Saturday, December 31, 2016

चला-चली की वेला... माजुली को हमेशा याद रखें... ((28))

चला-चली की वेला है। हम माजुली से वापसी के लिए तैयार हैं। पर ला मैसन डी आनंदा कभी खाली नहीं रहता। हमारी जगह नए मेहमान आ गए हैं। पुणे से सोनम और लक्ष्मी टपक पड़ी हैं। मंजीत रिसांग कहते हैं हम अपने हर मेहमान को टैक्सी स्टैंड तक छोड़ते हैं। वे हमें अपनी एक्टिवा से बारी बारी बारी से टैक्सी स्टैंड छोड़ आते हैं। हम एक बार फिर शेयरिंग टैक्सी में हैं। कमलाबारी फेरी तक के लिए 30 रुपये प्रति सवारी। डेढ़ बजे दोपहर वाली फेरी हमारा इंतजार कर रही है।

फेरी पर चढ़ने से पहले हम एक बार माजुली को पीछे मुड़कर देखते हैं। जैसे अपना घर छूटा जा रहा हो। मंजीत भाई कह रहे थे कुछ विदेशी सैलानी हर साल माजुली आते हैं, भला क्यों। माजुली से उनका कुछ इस तरह का भावनात्मक लगाव हो जाता है कि खींच लाता है ये नदी द्वीप उन्हें बार-बार।  
आदमी, बाइक, कार, एसयूवी सब लद चुका है और फेरी चलने को तैयार है। अक्तूबर महीने में पिछले दो दिन में कई जगह अच्छी बारिश हुई है। ब्रह्मपुत्र में पानी बढ़ गया है। फेरी वापसी के सफर पर चल पड़ी है। मैं और अनादि एक बार फिर फेरी की छत पर हैं फेरी के कप्तान के केबिन के इर्द गिर्द से नदी के अनंत विस्तार और पीछे छूट रहे माजुली द्वीप का नजारा करने के लिए। हल्की हल्की बारिश हो रही है तो हम विनचिटर तान लेते हैं। एक सहयात्री बताते हैं कि आज नदी में करंट ज्यादा है। निमाती घाट से माजुली आते समय में फेरी धारा के साथ आती है तब 14 किलोमीटर का सफर 50 मिनट में पूरा करती है। वापसी का सफर कोई डेढ़ घंटे का होता है। पर यह क्या आज सफर में वक्त ज्यादा लग रहा है। हमारी फेरी कोई ढाई घंटे से भी ज्यादा वक्त लगाती है। नदी में तेज प्रवाह होने के कारण कप्तान को दिक्कतें आ रही है।

फेरी में नीचे देखकर आता हूं दो विशाल बड़े बड़े डीजल इंजन लगे हैं। आधे लोग बैठे हैं तो आधे लोग अलग अलग जगह पर फोटो खींचने में लगे हैं। सहयात्री बताते हैं कि जून से सितंबर के बीच बारिश के दिनों में कई बार चार चार दिनों के लिए फेरी को बंद करना पड़ता है। उस वक्त जब ब्रह्मपुत्र उफान पर होती है, फेरी का संचालन मुश्किल हो जाता है। तब माजुली जोरहाट से कट ही जाता है।  
वहीं दिसंबर के महीने में इस क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र  में पानी कम हो जाता है। तब नदी में खोदकर फेरी चलाने के लिए चैनल बनाना पड़ता है। दोनों ही स्थितियां मुश्किल भरी होती हैं। पर फेरी के साथ माजुली के लोगों को बहुत गहरा रिश्ता है। शाम के 4 से बज चुके हैं।  हमें अब निमाती घाट नजर आने लगा है। पर दूसरी तरफ ब्रह्मपुत्र में छोटे छोटे मानव विहीन द्वीप नजर आते हैं। इनमें से कई द्वीप ब्रह्मपुत्र हर साल बनाती है तो कई द्वीपों को लील भी जाती है। एक द्वीप पर एक सज्जन अपने जानवरों को लेकर चराते हुए नजर आते हैं। उनके पास एक नाव भी है। बड़ा जीवट वाला काम है निर्जन द्वीप पर जानवर लेकर जाना फिर वापसी।

खैर निमाती घाट आ चुका है। हम एक दूसरे फेरी के सहारे सड़क पर पहुंच जाते हैं। दर्जनों शेयरिंग टैक्सियां खड़ी हैं। जिसमें बैठो तुरंत भर गई। शुरू हो गया सफर जोरहाट बाजार की ओर। आसाम ट्रंक रोड बाइपास होते हुए हम जोरहाट शहर में प्रवेश करते हैं। शाम को बाजार में काफी रौनक है। हम रेलवे स्टेशन के लिए रिक्शा लेते हैं । फिर हमें रिक्शा वाले बिहार के ही मिलते हैं।

रेलवे स्टेशन पहुंच कर गुवाहाटी इंटरसिटी का इंतजार। प्लेटफार्म पर दो छोटी छोटी कैंटीन हैं। समोसा पांच रुपये। लौंगलता पांच रुपये। स्वाद अच्छा है। छोटा सा वेटिंग हाल है स्लीपर क्लास के लिए। साफ सुथरा। मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट भी काम कर रहे हैं। ट्रेन समय पर आती है और चल पड़ती है। रात नौ बजे के आसपास फरकाटिंग जंक्शन आता है। यहां 35 मिनट का ठहराव है। स्टेशन पर  मौजूद भोजनालय से हम खाना पैक कराते हैं। 50 रुपये की थाली। ट्रेन फरकाटिंग से गुवाहाटीके लिए चल पड़ती है। 

 हमलोग अपने बर्थ पर सो जाते हैं। हां रेल में चढ़ने के बाद हम माजुली में ला मैसन डी आनंदा के मंजीत भाई को एसएमएस करते हैं – हम सकुशल जोरहाट पहुंच गए और ट्रेन मिल गई। उनका तुरंत भावुक सा उत्तर आता है- कृपया माजुली को हमेशा याद रखें। भला हम माजुली को भूला कैसे सकते हैं। यह तो अब हमारी स्मृतियों का स्थायी हिस्सा बन चुका है।

-        ---विद्युत प्रकाश मौर्य
(ASSAM, MAJULI, JORAHAT, BRAHAMPUTRA RIVER)
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Friday, December 30, 2016

क्या एक दिन खत्म हो जाएगा माजुली द्वीप ((27))

संसार के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली का अस्तित्व खतरे में है। यह एक सच है क्योंकि कई दशक का रिकार्ड बताता है कि द्वीप साल दर साल कटाव झेल रहा है और उसका भौगोलिक दायरा सिकुड़ता जा रहा है।

अस्तित्व की लड़ाई लड़ता माजुली
असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। माजुली बाढ़ और भूमि कटाव के कारण खतरे में है। एक रिपोर्ट कहती है कि आजादी से पहले इसका क्षेत्रफल 1278 वर्ग किलोमीटर था जो अब घटकर 557 वर्ग किलोमीटर रह गया है। कई रिपोर्ट में इसे 650 वर्ग किलोमीटर कहा जाता है। 
माजुली द्वीप के 23 गांवों में कोई डेढ़ लाख लोग रहते हैं। 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा ने कहा था यदि वह सत्ता में आई तो माजुली द्वीप को  विश्व विरासत स्थल का दर्जा दिलाएगी। हालांकि माजुली पर ठीक से वकालत नहीं की जा सकी और यूनोस्को ने विश्व धरोहर के प्रस्ताव रद्द कर दिया। बताया जाता है कि यूनेस्को की बैठकों के दौरान राज्य सरकार ने या तो ठीक से माजुली की पैरवी नहीं की या फिर आधी-अधूरी जानकारी मुहैया कराई। इसी के कारण यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा देने का अनुरोध ठुकरा दिया।

इतिहास बना न्यू मूर
बंगाल की खाड़ी में स्थित न्यू मूर नामक छोटा-सा द्वीप पूरी तरह जलमग्न हो चुका है। न्यू मूर को भारत में पुरबाशा और बांग्लादेश में दक्षिण तलपट्टी के नाम से भी जाना जाता है। भारत ने 1989 में नौ सेना का जहाज और फिर बीएसएफ के जवानों को वहां तैनात करके वहां तिरंगा फहराया था।

माजुली का वह ऐतिहासिक सत्र और स्थली जहां कभी महान संत शंकरदेव और माधव देव की मुलाकात हुई थी, कटाव की भेंट चढ़ चुका है। कटाव के कारण माजुली में कभी मौजूद 64 वैष्णव सत्रों की संख्या घटकर 23 रह गई है।
माजुली में हमारी मुलाकात माजुली कालेज के प्रोफेसर अवनि कुमार दत्ता से होती है। माजुली के भविष्य पर भावुक चर्चा होती है। वे बताते हैं कि हमने अपना स्थायी घर जोरहाट में बनाया हुआ है। कई समर्थ लोग बारिश के दिनों में माजुली छोड़कर चले जाते हैं।
माजुली को बाढ़ और भूमि कटाव से बचाने के लिए दो एजंसियां हैं. लेकिन किसी ने भी अब तक इस दिशा में ठोस पहल नहीं की है। यही वजह है कि माजुली का काफी हिस्सा नदी में समाता जा  रहा है।

असम सरकार ने इस द्वीप को बचाने की पहल के तहत माजुली कल्चरल लैंडस्केप मैनेजमेंट अथारिटी का गठन किया था। बावजूद इसके पिछले कई सालों में इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ है। 2016 में असम में भाजपा की सरकार आई है। संयोग से मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल माजुली से ही विधायक हैं। सोनोवाल का माजुली से भावनात्मक लगाव भी है। अब माजुली के लोगों की सरकार से काफी उम्मीदें बंधी हैं। सितंबर 2016 में माजुली असम का जिला बन चुका है। पर प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती है इस सुंदर द्वीप को ब्रह्मपुत्र के कटाव से रोकना।

तलवार की धार पर जिंदगी
बारिश के चार महीनों में माजुली द्वीप पर रहने वाले डेढ़ लाख लोग तलवार की धार पर जीवन काटते हैं। हर साल बरसात के मौसम में यहां तीन फीट तक पानी भर जाता है। एक गांव से दूसरे गांव तक जाने का रास्ता टूट जाता है और टेलीफोन सेवा काम नहीं करती। बाढ़ और भूमि काटव की वजह से इसका कुछ हिस्सा हर साल नदी के साथ बह जाता है।  जानकारों का मानना है कि अगर सरकार ने समय रहते व्यवस्था की होती तो इस द्वीप को नदी में डूबने से बचाया जा सकता था।

वेनिस से ज्यादा नावें माजुली में
माजुली के बारे में कहा जाता है कि यहां जितनी नावें हैं उतनी इटली के वेनिस में भी नहीं हैं। माजुली में कोई भी घर ऐसा नहीं है जहां नाव नहीं हो। यहां नावें लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं। यहां के लोग कार, टेलीविजन के बिना तो रह सकते हैं लेकिन नावों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। बारिश के चार महीनों में  नाव ही लोगों का घर बन जाती है। न सिर्फ आवाजाही के काम आती है बल्कि कई बार तो रात भी नाव में गुजारनी पड़ती है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

(MAJULI, ASSAM, JORHAT, BRAHMPUTRA RIVER ) 

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Thursday, December 29, 2016

माजुली का पर्यावरण बचाने की मुहिम ((26))

अपनी हरितिमा और पर्यावरण के मामले में माजुली द्वीप अनूठा है। माजुली की हरितिमा बची रहे इसके लिए जरूरी है कि माजुली का पर्यावरण बचा रहे। माजुली को बचाए रखने की मुहिम में न सिर्फ यहां लोग बल्कि देश दुनिया के अलग हिस्सों के लोग रूचि रखते हैं। 

हमें ला मैसन डी आनंदा में एक अनूठी साइकिल दिखाई देती है। हरे रंग की इस साइकिल में दो बैठने की सीटें और दो पैडल लगे हैं। कुछ विदेशी माजुली प्रेमी लोगों ने खास तौर पर यह साइकिल तैयार की और इससे पूरे माजुली की सैर करके लोगों को पर्यावरण को बचाने का संदेश दिया। फ्रांस के दो कलाकार टीना होलार्ड और हाफिड शोफ ने इस साइकिल को डिजाइन किया। इस साइकिल की यात्रा के साथ साथ नुक्कड़ नाटक पेंटिंग प्रतियोगिताओं आदि से लोगों में जागरूकता लाने की कोशिश की गई।  

माजुली में बैंक और अर्थव्यवस्था - किसी भी जगह की अर्थव्यवस्था को चलाने में बैंकों की प्रमुख भूमिका होती है। कमलाबाड़ी फेरी घाट पर उतरने पर माजुली में स्वागत करता हुआ यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का बोर्ड नजर आता है। यानी यहां पर इस बैंक की शाखा है। गड़मूर बाजार में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा है। यह माजुली का प्रमुख बैंक है। गड़मूर बाजार में ही हमें असम ग्रामीण विकास बैंक की शाखा नजर आती है। यहां यूनाइटेड बैंक और असम ग्रामीण बैंक की दो दो शाखाएं हैं।
असम की सरकार माजुली को लेकर संजीदा है। सितंबर 2016 में माजुली राज्य का 35वां जिला बन चुका है। इससे छोटे सेद्वीप जिले में कलेक्टर और एसपी की पोस्टिंग हो गई है। पर क्या इतने भर से द्वीप का क्षरण रुक जाएगा। यह सवाली कमलाबाड़ी से फेरी पर वापस होते समय माजुली द्वीप को पीछे छूटता देखते हुए सहज ही मन में आता है। दो बार माजुली को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट की सूची में शामिल करवाने की असफल कोशिश भी हो चुकी है। पर इनसे हासिल क्या होता है। 

माजुली कालेज के असमिया के प्रोफेसर  अबनी कुमार दत्ता कहते हैं कि मैंने एक घर जोरहाट टाउन में बनवा रखा है। रिटायर होने पर वहीं जाकर रहूंगा। 

माजुली की सड़कों पर घूमते हुए दुलियाजान में एक कालेज की प्रोफेसर मामोनी देवी मिलती हैं वह भी माजुली के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर करती हैं। कहा जाता है कि यह द्वीप ब्रह्मपुत्र में कुछ बड़े भूकंप और बड़े बाढ़  आने  बाद बना है।  पर यह जैव विविधता का अदभुत नमूना है। कुल 260 प्रजाति के पक्षी यहां पाए जाते हैं। पर यह 1256 वर्ग किलोमीटर से घट कर अब 50 फीसदी के आसपास रह गया है। कुछ लोग कहते हैं कि जो कटाव की दर है उसमें माजुली अगले 15 से 20 साल में खत्म भी हो सकता है। खास तौर पर साल 1966 से 2008 के बीच माजुली ने काफी कटाव झेला है। हर साल 8.76 वर्ग किलोमीटर की दर से भूमि का कटाव हो रहा है। खास तौर पर 1998 से 2008 के बीच कटाव की दर काफी ऊंची रही है। माजुली के कुल 67 गांव अब तक कटाव के कारण खत्म हो चुके हैं।
हालांकि सरकार ने कटाव रोकने के लिए माजुली में तटबंधों का निर्माण कराया है। हमें दक्षिणापथ सत्र के आसपास ऐसे तटबंध दिखाई देते हैं। पर इसका खास लाभ होता हुआ दिखाई नहीं देता।


1973 में माजुली में एक ब्लॉक दफ्तर की स्थापना हुई
1979 में 26 जनवरी को माजुली को सब डिविजन का दर्जा मिला
2016 के सितंबर में माजुली असम का 35वां जिला बना

अगर प्रशासनिक नजरिए से देखें तो सरकार काइस द्वीप जिले पर पूरा ध्यान रहा है। पर जरूरत इस बात की है कि विश्व भर के पर्यारण में रूचि रखने वाले लोग इस नदी द्वीप के सरंक्षण को लेकर जागरूक हों।

-- vidyutp@gmail.com


REFERENCE





Wednesday, December 28, 2016

हर आम और खास के लिए माजुली ((25))

माजुली आम और खास सैलानी का अपने यहां स्वागत करता है। माजुली में अगर आप ठहरना चाहते हैं तो कम से कम 100 रुपये प्रतिदिन में भी आपको आवास का इंतजाम मिल सकता है। वहीं रोज सौ रूपये में आप पेट पूजा कर सकते हैं। साल 2016 में इतना सस्ता पर्यटन और कहां हो सकता है।

माजुली में गडमूर सत्र और नूतन कमलाबाड़ी सत्र के गेस्ट हाउस में अत्यंत किफायती दरों पर ठहरा जा सकता है। इसके अलावा यहां पर ठहरने के लिए बंबू हट के तौर पर होम स्टे जैसे बेहतरीन विकल्प भी मौजूद हैं। कुछ होटल और रिजार्ट भी माजुली में खुल गए हैं। दो सुविधा जनक रिजार्ट हैं जिनका किराया 1500 से 3000 रुपये प्रतिदिन तक है। गड़मूर के बाजार में श्रीमंत शंकरदेव होटल दिखाई देता है। इसी होटल के नीचे दत्ता भोजनालय नामक एक रेस्टोरेंट भी है। यहां पर सुबह खाने में 40 रुपये में 4 रोटी सब्जी मिल जाती है। दोपहर के खाने में 50 रुपये में चावल की थाली। थाली यानी भरपेट खाइए।

समोसा ,नारियल मिठाई और जलेबी
हमें कमलाबाड़ी के बाजार में एक मिठाइयों की दुकान नजर आती है। दुकान के बाहर कोई साइन बोर्ड नहीं लगा है। राजस्थान के मनोज शर्मा जी इस दुकान के संचालक है। वे राजस्थान से कई दशक पहल इधर आ गए थे। समोसा छह रुपये का, नारियल मिठाई 7 रुपये की और बेहतरीन स्वाद वाली जलेबियां बनाते हैं। विजयादशमी के दिन खासतौर पर उन्होंने देसी घी की जलेबियां बनाई थीं। माजुली प्रवास के दौरान हमलोग कई बार उनकी दुकान में खाते रहे। आते जाते उनसे आसपास के सत्र में जाने का रास्ता भी पूछते रहे। चलते समय उनकी दुकान से समोसा पैक कराकर भी चले। चलते चलते वे एक पर्ची पर मेरे बेटे को अपना मोबाइल नंबर लिखकर देते हैं। कहते हैं, पापा से कहना कभी कभी बात करते रहेंगे।

वैसे माजुली मांसाहारी भोजन करने वालों के लिए भी काफी उपयुक्त है। खास तौर पर आप परंपरागत मिशिंग थाली का आनंद ले। इसमें चावल,  स्टिम्ड फिश, भूनी हुई मछली, सूखी हुई मछली का पाउडर, स्टिम्ड चिकेन,  भूना हुआ चिकेन, चिकेन करी, स्टिम्ड पोर्क, भूना हुआ पोर्क आदि शामिल है। और खाने से पहले आप राइस बीयर का आनंद उठा सकते हैं।
सोनोवाल कछारी लोक चिकेन और मटन खाना पसंद करते हैं। पर वे राइस बीयर कभी कभी पीते हैं। वे अपने मेहमानों को राइस बीयर सम्मान के तौर पर पेश करते हैं। इसके अलावा कई किस्म के चाय का स्वाद भी आप यहां ले सकते हैं।

कमालाबाड़ी से गड़मूर सत्र  आने के रास्ते में हमें खेतों में एक बंबू हट का समूह दिखाई देता है। यह खेतों में बना हुआ एक रिसार्ट है। यगादरशील बंबू काटेज ( 9401625744, 9577501010), केरेला गांव, माजुली, में अलग अलग कई काटेज खेतों में बने हुए हैं। हालांकि इनका काटेज किसी ऑनलाइन बुकिंग पर उपलब्ध नहीं है। किराया है 1000 रुपये प्रतिदिन। इसमें हमें स्कॉटलैंड के कुछ लोग मिले जिन्होने कई दिनों से इस काटेज को ठिकाना बनाया हुआ है। एक ऐसे सज्जन भी मिले जो दो साल की उम्र में असम छोडकर विदेश जा बसे थे। अब 40 सालों बाद अपनी जड़ों की तलाश में असम आए हैं। यह काटेज अपने मेहमानों को भोजन का इंतजाम करता है। पर सड़क के किनारे खेतों में स्थित इस काटेज के आसपास कोई बाजार नहीं है। शाम का वक्त है हमें अचानक आसमान में इंद्रधनुष दिखाई देता है। इंद्रधनुष देखकर हम सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( ASSAM, MAJULI,  SWEET SHOP, PORK, FISH, RICE BEER, YGDRASILL BAMBOO COTTAGE ) 

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Tuesday, December 27, 2016

सौ किस्म के धान उगाते हैं माजुली के लोग ((24))

अक्तूबर के महीने में माजुली की सड़कों पर गुजरते हुए दोनो तरफ हरे भरे धान के खेत दिखाई देते हैं। धान माजुली की मुख्य फसल है। हालांकि माजुली के लोग कई और फसलें भी उगाते हैं। पर धान के बारे में कहा जाता है कि इस नदी द्वीप पर लोग कुल 100 से ज्यादा किस्म के धान की खेती करते हैं। 
सबसे खास बात हैं कि ये सारा धान बिना किसी पेस्टीसाइड्स के यानी ये पूरी तरह से जैविक खेती है। माजुली के लोगों की जीविका का मुख्य श्रोत भी खेती बाडी ही है। न सिर्फ कीटनाशक बल्कि खेती में यहां लोग किसी तरह के फर्टिलाइज का भी इस्तेमाल नहीं करते। ब्रह्मपुत्र का वरदान है।
मिट्टी इतनी उपजाउ है कि किसी तरह के फर्टीलाइजर की जरूरत ही नहीं पड़ती। हर साल ब्रह्मपुत्र का पानी बारिश के दिनों में पूरे माजुली को डूबा देता है। इसके साथ आती है उपजाउ मिट्टी।

माजुली द्वीप के एक तरफ ब्रह्मपुत्र नदी है तो दूसरी तरफ सुबानसिरी नदी और उसकी सहायक रंगानदी, डेकरांग, डुबला, चिकी, टुनी आदि नदियां हैं। उत्तर पश्चिम तरफ खेरकुटिया सुटी नदी बहती है जो ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है। ग्रेटर ब्रह्मपुत्र की घाटी में आने के कारण माजुली को मानसून का पूरा लाभ मिलता है। माजुली द्वीप का बड़ा हिस्सा दलदली (वेटलैंड) का है। इसलिए यह धान जैसे फसल के लिए मुफीद है। सिर्फ दिसंबर और जनवरी का महीना होता है जब माजुली की जमीन काफी हद तक सूख जाती है।


अगर बारिश की बात करें तो औसत बारिश यहां 1980 से 2004 के बीच 1704.65 एमएम रिकार्ड की गई। यहां अप्रैल से अक्तूबर महीने तक बारिश होती रहती है। कभी कभी तो दिसंबर और जनवरी में भी बारिश हो जाती है। द्वीप का तापमान से 7 डिग्री से 37 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। वायु में आद्रता 80 फीसदी तक रहती है।
माजुली की अनूठी सब्जी - ओटिंगा 
 ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का नेटवर्क माजुली को अनूठा वातावरण प्रदान करता है। द्वीप की भौगोलिक स्थित ऐसी है कि हर साल ये नदियां माजुली को बेहतरीन किस्म के गाद से आबाद करती हैं। इसके कारण माजुली में वनस्पति और जीव जंतुओं के लिए अनोखे वातावरण का निर्माण होता है जो अन्यत्र दुर्लभ है। द्वीप पर सालों भर हरितिमा का विराजती है। न सिर्फ धान की खेती बल्कि कई किस्म की घास, बांस, सरकंडा, फर्न नागफनी, ताड़ और तमाम तरह के जलीय पौधे यहां देखे जा सकते हैं।
धान के अलावा किसी समय में यहां गेहूं की खेती की भी कोशिश की गई थी जिसमें आंशिक सफलता मिली थी पर सर्दियों में जाएं तो आप यहां सरसों लहलहाती हुई देख सकते हैं।
माजुली में स्थानीय स्तर पर तमाम तरह की हरी सब्जियों की भी खेती होती है। हमें यहां के स्थानीय सब्जी बाजार में एक अनूठी सब्जी दिखाई देती है। इसका नाम है ओटिंगा। यह हरे रंग की है। कई दिनों तक खराब नहीं होती। सब्जी वाले ने कहा कि आप इसे दिल्ली तक ले जा सकते हैं। माजुली में कई खाने योग्य पौधे होते हैं जो जंगल में यूं उग आते हैं इनकी खेती करने की जरूरत नहीं पड़ती। यानी ये आपके लिए प्रकृति के उपहार के तौर पर हैं।

माजुली के लोग अदरक और हल्दी भी उगाते हैं जो उम्दा किस्म की होती है। नोलदूबा के पत्ते हल्के कसैले होते हैं पर इसे लोग सब्जी में खाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। मतिकानदूरी की जड़े और पत्ते लोग खाने में इस्तेमाल करते हैं। इसका जूस बालों के विकास में काफी लाभकारी है। दाथा का इस्तेमाल सब्जियों के तौर पर होता है। सोतोमूल, पार्वती साक, गोलपातालोता, मेसानदूरी, मास आलू, लाजाबोरी जैसी 40 के करीब स्थानीय पादप हैं जिनका इस्तेमाल अलग अलग किस्म की सब्जियां बनाने और चिकित्सिकिय इस्तेमाल में भी आते हैं। माजुली के स्थानीय लोगों को इन वन पादप के महत्व के बारे में बखूबी पता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  

Monday, December 26, 2016

माजुली की आधी आबादी है मिशिंग जनजाति ((23))

माजुली द्वीप का सबसे प्रमुख जन जातीय समूह है मिशिंग। यह द्वीप के कुल आबादी का तकरीबन आधा है। इसलिए माजुली के कई गांवों में मिशिंग जनजाति के लोग ही रहते हैं। तकरीबन 63,500 आबादी है माजुली में मिशिंग लोगों की। ला मैसन डी आनंदा के केयर टेकर मंजीत रिसांग भी मिशिंग जनजाति से आते हैं।
वे बताते हैं कि मिशिंग लोग कई सौ साल पहले अरुणाचल प्रदेश से माजुली आए थे। मिशिंग लोगों का यहां मुख्य पेशा कृषि और मछली पकड़ना है। ये लोग ज्यादातर बांस के घर बनाकर रहते हैं। वैसे असम और अरुणाचल में मिशिंग लोगों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है। असम के जोरहाट, गोलाघाट, धेमजी, शोणितपुर, लखीमपुर, तिनसुकिया, ढिब्रूगढ़,  शिबसागर जिले में मिशिंग लोग पाए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश में अभी पूर्वी सियांग, लोअर दिबांग वैली और लोहित जिले में इनकी आबादी है। पूर्वोत्तर में बोडो के बाद ये दूसरी बड़ी जनजाति है।
MONJIT with KALKI KOCHLIN 
मिशिंग मतलब बहुमूल्य आदमी -  मिशिंग लोग अगर शाब्दिक अर्थ की बात करें तो मतलब निकलता है बहुमूल्य आदमी। मूल की बात करें तो तिब्बती बर्मी परिवार से आते हैं। यानी उनका संबंध मूल रूप से तिब्बत से है। हालांकि उनके माइग्रेशन का  कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है, पर मिशिंग लोग बताते हैं कि वे तिब्बत से पहले अरुणाचल में आए फिर वहां से असम में अलग अलग स्थानों पर। साक्षरता की बात करें तो मिशिंग लोगों के बीच साक्षरता दर काफी ऊंची है। पुरुषों में साक्षरता 78 फीसदी है।
असम राज्य में मिशिंग आटोनोमस काउंसिल बना है जिसमें 36 विधानसभा सीटों से मिशिंग लोग ही चुनकर जाते हैं। 2009 में एक संस्था बनाकर मिशिंग लोगों ने अपने लिए अलग राज्य के लिए भी आवाज बुलंद की थी।  अरुणाचल प्रदेश के मिशिंग लोगों की बात करें तो वे योद्धा रहे हैं और उन्होंने कई युद्ध लड़े हैं।
असम की आबादी सरकारी नौकरी में, डॉक्टर, उद्योग जगत आदि में भी मिशिंग लोगों का प्रतिनिधित्व काफी बेहतर है। अगर माजुली के मिशिंग गांवों की बात करें तो उनका जीवन स्तर काफी साधारण है।
माजुली के मिशिंग लोगों में ज्यादातर वैष्णव धर्म को मानते हैं पर यहां काफी लोग डोनी पोलो को मानने वाले भी हैं। माजुली में भी डोनी पोलो का नामघर बना हुआ है।
ला मैसन डी आनंदा से सुबह उठकर मैं और अनादि टहलने के लिए निकलते हैं। शिव मंदिर के बगल वाले रास्ते से बांस के बने पुल को पारकर एक मिशिंग गांव में प्रवेश करते हैं। यह बांस का पुल हिलता डुलता जरूर है पर इसके ऊपर से न सिर्फ साइकिल मोटर साइकिल बल्कि मोटरकार भी पार कर जाती है। गांव का नाम है चितादारचुक। गांव में एक बांस से कमरे में पोस्ट आफिस भी है। हर भरी कच्ची सड़क बांस के झुरमुट के बीच से बढ़ती चली जा रही है। हमें दो आस्ट्रेलियाई महिलाएं आती दिखती हैं जो गांव में आगे एक रिजार्ट में ठहरी हैं।
गांव के लोग सुबह सुबह साइकिल से बाजार के लिए जा रहे हैं। एक साइकिल वाला ग्रामीण साइकिल से उतरकर मुझे नमस्कार करता है फिर आगे बढ़ जाता है। कुछ लोग सूअर का मांस ( पोर्क) खरीदकर वापस लौट रहे हैं। सभी घर बांस से बने हैं। बांस के स्तंभ पर मचान के ऊपर। महिलाएं सुबह सुबह काम में जुट गई हैं। थाटल यानी हथकरघा पर चादरें, मेखला बुनने का काम। एक महिला बताती है एक चादर तैयार होने पर पांच हजार में बिकेगी। तो दूसरी महिला जो चादर बुन रही है उसकी कीमत 3500 मिलने की उम्मीद जता रही है।  अमूमन हर घर में बुनने का काम चल रहा है।


गांव में जगह जगह लकड़ी की नाव दिखाई दे रही है। साफ पता चलता है कि बारिश के दिनों में इधर नाव चलने लगती है। गांव के बीच में एक छोटा सा जनरल स्टोर भी नजर आता है। थोड़ा आगे बढ़ने पर एक बांस के घर के बाहर एक साथ  निक्कर टी शर्ट पहने कुछ कमसिन लड़कियां बैठी दिखाई देती हैं। उनके साथ एक महिला है जो असमिया में कुछ कह रही है जो मेरी समझ में नहीं आया। हम वहीं से वापस लौट आते हैं। शिवमंदिर के पास मंजीत रिशांग और उनके भाई मिलते हैं। बड़ा सा सूअर काटा जा चुका है और उसका मांस बिक रहा है। पास के कुछ दुकानों पर हरी सब्जियां भी बिक रही है। 
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(MAJULI, MISHING TRIBE, ASSAM, ARUNACHAL, DONYI POLO ) 
माजुली के मिशिंग गांव में बिक रहा सूअर का मांस। 
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Sunday, December 25, 2016

माजुली का मेहनतकश जनजातीय समाज ((22))

जंगराईमुख से लौटते हुए सड़क के किनारे एक घर में रूक जाते हैं हमलोग। घर की लड़कियां ओखल में धान को कूट कर चावल निकालने में पूरी ताकत और जोश से लगी हुई हैं। एक लड़की ने पेटीकोट ब्लाउज पहना हुआ है तो दूसरी ने निक्कर और टी शर्ट। भले ही माजुली गांव हों पर यहां शहरी फैशन गांव के हर घर तक पहुंच चुका है। घर की तीसरी बेटी फैशनेबल कपड़ों में करघा चलाकर उसपर चादर बुनने में लगी है। वहीं गृह स्वामी वे बांस की टोकरी बुनने लगे हैं। यानी पूरा परिवार अलग अलग काम में लगा हुआ है। माजुली की सड़क पर एक किसान से मुलाकात होता है। वे बताते हैं कि मैं कुश हूं। वे खेतीबाड़ी करते हैं। सीधे साधे भोले भाले लोगों की धरती है माजुली।

माजुली द्वीप की आबादी में मिसिंग, देवरी,  सोनोवाल,  कोच, कलिता, नाथ,  अहोम, नेराली जैसी प्रमुख जातियां निवास करती हैं। एक तरह से यह मिनी असम का प्रतिनिधित्व करता है।

सबसे पुरानी जनजाति है देवरी - सबसे पहले बात देवरी लोगों की। ये तिब्बती बर्मी मूल के लोग हैं। माजुली में इनकी आबादी 4000 के आसपास है। इनके यहां पर दो गांव हैं जो जंगराईमुख के पास हैं। एक बड़ी देवरी और दूसरा श्रीराम देवरी। ये माजुली की आबादी का तीन फीसदी हैं। देवरी लोग भगवान शिव की पूजा करते हैं। यह एक हिंदू जनजाति है। हर देवरी घर में पूजा स्थल होता है। वे जनजातीय लोगों के बीच पुजारी और विद्वान के तौर पर सम्मानित किए जाते हैं। देवरी लोग बिहू का त्योहार मनाते हैं। हुराईरंगाली उनकी खास नृत्य शैली है। देवरी लोग असम के सबसे पुराने जनजातीय समूह में गिने जाते हैं। देवरी महिलाएं गहने पहनने की शौकीन होती हैं। ये लोग खाने पीने के भी शौकीन होते हैं। अक्सर पूरा परिवार साथ बैठकर खाना पसंद करता है।
सोनोवाल कछारी – माजुली द्वीप पर सोनोवाल कछारी जनजाति के लोग महज 1000 से थोड़ी ज्यादा संख्या में हैं। हालांकि पूरे असम में इनकी संख्या 2.5 लाख से ज्यादा है। इनकी इसी नाम से गांव जंगराईमुख बाजार से 10 किलोमीटर पूरब में है। मजेदार बात है कि इनका नाम सोनोवाल इसलिए है क्योंकि ये लोग अहोम राजाओं के शासनकाल में सुबानसिरी नदी से सोना चुनने का काम करते थे। सोनोवाल कछारी लोगों के समाज की अपनी नृत्य शैलियां हैं। सोनोवाल कछारी समाज से कई प्रसिद्ध लोग हो चुके हैं। 1979 में असम के मुख्यमंत्री बने जोगेंद्र नाथ हजारिका और 2016 में मुख्यमंत्री बने सर्बानंद सोनोवाल इसी समुदाय से आते हैं। मजे की बात है कि कई सोनोवाल लोग गैर आदिवासी वाली उपाधियां जैसे सैकिया, बोरा, हजारिका भी अपने नाम के आगे लगाते हैं। सोनोवाल लोगों में बड़ी संख्या में लोग अवनिअति सत्र के अनुयायी हैं।

वाद्य यंत्र बनाने में माहिर हैं मतक – माजुली में थोड़ी संख्या में मतक जनजाति के लोग भी हैं। ये लोग खास तौर पर मृदंगम जैसे वाद्य यंत्र बनाने में माहिर हैं। इनका नाम मत और एक मिल कर बना है। मत मतलब विचार, फैसला और एक मतलब कि एक है। तो ये जो नाम मिला है उन्हें वह उनकी एकता का प्रतीक है। उनके आध्यात्मिक गुरु श्री अनिरुद्ध देव हैं। माजुली के तीन गांव देकासेनसावा, बरहासेनसेवा और अशोकगुरी में ये लोग थोड़ी संख्या में पाए जाते हैं।  

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( SONOWAL, DEORI, MATAK, MAJULI, TRIBE, ASSAM ) 

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Saturday, December 24, 2016

बापू के बताए रास्तों पर चलता एक गांव - देवरी ((21))

यह माजुली द्वीप की सबसे लंबी सड़क है। सड़क गड़मूर बाजार से जंगराई मुख की ओर जा रही है। ये 26 किलोमीटर का रास्ता है। दोनों तरफ हरे भरे धान के खेत। बीच बीच में छोटे छोटे चौराहे आ जाते हैं, जहां दो चार छोटी छोटी दुकानें हैं। विजयादशमी का दिन है। रास्ते एक जगह धार्मिक स्थल पर गांव के लोग पूजा में जुटे दिखाई देते हैं। सभी पुरुष सफेद कपड़ों में हैं। आगे एक धार्मिक जुलूस निकल रहा है। इसमें महिलाएं और लड़कियां सफेद साड़ियों में कतार में चल रही हैं। सबसे आगे वाद्य यंत्रों की धुन पर कुछ लोग धार्मिक गीत गाते चल रहे हैं। सबसे आगे एक नाव का सजा कर रखा गया है। नाव की पूजा।

माजुली के लिए नाव बहुत की अहम। यहां हर घर के पास नाव है। बारिश के दिनों में जब हर गांव में पानी भर जाता है ये नाव ही तो सहारा बनती है। इसलिए नाव तो इनके लिए प्रत्यक्ष देवता के समान है। यही नाव बारिश के चार महीने माजुली के लोगों के लिए घर बन जाती है। यहां विजयादशमी पर कहीं भी दुर्गापूजा नहीं देखने को मिला। माजुली के लोग तो कान्हा की भक्ति में रमे हैं। सजी-धजी महिलाएं और माजुली बालाएं आस्था की इस यात्रा में नंगे पांव सड़क पर निकल पड़ी हैं।

थोड़ी देर हम उनके साथ चलते हैं फिर चल पड़ते हैं आगे। अनादि धान के खेतों के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवाना चाहते हैं तो हमलोग रूक जाते हैं। हमारे गांव में धान की खेती खूब होती पर अनादि कभी धान के मौसम में गांव नहीं गए।

जंगराईमुख से पहले एक पंचायत ब्लॉक डेवलपमेंट आफिस आता है। इसके अंदर गांधी जी मूर्ति मुस्कुराती हुई दिखाई देती है। थोड़ा आगे चलने पर लोग सड़क के किनारे स्टैंड पर कैरम बोर्ड लगाकर खेलते हुए नजर आते हैं। बंगाल में भी लोग इस तरह कैरम खेलते नजर आते हैं।   

बाजार से पहले हमें जंगराई मुख कालेज का हरे रंग का चमचमाता हुआ भवन नजर आता है। यह कालेज 1973 में स्थापित है। वैसे माजुली का प्रमुख कालेज माजुली कालेज है। ये कालेज ढिब्रूगढ़ यूनीवर्सिटी के तहत आते हैं।  

थोड़ा और चलने पर हमें जंगराई मुख बाजार नजर आता है। एक तिराहा और उसके आसपास सौ के करीब दुकानें। जैसा कि मंजीत रिसांग ने बताया था पर हमें यहां कोई खाने के लिए होटल नहीं नजर आया। गांव की जरूरतों के अनुरूप बाजार है। यहां से हम पहले बायीं तरफ की सड़क पर चलते हैं। इधर ज्यादातर गांव मिसिंग जनजाति के लोगों के हैं। एक तरफ हमें नदी की जलधारा दिखाई देती है। यह ब्रह्मपुत्र की सहायक खैरकुटिया नदी का क्षेत्र है। जंगराईमुख से लखमीपुर जाने के लिए सड़क मार्ग है। विशाल हरे भरे बांस के झुरमुट हैं।

चरखा चलता बापू का ....

हम अपनी एक्टिवा वापस मोड़ते हैं। जंगराई मुख बाजार से दाहिनी तरफ वाली सड़क पर हम आगे बढ़ते हैं। कुछ दूर चलने पर सड़क कच्ची होने लगती है। जगह जगह कटाव नजर आता है। यह सड़क गांव के लोगों के लिए बांध का भी काम करती है। हमें यहां एक गेस्ट हाउस भी नजर आता है। पर लगता है उसमें कोई रहता नहीं। कोई छह किलोमीटर चलने पर हम देवरी गांव में पहुंच जाते हैं। यह भी एक मिसिंग ट्राईब के लोगों का गांव है।

देवरी गांव में लगभग हर घर में हाथ से चलने वाला करघा थाटल दिखाई देता है। कुछ घरों में रुककर हम गृहस्वामी और परिवार के सदस्यों से बातें करते हैं। वे बताते हैं कि हम गांधी जी के संदेश को मानते हुए अपने लिए कपड़ा खुद बुनते हैं। वे लोग हथ करघा से चादर, असमिया गमछा तैयार करते हैं। नीचे करघा लगा है। बांस के स्तंभो पर बने अस्थायी घर में ऊपर परिवार रहता है। एक महिला अलमारी खोल कर तैयार वस्त्र दिखाती है। ये लोग तैयार कपड़ों को एजेंटों को बेचते हैं जो इंपोरियम तक पहुंचता है। पर एक असमिया गमछा वे गांव में भी कम से कम 250 रुपये में देने को तैयार होते हैं। हालांकि अब मिल के बने हुए गमछे सस्ते मिल जाते हैं।

रास्ते में हमें कुछ देवरी महिलाएं मिलीं। वे ब्लाउज के ऊपर एक साफा बांधती हैं। सिर पर गमछा लपेटती हैं तो कमर के नीचे भी खुद की बुनी हुई सफेद चादर लपेटे हुए दिखाई दीं।


देवरी की बात करें तो माजुली में इस गांव के नाम पर देवरी जनजाति भी है और देवरी की अपनी देवरी भाषा भी है। यह माजुली के 144 गांवों में से एक है। देवरी गांव के रास्ते में भी लोग पूजा करते दिखाई दिए। यहां एक पालकी पर नाव को सजा कर ले जाया जा रहा था। यह नाव ही तो इन्हें ब्रह्मपुत्र के कोप से बारिश के दिनों विजय दिला पाती है। 

- vidyutp@gmail.com

(MAJULI, ASSAM, JANGRAI MUKH MARKET, DEORI VILLAGE ) 
माजुली के देवरी गांव में एक सेल्फी ....
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Friday, December 23, 2016

सामाजिक बदलाव का अगुआ रहा माजुली का गड़मूर सत्र ((20))

गड़मूर वैसे तो माजुली जिले का मुख्यालय है। जब माजुली जोरहाट जिले का सब डिविजन था तब से यहां प्रशासनिक दफ्तर हुआ करते थे। माजुली के भूगोल के लिहाज से भी देखा जाए तो गड़मूर बीच में है। पर गड़मूर जाना जाता है इसी नाम से सत्र के लिए। गड़मूर सत्र का एक प्रवेश द्वार गड़मूर बाजार में जब आप कमलाबाड़ी की ओर से आते हैं तो बायीं तरफ दिखाई देता है। पर गड़मूर सत्र यहां से एक किलोमीटर अंदर है।

सड़क से दाहिनी तरफ सत्र का भव्य प्रवेश द्वार है। यहीं पर सत्र का का के अतिथिगृह भी बना हुआ है। गड़मूर सत्र अति व्यस्थित साफ सुथरा और चमचमाता हुआ नजर आता है। गड़मूर वास्तव में दो शब्दों से मिलकर बना है। असमिया में  गढ़ मतलब कोई ऊंचा स्थान। मूर मतलब प्रमुख। गड़मूर सत्र भी असम के अमीर सत्रों में से एक है। राजा शिव सिंह ने इस सत्र को 30 हजार पूरा ( 1 पूरा में 2.66 एकड़ ) जमीन दान में दी थी जिससे कोई मालगुजारी नहीं वसूली जाती है।

गड़मूर सत्र की स्थापना 1653-1660 के दौरान अहोम राज जय ध्वज सिंह के संरक्षण में हुई थी। इस सत्र में कृष्ण की पूजा बंशी गोपाल, अच्युतानंद और मोहन मुरारी के रूप में की जाती है।  
वर्तमान सत्राधिकार परमानंद देवगोस्वामी
सत्र के अंदर सुंदर और विशाल नामघर बना हुआ है। आजकल सत्र में भगत लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। अभी 21 भगत यहां निवास कर रहे हैं।

वर्तमान सत्राधिकार परमानंद देव गोस्वामी बिल्कुल युवा हैं। एक भक्त ने बताया कि पहले वाले सत्राधिकार विवाह करके चले गए। तब हमने नए सत्राधिकार का चुनाव किया। यह एक उदासीन सत्र है इसलिए इसमें विवाहित लोग नहीं रहते।

सुबह और शाम को गड़मूर सत्र में विधिपूर्वक पूजा होती है। हमलोग सुबह सुबह पहुंचे हैं तो नाम घर में संगीत की सुर लहरियों के साथ भक्त लोग नटवर नागर की पूजा में लीन हैं। हमारी मुलकात वर्तमान सत्राधिकार परमानंद देवजी से हो जाती है। वे हमें सत्र का परिसर और संग्रहालय देखने को कहते हैं। गड़मूर सत्र के नामघर की दीवारों पर चित्रों में भागवत कथा उकेरी गई है। इसके साथ असमिया में कथा भी लिखी गई है।

गड़मूर सत्र में तीन बिहू, पूर्व सत्राधिकारों के पुण्यतिथि, रासलीला, फाल्गुनोत्सव (होली) जन्माष्टमी, शिवरात्रि आदि उत्सव श्रद्धा और उल्लास से मनाए जाते हैं।
गड़मूर सत्र में एक म्युजियम भी बना है। यहां पीतल के तारों के इस्तेमाल से बनी विशाल साड़ी, चांदी के तारों से बनी विशाल साड़ी, तुलसी की बनी हुई साड़ी, धातु के बने हुए बरतन, मयूर घंटा, गज घंटा, चांदी के बरतन आदि देखे जा सकते हैं। इसके अलावा तकरीबन 40 बहुमूल्य पांडुलिपियां इस सत्र की धरोहर हैं।
श्री पीतांबर देव गोस्वामी और गड़मूर सत्र
आधुनिक काल में गड़मूर सत्र के पूर्व सत्राधिकार श्री पीतांबर देव गोस्वामी का बड़ा नाम है। वे बड़े समाजसुधार होने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान करने वाले सेनानियों में सम्मानित नाम हैं। वे गांधी जी, पंडित नेहरू और बिनोबा भावे के असम के करीबी लोगों में से एक थे। गड़मूर सत्र का असमिया साहित्य के प्रचार प्रसार में बड़ा योगदान रहा है। 12वें सत्राधिकार श्री श्री पीतांबर देव गोस्वामी ने खास तौर पर कई पुस्तकों की रचना की है। राम कथा पर आधारित उन्होंने राम बनबास, लव कुश की रचना की तो महाभारत कथा पर आधारित युधिष्ठिर अश्वमेध यज्ञ लिखा।

उन्होंने करीब 20 पुस्तकों का सृजन किया। पर न सिर्फ असमिया बल्कि हिंदी साहित्य के विकास में उनका बड़ा योगदान है। 10 जून 1885 को जन्मे पीतांबर देव जी छह साल के उम्र में बाल भक्त के तौर पर गड़मूर सत्र आ गए थे। 21 साल की उम्र में वे गड़मूर सत्र के सत्राधिकार बने। पीतांबर देव जी का निधन 20 अक्तूबर 1962 को 77 साल की आयु  में हुआ। संस्कृत के विद्वान होने के साथ ही उन्होंने आयुर्वेद का गहन अध्ययन किया था वे शास्त्रीय संगीत और वाद्य यंत्र जैसे सितार हारमोनियम के भी अच्छे जानकार थे। स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान 1943 में उनकी गिरफ्तारी हुई और वे दो साल जेल में भी रहे। असम के कार्बी क्षेत्र में जनजातीय लोगों के विकास कार्य के लिए भी उन्हें याद किया जाता है।
असम में हिंदी का प्रचार किया  
गड़मूर सत्र के 12वें पूर्व सत्राधिकार पीतांबर देव गोस्वामी का असम में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में बड़ा योगदान था। जोरहाट में हिन्दी शिक्षा की व्ययस्था की श्री पीताम्बर देव गोस्वामी ने नेहरू पार्क स्थित अपनी जमीन का एक टुकड़ा हिन्दी प्रचार के लिए दान में दिया। सन 1936 में बाबा राघवदास के नेतृत्व में गठित अखिल भारत हिन्दी प्रचार समितिके अंतर्गत असम में गड़मुर सत्राधिकार श्री पीताम्बर गोस्वामी के सभापतित्व में असम हिन्दी प्रचार समितिगठित की गई। इसके सचिव कृष्णनाथ शर्मा बने। सभापति कि हैसियत से स्थानीय नेताओं से परामर्श कर पीतांबर देव गोस्वामी ने ऊपरी असम के जोरहाट, गोलघाट, शिवसागर, डिब्रुगढ़ आदि जगहों पर कई हिन्दी स्कूलों की स्थापना की।  गड़मूर सत्र के परिसर में पूर्व सत्राधिकार श्री पीतांबर देव गोस्वामी की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

गड़मूर सत्र के सत्राधिकार - 

1. जय हरिदेव गोस्वामी 
2 लक्ष्मी नारायण देव
3 जयराम देव
4. बालरामदेव
5 हरिदेव प्रथम
6 कृष्णदेव 7 बासुदेव
8. रघुदेव 9. हरिदेव द्वतीय
10. भद्रकृष्ण देव
11 जोगचंद्रदेव
12. पीतांबरदेव गोस्वामी
13. कृष्णचंद्रदेव 14. हरिदेव तृतीय
15 परमानंद देव गोस्वामी।