Thursday, July 27, 2017

आइए जानें बोधि वृक्ष की कहानी

बोधगया के महाबोधि मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के ठीक पीछे विशाल बोधि वृक्ष स्थित है। बौद्ध धर्म में बोधि वृक्ष का खास महत्व और सम्मान है। इसी पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे सिद्धार्थ को 623 ईसा पूर्व में वैशाख मास की पूर्णिमा को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इस पवित्र वृक्ष के दर्शन के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु आते हैं। श्रद्धालु इस वृक्ष के नीचे बैठ कर घंटो साधना करते हैं।
वृक्ष के चारों तरफ पत्थरों की एक चारदीवारी है। इसे भी सम्राट अशोक के काल का माना जाता है। इस स्थल को वज्रासन ज्ञान स्थली कहते हैं। यहां बोधि वृक्ष की छांव में भी श्रद्धालु घंटों साधना करते दिखाई देते हैं। कई साधक तो पूरे मंदिर परिसर में अलग अलग स्थलों पर बैठकर साधना करते नजर आते हैं।

श्रीलंका भेजी गई टहनियां

कहते हैं कि सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को इसी बोधि वृक्ष की टहनियां लेकर बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए श्रीलंका भेजा था। इसलिए इस वृक्ष की शाखाएं आज भी श्रीलंका में पल्लवित हो रही हैं। श्रीलंका के अनुराधापुरम में आज भी यह बोधिवृक्ष मौजूद है। 

कहा जाता है कि सातवीं शताब्दी में बंगाल के राजा शशांक ने जो बौद्ध धर्म का विरोधी था, इस बोधि वृक्ष को उखड़वाने की पूरी कोशिश की, पर उसे अपने कुत्सित प्रयास में सफलता नहीं मिली। 

श्रीलंका से लाकर दुबारा लगाया बोधि वृक्ष- 

साल 1876 में एक प्राकृतिक आपदा के कारण बोधि वृक्ष भी नष्ट हो गया था। तब 1881 में एलेक्जेंडर कनिंघम ने श्रीलंका के अनुराधापुरम में रखी टहनियों को मंगवाकर वृक्ष लगाया। फिलहाल जो बोधि वृक्ष है वह मूल वृक्ष के चौथी पीढ़ी का माना जाता है। इस प्रकार यह संसार का सबसे पुराना जीवित वृक्ष माना जाता है। 

मुख्‍य विहार के पीछे बुद्ध की लाल बलुए पत्‍थर की सात फीट ऊंची एक मूर्ति है। यह मूर्ति वज्रासन मुद्रा में है। इस मूर्ति के चारों ओर विभिन्‍न रंगों के पताके लगे हुए हैं जो इस मूर्त्ति को एक विशिष्ट आकर्षण प्रदान करता हैं। कहा जाता है कि तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व में इसी स्‍थान पर सम्राट अशोक ने हीरों से बना राज सिहांसन लगवाया था। सम्राट अशोक ने तो इसे पूरी पृथ्वी का नाभि केंद्र भी कहा था।

स्मारक स्तंभ - सबसे प्राचीन संरचना है -  महाबोधि मंदिर परिसर में भगवान बुद्ध से जुड़े छह पवित्र स्थल हैं जो दुनिया भर से आने वाले बौद्ध श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र हैं। 
जब सम्राट अशोक ने प्रथम मंदिर का निर्माण कराया तो वहां एक स्‍मारक स्‍तंभ का भी निर्माण कराया।
अत्यंत सुंदर शिल्‍पकारी से बनाया गया पत्‍थर का स्मारक स्तंभ अभी भी देखा जा सकता है। जो इस मंदिर की सबसे प्राचीन संरचना मानी जाती है। मंदिर परिसर में इस स्मारक स्तंभ को संरक्षित किया गया है।

बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद कुछ वक्त मंदिर परिसर में ही गुजारा था। उन स्थलों की जानकारी यहां दी गई है। ये सभी स्थल बौद्ध धर्म में अलग अलग महत्व रखते हैं साथ ही अलग अलग संदेश भी देते हैं। 

अनिमेश लोचन में गुजारा दूसरा सप्ताह-  बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद दूसरा सप्‍ताह इसी बोधि वृक्ष के आगे खड़े अवस्‍था में बिताया था। यहां से बोधि वृक्ष की ओर अपलक देखते रहे थे। यहां पर बुद्ध की खड़े अवस्‍था में एक मूर्ति भी बनी हुई है। इस मूर्त्ति को अनिमेश लोचन कहा जाता है। मुख्‍य विहार के उत्तर पूर्व में अनिमेश लोचन चैत्य बना हुआ है।

चक्रमण करते हुए तीसरा हफ्ता  भगवान बुद्ध ने इस स्थान पर ध्यानास्थ चक्रमण करते हुए तीसार सप्ताह बिताया था। यहां पर चबूतरे पर जो कमल पुष्प के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं उनके बारे में कहा जाता है कि वहां वहां भगवान बुद्ध के चक्रमण करने के दौरान चरण पड़े थे।

जन्म से नहीं सिर्फ कर्म से ब्राह्मण

अजपाल निग्रोध वृक्ष  बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने यहां पर अपना पांचवा सप्ताह बिताया था। यह स्थान काफी महत्वपूर्ण संदेश देता है। इसी स्थान पर भगवान बुद्ध ने एक ब्राह्मण के प्रश्न के उत्तर में कहा था कोई व्यक्ति जन्म से नहीं बल्कि कर्म से ब्राह्मण होता है।

राज्यतन्या  में गुजारा सातवां हफ्ता  ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने यहां अपना सातवां सप्ताह बिताया। यहां बुद्ध दो बर्मी व्यापारियों तापासु और भालिका से मिले थे। इन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर उनसे आश्रय देने की इच्छा जताई। उन्होंने बुद्धम शरण गच्छामि और धम्म शरण गच्छामि कहा। उस समय संघ नहीं बना था। संघम शरम गच्छामि बाद में जुड़ा है। और यही तीन पंक्तियां बौद्ध धर्म की प्रार्थना बन गई। दोनों बर्मी व्यापारी बुद्ध के पहले अनुयायी बने।


मुचलिंद सरोवर - जहां नागराज ने बुद्ध की रक्षा की   बुद्ध ने छठा सप्‍ताह महाबोधि विहार के दायीं ओर स्थित मुचलिंद सरोवर के नजदीक व्‍यतीत किया था। यह सरोवर चारों तरफ से वृक्षों से घिरा हुआ है। इस सरोवर के मध्‍य में बुद्ध की मूर्ति स्‍थापित है। इस मूर्ति में एक विशाल सांप बुद्ध की रक्षा करता हुआ दिखाई देता है। इस मूर्ति के संबंध में कथा प्रचलित है कि बुद्ध प्रार्थना में इतने तल्‍लीन थे कि उन्‍हें आंधी आने का ध्‍यान नहीं रहा। बुद्ध जब मूसलाधार बारिश में भिंगने लगे तो नागराज मुचलिंद अपने निवास से बाहर आए और उन्होंने अपना फन काढ़ कर बुद्ध की भारी आंधी बारिश से रक्षा की।

रत्नधारा में गुजारा चौथा सप्ताह - महाबोधि विहार के उत्तर पश्चिम भाग में एक छत विहीन भग्‍नावशेष है जिसे रत्‍नाघारा के नाम से जाना जाता है। इसी स्‍थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद चौथा सप्‍ताह बिताया था। दंत कथाओं के अनुसार बुद्ध यहां गहन ध्‍यान में लीन थे इसी दौरान उनके शरीर से एक प्रकाश की किरण निकली। प्रकाश की इन्‍हीं रंगों का उपयोग विभिन्‍न देशों द्वारा यहां लगे अपने पताके में किया है।

मंदिर परिसर में मेडिटेशन पार्क - महाबोधि मंदिर परिसर में स्वागत कक्ष के पीछे एक विशाल मेडिटेशन पार्क बना है। इस पार्क में 25 रुपये का शुल्क देकर ध्यान करने के लिए जाया जा सकता है। यह एक नई संरचना है जिसे काफी सुंदरता से संवारा गया है।

एक घंटे ज्यादा महाबोधि मंदिर परिसर में गुजारने बाद बाहर निकलता हूं। मन में अनूठी शांति का एहसास है। बाहर निकलते हुए मंदिर परिसर में साहित्य बिक्री केंद्र दिखाई देता है, वहां से कुछ किताबें खरीदता हूं यादगारी के तौर पर और आगे बढ़ जाता हूं। बुद्ध से जुड़े कुछ और स्मृति स्थलों को देखने के लिए...

- vidyut@gmail.com

( आगे पढ़िए विशाल बौद्ध प्रतिमा और बोधगया के बौद्ध मठ के बारे में)

( BODHGAYA, BUDDHA, BODHI TREE, MAHABODHI TEMPLE, MUCHALINDA POND ) 



Tuesday, July 25, 2017

महाबोधि मंदिर - यहां सिद्धार्थ बने थे बुद्ध

बिहार के बोधगया का महाबोधि मंदिर, जहां भगवान बुद्ध को लंबे तप के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ, उनसे मिले बुद्धत्व की ज्योति से सारा जगत आलोकित हुआ, वह विशाल मंदिर मेरी नजरों के सामने है। सुबह-सुबह की वेला है मंदिर में जाने वाले श्रद्धालुओँ की संख्या काफी कम है। प्रवेश द्वार से पहले जूते का स्टैंड है। पर स्टैंड वाले मेरे चप्पलों को देखकर कहते हैं इन्हें अंदर भी रख सकते हैं। पर वहां मोबाइल फोन जमा करना पड़ा। 2013 में हुए इस मंदिर पर आतंकी हमले के बाद महाबोधि मंदिर की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

महाबोधि मंदिर परिसर में मोबाइल फोन लेकर प्रवेश करना वर्जित है। कैमरा के लिए 100 रुपये का टिकट है। मैं वापस लौटकर कैमरे के लिए टिकट ले लेता हूं। मंदिर के प्रवेश द्वार में कमल और कुमुदनी के फूलों की सुंदर सुंदर प्लेटे लिए स्त्रियां बैठी हैं। 10 और 20 रुपये के फूलों की तस्तरियां हैं। मैं किसी भी मंदिर में फूल नहीं चढ़ाता पर यहां न जाने क्यों फूल लेकर जाने की इच्छा हुई।


मुख्य प्रवेश द्वार से तकरीबन सौ मीटर सीधे चलने के बाद दायीं तरफ मंदिर का दूसरा प्रवेश द्वार आता है। वहां भी सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। एक गलियारे में चलने के बाद बैगेज स्कैनर और मेटल डिटेक्टर की सुरक्षा से गुजरना पड़ा। यहां पर कैमरा के पास के चेकिंग हुई। मंदिर में प्रवेश के लिए भी एक फ्री टिकट जारी होता है। इसे भी दिखाना पड़ा। इसके बाद चप्पल स्टैंड में अपनी पादुकाएं उतारीं। सामने मंदिर का विशाल स्वागत कक्ष दिखाई दे रहा है। दाहिनी तरफ एक और प्रवेश द्वार से सीढ़ियों से नीचे उतरने पर विशाल महाबोधि मंदिर नजर आने लगा। इसके गर्भ गृह में विराजमान बुद्ध प्रतिमा के भी दर्शन दूर से ही होने लगे। मंदिर का परिसर अत्यंत हरा भरा है। सुबह की वेला में साधना में लीन कई देशों के बौद्ध भिक्षु मंदिर में दिखाई दे रहे हैं।

महाबोधि मंदिर विहार ठीक उसी स्थान पर निर्मित है जहां गौतम बुद्ध ने ईसा पूर्व छठी शताब्दी में ज्ञान प्राप्त किया था। यहां पर पहला मंदिर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित कराया गया था। आजकल जो मंदिर दिखाई देता है यह सातवीं शताब्‍दी में गुप्त काल में बनाया गया। मंदिर की ऊंचाई 50 मीटर है। यह ईंटों से पूरी तरह निर्मित सबसे प्रारंभिक बौद्ध मंदिरों में से एक है। गुप्‍त काल में निर्मित ये मंदिर बेहतरीन हाल में अभी भी खड़ा है। महाबोधि मंदिर परिसर में महात्‍मा बुद्ध के जीवन से जुड़ी घटनाओं और उनकी पूजा से संबंधित साक्ष्यों को देखा जा सकता है।

मंदिर के गर्भ गृह में भगवान बुद्ध की साधनारत प्रतिमा है। अत्यंत नयनाभिराम प्रतिमा को देखते हुए यूं प्रतीत होता है मानो बुद्ध आपको मुस्कुराते हुए आशीर्वाद दे रहे हों। यह प्रतिमा सोने के आवरण में है। इसे बंगाल के पाल राजा ने बनवाया था।

गर्भगृह में दुनिया भर से आए श्रद्धालु थोड़ी देर बैठकर प्रार्थना करते हुए देखे जाते हैं। काफी लोग यहां आस्था के फूल बुद्ध प्रतिमा के चरणों में चढ़ाते हैं। महाबोधि मंदिर की बाहरी दीवारों पर अत्यंत सुंदर शिल्पकारी और बुद्ध के जीवन से जुडी प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। महाबोधि मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण में बर्मा (म्यांमार) के बौद्ध संस्थानों ने सर्वाधिक सहयोग दिया है।
  
म्यांमार के राजा ने कराया जीर्णेद्धार 
महाबोधि मंदिर का पहली बार व्यापाक जीर्णोद्धार का कार्य बर्मा (वर्तमान में म्यांमार) के राजा मिंडुमिन ने 1874 में करवाया। उसके बाद सन 1880 में बंगाल के गवर्नर एंशले इडेन के आदेश
पर अलेक्जेंडर  कनिघंम और बेगलर ने काम आगे बढ़ाया। उत्खनन के दौरान मंदिर का तल जमीन की तत्कालीन सतह से 25 फीट नीचे मिला था।

खुलने का समय - महाबोधि मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है। यह रात्रि 9 बजे बंद होता है। 5.30 से 6.00 बजे पहली प्रार्थना होती है। 10 बजे सुबह खीर प्रसाद का समय होता है।

कैसे पहुंचे  महाबोधि मंदिर की दूरी गया रेलवे स्टेशन से 14 किलोमीटर, गया एयरपोर्ट से 5 किलोमीटर तो बिहार की राजधानी पटना से 115 किलोमीटर की दूरी पर है। आप गया से आटो रिक्शा करके यहां सुगमता से पहुंच सकते हैं। आप चाहें तो दिन भर बोध गया घूमने के लिए गाड़ी आरक्षित भी कर सकते हैं।

महाबोधि मंदिर एक नजर -  
1883 में ए. कनिंघम की अगुवाई मंदिर परिसर का व्यापक पुनर्विकास किया गया।
2002 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया
50 मीटर है महाबोधि मंदिर के मुख्य गुंबद की ऊंचाई
1956 में 2500 वीं बुद्ध जयंती के मौके पर भी मंदिर का सौंदर्यीकरण हुआ 
2013 में 7 जुलाई को मंदिर पर आतंकी हमला हुआ था। 
 4.86 हेक्टेयर में फैला है मंदिर का विशाल परिसर। 

-vidyutp@gmail.com

( आगे पढ़िए बोधि वृक्ष और महाबोधि मंदिर के अन्य स्थलों के बारे में )

( BODHGAYA, BUDDHA, BODHI TREE, MAHABODHI TEMPLE, SMRAT ASHOKA ) 


Sunday, July 23, 2017

महाबोधि, संबोधि के शहर में - बोध गया में

बिहार में विश्व विरासत की श्रेणी में दो दर्शनीय स्थल हैं। पहला महाबोधि मंदिर बोध गया और दूसरा नालंदा के खंडहर। बोधगया एक बार 1994 में जाना हुआ था सदभवाना रेल के साथ पर तब महाबोधि मंदिर नहीं जा सके थे हमलोग। मेरे घर सासाराम से गया कि दूरी महज 100 किलोमीटर है। तो इस बार मौका मिल गया गया जाने का। फुआ जी के बड़े बेटे के बेटे यानी हमारे भतीजे के शादी थी तो टिकट मिला आनंद विहार हावड़ा एक्सप्रेस में। ट्रेन आनंद विहार से चलकर कानपुर, इलाहाबाद, मुगलसराय के बाद गया और कोडरमा रुकती है। ठहराव कम है तो गति अच्छी  होनी चाहिए। पर कानपुर तक ट्रेन ठीक चली। उसके बाद लेट होने लगी। मुगलसराय शाम को 7 बजे की जगह तकरीबन रात 12 बजे पहुंचकर खुली। तो हम गया जंक्शन पर इस ट्रेन से रात के 2.10 पर उतरे।
 आनंद विहार हावड़ा एक्सप्रेस के एसी2 कोच की रैक बिल्कुल नई है। सीटों की चौड़ाई अच्छी है। स्टडी लाइट हर सीट पर है। पर मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट साइड के बर्थ में नहीं बने हैं। यह तो साइड का बर्थ पाने वालों के साथ अन्याय है। वे भी पूरा किराया देकर सफर कर रहे हैं। ट्रेन में केटरिंग सेवा भी नहीं है। पर कोच एटेंडेंट का व्यवहार अच्छा है। ट्रेन सासाराम और डेहरी ऑन सोन नहीं रुकती। ये दोनों मेरे घर के पास के स्टेशन हैं। खैर गया स्टेशन के प्लेटफार्म नबंर 2 पर उतरने के बाद एक नंबर की तरफ बाहर आता हूं। सामने होटल और खाने पीने के दर्जनों रेस्टोरेंट खुले हुए हैं। गया जंक्शन के बाहर का बाजार रात भर गुलजार रहता है। हो भी क्यों नहीं बिहार का बड़ा टूरिस्ट प्लेस है गया। यह बिहार के इस मिथ को तोड़ता भी है कि यहां कोई नाइट लाइफ नहीं होती।

रेलवे स्टेशन के सामने ही कई होटल हैं। इनमें अजातशत्रु और शकुन बिल्कुल सामने दिखाई देते हैं। इनमें रात भर कभी भी पहुंचा जा सकता है। हमने होटल शकुन में एक कमरा गोआईबीबो डाट काम से बुक करा लिया था। रात को  बजे स्वागत कक्ष पर होटल के मैनेजर मेरा इंतजार कर रहे थे। मैं तुरंत अपने कमरे में गया। पर भूख लगी थी सो नीचे होटल के रेस्टोरेंट में जाकर कुछ खाया पीया फिर सो गया। लोगों ने बताया कि बोधगया जाने वाले आटो रिक्शा सुबह 4.30 बजे से मिलने लगेंगे।

मैं सुबह पौने पांच बजे जगने के बाद स्नानआदि से निवृत होकर बोध गया जाने के लिए निकल पड़ता हूं। सीधा आटो के इंतजार में देर नहीं करता हूं। पहला आटो मिलता है सिकड़िया मोड के लिए। दस रुपये में। गया शहर की प्रमुख सड़कों प्रशासनिक दफ्तर जेल आदि को पार कर हम पहुंचते हैं सिकड़िया मोड। यहां पर निजी बस स्टैंड है। यहां से दूसरा आटो मिलता है वह बोलता है कि दोमुहा छोड़ दूंगा। ये दोमुहा क्या है। वास्तव यह बोधगया का प्रवेश द्वार है। संबोधि द्वार। यहां से महाबोधि मंदिर दो किलोमीटर है। रास्ते में मगध विश्वविद्यालय का परिसर दिखाई देता है। संबोधि द्वार से 4 किलोमीटर पहले गया का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। दिल्ली से गया के लिए रोज सुबह 5.55 बजे एयर इंडिया नान स्टाप उड़ान है। एयर इंडिया की उड़ान यहां से कोलकाता, वाराणसी और यांगून के लिए भी है। समय समय पर यहां थाईलैंड, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका से भी उडाने आती हैं। गया एयरपोर्ट फिलहाल 954 एकड़ में है। रनवे छोटा होने के कारण बड़े विमान उतरने में दिक्कत है। रनवे विस्तार के लिए 200 एकड़ जमीन और लिए जाने की बात चल रही है।


गया में कहां ठहरें  अगर आप गया में ठहरना चाहते हैं रेलवे स्टेशन के आसपास 20 से ज्यादा होटल हैं। रियायती दर पर भारत सेवाश्रम संघ में ठहर सकते हैं। इसके अलावा बोध गया में महाबोधि मंदिर के सामने वाली सड़क पर भी दर्जनों अच्छे होटल उपलब्ध हैं। बोध गया में बिहार टूरिज्म का होटल सिद्धार्थ विहार, सुजाता विहार और बुद्धा विहार स्थित है।


गया में क्या देखें  देश भर से गया में लोग पितरों का पिंडदान करने के लिए भी आते हैं। ये संस्कार फल्गु नदी के तट पर कराया जाता है। यहां पर प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर स्थित है। इसके अलावा पिता महेश्वर मंदिर, बागेश्वरी मंदिर, प्रेतशिला वेदी, रामशिला वेदी आदि गया में दर्शनीय स्थल हैं। स्थानीय तौर पर घूमने के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा चलते हैं। आप इन्हें अपनी सुविधा से आरक्षित भी कर सकते हैं।
 - vidyutp@gmail.com
(GAYA, BODHGAYA, BUDDHA, MAHABODHI TEMPLE, VISHNUPAD TEMPLE, WORLD HERITAGE SITE ) 




Friday, July 21, 2017

आइए जानें कर्नाटक की खास मिठाई के बारे में

हर राज्य की कुछ मिठाइयां खास होती हैं। तो कर्नाटक की सबसे खास मिठाई है मैसूर पाक। इसका नाम मैसूर पाक कैसे पड़ा। कहा जाता है कि यह मिठाई मैसूर के राजा के रसोई में पहले बनी थी, बाद में इसका स्वाद आम आदमी को भी मिलने लगा। पर अब तो इसका मज़ा पूरे हिन्दुस्तान में लिया जाता है।

 मैसूर पाक खाने में इतनी मुलायम होती है कि मुंह में रखते ही घुल जाती है। घी के कारण इसमें एक भारीपन होता है इसलिए थोड़ी सी मिठाई खाने पर भी लगता है कि काफी कुछ खा लिया। 

बेंगलुरु शहर के प्रमुख स्वीट शॉप में मैसूर पाक मिल जाती है। कर्नाटक के सरकारी ब्रांड नंदिनी मैसूर पाक बनाती है। इसके अलावा बेंगलुरु के लोकप्रिय मिठाई निर्माता लाल और मियाज में भी आप मैसूर पाक खरीद सकते हैं।

दक्षिण भारत की इस खास मिठाई मैसूर पाक़ को किसी भी स्पेशल अवसर या किसी भी त्यौहार पर घर में बनाया भी जा सकता है। मावा और पानी न होने की वजह से मैसूर पाक की लाइफ बहुत अधिक मानी जाती है। बेहद स्वादिष्ट मैसूर पाक रैसिपी बनाने में भी बेहद आसान ही होती है। इसके निर्माण में घी, चीनी और बेसन का इस्तेमाल होता है। इसको बनाना बहुत मुश्किल काम नहीं है पर समय काफी लगता है। इसमें मौजूद घी स्वाद को बढ़ाता है। बेंगलुरु में मैसूर पाक का भाव 400 रुपये किलो के आसापास है। 

नंदिनी का मैसूर पाक 500 ग्राम के पैक में और उससे छोटे पैक में भी मिल जाता है। आप 25 ग्राम, 100 ग्राम, 250 ग्राम का पैक भी खरीद सकते हैं। 25 ग्राम के पैक में सिर्फ एक मिठाई होती है। इस बार के बेंगलुरु प्रवास के दौरान हमने कई बार मैसूर पाक का स्वाद लिया। जिस मित्र रिश्तेदार के घर गए उनके यहां भी यही मिठाई लेकर हाजिर। आखिर दिन थोड़ी सी मिठाई लेकर दिल्ली भी चले।


बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित स्वीट शॉप में भी आपको मैसूर पाक मिल जाएगा। यहां से आप धारवाड़ पेड़ा भी खरीद सकते हैं। इसके अलावा हुब्बली के पेड़े के भी अपना स्वाद होता है।

पर एयरपोर्ट पर स्थित दुकान में मिठाइयां बाजार से दुगुने दाम पर मिलती हैं। इसलिए अच्छा होगा कि बाजार के किसी आउटलेट से ही मैसूर पाक खरीदें। वैसे ऐयरपोर्ट के बाहर नंदिनी का स्टाल भी है। आजकल फ्लेवरमाइ सिटी जैसी वेबसाइट से आप आनलाइन भी मैसूर पाक जैसी मिठाई मंगा सकते हैं।



बेंगलुरू से वापसी और जेट एयर का बुरा अनुभव 
दो अप्रैल की शाम हम बेंगलुरु से दिल्ली वापस आ रहे हैं। एक बार फिर ओला कैब से एयरपोर्ट की राह पर हैं। शहर के ट्रैफिक को देखते हुए ढाई घंटे का अंतराल लेकर चल रहे हैं। हमलोग पर्याप्त समय पहले चेकइन करके इंतजार कर रहे हैं। हमारी फ्लाइट जेट एयर की है। नियत समय पर हमलोग अपनी सीट ले चुके हैं। यह ए 330 विमान है। इसमें आगे की कुछ सीटें बिजनेस क्लास की हैं। इससे पहले हमने एक बार जेट से दिल्ली से चेन्नई की उड़ान भरी थी। तब जेट ने बहुत ही सुस्वादु दक्षिण भारतीय भोजन पेश किया था। पर इस बार का भोजन औसत से नीचे रहा। चावल, पालक पनीर आदि की छोटी सी प्लेट थी। खाना अनादि को भी पसंद नहीं आया। हालांकि विमान में मनोरंज के इंतजाम बेहतर थे। आंतरिक वाईफाई से आप फिल्में गाने और टीवी के प्रोग्राम देखकर समय काट सकते हैं। यह हमें काफी अच्छा लगा।

पर बुरा अनुभव रहा उड़ान का। विमान को कोई कैप्टन जयंत उड़ा रहे थे। रनवे से हवा में जाने के दौरान विमान कभी बायें तो कभी दाएं तेजी से झुक रहा था। तमाम यात्रियों को चक्कर आ जा रहा था। पर बेंगलुरु से दिल्ली के दरम्यान भी विमान कभी बार तेजी से नीचे आया। हवा में कई बार स्विंग भी करता रहा। मैं अब तक 20 से ज्यादा बार उड़ान भर चुका हूं, पर इतना बुरा अनुभव कभी नहीं हुआ। कई बार ऐसा लग रहा था कि कोई बैलगाड़ी गांव के टूटे फूटे कच्चे सड़क पर दौड़ रही हो। खैर दिल्ली के टी 3 पर सकुशल उतरने पर ईश्वर को धन्यवाद दिया। हमने जेट प्रबंधन को इस उडान की शिकायत भी की। उनका उत्तर भी आया कि हमने आपकी शिकायत पर गंभीरता से नोटिस लिया है। तो एक बार फिर वापस आ गए हैं हम अपनी दिल्ली में। ( इस बार कर्नाटक बातें बस इतनी...फिर किसी राज्य में ) 

 - vidyutp@gmail.com

( MYSORE PAK, SWEETS, NANDINI, LAL, JET AIR )  

बेंगलुरु एयरपोर्ट का वेटिंग लाउंज. 


Wednesday, July 19, 2017

एक मंदिर जहां नंदी की होती है पूजा

बेंगलुरु का बसवनगुडी इलाका, आज शहर के संभ्रात इलाकों में शामिल है। बड़ी बड़ी दुकानें और रेस्टोरेंट। पर कभी बसवनगुडी इलाके में खेती होती थी। जी हां। इसी बसवनगुडी इलाके में है अनूठा बुल टेंपल यानी भगवान शिव के वाहन नंदी का मंदिर। इस अनूठे मंदिर की अपनी अनूठी कहानी भी है।
कभी बसवनगुडी इलाके में खेती खूब शानदार होती थी। तब इस इलाके का नाम सनकेनहाली हुआ करता था। पर इस इलाके के खेतों की फसलों को जानवर आए दिन चर (खा) जाया करते थे। यहां बड़े पैमाने पर मूंगफली की खेती होती थी। पर जानवरो के हमले से किसान और जमींदार काफी परेशान थे। फसलों के बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। तब एक बार जमींदार को सपना आया कि अगर यहां एक नंदी का मंदिर स्थापित कर दिया जाए तो इससे फसलों की जानवरों से रक्षा हो सकेगी। 

डोडा बसवन गुडी यानी नंदी का यह मंदिर नंदी के आकार के लिहाज से विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है। 1537 में इस मंदिर का निर्माण केंपे गोडा द्वारा कराया गया था। वे विजयनगर सम्राज्य के अधीन मैसूर के शासक थे। इस मंदिर में विजय नगर सम्राज्य के वास्तुकला की झलक दिखाई देती है।
मंदिर का प्रवेश द्वार यानी गोपुरम द्रविड़ शैली में बना है। पर प्रवेश द्वार से आगे बढ़कर जब आप गर्भ गृह में जाते हैं तो वहां विशाल नंदी की प्रतिमा है। यह प्रतिमा एकल पत्थर से बनाई गई है। नंदी प्रतिमा की ऊंचाई 15 फीट है जबकि इसकी लंबाई 20 फीट के करीब है।
चारकोल और तेल से लगातार सालों से घर्षण के कारण प्रतिमा काले रंग की दिखाई देती है। पहले नंदी की यह प्रतिमा खुले में थी। पर बाद में बीसवीं सदी में इसके ऊपर छत निर्माण कर इसे गर्भ गृह का रुप दिया गया। कार्तिक माह में हर साल बुल टेंपल के पास विशाल मेला लगता है। खेती किसानी पर केंद्रित यह मेला सैकड़ो साल से लगता आ रहा है।
बुल टेंपल के बाहर जूता घर बना है। मंदिर खुलने बंद होने का समय निश्चित है। यहां सुबह 6 से शाम 8 बजे तक दर्शन किया जा सकता है। मंदिर में पुजारी की भी बहाली की गई है। यह बेंगलुरु शहर के प्रसिद्ध मंदिरों शामिल है। बेंगलुरु दर्शन के सभी पैकेज में बुल टेंपल जरूर शामिल रहता है।  
मक्खन के गणेश जी - बुल टेंपल के बगल में आप बगल रॉक गार्डेन और गणेश मंदिर के भी दर्शन कर सकते हैं। बुल टेंपल के बगल में स्थित गणेश मंदिर की खास बात है कि यहां गणेश मूर्ति 110 किलो मक्खन की बनी है। पर यह मक्खन कभी पिघलता नहीं है। हर चार साल बाद इस मक्खन को बदल दिया जाता है। मंदिर का मक्खन लोगों  में प्रसाद के तौर पर बांट दिया जाता है।
अगर आप बुल टेंपल देखने पहुंचे हैं तो बसवन गुडी इलाके में शापिंग भी कर सकते हैं। यह शहर का संभ्रात इलाका है जहां कपड़ों का अच्छा बाजार और खाने पीने के लिए अच्छे रेस्टोरेंट भी मौजूद हैं।
बसवन गुडी में बुल टेंपल वाली सड़क का नाम ही बुल टेंपल रोड है। इस मंदिर के पास स्थित चौराहे पर स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा है। साथ ही पास में ही बेंगलुरु के रामकृष्ण मिशन का दफ्तर भी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( BULL TEMPLE, SHIVA, GANESHA, BASAWANGUDI ) 
   


Monday, July 17, 2017

बंगलुरु - एमजी रोड की एक सुहानी शाम

हर शहर में एक सड़क होती है जहां शहर का दिल धड़कता हुआ महसूस किया जा सकता है। तो बेंगलुरु शहर का सबसे ग्लैमरस इलाका है एमजी रोड। एमजी रोड मतलब महात्मा गांधी रोड। सुबह हो या दोपहर या फिर शाम यहां रौनके बहार रहती है। मध्य रात्रि तक यहां आप लोगों की भीड़ भाड़ देख सकते हैं। अब एमजी रोड पर इसी नाम से एक मेट्रो का स्टेशन भी है। मेट्रो स्टेशन 2011 में आरंभ हुआ। यानी आप एमजी रोड मेट्रो से भी पहुंच सकते हैं।

वैसे बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन से एमजी रोड की दूरी महज दो किलोमीटर है। यह इलाका मलेश्वरम, कब्बन पार्क, विधानसभा आदि स्थलों से भी काफी नजदीक है। एमजी रोड दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन की तरह है। जहां की शाम युवा धड़कनों से रंगीन होती है। तकरीबन एक किलोमीटर सड़क पर विशाल शो रुम हैं। खाने पीने के रेस्टोरेंट हैं। एमजी रोड की शुरुआत चिन्नास्वामी स्टेडियम से हो जाती है। चौड़ी सड़क के दोनों तरफ हरे भरे फुटपाथ हैं। यहां आप बड़े शोरुम के अलावा स्ट्रीट शापिंग का मजा ले सकते हैं।

एमजी रोड के बीचों बीच ब्रिगेड रोड नामक सड़क है। इस सड़क पर भी इसी तरह का बाजार है। ब्रिगेड रोड एमजी रोड और रेसिडेंसी रोड को जोड़ता है। यह शहर का बड़ा व्यवसायिक केंद्र है। मुझे सड़क पर दो सौ नौजवानों की लाइन दिखाई देती है। मैं पूछता हूं किस बात की लाइन है। वे बताते हैं फोन खरीदने के लिए। एक नामचीन कंपनी का नया मोबाइल फोन आया है। यह 35 हजार रुपये का है। इसे खरीदने के लिए 500 से ज्यादा लोग लाइन में हैं। फोन के प्रति युवाओं की दीवानगी तो है ही। पर बेंगलुरु औसत वेतन पाने वालों के मामले में दिल्ली और मुंबई से ऊपर है। इसलिए यहां खर्च करने वाला भी बड़ा तबका रहता है। इसलिए तो बेंगलुरु में प्रोपर्टी के भाव भी ज्यादा हैं।

तो चलिए एक बार फिर एमजी रोड पर ही चलते हैं, कुछ खाते पीते हैं। मैकडोनाल्ड, केएफसी या फिर डोमिनोज में। ब्रिगेड रोड सालों से नौजवानों में लोकप्रिय है। खासतौर पर 31 दिसंबर को नए साल के स्वागत के लिए यहां हजारों लोग जुट जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली के कनाट प्लेस में।

वैसे देश के कई प्रमुख शहरों में एमजी रोड नाम से सड़क है। ज्यादातर शहरों में एमजी रोड वहां की प्रमुख शहर है। दिल्ली में तो रिंग रोड का ही नाम एमजी रोड है। बेंगलुरु का एमजी रोड ट्रिनिटी सर्किल से शुरू होकर अनिल कुंबले सर्किल तक जाता है। 70 साल पहले के एमजी रोड और आज के एमजी रोड में काफी बदलाव आया है, पर रौनक यूं ही बरकरार है।  आजादी से पहले एमजी रोड साउथ परेड रोड के नाम से जाना जाता था। पर देश आजाद होने पर 26 फरवरी 1948 को इसका नाम राष्ट्रपिता के सम्मान में रखा गया।

एमजी रोड पर अब भी आपको कुछ पुरानी इमारतें देखने को मिल सकती हैं जो ब्रिटिशकालीन वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करती हैं। हालांकि कई इमारतों के बाहरी डिजाइन में समय के मुताबिक बदलाव आ रहा है।
-vidyutp@gmail.com
( MG ROAD, BRIGADE ROAD, BENGALURU ) 

Saturday, July 15, 2017

फिल्मकारों को भी लुभाता है बेंगलुरु का कब्बन पार्क

बेंगलुरु शहर में कई पार्क हैं। लाल बाग के बाद दूसरा प्रसिद्ध पार्क है कब्बन पार्क। यह विधानसभा और हाईकोर्ट के बिल्कुल पास है। मेट्रो के तीन स्टेशन कब्बन पार्क के आसपास हैं। यह बेंगलुरु शहर का ऐतिहासिक पार्क है। आप अगर बेंगलुुरू का लाल बाग घूम चुके हैं तो हो सकता है कि आपको कब्बन पार्क में कुछ खास नहीं लगे, पर यह बेंगलुर शहर की धड़कन है। कब्बन पार्क कर्नाटक विधानसभा भवन में सचिवालय में और अदालतों का चक्कर लगाने वालों के लिए फुर्सत के पल गुजाने की सुंदर जगह है।

 यह रेलवे स्टेशन और मुख्य बस स्टैंड से काफी करीब है। बेंगलुरू की भरी दोपहरी में भी आप यहां अमराई की छांव पा सकते हैं। पार्क की बेंच पर बैठकर हरीतिमा से संवाद कर सकते हैं। कई लोगों को कब्बन पार्क बोरिंग लगता है तो कई लोगों की खास पसंद है। 1870 में कब्बन पार्क का निर्माण मैसूर के कमिश्नर जॉन मिडे के कार्यकाल के दौरान हुआ। इसका लैंडस्केप मेजर जनरल रिचार्ड शैंकी ने तैयार किया था। पर पार्क का नाम मेजर जनरल मार्क कब्बन के नाम पर पड़ा। मार्क कब्बन मैसूरु को सबसे ज्यादा समय तक सेवाएं देने वाले कमिश्नर थे। उनकी मूर्ति भी पार्क के एक कोने में लगी हुई है। इसे एक पब्लिक पार्क के तौर पर सौ एकड़ में विकसित किया गया था। बाद में इसका विस्तार होता रहा। इस पार्क की देखभाल कर्नाटक सरकार का उद्यान विभाग (हार्टिकल्चर डिपार्टमेंट) करता है। 

पार्क का कोई एक कैंपस नहीं है। पार्क के अंदर से होकर कई सड़के भी गुजरती हैं। इसलिए यह पार्क कई हिस्सों में है। इसमें प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।आप कब्बन पार्क एमजी रोड, कस्तूरबा रोड, हडसन रोड, अंबेडकर रोड आदि से पहुंच सकते हैं।

हर पार्क के चारों किनारे में टहलने वालों के लिए ट्रैक बना हुआ है। लिहाजा इसमें सुबह दोपहर और शाम हमेशा टहलने वाले मिल जाते हैं। पार्क में आम के पेड़ अच्छी संख्या में है। मार्च की दोपहर में हमलोग पार्क में टहल रहे हैं। पेड़ की छांव में आम टिकोले ताजे ताजे गिरे हैं। हमलोग कुछ टिकोले जमा कर लेते हैं चटनी बनाने के लिए... आपने बचपन में टिकोले खाए हैं क्या नमक मिर्च मिलाकर...हमने तो खूब खाए हैं।

कब्बन पार्क में सिल्वर ओक का पेड़ देखा जा सकता है। दक्षिण भारत में ऑस्ट्रेलिया से लाकर पहला सिल्वर ओक यहां लगाया गया था। पार्क के पास सिटी सेंटर लाइब्रेरी की लाल रंग की कलात्मक बिल्डिंग देखी जा सकती है। समय हो तो लाइब्रेरी में जाकर पढ़ाई भी कर सकते हैं।

हाल में कब्बन पार्क में डांसिंग म्युजिकल फाउंटेन शुरू किया गया है, इसे शाम को देखा जा सकता है। आधे घंटे आप संगीत की सुर लहरियों का आनंद ले सकते हैं। कब्बन पार्क में आप कुछ पुराने पेड़ों के बनी हुई सुंदर कलाकृतियां भी देख सकते हैं।
कब्बन पार्क की सीमा में गवर्नमेंट म्यूजिम, आर्ट गैलरी, एक्वेरियम, प्रेस क्लब, जवाहर बाल भवन, यूथसेंटर, वाईएमसीए, टेनिस पैवेलियन आदि भी देख सकते हैं।

6000 वृक्ष लगाए हैं कब्बन पार्क में
96 प्रजातियों के पेड़ पौधे यहां देखे जा सकते हैं
300 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में विस्तारित है कब्बन पार्क
1870 में पार्क का लैंडस्केप तैयार किया गया।
01 किलोमीटर है बेंगलुरु सिटी स्टेशन से पार्क की दूरी।

कुली फिल्म की शूटिंग हुई थी - अब आपको यह भी बता दें कि अमिताभ बच्चन की सुपर हिट फिल्म कुली की शूटिंग कब्बन पार्क में हुई थी। इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान बेंगलुरु में ही अमिताभ बच्चन को पेट में गहरी चोट लगी थी। चोट तब लगी जब बेंगलुरु यूनीवर्सिटी में शूटिंग चल रही थी। कब्बन पार्क में गीत लंबू जी टींगू जी...को शूट किया गया तो,  एक्सीडेंट हो गया रब्बा रब्बा में कब्बन पार्क की लाइब्रेरी दिखाई देती है। फिल्म कुली नंबर वन के गीत मैं तो रस्ते से जा रहा था की पूरी शूटिंग बेंगलुरु शहर में हुई है। इसमें भी कब्बन पार्क दिखता है।
चिन्नास्वामी स्टेडियम में कई रूपों में गांधी जी 


कब्बन पार्क से निकलकर पैदल चलते हुए हमलोग एम चिन्नास्वामी स्टेडियम की ओर बढ़ते हैं। वही स्टेडियम जहां अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच होते हैं। स्टेडियम के मुख्य प्रवेश द्वार के बगल में एक पार्क हैं जहां बापू की कई मूर्तियां लगाई गई हैं। साल 1992 में भी मैं यहां पहुंचा था। बापू की मूर्ति को देखकर 25 साल पुरानी यादें ताजा हो गईं। तब कई दोस्त साथ थे, इस बार बेटे साथ हैं।
-vidyutp@gmail.com

 ( CUBBON  PARK, BENGALURU, M CHINNASWAMI STADIUM , GANDHI, BAPU )