Tuesday, June 30, 2015

भिखना ठोरी – यहां जार्ज पंचम ने मारे थे 39 बाघ

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले का भिखना ठोरी रेलवे स्टेशन। गवनहा ब्लाक में स्थित भिखना ठोरी के जंगलों में बिखरे हैं इतिहास के कई पन्ने। यह इलाका ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम के शिकारगाह के तौर पर प्रसिद्ध है। वे नेपाल के राजा के आमंत्रण पर इधर शिकार करने पहुंचे थे। दिसंबर 1911 में ग्रेट ब्रिटेन के किंग जार्ज पंचम ने 21 दिन चंपारण के भिखना ठोरी में गुजारे। यहां उन्होंने शिकार के लिए शिविर लगाया था। इस तीन हफ्ते में उन्होंने 39 बाघों का शिकार किया। जार्ज पंचम का जत्था हाथियों पर सवार होकर नेपाल की तराई के जंगल जंगल में घूमता था।

  जार्ज पंचम की खातिरदारी इस दौरान बेतिया और रामनगर के राजा ने की थी। सहायता के लिए उनके साथ नेपाली सिपाहियों और शिकारियों की टीम भी थी। 18 दिसंबर को किंग जार्ज ने पहला बाघ मारा। जार्ज पंचम 12 दिसंबर 1911 के दिल्ली दरबार के बाद चंपारण पहुंचे थे। जार्ज पंचम को शिकार का शौक था। वे इससे पूर्व 1905-06 में प्रिंस ऑफ वेल्स के तौर पर भारत आ चुके थे। 1911 में जार्ज पंचम ट्रेन से भिखना ठोरी तक पहुंचे। 

ठोरी में जार्ज पंचम के लिए बना अस्थायी निवास। 
यहां से आगे का सफर उन्होंने मोटर और हाथी से किया। शिकार के लिए 600 हाथियों की मदद ली गई जो एक रिंग बनाकर बाघों को घेरने का काम करते थे। जार्ज पंचम ने नेपाल के चितवन नेशनल पार्क में जाकर इन बाघों का शिकार किया। शिकार से पहले पूरी तैयारी की गई थी। थल सेना के दल ने 40 ठिकानों की पहचान की थी जहां राजा शिकार कर सकें। शिकार करने के नेपाली तरीके में बाघों को आकर्षित करने के लिए बकरियां बांध दी जाती थीं। पर जार्ज पंचम की टीम ने रिंग तकनीक अपनाई और सफलतापूर्वक कई बाघों का शिकार किया। भिखना ठोरी में जार्ज पंचम के अस्थायी निवास के लिए एक बंगला बनाया गया था जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। जार्ज पंचम के प्रवास के दौरान इस बंगले के बाहर चौकीदार तैनात रहते थे। भिखना ठोरी इलाके से हिमालय की सुंदर चोटियां दिखाई देती हैं। ये इलाका बिल्कुल नेपाल की सीमा पर स्थित है।

जार्ज पंचम के आगमन के लिए बिछाई गई रेलवे लाइन 

नरकटिया गंज तक रेल संपर्क तो पहले से मौजूद था। पर जब 1911 में जार्ज पंचम ने नेपाल की तराई में शिकार की योजना बनाई तो उनके पहुंचने के लिए नरकटिया गंज से भिखना ठोरी तक के लिए 35 किलोमीटर की मीटरगेज लाइन बिछाई गई।

 इसी रेल मार्ग से जार्ज पंचम भिखना ठोरी दल बल के साथ पहुंचे। इस मार्ग पर कुल तीन रेलवे स्टेशन थे। यह संयोग रहा है कि 1917 में महात्मा गांधी ने जब इस क्षेत्र में निलहे किसानों को लेकर आंदोलन की शुरुआत की तो अपना आश्रम भितिहरवा में बनाया। भितिहरवा इसी रेल मार्ग पर 16 किलमीटर पर स्थित है। बाद में भितिहरवा आश्रम के नाम से इस रेल मार्ग पर एक हाल्ट बनाया गया। लंबे समय से लोग इस रेल मार्ग को बड़ी लाइन में तब्दील करने की लगातार मांग कर रहे थे। अब उनके ये मांग पूरी होती हुई नजर आ रही है। हालांकि मुनाफे के लिहाज से ये रेलवे के लिए घाटे की लाइन है। पर इसका ऐतिहासिक महत्व ज्यादा है। 
 वाल्मिकी नगर से दो बार संसद का चुनाव लड़ चुके पत्रकार मनोहर मनोज ने भी इस लाइन को बड़ी लाइन में तब्दील करने और इसे हेरिटेज लाइन घोषित करने की मांग रखी थी।

 अंततः  समस्तीपुर रेलमंडल अंतर्गत नरकटियागंज- भिखना ठोरी रेल ट्रैक पर 24 अप्रैल 2015 से रेल गाड़ियों का परिचालन बंद कर दिया गया है। रेलवे अब इस मार्ग को ब्राडगेज में बदलने जा रहा है। वास्तव में रेलवे के इतिहास में ये एक हेरिटेज लाइन है। इस लाइन से ब्रिटेन के महाराजा जार्ज पंचम और महात्मा गांधी की स्मृतियां जुड़ी हैं।

नरकटियागंज भिखना ठोरी रेल मार्ग  
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कुल लंबाई - 35.7 किलोमीटर
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मार्ग के स्टेशन –-
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1  नरकटियागंज ( NRKG)  -

2 अमोलवा  - (12किमी पर)

3 भितिहरवा आश्रम हाल्ट (BHWR) – (16 किमी पर)

4 गवनहा  ( 22 किमी पर)

5 भिखना ठोरी ( BKF) ( 35.7 किमी पर)
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Monday, June 29, 2015

बापू ने डाली थी बुनियादी शिक्षा की नींव

बेतिया शहर के पास कुमारबाग के पास है वृंदावन आश्रम। यह वही आश्रम है, जहां बापू पंडित प्रजापति मिश्र, गुलाब खां व पीर मुहम्मद मुनिस के द्वारा निमंत्रण पर गांधी सेवा संघ के पंचम अधिवेशन के के मौके पर 2 मई, 1939 को एक बार फिर चंपारण की धरती पर पहुंचे थे। इसी वृंदावन में बनी कुटिया में 9 मई, 1939 तक रहकर जनता को प्रेरित किया था। इसी दौरान बापू ने स्वावलंबन आधारित शिक्षा की नींव रखी, जिसके तहत 4 मई 1939 को बुनियादी शिक्षा की शुरुआत हुई।

उद्योग विकास और रोजगारपरक शिक्षा के लिए बिहार में 29 बुनियादी विद्यालयों की शुरुआत बड़े ही जोर शोर से की गई थी। ऐसे ही बिहार के एक बुनियादी विद्यालाय कन्हौली (वैशाली) में मैंने स्कूली शिक्षा पाई। मेरे स्कूल का नाम था राजकीय उच्च बुनियादी विद्यालय था। उद्देश्य था कि स्कूल में सिर्फ किताबी ज्ञान न दिया जाए बल्कि ग्रामीण बच्चों को पढ़ाई के साथ कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाए जिससे वे बाद में कोई रोजगार कर सकें। इन स्कूलों में कभी सूत कताई और करघा चलाना अनिवार्य तौर पर सिखाया जाता था। ये स्कूल पहली से आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई वाले थे। इन स्कूलों को बापू के ग्राम स्वराज्य के सपने के अनुरूप खोला गया था। पर इन स्कूलों का अब नाम पर बुनियादी विद्यालय रह गया है।

1980 से 1983 के दौरान हमारे बुनियादी विद्यालय में बुनियादी शिक्षा बिल्कुल ही बंद हो चुकी थी पर कौशल का प्रशिक्षण देने वाले तमाम यंत्र और इससे जुड़ी हुई पुस्तकें दो बंद कमरों में धूल फांक रहे थे। अब ये स्कूल समान्य स्कूलों की तरह की संचालित किए जा रहे हैं। आज एक बार फिर कौशल विकास की बात जोर शोर हो रही है, पर स्कूली स्तर पर बुनियादी शिक्षा उस कौशल विकास का उत्कृष्ट नमूना था जिसे हम कबसे भूला बैठे हैं।  बिहार में हमारे हाईस्कूल कोर्स में सातवीं से दसवीं क्लास के बीच कार्यानुभव और शैक्षिक परियोजना का एक विषय हुआ करता था। पर इसकी कभी पढ़ाई और परीक्षा नहीं होती थी। हां बोर्ड की परीक्षा में अंक पत्र पर इस विषय का ग्रेड जरूर लिखा जाता था। अक्सर इसमें सबको ए ग्रेड दे दिया जाता था। यह व्यवहारिक शिक्षा के साथ बड़ी धोखाधड़ी थी।

आज मैं बापू के इस बुनियादी शिक्षा को याद करता हूं, तो हमारे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एमए की कक्षा में पढ़ने वाले दो साथी याद आते हैं। यज्ञनाथ झा ने एमए करने के बाद एक नामी बिस्कुट कंपनी में प्रोडक्शन का काम देखना शुरू किया। आज वह उस क्षेत्र में सफल हैं। हमारी एक और मित्र पद्मा ने तो पीएचडी किया पर शिक्षण के क्षेत्र में नहीं गईं, कभी जो उनका शौक था वह रोजगार बन गया। वे इलाहाबाद में कौशल विकास केंद्र चला रही हैं। इससे ये महसूस होता है कि पढ़ाई के साथ कौशल विकास वाली शिक्षा कितनी जरूरी है।

पश्चिम चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया में हजारीमल धर्मशाला वह जगह है जहां बापू भितिहरवा जाने के क्रम में रुके थे। हजारीमल धर्मशाला को बिहार सरकार द्वारा सुरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। इसकी रख-रखाव की व्यवस्था कला, संस्कृति एवं युवा (पुरातत्व निदेशालय) विभाग को है। पर इसकी हालत भी अब बदतर बताई जाती है।
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 ( GANDHI, BAPU, CHAMPARAN, BHITIHARWA ASHRAM) 



Sunday, June 28, 2015

चंपारण में बापू के भितिहरवा आश्रम की ओर

सुबह सुबह मैं नरकटियागंज के पुरानी बाजार के थाना चौक पहुंचता हूं। यहां से कई ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के लिए आटो रिक्शा चलते हैं। गवनहा तक जाने वाले आटो रिक्शा भितिहरवा जाते हैं। किराया है 20 रुपये। 
नरकटियागंज से भिखनाठोरी जाने वाली मीटरगेज लाइन पर भितिहरवा आश्रम हाल्ट स्टेशन आता है। पर  रेल सेवा 24 अप्रैल 2015 को बंद कर दी गई है। इसलिए अब आटो ही विकल्प है। पूरी सवारी हो जाने पर आटो चल पड़ा। गांव की सड़के अच्छी हालत में हैं। कुछ हरे भरे गांव के बाद आता है अमोलवा। माधोपुर बैरिया के बाद एक नहर आता है जिसके बाद आ गया भितिहरवा गांव। मैं आटो से उतर जाता हूं। सड़क के किनारे एक इमारत बनी है। महात्मा गांधी शोध संस्थान भितिहरवा।

 साल 2009 में इसके निर्माण में 11 लाख रुपये खर्च किए गए, लेकिन बापू पर यहां कितना शोध हुआ नहीं मालूम। संस्थान में ताला लटक रहा है। यहां से 500 मीटर की दूरी पर है बापू का आश्रम। साल 2014 -15 में आश्रम का जीर्णोद्धार कार्य 61 लाख 65 हजार 774 रुपये की राशि से कराया गया है। बापू की मूल कुटिया के आसपास कई भवनों और प्रदर्शन हॉल का निर्माण हुआ है। आश्रम में बापू के जीवन पर चित्र प्रदर्शनी के अलावा कुछ खास नहीं है। आश्रम की ओर से किसी नियमित गतिविधि का संचालन नहीं किया जाता है। बिल्कुल ग्रामीण इलाके में होने के कारण आश्रम में हर रोज सैलानी भी कम ही आते हैं। बिहार सरकार की ओर से आश्रम में चार कर्मचारी पदस्थापित हैं। पर वे सभी हर  रोज समय से नहीं पहुंचते। आश्रम में कई पुराने शिलापट्ट टूटे फुटे हालात में दिखाई दे रहे हैं।
यह देख निराशा होती है कि भितिहरवा आश्रम की ओर से किसी गतिविधि का संचालन नहीं होता है। अगर आश्रम में के पास या आश्रम के परिसर में कोई कौशल विकास केंद्र खोल दिया जाए तो यहां रौनक बढ़ सकती है वहीं बापू के ग्राम स्वराज से सपनों को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।  आश्रम के पास 1986 में स्थापित कस्तूरबा कन्या उच्च विद्यालय है। पर भितिहरवा में कोई बड़ा शैक्षणिक संस्थान नहीं खोला गया जिससे ये गांव चंपारण के मानचित्र में विकास की कुलांचे भर सके।

सावित्रि वर्मा का दर्द... ये कैसे अच्छे दिन आए...
भितिहरवा आश्रम में मेरी मुलाकात 80 की बुजुर्ग महिला सावित्रि वर्मा से होती है। वे स्वतंत्रता सेनानी स्व. सत्यदेव प्रसाद वर्मा की पत्नी हैं। वही सत्यदेव वर्मा जी जिन्होंने 1974 से 1985 तक आश्रम का संचालन किया। सावित्रि वर्मा रोज आश्रम में आकर अपनी सेवाएं निःशुल्क देती हैं। उनके पति की यादें इस आश्रम से जो जुड़ी हैं। पर सावित्रि वर्मा को सरकार से काफी शिकायत है। नवंबर 2014 से उनका पेंशन रुका हुआ है। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी होने का पेंशन मिलना चाहिए। वे नौकरी से रिटायर हुईं उसका पेंशन भी रुक गया। उनकी शिकायत है सरकार कहती है कोई एक ही पेंशन मिलेगा। पर पिछले छह माह से एक भी पेंशन नहीं मिल रहा है। सरकारी लालफीताशाही का आलम है कि उनके आवेदन पर अफसर उनकी नहीं सुन रहे। वे दुखी होकर कहती हैं अब क्या स्वतंत्रता सेनानी कटोरा लेकर भीख मांगे। वे पूछती हैं ये कैसे अच्छे दिन आए। अब सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को भी सम्मान नहीं देती।

मैं आश्रम की मिट्टी को नमन कर आगे बढ़ता हूं। दो परिवार के लोग अपने वाहन से आश्रम देखने पहुंचे हैं। आश्रम के बाहर चौक पर चाय नास्ते की तीन दुकाने हैं। यहां चाय, दही चूड़ा आदि मिल जाता है। मुझे थोड़े इंतजार के बाद नरकटियागंज जाने के लिए आटो रिक्शा मिल जाता है। नरकटियागंज रेलवे स्टेशन के पूरब तरफ रेलवे गुमटी के पास बेतिया के लिए बस मिल जाती है। चनपटिया होते हुए बस बेतिया शहर पहुंच जाती है। 


क्या थी तीन कठिया प्रथा

चंपारण में 1916 में लगभग 21,900 एकड़ जमीन पर तीनकठिया आदि प्रथा लागू थी। तीन काठिया मतलब एक बीघा में तीन कट्ठा नील की खेती करना अनिवार्य था। चंपारण के किसानों से मड़वन, फगुआही, दषहरी, सट्टा, सिंगराहट, धोड़ावन, लटियावन, शरहवेशी, दस्तूरी, तवान, खुश्की समेत करीब छियालीस प्रकार के अवैध करवसूले जाते थे। 
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Saturday, June 27, 2015

भितिहरवा आश्रम – यहां से बापू ने दी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती

मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा 1917 में संचालित चंपारण सत्याग्रह न सिर्फ भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी।

चंपारण की इस पवित्र धरती को वह गौरव प्राप्त है जहां से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश राज को चुनौती दी। इसके साथ ही आधुनिक भारत के इतिहास में गांधी युग की शुरुआत होती है।

1917 का वह साल जब देश के आजादी के आंदोलन के इतिहास के केंद्र में महात्मा गांधी आ जाते हैं। देश में बापू के दो प्रमुख आश्रम हैं अहमदाबाद में साबरमती और महाराष्ट्र में वर्धा। पर भितिहरवा आश्रम का गौरव इन सबसे कई मामलों में ज्यादा है।

भितिहरवा में बापू के हाथों से बनाई गई कुटिया।
दक्षिण अफ्रीका में बापू रंगभेद के खिलाफ आंदोलन कर चुके थे। पर ब्रिटिश राज के खिलाफ कोई उग्र विरोध नहीं किया था। बापू के रंगभेद के खिलाफ आंदोलन की कहानी मीडिया में आई थी। पर देश में कम लोग ही इससे वाकिफ थे। चंपारण में बड़े पैमाने पर नील खेती की जा रही थी। इसमें स्थानीय किसानों और मजदूरों का शोषण हो रहा था।  चंपारण के बड़े किसान राजकुमार शुक्ल चाहते थे कि बापू आकर नील किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करें। पर बापू ने दो बार राज कुमार शुक्ल को मना कर दिया था। पर तीसरी बार में उनका आग्रह मान लिया।

27 अप्रैल 1917 का दिन था जब बापू राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर पश्चिम चंपारण के भितिहरवा गांव में पहुंचे। भितिहरवा की दूरी नरकटियागंज से 16 किलोमीटर है। बेतिया से 54 किलोमीटर है। बापू यहां देवनंद सिंह, बीरबली जी के साथ पहुंचे। बताया जाता है कि बापू सबसे पहले पटना पहुंचे थे जहां वे डाक्टर राजेंद्र प्रसाद के बंग्ले में रुके थे। वहां से आकर मोतिहारी में रुके।मोतिहारी से बेतिया आए।बेतिया के बाद उनका अगला प्रवास कुमार बाग में हुआ। कुमार बाग से हाथी पर बैठकर बापू श्रीरामपुर भितिहरवा पहुंचे थे। गांव के मठ के बाबा रामनारायण दास द्वारा बापू  को आश्रम के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। 16 नवंबर 1917 को बापू ने यहां एक पाठशाला और एक कुटिया बनाई।
1917 का खुदा वह कुआं जिससे बा और बापू पानी निकालते थे। 

20 नवंबर 1917 को भितिहरवा में कस्तूरबा गांधी,गोरख बाबू, जनकधारी प्रसाद, महादेव बाबू, हरिशंकर सहाय, सोमन जी, बालकृष्णजी और डा.देव का भितिहरवा आगमन हुआ। बापू का यहां रहना ब्रिटिश अधिकारियों को बिल्कुल गवारा नहीं था। एक दिन बेलवा कोठी के एसी एमन साहब ने कोठी में आग लगवा दी। उनकी साजिश बापू की सोते हुए हत्या करवा देने की थी। पर संयोग था बापू उस दिन पास के गांव में थे। इसलिए बच गए। बाद में सब लोगों ने मिलकर दुबारा पक्का कमरा बनाया। जिसकी छत खपरैल है। इस कमरे के निर्माण में बापू ने अपने हाथों से श्रमदान किया। 

आज यह कुटिया मुख्य स्मारक जिसे दूर दूर से लोग देखने आते हैं। इस कमरे में कस्तूरबा द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला जांता देखा जा सकता है। बा इसमें गेहूं पिसाई करती थीं। यहां बापू द्वारा निर्मित टेबल भी है। बापू इस पर पढाई लिखाई करते थे और इसी पर सो भी जाते थे। यहां बापू के पाठशाला की घंटी भी देखी जा सकती है। आश्रम परिसर में 1917 में बना कुआं भी देखा जा सकता है, इस कुएं का इस्तेमाल बापू और कस्तूरबा करते थे।

2 अक्तूबर 1974 तक भितिहरवा आश्रम का संचालन गांधी स्मारक निधि द्वारा होता रहा।  1974 से 30 अक्तूबर 1985 तक इस आश्रम का संचालन स्थानीय मुखिया स्व. मुकुटधारी प्रसाद और स्वतंत्रता सेनानी स्व. सत्यदेव प्रसाद वर्मा द्वारा होता रहा। 31 अक्तूबर 1985 को भितिहरवा आश्रम बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के तहत आ गया। बिहार सरकार द्वारा हाल में आश्रम परिसर में नए भवनों का निर्माण कर आश्रम को भव्य रुप प्रदान किया गया है।

कैसे पहुंचे – पश्चिम चंपारण में नरकटियागंज जंक्शन भितिहरवा आश्रम से निकटतम बाजार है। नरकटियागंज ने निजी वाहन से या फिर शेयरिंग आटोरिक्शा से यहां पहुंच सकते हैं। नरकटियागंज में पुरानी बाजार के थाना चौक से गवनहा की तरफ जाने वाले आटो रिक्शा भितिहरवा आते हैं। मुख्य सड़क से आश्रम  आधा किलोमीटर पूरब में स्थित है।




10 अप्रैल, 1917 को गांधी जी बिहार की राजधानी पटना पहुंचे  
15 अप्रैल, 1917 को गांधी जी मोतिहारी पहुंचे और गोरख प्रसाद के घर में ठहरे
18 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी के जिस अदालत में बापू की पेशी हुई


1 मई, 1918 को गांधी जी के अथक प्रयासों ने अंग्रेज़ सरकार को चंपारण ऐगरेरियन ऐक्ट लागू करने पर मजबूर कर दिया। इसी के परिणाम स्वरूप तीनकठिया लगान हमेशा के लिए खत्म हो गया। 

भितिहरवा आश्रम में लिखा संदेश। 



भितिहरवा आश्रम का प्रवेश द्वार  ( अंदर की ओर से ली गई तस्वीर)



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( BHITIHARWA,  GANDHI,  CHAMPARAN) 



Friday, June 26, 2015

हरा-भरा चंपारण, अब नहीं रहा मिनी चंबल

किसी जमाने में चंपारण को मिनी चंबल कहा जाता था। पर अब हालात बदल गए हैं। लौरिया नंदनगढ़ से आटो रिक्शा में बैठता हूं नरकटियागंज के लिए। सड़क अच्छी बन गई है। दोनों तरफ हरे भरे खेत हैं। चंपारण धान का बड़ा उत्पादक क्षेत्र है। गन्ने का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है। चंपारण में कई चीनी मिलें हैं। यहां को भूख से नहीं मरता। जून के महीने में आम का मौसम है। पेड़ों पर जर्दा आम पककर झूम रहे हैं। बाजार में बेचने के लिए आम तोड़े जा रहे हैं।  आटोरिक्शा हमें नरकटियागंज के हरदिया चौक पर छोड़ देता है। मैं रेलवे स्टेशन को पार करके पुरानी बाजार होते हुए जय प्रकाशनारायण की प्रतिमा वाले चौक तक पहुंचता हूं। बाजार में आम खूब सस्ते बिक रहे हैं। 30  रुपये किलो।


 सब्जियां तो और भी सस्ती हैं। करेला, नेनुआ और कुनरी सब 10 रुपये किलो। पर नरकटियागंज में जमीन काफी महंगी है। 40 लाख रुपये प्रति कट्टा। यानी दिल्ली के बाहरी इलाके के बराबर। चंपारण से बड़ी संख्या में लोग अरब देशों में नौकरी करने गए हैं इसलिए पैसा खूब  आ रहा है। ब्लॉक और जिले में पदस्थापित होने वाले अधिकारी चंपारण से तबादला नहीं चाहते। क्योंकि यहां रुतबा और पैसा दोनों है। सौ साल पहले होने वाली नील की खेती के बाद हालात बदल गए हैं। रेल नेटवर्क और सड़क नेटवर्क में भी सुधार हुआ है। एक और अच्छी चीज दिखाई देती है बिहार पर्यटन की ओर से सभी प्रमुख चौक चौराहों पर आसपास के स्थलों की जानकारी देते हुए बोर्ड लगाए गए हैं।
बेतिया कभी बेतिया राज हुआ करता है। बेतिया की सड़कों पर फिल्म अभिनेत्री हेलन का बचपन गुजरा है। यहां जार्ज आरवेल की स्मृतियां हैं। चनपटिया से पार करके कुमार बाग पहुंचता हूं। कई उद्योग लगे दिखाई देते हैं। बेतिया शहर के चारों तरफ कालोनाइजनर नई नई कालोनियां बनाने में लगे हैं। शहर में तेजी से फैलाव हो रहा है। कुमार बाग तक कालोनियां बन रही हैं। बेतिया शहर में बड़े बड़े शोरूम दिखाई देते हैं।  प्रजापति, छतौनी, सुप्रिया रोड में बदलाव की बयार दिखाई देती है। हालांकि जिस रफ्तार से बेतियाका विकास हो रहा है उसी रफ्तार से मोतिहारी का विकास होता हुआ नहीं दिखाई देता।

मशहूर फिल्मकार प्रकाश झा और फिल्म अभिनेता मनोज वाजपेयी बेतिया के रहने वाले हैं। हमारे पत्रकार मित्र समीर वाजपेयी, आसितनाथ तिवारी का रिश्ता भी बेतिया से है। अगर आप चंपारण के किसी हिस्से से गुजर रहे हैं तो यहां दही खाना न भूलें। ऐसा स्वाद कहीं नहीं मिलेगा। हमारे एक और पत्रकार साथी ब्रजेश झा भोजपुरी भाषी चंपारण क्षेत्र के अहमित को अपने शब्दों में बयां करते हैं। पेश है उनके सौजन्य से मिली चंपारण महत्व को बयां करती एक भोजपुरी कविता... कवि का नाम नहीं पता...

चंपारण_के_लोग_हँसेला

उत्तर ओर सोमेसर खड़ा,
दखिन गंडक जल के धारा |
पूरब बागमती के जानी,
पश्चिम में त्रिवेणी जी बानी |
माघ मास लागेला मेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



त्रिवेणी के नामी जंगल,

जहँवा बाघ करेला दंगल |
बड़का दिन के छुट्टी होला,
बड़-बड़ हाकिम लोग जुटेला |
केतना गोली रोज छुटेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


नदी किनारे सुन्दर बगहां,
मालन के ना लागे पगहा |
परल इन्हा संउसे बा रेत,
चरके माल भरेलें पेट |
रेल के सिलपट इन्हा बनेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



इन्हा मसान नदी बउरहिया,

ऊपर डुगरे रेल के पहिया |
भादो में जब इ फुफुआले,
एकर बरनन करल ना जाले |
बड़का-बड़का पेड़ दहेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


इहे रहे विराट के नगरी,
जहँवा पांडव कईलें नौकरी |
अर्जुन इहंवे कईलें लीला,
इहंवे बा विराट के टीला |
बरनन वेद-पुराण करेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



परल इंहवा पानी के टान,

अर्जुन मरलें सींक के बाण |
सींक बाण धरती में गईल,
सिकरहना नदी बह गईल |
जेकर जल हर घड़ी बहेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |






रामनगर राजा नेपाली,
माँगन कबो ना लौटे खाली |
इहाँ हिमालय के छाया बा,
इन्हा अजबे कुछ माया बा |
एही नदी में स्वर्ण दहेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



रामनगर के धनहर खेती,

एकहन खेत रोहू के पेटी |
चार महीना लोग कमाला,
आठ महीना बइठल खाला |
दाना बिना केहू ना मरेला,
चंपारण के लोग हंसेला | |


इहां जाईं चानकी पर चढ़,
देखीं लौरिया में नंदनगढ़ |
केहू कहे भीम के लाठी,
गाड़ल बा पत्थर के जाथी |
लोग अशोक के लाट कहेला,
चंपारण के लोग हंसेला | |



नरकटियागंज देखीं गाला,

मंगर शनिचर हाट के हाला |
लेलीं बासमती के चाउर,
अन्न इहाँ ना मिली बाउर |
भात बने बटुला गमकेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


आगे बढीं चलीं अब बेतिया,
बीच राह में बा चनपटिया |
इहाँ मिले मरचा के चिउरा,
किन-किन लोग भरेला दउरा |
गाड़ी-गाड़ी धान बिकेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



बेतिया राजा के राजधानी,

रहलें भूप करन अस दानी |
पच्छिम उदयपुर बेंतवानी,
बढ़िया सरेयाँ मन के पानी |
दूर-दूर के लोग पियेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


बेतिया के मीना मशहूर,
गिरजाघर भूकंप में चूर |
बाड़े अबतक बाग़ हजारी,
मेला लागे दशहरा के भारी |
हाथी घोडा बैल बिकेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



आलू डगरा बस बेतिया के,

भेली सराहीं जोगिया के |
गुड़ चीनी के मात करेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


बेतिया के दक्षिण कुछ दूर,
बथना गाँव बसल मशहूर |
इहाँ बा लाला लोग के बस्ती,
धंधा नौकरी और गिरहस्ती |
एमे केतना लोग बसेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



चंपारण के गढ़ मोतिहारी,

भईल नाम दुनिया में भारी |
पहिले इहे जिला जागल,
गोरन का मुँह करिखा लागल |
नीलहा अबतक नाम जपेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


गाँधीजी जब भारत में अइलें,
पहिले इंहवा सत्याग्रह कईलें |
लीलाहा देखी भाग पराईल,
तब से ना चंपारण आइल |
मोतिहारी के नाम जपेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



इन्हवे बसल सुगौली भाई,

गोरे-गोरखे भइल लड़ाई |
हारे पर जब भइलें गोरा,
धर दिहलें गोली के बोरा |
भईल सुलह इतिहास कहेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


कँवरथिया के देखीं राबा,
अरेराज बउराहवा बाबा |
नामी अरेराज के मेला,
आके दरशन लोग करेला |
फगुनी तेरस नीर चढ़ेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



छपरा जिला गोरखपुर बस्ती,

जेकर इहाँ होत परवस्ती |
केहू नोकरी केहू नाच करेला,
माँगन लोग दिन-रात रहेला |
केतना लोटा झाल बजेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |





खाए में जब खटपट भइलें,
भाग के तब चंपारण अइलें |
माँगी-चाँगी के धन-धान कमइलें,
माँगन से बाबू बन गईलें |
अइसन केतना लोग बसेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



सब दिन खईलें सतुआ लिट्टी,

इहाँ परल देहिया पर पेटी |
बाप के दुःख भूल गईलें बेटा,
भोर परल माटी के मेटा |
अब त लाख पर दिया जरेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |


का करिहें कविलोग बड़ाई,
जग चंपारण के गुण गाई |
आपन कमाई अपने खाला,
केहू से ना मांगे जाला |
ए देख दुश्मन ठठुरेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



रहलें उ कविचूर के साथी,

इहंवे के भईया देहाती |
कविता बा उ देहिया नइखे,
गगरी भरल खींचाते नइखे|
रटना अबहीं लोग करेला,
चंपारण के लोग हँसेला | |



Thursday, June 25, 2015

लौरिया-नंदनगढ़ के बौद्ध स्तूप

बेतिया जिले के लौरिया में अशोक स्तंभ के अलावा एक और ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है नंदनगढ़ का बौद्ध स्तूप। लौरिया चौक से बौद्ध स्तूप बायीं तरफ है। लौरिया बाजार को पार करके गांव के अंदर एक विशाल टीला आता है जहां पर ये स्तूप स्थित है।

1880 में इतिहास सर एलेक्जेंडर कनिंघम ने नंदनगढ़ को ढूंढा। गैरिक ने इसी साल यहां खुदाई कराई। ये बौद्ध स्तूप दूर से देखने में एक विशाल टीले सा नजर आता है। कुछ लोगों का मत है कि ये कोई किला रहा होगा। पर कई इतिहासकारों का कहना है कि किला इतना कम दायरे में नहीं हो सकता। 1880 के खुदाई के दौरान यहां तीन मिट्टी के द्वीप मिले जिस पर अशोक कालीन अभिलेख मिले हैं। 

इतिहासकार स्मिथ के मुताबिक ये बौद्ध अस्थि स्तूप हो सकता है। हालांकि इतिहासकार ब्लाच इसे प्राचीन दुर्ग यानी किला ही मानते हैं।  1935-36 में इतिहासकार एनजी मजूमदार ने इस स्थल पर सिलसिलेवार ढंग से खुदाई कराई जो 1942 तक जारी रही। यहां दो स्तूपों में खुदाई के दौरान राख और आदमी की जली हुई हड्डियां पाई गई थीं। यहां सोने के पत्तर पर बनी हुई देवी की मूर्ति भी मिली थी। ऐसी ही मूर्ति बस्ती जिले के पिपरवा के बौद्ध स्तूप में मिली थी।

खुदाई के दौरान यहां ईंट से बने हुए 24.38 मीटर ऊंचे स्तूप के अवशेष प्राप्त हुए। नंदनगढ़ की संरचना बहुकोणीय है। यह पांच वेदिकाओं के ऊपर अवस्थित है। इसमें तीन वेदियों पर परिक्रमा करने योग्य रास्ता बना हुआ है। दीवार के सामने ईंटो पर शानदार काम किया गया है। बौद्ध स्तूप पर कुल 13 किनारे नजर आते हैं। किले की पूरी संरचना वृताकार है। संरक्षण के लिहाज से इसकी बाउंड्री की गई है। आप पूरे स्तूप का वृताकार परिक्रमा करके नजारा कर सकते हैं। 

प्रवेश के लिए कोई टिकट घर नहीं है। यहां सुबह से लेकर शाम तक जाया जा सकता है। सुबह सुबह मुझे फौज में भर्ती होने वाले नौजवान किले के चारों तरफ दौड़ लगाते हुए नजर आए। मजूमदार इसे बौद्ध स्तूप ही मानते हैं। सिक्के एवं मुद्रांकों से ये पता चलता है ये बौद्ध स्तूप पहली शताब्दी के आसपास बना होगा।

नंदनगढ़ के दो तरफ आम के विशाल बाग नजर आते हैं तो एक तरफ चीन मिल और खेत देखे जा सकते हैं। इतिहास में रूचि रखने वाले लोगों को नंदनगढ़ जरूर पहुंचना चाहिए। बौद्ध स्तूप को चारों तरफ से घूम कर देखा जा सकता है। इसके ऊपर चढ़ने की मनाही है।

कैसे पहुंचे – लौरिया के मुख्य बाजार से यहां तक पैदल या फिर अपने निजी वाहन से पहुंचा जा सकता है। ये स्तूप चीनी मिल के ठीक पीछे स्थित है। लौरिया बाजार से रास्ता पूछते हुए मैं नंदनगढ़ की ओर चला। पूरा बाजार पार करने के बाद पगड़ंडियों वाला रास्ता आता है। दोनों तरफ खेत और आम के पेड़ दिखाई देते हैं। 

नंदनगढ़ के स्तूप की तराई में छोटा सा गांव भी है। लौरिया में ठहने के लिए होटल उपलब्ध नहीं है। पर चाय नास्ता मिल जाता है। आप यहां नास्ते में पूरियां या दही चूड़ा खा सकते हैं।
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( LAURIA NANDAN GARH, BAUDH STUPA )