Thursday, August 24, 2017

पहाड़ों की रानी है मसूरी – क्विन ऑफ हिल स्टेशन्स

देहरादून शहर के बाहरी हिस्सों को पार करते हुए हमारी बस मसूरी की ओर बढ़ रही है। हमलोग राजापुर रोड से गुजर रहे हैं। कई सालों बाद मसूरी की ऊंचाई पर चढ़ने का एहसास खुशनुमा है। हालांकि 1993 की मसूरी यात्रा अब स्मृतियों में धूमिल हो गई है। बस लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकादमी की शाम की कुछ यादें हैं। देहरादून से मसूरी की दूरी कोई 40 किलोमीटर ही है। पर इस छोटी सी यात्रा में काफी कुछ बदल जाता है।  छुट्टी का दिन होने के कारण वाहनों की भारी भीड़ है। मसूरी शहर से 10 किलोमीटर पहले एक चेकपोस्ट आता  है। यहां सभी गाड़ियों को मसूरी में प्रवेश का टोल चुका कर आगे बढ़ना होता है। हमारी बस यहां रुकी। आप बाइक से जा रहे हैं तो भी टोल देना पड़ता है।
मसूरी की औसत ऊंचाई 1880 मीटर यानी 6170 फीट है। पर मसूरी की सबसे ऊंची चोटी लाल टिब्बा है जिसकी ऊंचाई 2255 मीटर यानी 7464 फीट है।

मसूरी में क्या देखें - मसूरी में देखने घूमने वाले स्थलों की बात करें तो मसूरी लेक,  मसूरी की मॉल रोड,  कैंप्टी फॉल, धनोल्टी और लाल टिब्बा प्रमुख स्थलों में शामिल किए जा सकते हैं। मसूरी कई सारे प्रसिद्ध स्कूलों के लिए जाना जाता है। रेलवे का ओक ग्रोव स्कूल यहां स्थित है। आईएएस का प्रशिक्षण पाने वालों की अकादमी लाल बहादुर शास्त्री नेशनल प्रशासनिक अकादमी भी यहीं मनोरम वातावरण में स्थित है।


जैसा कि आपको मालूम है कि देश के सारे प्रमुख हिल स्टेशन की खोज ब्रिटिश अधिकारियों ने की थी तो मसूरी की खोज भी ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी ले. फ्रेडरिक यंग ने की थी। तब से अब तक विदेशी सैलानियों को मसूरी काफी लुभाता है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड तो मसूरी के होकर ही रह गए। दशकों पहले उन्होंने अपना घर मसूरी में बना लिया। उनके लेखन में भी बार बार मसूरी नजर आता है। वे आज भी हर शनिवार को मसूरी की एक पुस्तक दुकान पर अपने पाठकों से मिलते हैं।


तो हमारी बस भारी जाम के बीच धीरे धीरे सरकती हुई मसूरी में प्रवेश कर रही थी। मसूरी शहर में हमारा पहला पड़ाव था मसूरी लेक। बस वाले ने बहुत मुश्किल से पार्किंग तलाश कर बस को पार्क किया। लेक के नाम पर कुछ खास नहीं है। छोटा सा पोखर है। किसी गांव के पोखर जैसा। पर यहां पर बोटिंग रंग बिरंगे कपड़ो में फोटो खिंचवाना और खाने पीने के कुछ होटल हैं। हां यहां क्रॉस द वैली का भी आनंद लिया जा सकता है। टिकट 300 से 500 रुपये का  है। बोटिंग की इच्छा नहीं थी, पर पेट में चूहे तो कूदने लगे थे, सो हमने बोट के पास एक होटल में पेट पूजा की। सौ रुपये की शाकाहारी थाली। हमलोग मसूरी लेक के बाद आगे बढ़े। बस स्टैंड नजर आया मसूरी का। यहीं पर एक मंदिर और एक गुरुद्वारा भी नजर आया। हां गुरुद्वारा में ठहरने का भी इंतजाम है। आप अगर सस्ते में ठहरना चाहते हैं तो मसूरी के इस गुरुद्वार में जाकर एकोमोडेशन के लिए आग्रह कर सकते हैं। मसूरी के चौराहे पर भारी भीड़ है। यहां भी गांधी जी की प्रतिमा दिखाई दे रही है। सामने मसूरी की ऐतिहासिक लाइब्रेरी बिल्डिंग है। पर हमारी मंजिल तो अभी आगे है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MUSSOORIE, UTTRAKHAND, LAKE, HILL STATION, LBSNAA ) 



Tuesday, August 22, 2017

फन वैली में थोड़ी सी मौज मस्ती

फन वैली रिजार्ट। यानी थोड़ी देर की मौज मस्ती। देहरादून से कई किलोमीटर पहले हरिद्वार देहरादून मार्ग पर दाहिनी तरफ फन वैली रिजार्ट बना है। चेन्नई और बेंगलुरू में ऐसे वाटर पार्क का हमलोग खूब मजा ले चुके हैं। हरिद्वार मसूरी बस पैकेज में फन वैली रिजार्ट पहला पड़ाव होता है। यहां पर बस वाले एक घंटे का समय देते हैं। यह फन वैली की मौज मस्ती के लिहाज से बहुत कम है। वैसे तो फन वैली का दिन भर का टिकट 700 रुपये का है। पर बस वालों से एक घंटे के लिए लिए जाते हैं 210 रुपये। इसमें 40 रुपये कमीशन के तौर पर बस वाले की जेब में जाता है।

हमलोग फन वैली का टिकट लेने उसके काउंटर पर पहुंचते हैं। पर यहां क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने पर 2 फीसदी अतिरिक्त की मांग की जाती है। मैं यह राशि देने से साफ इनकार करता हूं। मैं उन्हें कहता हूं देश की मोदी सरकार डिजिटल इंडिया को प्रोत्साहन दे रही है और आप केशलेस लेने पर अतिरिक्त वसूली कर रहे हैं। थोड़ी बकझक के बाद वे 2 फीसदी के बिना भुगतान लेने पर तैयार हो जाते हैं।   
हमलोग फनवैली के अंदर प्रवेश करते हैं। लगातार हल्की बारिश का दौर है। इस बारिश में सभी बिजली से चलने वाले झूले बंद कर दिए गए हैं। ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया है। उनमें बारिश में करंट आने का अंदेशा रहता है।

हमलोग फनवैली के अंदर प्रवेश करते हैं। लगातार हल्की बारिश का दौर है। इस बारिश में सभी बिजली से चलने वाले झूले बंद कर दिए गए हैं। ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया है। उनमें बारिश में करंट आने का अंदेशा रहता है।

अब बचा है वाटर पार्क का मजा लेना। तो उसके लिए स्विमिंग कास्ट्यूम किराये पर लेना जरूरी है। तो अनादि के लिए कास्ट्यूम किराए पर लिए गए। इसके बाद वे कूद पड़े स्विमिंग पुल में। हल्की बारिश लगातार जारी थी। यानी नीचे भी पानी और ऊपर से भी बरसता पानी। इन सबके बीछ छई छई छपाक छई। पार्श्व में बजते संगीत के बीच अनादि को पानी के इस खेल में पूरा मजा आ रहा था। एक बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा। पर उनका तो मन ही नहीं भर रहा था। हालांकि वे चेन्नई और बंगलूरु में वाटर पार्क का खूब मजा ले चुके थे। पर वे खूब धमचौकड़ी मचाते रहे।

फन वैली के वाटर गेम्स अच्छे हैं। यहां विविधता है। पर हमारे पास समय था केवल एक घंटे। और ये एक घंटे कितनी तेजी से पूरे हो गए पता भी नहीं चला। बहुत सारे गेम्स और झूले तो बाकी ही रह गए।खैर हमारी गाड़ी बुला रही थी। इसलिए ये फिर कभी सही। कहते हुए हमलोग बाहर निकले। बस के बाकी यात्री भी पहुंच चुके थे, और आगे का सफर शुरू हो गया। 
- vidyutp@gmail.com
( FUN VALLEY, DEHRADUN, WATER PARK )      

       

Sunday, August 20, 2017

हरिद्वार से मसूरी की यात्रा- पैकेज टूर से

सुबह के तीन बजे हैं। टैक्सी हमें हरिद्वार रेलवे स्टेशन के पास छोड़ देती है। हम विचार कर रहे हैं क्या करें अभी हर की पौड़ी की तरफ प्रस्थान करें या फिर थोड़ी देर यहीं बैठकर कर इंतजार करें। हम देख रहे हैं कि हरिद्वार रेलवे स्टेशन परिसर में और बाहर हर तरफ हजारों लोग सो रहे हैं। ये सभी लोग गंगा स्नान करने के लिए दूर-दूर से पहुंचे हैं। जून का महीना और शनिवार रविवार का दिन। इसलिए गंगा स्नान करने वालों की भीड़ कुछ ज्यादा ही है। तो  हमलोग भी स्टेशन के प्रतीक्षालय में अपने बैठने के लिए जगह बना लेते हैं। एक घंटा यहां गुजारने के दौरान दांतो की सफाई से भी निवृत हो लेते हैं।

हरिद्वार रेलवे स्टेशन का परिसर बड़ा जरूर है। पर यात्री सुविधाओं का अभी भी टोटा है। सवा चार बजे स्टेशन से निकलने के बाद एक दुकान पर बैठकर एक कप चाय। पैदल ही हर की पौड़ी की तरफ आगे बढ़ते हुए बंशी ट्रैवल्स का बोर्ड नजर आता है। सुबह सुबह हमलोग मसूरी के लिए जाने वाली बस में दो सीटें बुक कर लेते हैं। 280 रुपये प्रति सवारी। बस आठ बजे जाएगी। हमारे पास तीन घंटे का वक्त है। तो चलें गंगा नहाने। 

हरिद्वार के पंडा कैलाश भट्ट जी के साथ। 
सुबह 5 बजे हर की पौड़ी श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा हुआ है। हम अपने पुराने परिचित पंडा कैलाश भट्ट का ढूंढते हैं। वे सात नंबर बूथ में बैठते हैं। वे हमारे दैनिक जागरण लुधियाना के दिनों के साथी कमलेश भट्ट के चचेरे भाई हैं। उनके पास बैग रखकर हमलोग गंगा मइया में डूबकी लगाने चल पड़ते हैं। इससे पहले अनादि ने 2010 में हरकी पौड़ी में गंगा में संक्षिप्त डूबकी लगाई थी। पर इस बार विस्तार से। गंगा स्नान के बाद थोड़ी सी पूजा। फिर पेट पूजा के लिए हरिद्वार की गलियों में एक बार फिर पंडित जी पूरी वाले की दुकान पर।


मसूरी यानी क्वीन ऑफ हिल्स. पहाड़ों की रानी। देहरादून से 40 किलोमीटर आगे मसूरी में लोग कुछ दिन गुजारने जाते हैं। पर मसूरी सिर्फ घूमने पर जाना हो तो एक सस्ता तरीका है। हरिद्वार से मसूरी का एक दिन का टूर पैकेज। रोज सुबह कुछ बसें आठ बजे निकलती हैं और मसूरी घूमा कर देर रात हरिद्वार वापस लौट आती हैं। इस पैकेज में मसूरी और रास्ते के कुछ विंदू तय हैं जिन्हे घूमाने का दावा ये बस सेवाएं करती हैं। ऐसी ही एक बस में हम सवार होने वाले हैं। ये बसें लालतरौं पुल के उस पार गड्ढा पार्किंग से चलती हैं।

यात्रा से पहले थोड़ी पेट पूजा 
वहां पहुंचने पर बस एजेंट ने कहा, अगर 50 रुपये और दें तो 2 बाई 2 बस मिलेगी। हम अब 330 रुपये प्रति सीट देकर 2 बाई 2 वाली बस में सवार हो जाते हैं।

हमारी बस चल पड़ती है पर हरिद्वार बाईपास पर भारी जाम लगा है। बस रास्ते में भीमगोडा और शांतिकुंज से भी कुछ सवारियां उठाती है। हमारे बस में उन्नाव का एक परिवार जिसमें अनादि के उम्र की कई लड़कियां हैं तो कुछ खाते पीते घर की सुर्ख लिपिस्टिक से लैस पंजाबी महिलाएं भी विराजमान हो चुकी हैं। मोतीचूर और राईवाला के जंगल को पार कर बस देहरादून की ओर चढ़ने लगी है। हल्की बारिश शुरू हो चुकी है। 1993 के बाद 2017 में मैं मसूरी की दूसरी यात्रा पर हूं। देहरादून से पहले हमारा पहला पड़ाव आ चुका है। फन वैली रिजार्ट।    

       - vidyutp@gmail.com 

(HARIDWAR, UTTRAKHAND, BUS TRIP TO MUSSORIE ) 

Friday, August 18, 2017

हर घर में टायलेट बनवाओ, पर बरजोरी तो मत करो

देश भर में घर घर में टायलेट हो जिससे कि लोगों को शौच के लिए खुले में नहीं जाना पड़े, इसके लिए सरकारी अभियान कई सालों से चलाया रहा है। पर अगस्त 2017 में इसी विषय पर एक फिल्म आ गई है टॉयलेट एक प्रेम कथा। कहानी का प्लाट ये है कि घर में टॉयलेट नहीं होने पर दुल्हन ससुराल में रहने से इनकार कर देती है। इस तरह की खबरें अखबारों में कई बार आई थीं, इसी से प्रेरित होकर अक्षय कुमार की इस फिल्म का तानाबना बुना गया है। फिल्म मनोरजंन के साथ हर घर में शौचालय बनवाने का संदेश भी देती है।

यह सही भी है कि हर समर्थ आदमी को अपने घर में टायलेट बनवाना ही चाहिए। पर शौचालय बनवाने के सरकारी अभियान को देखिए। सरकार चाहती है कि देश के सभी राज्य सभी जिले खुले में शौच से मुक्त हो जाएं। इसके लिए जिलाधिकारी अभियान चला रहे हैं। स्कूलों के शिक्षकों की मदद ली जा रही है। अभियान प्रेरणा के बल पर चले  सरकारी सहयोग के बल पर चले यहां तक तो ठीक पर है। कई जगह ये अभियान डंडे के बल पर चलाने की कोशिश की जा रही है।

बिहार के कुछ जिलों की बानगी लिजिए। प्रावधान है कि गांव का कोई व्यक्ति खुले में शौच करता पाया गया तो पंचायत उस पर जुर्माना कर सकती है। पुलिस में शिकायत की जा सकती है। सजा का प्रावधान तो नहीं है, पर उस व्यक्ति की फोटो थाने में लगाकर उसे अपमानित किया जा सकता है। मान लिजिए आप एक गांव से दूसरे गांव जा रहे हैं। रास्ते में कई किलोमीटर तक शौचालय नहीं है। आपको शौच का दबाव आया तो आप क्या करेंगे। खुले में निपटेंगे तो वालंटियर बने मास्टर जी आपकी फोटो खींच लेंगे और इस फोटो से सजा दिलाने का काम करेंगे। बिहार में तो एक बार ऐसा हुआ कि वालंटियर बने मास्टर जी को ही राह चलते शौच आ गया। उन मास्टर जी की फोटो दूसरे लोगों ने ले ली। बेचारे मास्टर जी की बहुत फजीहत हुई।

फजीहत की कहानी इतनी ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों से खबर आई कि अधिकारी लोग सुबह सुबह गांव के बाहर डंडा लेकर पहरा देंगे, जो खुले में लोटा लेकर शौच करने आएगा उसे धमकाया जाएगा। वापस भेज दिया जाएगा। अरे खुले में शौच मुक्ति अभियान चलाओ पर इस तरह जोर जबरदस्ती तो मत करवाओ। अधिकारी और स्कूल शिक्षक अपना असली काम छोड़कर इसी में लगे हुए हैं। सामाजिक तौर पर खुले में शौच मुक्ति का अभियान लंबे समय से चल रहा है। डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक की अगुवाई में सुलभ इंटरनेशनल तो चार दशक से इस अभियान में लगा हुआ है।

मैं 2014 के मार्च में अपने गांव गया था। बिहार के रोहतास जिले का छोटा सा गांव सोहवलिया। सरकारी योजना का लाभ उठाकर हर घर ने शौचालय बनवा लिया था। अब कोई खुले नहीं जाता निपटारा करने। साल 2017 में हमारा प्रखंड करगहर ओडीएफ यानी खुले में शौच मुक्त ब्लॉक घोषित हो गया है। इसमें हमारे भ्राताश्री और मध्य विद्यालय बिलारी के प्राधानाध्यापक अरविंद कुमार मेहता का भी सराहनीय प्रयास रहा है। कई गांवों में जाकर उन्होंने लोगों को प्रेरित करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। 

हालांकि हम बचपन में खुले में ही जाते थे। तब दादा जी कहते थे अपने खेत में ही जाना। क्योंकि आपका शौच बाद में खाद बन जाता है। तो खाद दूसरों के खेत में क्यों डालना।
पर जरा देश की करोड़ों वैसी आबादी के बारे में सोचिए जिसके पास रहने के लिए एक छत तक नहीं है तो वह शौचालय कैसे बनवा लेगा। एक सरकार के तौर पर अगर हम लोगों के लिए दानापानी का इंतजाम करने में सक्षम हो जाएं, और रहने  के लिए एक अदद आशियाना देने की गारंटी कर दें फिर शौचालय की अनिवार्यता की बात कर सकते हैं। पर अभी तो दानापानी और एक अदद झोपड़ी के लिए भी अभी सालों चलना होगा इस देश में।

बेंगलुरु के बसवनगुडी में बना ई टायलेंट 
पहले दिल्ली को ओडीएफ तो बनाइए - बात खुले में शौच की करें तो देश के सुदूर गांव से ज्यादा बुरी हालात दिल्ली की है। यहां जब आप सुबह सुबह रेल से पहुंचते हैं तो रेलवे पटरियों के किनारे हजारों लोग खुले में निपटान करते नजर आते हैं। चुनौती बड़ी ये है कि पहले दिल्ली को खुले में शौच से मुक्त बना लिया जाए उसके बाद गांव के बारे में सोचा जाए। दिल्ली में आबादी का घनत्व ज्यादा है इसलिए शौच जनित बीमारियों का खतरा यहां ज्यादा है। वैसे टॉयलेट – एक प्रेम कथा के बहाने इस मुद्दे को चर्चा का केंद्र बनाने के लिए निर्माताओं का शुकराना।
- vidyutp@gmail.com  

( TOILET EK PREM KATHA, OPEN DEFECATION FREE VILLAGE, SWACHH BHARAT MISSION ) 



Wednesday, August 16, 2017

दिल्ली से हरिद्वार मार्ग पर ढाबों की लूट से सावधान रहें

बरला ( मुजफ्फरनगर) में शिवा टूरिस्ट ढाबा पर रात को 2 बजे। 
दिल्ली से हरिद्वार। कई बार जा चुका हूं। एक बार फिर बेटे के अनादि के साथ निकल पड़ा। रात्रि भोजन के बाद हमलोग पहुंचे मोहन नगर चौराहे पर। हरिद्वार के लिए बस का इंतजार है। शनिवार है, लोगों की काफी भीड़ है। तभी एक एसयूवी मिली। वे हरिद्वार जा रहे हैं। दो सौ रुपये प्रति सवारी। हमने आगे की दो सीट ले ली। मेरठ बाइपास पार करने के बाद मुजफ्फरनगर शहर को पार किया। टैक्सी उत्तराखंड में प्रवेश करने से पहले बरला में एक ढाबे पर रुकी। बरला के ढाबे का नाम है शिवा टूरिस्ट ढाबा। दिल्ली से हरिद्वार मार्ग पर मैं किसी ऐसे ढाबे पर रात में रुका हूं जहां कोई ठगी नहीं है। मीनू कार्ड पर रेट लिखे हैं। वातानूकुलित हॉल भी उपलब्ध है। टायलेट बड़े और साफ सुथरे हैं। इस्तेमाल के लिए कोई शुल्क नहीं है।

हम घर से पेट पूजा करके चले थे इसलिए खाना तो नहीं लिया, रात के एक बजे काफी लोग खा-पी रहे थे। यहां पर दिल्ली से हरिद्वार जाने वाली एक तीर्थ यात्रा समूह की बस भी रुकी है।

खतौली के ढाबों में लूटपाट
मुझे कुछ दिन पहले की हरिद्वार से लौटने वाली यात्राएं याद आईं। ज्यादातर यूपी और उत्तराखंड रोडवेज की बसें खतौली बाईपास के पास ढाबे पर दिन रात में खाने के लिए रुकती हैं। ये ढाबे लूट के अड्डा हैं। यहां पर कोई मीनू कार्ड नहीं होता। आपसे बिना पूछे हुए आपकी थाली में कुछ भी रख दिया जाता है। फिर 60 रुपये की थाली के वसूले जाते हैं 225 रुपये। मजबूर ग्राहक अपनी जेब ढीली करता है और खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। जो लोग बार बार जाते हुए इस लूट से वाकिफ हो गए हैं वे तो यहां कुछ खाते पीते ही नहीं। ऐसी लूट का मैं खुद शिकार हुआ हूं और अपने साथ लोगों को शिकार होते देखा है।
इसके बाद मैंने यूपी की योगी सरकार के परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को शिकायत की। मेरा मानना है कि जो ढाबे यूपी रोडवेज द्वारा अनुबंधित हैं। वहां पर खाने पीने की दरें प्रकाशित होनी चाहिए। मीनू कार्ड पर और साइनबोर्ड पर भी। हालांकि लगातार सक्रियता दिखानेवाले मंत्री जी ने शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया और लूटपाट बदस्तूर जारी है।
हरियाणा पंजाब के हाईवे पर भी ठगी - खाने पीने में इस तरह की ठगी न सिर्फ दिल्ली हरिद्वार बल्कि आपको दिल्ली से अंबाला, लुधियाना, जालंधर, पठानकोट जम्मू के मार्ग पर भी मिल सकता है। जो यात्री इन ढाबों पर एक बार ठगे जाते हैं वे दुबारा की यात्रा में यहां कभी नहीं खाने का तय कर लेते हैं। पर ये ढाबे वाले सुधरने को तैयार नहीं है। अपनी दक्षिण भारत की यात्राओं के दौरान देखा है कि वहां जिन ढाबों पर बसें रुकती हैं वहां रेट लिस्ट लगी होती है। खाने पीने की दरें भी वाजिब रहती हैं। आप जब दिल्ली हरियाणा, यूपी में बस से सफर करें तो ऐसे ठग ढाबे वालों से सावधान रहें।


मुरादनगर के पास संगम यात्री प्लाजा में वाजिब दाम की थाली 
इन सबके बीच हरिद्वार से  दिल्ली लौटते हुए सुखद अनुभूति हुई। हम मेरठ से दिल्ली बिजनौर से आने वाली बस में बैठे। रात के 10 बजे बस मोदीनगर मुरादनगर के बीच एक ढाबे पर खाने के लिए रुकी। यह था संगम यात्री प्लाजा,  यहां पर खाने पीने की दरें बोर्ड पर चस्पा थीं। थाली महज 40 रुपये की। थाली में चार चपाती, चावल, दाल और दो सब्जियां भीं। खाने का स्वाद भी अच्छा है। ब्रेड पकौड़ा 10 रुपये का। ऐसे ढाबे वाले की तारीफ करने का कायदा बनता है। तमाम लूटेरे ढाबों के बीच कुछ ईमानदार और जेब के अनुकूल ढाबे भी हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        ( DHABA, FOOD, DELHI, UP, HARIDWAR, HARYANA , PUNJAB )

Monday, August 14, 2017

पटना संग्रहालय और कैमूर की मुंडेश्वरी देवी

अग्नि की प्रतिमा (कैमूर ) 
बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटना संग्रहालय और बिहार के कैमूर जिले के मुंडेश्वरी का बड़ा गहरा संबंध है। संग्रहालय में प्रदर्शित कई विलक्षण मूर्तियां बिहार के कैमूर जिले से प्राप्त की गई हैं।

इससे साफ जाहिर होता है कि बिहार के कैमूर जिले में इतिहास के अलग अलग कालखंडों में मूर्तिकला, मंदिर और स्थापत्य को तत्कालीन राजाओं ने कितनी प्रमुखता दी थी। पटना संग्रहालय में 10 से ज्यादा प्रतिमाएं बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित कैमूर जिले के मुंडेश्वरी से प्राप्त की गई हैं। ये मूर्तियां कई मायने में विलक्षण हैं। इससे ये भी साबित होता है कि मुंडेश्वरी इतिहास में हिंदू सभ्यता संस्कृति का बड़ा केंद्र था, जो अब बिसार दिया गया है। 

हरिहर की प्रतिमा (कैमूर ) 
सातवीं सदी की अग्नि देवी की प्रतिमा 

हमें संग्रहालय मे सातवीं सदी की बनी अग्नि की प्रतिमा दिखाई देती है जो मुंडेश्वरी कैमूर से प्राप्त हुई। पत्थर की इस प्रतिमा में अग्नि को एक देवी के रूप में चित्रित किया गया है। 

देवी के मुख्य के चारों तरफ अग्नि प्रज्जवलित होते हुए चित्रित किया गया है, इससे यह परिलक्षित होता है कि यह अग्नि देवी की प्रतिमा है। देवी के गले में माला है और एक हाथों से वह आशीर्वाद देती हुई प्रतीत होती है।


हरिहर की विशाल प्रतिमा  - अगली प्रमुख प्रतिमा है हरिहर की। यह छठी शताब्दी में निर्मित है। यह प्रतिमा खड़ी अवस्था में है। इसका ऊपरी भाग खंडित हो गया है, पर संग्रहालय में उसे संरक्षित करके रखा गया है। हरिहर यानी शिव और विष्णु एक साथ। प्रतिमा के सिर पर विशाल मुकुट बना हुआ है। पांव के पास दो गण उनकी अराधना में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। भगवान आशीर्वाद देने की मुद्रा में हैं। उनके चेहरे पर एक खास किस्म के संतोष का भाव दिखाई देता है।


शिव पुत्र कार्किकेय (कैमूर ) 
शिव पुत्र कार्तिकेय की प्रतिमा - छठी शताब्दी की ही कार्तिकेय की प्रतिमा पटना संग्रहालय में देखी जा सकती है। यह भी मुंडेश्वरी कैमूर जिले से प्राप्त की गई है। कार्तिकेय शिव के पुत्र हैं गणेश जी के भ्राता।
कार्तिकेय की प्रतिमा का एक हाथ भंग हो गया है।

पर प्रतिमा की भाव भंगिमा देखते ही  बनती है। कार्तिकेय के साथ देवी भी खड़ी दिखाई देती हैं। प्रतिमा काले पत्थरों से बनाई गई है। देवता के कमर में नक्काशीदार कमरबंद देखा जा सकता है।


छठी शताब्दी के सूर्य  देव की प्रतिमा

सूर्य छठी शताब्दी (कैमूर ) 
और आइए अब देखते हैं छठी शताब्दी की सूर्य की प्रतिमा को। आम तौर पर सूर्य की प्रतिमाएं देश में कम ही देखने को मिलती हैं। पर कैमूर के मुडेश्वरी में सूर्य की प्रतिमा का भी निर्माण हुआ था। यह भी मुंडेश्वरी से प्राप्त की गई अदभुत प्रतिमा है। सूर्य देव के सिर पर विशाल मुकुट देखा जा सकता है। 

प्रतिमा के सिर के चारों तरफ गोलाकार आकृति उनके सूर्य होने का बोध कराती प्रतीत होती है। उनके दोनो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं। उनके पांव के दोनों तरफ एक पुरुष और स्त्री की कृति बनी हुई है। हालांकि स्त्री की कृति भंग हो गई है। पर सूर्य को दर्शन करना अदभुत अनुभूति है। इस मूर्ति से यह भी पता चलता है कि बिहार में सूर्य पूजा की पुरानी पंरपरा रही है। बिहार के देव (औरंगाबाद ) में शिव का अति प्राचीन मंदिर भी है। 

पार्वती की प्रतिमा  (कैमूर ) 

छठी शताब्दी की देवी पार्वती 

पटना संग्रहालय में छठी शताब्दी की पार्वती की प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई है। यह भी मुंडेश्वरी कैमूर से प्राप्त की गई है। पार्वती के चार हाथ दिखाए गए हैं। उनके पांव के दोनों तरफ दो बालक बने हैं। देवी की प्रतिमा की सिर से लेकर पांव तक की बनावट विलक्षण है। चेहरे पर एक खास तरह की ममता दिखाई देती है।


ब्रह्मा और कार्तिकेय की अदभुत प्रतिमाएं – 

संग्रहालय के प्रांगण में मुंडेश्वरी से ही प्राप्त ब्रह्मा और कार्तिकेय की प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। ये दोनों प्रतिमाएं भी छठी शताब्दी की  निर्मित हैं। हालांकि की ब्रह्मा जी की प्रतिमा खंडित हो गई है। यह लाल बलुआ पत्थर से बनी हुई प्रतिमा है। इसका सिर खंडित हो चुका है। साथ में दो देवताओं की और भी प्रतिमा है जो खंडित हो चुकी है। ब्रह्मा जी बैठे हुए मुद्रा में हैं।


कार्तिकेय की जो प्रतिमा बाहर रखी गई है वह संग्रहालय के गैलरी में रखी प्रतिमा से अलग है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह प्रतिमा भी काफी विलक्षण है। इन तमाम प्रतिमाओं को देखकर लगता है कि छठी से आठवीं शताब्दी तक कैमूर जिले का मुंडेश्वरी क्षेत्र मूर्तिकला का बड़ा केंद्र रहा होगा। तभी यहां से देवताओं की इतनी सुंदर प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  (KAIMUR, MUNDESHWARI, ART, SCULPTURE, PATNA , BIHAR ) 
कैमूर जिले के मुंडेश्वरी से प्राप्त कार्तिकेय की प्रतिमा। 








Saturday, August 12, 2017

यहां है दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर

क्या आपको पता है दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर कहां है। जवाब है बिहार के कैमूर जिले में। माता मुंडेश्वरी देवी का मंदिर दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर है जिसके ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं। साथ ही यहां अनवरत पूजा भी हो रही है। श्रद्धालु इसे देवी के शक्तिपीठ में भी शामिल करते है। 
कैमूर पर्वत की पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की उंचाई पर स्थित इस मंदिर से मिले एक शिलालेख से पता चलता है कि 635 ई. में यह निश्चित रूप से विद्यमान था। पर हाल के शोधों के आधार पर तो अब इसे पहली सदी का यानी देश और दुनिया का प्राचीनतम मंदिर माना जाने लगा है।


बिहार धार्मिक न्यास परिषद के अध्यरक्ष आचार्य किशोर कुणाल यहां मिले शिलालेख और अन्यं दस्ता वेज का हवाला देते हुए कहते हैं कि यह मंदिर 108 ईस्वी में मौजूद था और तभी से इसमें लगातार पूजा का कार्यक्रम चल रहा है। अपनी प्राचीनता के आधार पर यह मंदिर यूनेस्को द्वारा जारी की जाने वाली विश्व धरोहर की सूची में शामिल किए जाने का दावेदार है।

अष्टकोणीय वास्तु योजना का मंदिर
मंदिर अष्टकोणीय योजना में बना है जो अपने आप में दुर्लभ है। पूरी तरह से पत्थर से निर्मित इस मंदिर की दीवारों पर सुंदर ताखे, अर्ध स्तंभ और घट-पल्लतव के अलंकरण बने हैं। दरवाजे के चौखटों पर द्वारपाल और गंगा-यमुना आदि की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर के भीतर चतुर्मुख शिवलिंग और मुंडेश्वरी भवानी की प्रतिमा है। मंदिर का शिखर नष्ट हो चुका है। इसकी छत पुरातत्व विभाग द्वारा बाद में दुबारा निर्मित कराई गई है।

चली आ रही है अहिंसक बलि प्रथा

मुंडेश्वरी मंदिर की बलि प्रथा का अहिंसक स्वरूप इसकी विशेषता है। यहां परंपरागत तरीके से बकरे की बलि नहीं होती है। केवल बकरे को मुंडेश्वरी देवी के सामने लाया जाता है और उस पर पुजारी द्वारा अभिमंत्रित चावल का दाना जैसे ही छिड़का जाता है वह अपने आप अचेत हो जाता है। इतनी ही बलि की पूरी प्रक्रिया है। इसके बाद बकरे को छोड़ दिया जाता है और वह फिर चेतना में आ जाता है। मंदिर में रोज सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पर नवरात्र के मौके पर वहां विशेष भीड़ रहती है।

मंदिर की प्राचीनता के साक्ष्य

मुंडेश्वरी मंदिर से संबंधित दो पुरातात्विक साक्ष्य अब तक मिले हैं, वहां से प्राप्त प्राचीन शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुत्त गामनी की राजकीय मुद्रा। मुंडेश्वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्य आधार वहां से प्राप्त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्ही महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है।  दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्हें  उसी साल इंडियन म्यूजियम कोलकाता भेज दिया गया। यह शिलालेख संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है।

ब्राह्मी लिपि के उक्त  शिलालेख का चित्र और बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्यांतरण प्रस्तुत किया गया है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। हाल में हुए कुछ शोधों के आधार पर शिलालेख में उल्लेखित संवत्सर को शक संवत मानते हुए इसे कुषाण युग में हुविष्कद के शासनकाल में 108 ईस्वी में उत्कीर्ण माना गया है। मुंडेश्वरी धाम में मिले पुरातात्विक साक्ष्य (शिलालेख और दुत्तणगामनी की मुद्रा) जब इतने प्राचीन हैं तो जाहिर है कि मंदिर उससे पहले ही बना होगा। इस तरह से मंदिर का निर्माण ईस्वी पूर्व का भी हो सकता है। ( साभार- अशोक पांडे, कुदरा )


कैसे पड़ा मुंडेश्वरी नाम - मां मुंडेश्वरी भैंसे पर सवार हैं और उनके दस हाथ हैं जिसमें शस्त्र धारण किया हुआ है। कहा जाता है मुंडा चेरो जनजाति का राजा था, जिसके नाम पर देवी मुंडेश्वरी का नाम पड़ा है। पर शक्ति का रुप मां मुंडेश्वरी ने चेरो राजा मुंडा का संहार किया था या फिर वह उसकी अराध्या देवी थीं इसको लेकर अलग अलग विचार हो सकते हैं। मुंडेश्वरी नाम से दोनों तरह के अर्थ निकाले जा सकते हैं। वैसे चेरो जनजाति उत्तर प्रदेश और बिहार में अब भी पाई जाती है। वे लोग खुद को क्षत्रिय होने का दावा करते हैं। आजकल वैसे वे अनुसूचित जनजाति में आते हैं। उनका उपाधि महतो और चौधरी आदि हुआ करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि चेरा राजा मुंडा की अराध्या रही होंगी माता मुंडेश्वरी देवी। 

कैसे पहुंचे – मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने के लिए जीटी रोड पर स्थित मोहनिया (भभुआ रोड) से सुगम रास्ता है। मोहनिया से मंदिर की दूरी 22 किलोमीटर और भभुआ बाजार से तकरीबन 12 किलोमीटर है। मंदिर के पहुंचने के लिए पहाड़ को काटकर छायादार सीढियां और रेलिंगयुक्त सड़क बनाई गई हैं। आप सड़क मार्ग से कार, जीप या बाइक से पहाड़ के ऊपर मंदिर में पहुंच सकते हैं। यूपी के बड़े मुगलसराय रेलवे स्टेशन से भभुआ रोड रेलवे स्टेशन (मोहनिया) की दूरी 54 किलोमीटर है। बाहर से आने वाले लोग भभुआ में ठहरकर मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं। यह मंदिर से निकटम शहर है जहां रहने के लिए होटल उपलब्ध हैं।   

- विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com

(MUNDESHWARI TEMPLE, BHABUA, KAIMUR, BIHAR, THE OLDEST TEMPLE OF WOLRD )