारी थाली। इसमें नान और लच्छा पराठा। बेहतरीन किस्म का पुलाव। जिसमें कई तरह के ड्राई फ्रूट डाले जाते हैं। रायता, दाल मखानी और मिक्स वेजिटेबल। हर सब्जी का स्वाद उम्दा है।

यहां की मारवाड़ी थाली का भी आनंद ले सकते हैं। दोनों थाली 150 रुपये की हैं पर उनका मीनू कुछ अलग अलग है। आपकी इच्छा है तो आप अलग अलग सामग्री का भी आर्डर कर सकते हैं। पर इनकी खास बात यहां के पराठे हैं। ये पराठे तवे वाले और तंदूर वाले दोनों ही तरह के हैं। पराठे के साथ रायता. चटनी आदि उसका स्वाद और भी बढ़ा देते हैं।
यहां पर दक्षिण भारतीय मसाला डोसा आदि का भी स्वाद ले सकते हैं। कश्मीरी गेट मेट्रो से होकर गुजरने वाले तमाम लोग जो शाकाहारी खाने के शौकीन हैं यहां पहुंचते रहते हैं।
 श्री हरिशरणम में पुरुषों के साथ महिलाएं भी वेटर के रुप में अपनी सेवाएं देती हैं। ये वर्दीधारी वेटर काफी अनुशासन में रहते हैं और ग्राहकों से सम्मान से पेश आते हैं। यहां आप सुबह से लेकर रात्रि 11 बजे तक भोजन का स्वाद ले सकते हैं।

हां, श्री हरिशरण में आपस कहीं बाहर से आए हैं तो रहने के लिए दरियाफ्त कर सकते हैं। यहां पर वातानुकूलित डारमेट्री महज 300 रुपये प्रतिदिन में उपलब्ध है। इसी प्रबंधन का एक होटल चांदनी चौक से आगे फतेहपुरी के पास भी है। वहां होटल क्राउन में भी शाकाहारी भोजनालय उपलब्ध है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com


(SHREE HARI SHARNAM, DELHI6, KASHMIRI GATE,  ) 


Tuesday, October 17, 2017

किला राय पिथौरा कभी कहलाता था लालकोट


दिल्ली के मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन के पास दिल्ली की एक प्राचीन विरासत है। यहां कम लोग पहुंचते हैं। पर इतिहास के पन्नों में इसका खास महत्व है। हम बात कर रहे हैं किला राय पिथौरा की। हालांकि अब किले के नाम पर यहा कुछ खास मौजूद नहीं है। पर यह हमें दिल्ली के स्वर्णिम अतीत की स्मृतियों में ले जाता है।
किला राय पिथौरा का निर्माण पृथ्वीराज चौहान ने कराया था। कुछ लोग उन्हें दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक के तौर पर देखते हैं। उन्हें राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता था। भारतीय इतिहास के पन्नों पर पृथ्वीराज चौहान का नाम मुस्लिम अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध की कथाओं के प्रसिद्ध नायक के रुप में है। किला राय पिथौरा के परिसर में घोड़े पर सवार पृथ्वीराज चौहान की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।
जहां अभी किला राय पिथौरा है वहां पहले लालकोट नामक प्राचीन नगर हुआ करता था। इसे तोमर वंश के राजाओं ने बसाया था। तोमर राजाअनंगपाल ने दिल्ली में संभवत पहला नियमित रक्षा संबंधी कार्य किया था। उनके नाम पर हरियाणा में फरीदाबाद के पास अनंगपुर नामक गांव है। अनंगपाल ने जो शहर बसाया उसे लालकोट नाम दिया गया था। 



लाल कोट अर्थात लाल रंग का किलाजो कि वर्तमान दिल्ली क्षेत्र का प्रथम निर्मित नगर था। इसकी स्थापना तोमर शासक राजा अनंगपाल द्वितीय ने 1060 में की थी। तोमर वंश ने दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में सूरजकुण्ड के पास से राजधानी बनाकर शासन किया। तोमरवंश का इतिहास 700 ईस्वी से आरम्भ होता है। फिर चौहान राजापृथ्वीराज चौहान ने 12वीं सदी में लालकोट को अपने अधिकार में ले लिया और उस नगर एवं किले का नाम किला राय पिथौरा रखा।

पृथ्वीराज चौहान ने 1191  में मुहम्मद गोरी को तराइन ( थानेशर, हरियाणा) के प्रथम युद्ध में हरा कर दिल्ली पर कब्जा किया था। इसके बाद पृथ्वीराज ने किला राय पिथौरा को विशाल नगर में तब्दील किया। लेकिन दिल्ली की तख्त पर चौहान का कब्जा ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाया। एक साल बाद 1192 में वह कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों हार गया और ये नगर मुस्लिम शासकों के कब्जे में आ गया।

राय पिथौरा के अवशेष अभी भी दिल्ली के साकेत,  महरौलीकिशनगढ़ और वसंत कुंज क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं। इस किले की प्राचीरों के खंडहर अभी भी कुतुब मीनार के आसपास के क्षेत्र में आंशिक रूप से देखे जा सकते हैं।
किला राय पिथौरा यानी लालकोट दिल्ली के सात प्राचीन नगरों में से एक है। इस किला में कुल 28 बुर्ज हुआ करते थे। इसके बुर्ज बिल्कुल नष्ट प्राय हो चुके हैं। अब इसमें किला के नाम पर कुछ बुर्ज और दीवारें ही बची हैं। इस किले में बुर्ज नंबर 15 सबसे बड़ा बुर्ज है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने इसका संरक्षण किया है।


आजकल महरौली बदरपुर रोड (एमबी रोड ) कुतुबमीनार से अधचीनी के बीच इस किले को काटती हुई जाती है। इस किले का विस्तार जितने हिस्से में था उसमें अब दक्षिण दिल्ली की तमाम नई नई कालोनियां बस चुकी हैं। इसलिए अब किले का पूरा घेरा अब पुनर्स्थापित करना मुश्किल है। पर इसमें किसी जमाने में कुल 13 दरवाजे हुआ करते थे।

दिल्ली के प्राचीन शहरों में से एक जहांपनाह की एक दीवार किला राय पिथौरा से मिलती है। इस दीवार को संरक्षित किया गया है। मुहम्मद बिन तुगलक ने सीरी और किला राय पिथौरा के बीच जहांपनाह नामक नगर बसाया था।

कैसे पहुंचे  आप मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद मालवीय नगर थाने की तरफ बढ़े। यानी साकेत मॉल की उल्टी तरफ गीतांजलि कालोनी के सामने किला राय पिथौरा का परिसर है। बस नंबर 680 और 534 किला राय पिथौरा से होकर गुजरती है। परिसर के अंदर एक सुंदर पैदल चलने के लिए ट्रैक बनाया गया है। बीचों बीच एक छोटा सा संग्रहालय और चित्र प्रदर्शनी है, जहां दिल्ली के इतिहास से रुबरू हुआ जा सकता है। इस इमारत के ऊपर ही पृथ्वीराज चौहान की प्रतिमा स्थापित की गई है।




06 मीटर चौड़ी दीवार हुआ करती थी किला राय पिथौरा की

18 मीटर तक ऊंचाई थी कई जगह किले की दीवार की

13 दरवाजे हुआ करते थे किला राय पिथौरा में प्रवेश के लिए। 




 -vidyutp@gmail.com  

( QUILA RAI PITHAURA, DELHI, LALKOT  ) 



Sunday, October 15, 2017

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे...

सन 1853 में भारत में जब मुंबई से थाणे के बीच पहली बार रेल चली तो यह एक आश्चर्यजनक घटना थी। पर अगले दो दशक में देश के कई हिस्सों में रेल की सिटी पहुंच गई। न सिर्फ लोग रेलगाड़ियों के सफर का आनंद ले रहे थे, बल्कि लोकगीतों और गीतों रेलगाड़ियों की चर्चा सुनने को मिली। हिंदी और भोजपुरी में कई गीत और कविताएं रेलगाड़ियों पर लिखी और गाई गईं। तो आइए कुछ गीतों की चर्चा करते हैं।
हिंदी के महान कवि वाराणसी के भारतेंदु हरिश्चंद्र ने रेलवे के बारे में कुछ इस तरह लिखा।
धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल, मानो जादू किहिस दिखाइस खेल... ( भारतेंदु हरिश्चंद्र)
पैसे लेके पास भगावे, ले भागे मोहि खेले खेल, का सखि साजन,  ना सखि रेल।
तो अब भोजपुरी का एक और लोकगीत सुनिए। इस गीत को लखनऊ की मशहूर लोक गायिकी मालिनी अवस्थी ने अपनी मधुर आवाज में की बार गाया है।

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे,
रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे ।


जौन टिकसवा से बलम मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें,
पानी बरसे टिकस गल जाए रे, रेलिया बैरन ।।


जौने सहरिया को बलमा मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें,
आगी लागै सहर जल जाए रे, रेलिया बैरन ।।


जौन सहबवा के सैंया मोरे नौकर, रे बलमा मोरे नौकर,
गोली दागै घायल कर जाए रे, रेलिया बैरन ।।


जौन सवतिया पे बलमा मोरे रीझे, रे सजना मोरे रीझें,
खाए धतूरा सवत बौराए रे, रेलिया बैरन ।।


और अब एक कवि कविता जो रेल गाड़ी के पैसेंजर ट्रेन में भीड़ का चित्रण करते हैं। क्या शानदार शब्द चित्र खींचा है - इलाहाबाद के चर्चित कवि कैलाश गौतम ने – अमवसा के मेला कविता में रेल गाड़ी में भीड़ का चित्रण करते हैं।
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गर्रा ओहर लोली लोला
 बिच्चे में हउवै सराफत से बोला
चपायल  केहूदबायल हौ केहू
 घंटन से उप्पर टंगायल  केहू
केहू हक्का-बक्काकेहू लाल-पीयर
केहू फनफनात हउवै कीरा के नीयर
 बप्पा रे बप्पा दइया रे दइया
तनी हमें आगे बढ़े देत्या भइया
मगर केहू दर से टसकलै  टसकै
टसकलै  टसकैमसकले  मसकै
छिड़ल हौ हिताई-नताई  चरचा
पढ़ाई लिखाईकमाई  चरचा
दरोगा  बदली करावत हौ केहू
 लग्गी से पानी पियावत हौ केहू
अमावास के मेला अमावस  मेला
इहइ हउवै भइया अमावस  मेला।

एक भोजपुरी फिल्म आई थी लागी नाही छूटे रामा. उसके के गीत में रेल गाड़ी की चर्चा कुछ इस तरह से शुरू होती है।
छुक छुक गाडी,  धदे पइसा, चल कलकत्ता (लाही नाही छुटे रामा )
एक युवा कवि की कविता सुनिए....
कविता - लोहे के गाड़ी लोहे के पटरीजाए के बा टाटा नगरी
बचपन में स्कूली कोर्स में एक कविता थी
रेल हमारी, लिए सवारी, काशी जी से आई है।
भोजपुरी के गीतकार उमाकांत वर्मा फिल्म पिया के प्यारी में एक गीत लिखते हैं – आइल तूफान मेल गड़िया हो साढे तीन बजे रतिया....

अगर हिंदी फिल्मों की बात करें तो इसके कई गीत रेलगाड़ियों के आसपास घूमते हैं। साल 1974 की फिल्म दोस्त का गीत सुनिए - गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है, चलना ही जिन्दगी है, चलती ही जा रही है...इसे गाया था बड़े भाव से किशोर कुमार ने। ये फिल्म दुलाल गुहा ने बनाई थी।

एक और फिल्मी गीत देखिए - छुक छुक छुक छुक रेल चली . चुनू मुनू आए तो ये खेल चली ( 1959 में बनी फिल्म सोने की चिड़िया का ये गीत बच्चों की लोरी की शैली में है।

अशोक कुमार की फिल्म आशीर्वाद ( 1968 ) में ये गीत देखिएगा – रेलगाड़ी रेलगाड़ी, रेलगाड़ी रेलगाड़ी, छुक छुक छुक छुक बीच वाले स्टेशन बोले रुक रुक रुक। इस गीत को अशोक कुमार ने खुद अपनी आवाज में ही गाया है। संगीतबद्ध किया था वसंत देसाई ने। गीत के लेखक थे हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय।  इस गीत की आगे की लाइनें सुनिए -  बीच वाले स्टेशन बोलें, रुक रुक रुक रुक , ब्रह्मपुर धरमपुर ब्रह्मपुर , मांडवा खंडवा , रायपुर जयपुर , तालेगांव मालेगांव , नेल्लोर वेल्लोरे, शोलापुर,कोल्हापुर , कुक्कल डिंडीगुल , मच्छलीपट्नम बींबलीपट्नम , ऊंगोल नंदीगुल , कॉरेगांव, गोरेगांव , ममदाबाद अमदाबाद अमदाबाद ममदाबाद, शोल्लुर कोन्नुर शोल्लुर कोन्नुर,  छुक छुक छुक छुक।
ये गीत पूरी तरह बच्चों का गीत था। इस गीत पर नन्हे मुन्ने बच्चों ने खूब मजा लिया है। क्या आपको भी कोई रेलगाड़ी वाला गाना या कोई कविता याद आती है तो बताइए ना।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( RAIL, MOVIE SONGS, POEMS, BHOJPURI ) 


Friday, October 13, 2017

शानदार 150 साल - दिल्ली का पुराना लोहे का पुल

आपकी रेलगाड़ी कई बार दिल्ली के पुराने लोहे के पुल से गुजरी होगी। आपको पता है कि यमुना नदी पर बना ये पुल सिर्फ दिल्ली का ही नहीं बल्कि देश के सबसे पुराने रेल पुल में से एक है। रेलवे के नंबरिंग के हिसाब से ब्रिज नंबर 249 इस पुल के पर यातायात चालू होने के बाद ही दिल्ली हावड़ा से जुड़ सका। यह एक रेल कम रोड ब्रिज है। यानी नीचे नीचे सड़क मार्ग और ऊपर ऊपर रेल।

इस पुल का निर्माण 1863 में आरंभ हुआ यानी 1857 की क्रांतिके छह साल बाद। पुल तीन साल में बनकर तैयार हो गया। 1866 में इस पर यातायात आरंभ हो गया। पहले यह सिंगल ट्रैक वाला पुल था पर 1913 में इसे डबल ट्रैक वाले रेल में पुल में बदला गया। इस पुल के निर्माण में 16 लाख 16 हजार 335 रुपये की कुल लागत आई थी। 1913 में डाउन लाइन बिछाने के लिए इसमें 12 स्पैन और दो एन्ड स्पैन जोड़े गए।

साल 2016 में दिल्ली के इस लोहा पुल ने अपनी सेवा के स्वर्णिम 150 साल पूरे किए। पर पुल का सड़क मार्ग और रेल मार्ग दुरुस्त है। इसपुल की खास बात है कि यह ऐतिहासिक लालकिला के बिल्कुल बगल में है। पुल पार करने के बाद ट्रेन तुरंत दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर जाती है। पुल के तरफ दिल्ली के जमुना बाजार का इलाका है। इसी तरह के लोहे के पुल दिल्ली हावड़ा मार्ग पर इलाहाबाद के नैनी में और पटना के पास कोईलवर में सोन नदी पर बनाए गए हैं।
अब दिल्ली में यमुना नदी पर कई नए सड़क पुल बन गए हैं पर अभी भी बड़ी संख्या में ट्रैफिक हर रोज पुराने लोहे के पुल से होकर गुजरता है। इसके सड़क मार्ग पर रिक्शे ठेले चलते नजर आते हैं जो होल सेल बाजार गांधीनगर और चांदनी चौक के बीच आवाजाही करते हैं। कभी कभी तो पुल पर जाम लगने के हालात बन आते हैं। पुराने लोहे के पुल ने दिल्ली के बसते हुए  देखा और आबादी का बोझ बढ़ते हुए देखा है।
बारिश के दिनों बंद करना पड़ता है - दिल्ली में हर साल बढ़ने वाले यमुना के जलस्तर का यह पुल साक्षी रहा है। 1978 में यमुना में सबसे बड़ी बाढ़ को देखा है, जब पानी खतरे के निसान से काफी ऊपर आ गया था। तब दिल्ली के कई इलाके डूब गए थे। हर साल यमुना का जल स्तर बढ़ने पर पुराने लोहे के पुल पर रेल यातायात एहतियात के तौर पर कुछ दिनों के लिए रोक दिया जाता है। पर बाढ़ से पुल को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 150 साल में इस पुल की कई बार मरम्मत की गई है। पर इसका सुपर स्ट्रक्टचर आज भी बेहतर है।
आसपास कई नए पुल बने- भारतीय रेलवे ने 1997-98 में इस पुल के बगल में ही एक नया रेलवे पुल बनाने की योजना बनी। 2003 में काम शुरू हुआ। पिलर डाल दिए गए पर पर्यावरण और ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के मुद्दे पर 2008 में काम रुक गया। नए पुल के राह में ऐतिहासिक सलीमगढ़ का किला आ रहा था। अब यह विवाद दूर हो गया है। पर जब तक नया पुल नहीं तैयार हो जाता यह पुराना लोहे का पुल अपनी सेवाएं बदस्तूर जारी रखेगा।
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( OLD YAMUNA BRIDGE, DELHI, RAIL ) 

Thursday, October 12, 2017

कई मामलों में अनूठी है गुरुग्राम की रैपिड मेट्रो

भारत के कई शहरों में मेट्रो रेल सेवा आरंभ हो चुकी है। पर महानगरों में कुछ रेल सेवाएं मेट्रो से थोड़ी अलग किस्म की भी हैं। जैसे मुंबई में मोनो रेल चलती है तो दिल्ली से सटे गुरुग्राम ( गुड़गांव) में रैपिड मेट्रो रेल सेवा चलती है। यह रैपिड रेल कई मामलों में अनूठी है। यह देश की एकमात्र निजी क्षेत्र में चलाई जाने वाली मेट्रो रेल सेवा है। गुरुग्राम में रैपिड मेट्रो दिल्ली मेट्रो के फीडर सिस्टम यानी सहयोगी की तरह काम करती है।


सिकंदरपुर में जुड़ती है दिल्ली मेट्रो से - गुरुग्राम की रैपिड रेल पूरी तरह एलिवेटेड ट्रैक पर चलनेवाली मेट्रो सेवा है। इससे आप मेट्रो के सिकंदरपुर स्टेशन से चलकर दिल्ली गुरुग्राम के बीच जा रही सड़क नेशनल हाईवे नंबर 8 तक पहुंच सकते हैं। वास्तव में यह दिल्ली के मेट्रो के नेटवर्क और गुड़गांव के साइबर सिटी के कुछ प्रमुख सेक्टरों को जोड़ने का काम करती है।

एक सर्किल में चलती रेल -  रैपिड मेट्रो वास्तव में एक सर्किल में चलती है। जहां से चलती है लौटकर वही पहुंच जाती है। कुल ट्रैक 11.7 किलोमीटर का है और कुल 11 स्टेशन हैं। ट्रैक चौड़ाई के लिहाज से स्टैंडर्ड गेज (1435 मिमी) के हैं। रैपिड मेट्रो गुरुग्राम के सेक्टर 55-56 स्टेशन से आरंभ होकर वहीं वापस आ जाती है। इसके रास्ते में साइबर सिटी, डीएलएफ फेज 2, डीएलएफ फेज 3, एनएच 8, गोल्फ कोर्स रोड के इलाके आते हैं। फिलहाल हर 4 मिनट के अंतर पर मेट्रो उपलब्ध रहती है। गुरुग्राम में रैपिड मेट्रो की शुरुआत 14 नवंबर 2013 में हुई। हालांकि दिल्ली एनसीआर में रहते हुए मुझे इसकी सवारी का मौका 2017 में मिला।

रैपिड मेट्रो का संचालन बाकी मेट्रो नेटवर्क से अलग है। यह निजी क्षेत्र की कंपनी के अधीन है। इसका संचालन इन्फ्रास्ट्रक्चर लिजिंग एंड फाइनेंसियल सर्विसेज लिमिटेड नामक कंपनी करती है। इसकी योजना साल 2008 में बनी थी।

रैपिड मेट्रो में कुल तीन डिब्बों का संयोजन है। अगर गति की बात करें तो यह दिल्ली मेट्रो की तुलना में काफी धीमी गति से चलती है। आमतौर पर यह 35 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है। हालांकि इसकी अधिकतम स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटा है। पर गुरुग्राम के साइबर सिटी के तमाम बड़े दफ्तरों और शापिंग मॉल्स से कनेक्टिविटी प्रदान करने के कारण इससे सफर करने वालों की अच्छी संख्या है। आपको अगर गुरुग्राम के एंबिएन्स मॉल और लीला होटल जाना हो तो रैपिड मेट्रो के मौलश्री गार्डन उतरना चाहिए।

दिल्ली मेट्रो का कार्ड मान्य - किराया की बात करें तो रैपिड मेट्रो का सफर दिल्ली मेट्रो से महंगा है। इसका न्यूनतम किराया भी मेट्रो के न्यूनतम किराया से ज्यादा है। पर अच्छी बात है कि इसमें दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड मान्य है। आप दिल्ली मेट्रो से रैपिड मेट्रो में सिकंदर पुर में चढ़ते हैं तो अलग से कोई टोकन लेने की कोई जरूरत नहीं है। वहीं आप दिल्ली मेट्रो के स्मार्ट कार्ड को रैपिड मेट्रो के स्टेशनों पर रिचार्ज करा सकते हैं।


21 अगस्त 2017 को रैपिड मेट्रो में एक अनूठा प्रयोग किया गया है। इसमें हुए कार्यक्रम में ट्रेन के अंदर लोगों ने योगासन किया। इस दौरान इंदिरापुरम के प्रमोद बिष्ट ने 30 मिनट 14 सेकंड तक सुनील तोमर ने 17 मिनट तक और पूजा ने 15 मिनट सेकंड तक शरीर का संतुलन बनाकर पलैंक चैलेंज का बखूबी प्रदर्शन किया। http://rapidmetrogurgaon.com/home/ ) 
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(RAPID METRO, GRUGRAM, DELHI METRO )