Wednesday, September 11, 2013

दक्षिण भारत में हिंदी से चलता है काम

दक्षिण भारत में हिंदी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आप दक्षिण भारत के तमाम पर्यटक स्थलों पर जाएं आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। कोच्चि, त्रिवेंद्रम के होटल वाले, आटो वाले और दुकानदार हिंदी बोलते, समझते हैं। कन्याकुमारी तमिलनाडु में है लेकिन वहां हर तरफ हिंदी समझी जाती है। दुकानों के साइन बोर्ड भी हिंदी में दिखाई देते हैं। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के परंपरागत शहर मदुरै में रेलवे स्टेशन के बाहर होटलों के साइन बोर्ड और विजिटिंग कार्ड पर हिंदी में नाम प्रकाशित है।
मदुराई में रेलवे स्टेशन के आसपास होटलों के बाहर हिंदी में लिखा दिखाई देता है- यहां कमरे किराए पर मिलते हैं। जाहिर है यह बाजार का असर है। उत्तर भारत के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ लगी है। शापिंग माल्स और शोरूम के सेल्समैन हिंदी बोलते हैं। जिन सेल्समैन को हिंदी आती है उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाती है। मैं मदुरै एक सेल में घुसता हूं। मैं हिंदी में संवाद शुरू करता हूं। तुरंत एक हिंदी वाला सेल्समैन हाजिर हो जाता है। वह पूछता है कहिए क्या सेवा करूं। सेल्समैन ने कहा उसे चार भाषाएं आती है। इस प्लस प्वाइंट के कारण उसे वेतन ज्यादा मिलता है। वह एक नौकरी छोड़े तो कई नौकरियां उसे आफर हो जाती हैं। रामेश्वरम शहर में सारे आटो रिक्शा वाले हिंदी समझ और बोल लेते हैं।

ऊटी के बोटानिकल गार्डन में...
हिल स्टेशन ऊटी में जाकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप किसी दक्षिण के शहर में हैं। हर दुकान, हर फुटपाथ पर सामान बेचने वाले को हिंदी आती है। होटलों के रिसेप्शन पर भी आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। वहीं तिरूपति में हिंदी को लेकर कोई समस्या नहीं आती। बेंगलुरु और मैसूर में आप हिंदी बोलकर आराम से काम चला सकते हैं। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा कई दशक से सक्रिय है। इस संस्था को डिम्ड यूनीवर्सिटी का दर्जा है। यह कई तरह के कोर्स कराता है। लेकिन अब टेलीविजन, फिल्मों और लगातार सैलानियों की आवाजाही के कारण हिंदी का प्रसार दक्षिण में खूब हो रहा है। 

अगर अखबारों की बात करें तो बेंगलुरु से हिंदी दैनिक अखबार राजस्थान पत्रिका प्रकाशन दो दशक से हो रहा है। पत्रिका अपना चेन्नई संस्करण भी शुरू कर चुका है। साल 2012 की यात्रा में  मैंने वहां दक्षिणभारत राष्ट्रमत नामक नया अखबार देखा जो बहुत अच्छे लेआउट डिजाइन में प्रकाशित हो रहा है। यह अखबार भी बेंगलुरु के साथ चेन्नई से भी प्रकाशित होता है।



-  ----  विद्युत प्रकाश  
http://www.dbhpsabha.org/   

( (HINDI, SOUTH, KERALA, TAMILNADU )     

Tuesday, September 10, 2013

स्थानेश्वर महादेव - यहां पांडवों ने की थी शिव की पूजा

वैसे तो देश भर में शिव के कई प्रसिद्ध मंदिर है। शिव के 12 ज्योतिर्लिंग के अलावा भी कई शिव मंदिर हैं जिनका खास महत्व है। इन्हीं मंदिरों में एक है कुरूक्षेत्र स्थित स्थानेश्वर का शिव मंदिर।

स्थानेश्वर महादेव वह मंदिर है जहां पांडवों ने महाभारत के युद्ध से पहले अपने विजय की कामना करते हुए भगवान शिव की पूजा की थी। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र आने वाले श्रद्धालुओं की इस धार्मिक नगरी में यात्रा का पूरा पुण्य तब तक नहीं मिलता है जब तक कि वे स्थानेश्वर मंदिर में भगवान शिव के दर्शन न कर लें। यहां आने वाले शिव भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए विधिपूर्वक अभिषेक कराते हैं। पुराणों के मुताबिक सकाम या फिर निष्काम भाव से स्थाणु मंदिर में प्रवेश करने वाला मनुष्य पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।

स्थानेश्वर मंदिर से लगा हुआ एक सुंदर सरोवर भी है। कहा जाता है इस सरोवर के जलार्पण से तमाम रोग दूर हो जाते हैं। कहा जाता है कि इस सरोवर के जल के स्पर्श से राजा वेन के सारे कष्ट दूर हो गए थे। इस सरोवर में स्नान करने के लिए घाट बने हुए हैं। स्त्रियों के स्नान करने के लिए अलग से घाट बने हुए हैं।
यहां सिखों के नौंवे गुरु तेगबहादुर के आने का भी प्रकरण मिलता है। इस मंदिर से बिल्कुल सटे उनकी याद में गुरुद्वारा नवीं पातशाही बना हुआ है। कुरूक्षेत्र में इस स्थल पर शिव मंदिर और गुरुद्वारे का अनूठा संयोग दुर्लभ है। दोनों मिलकर यहां अदभुत सुरम्य वातावरण का संचार करते हैं।

कैसे पहुंचे - ये मंदिर कुरुक्षेत्र शहर में थानेश्वर से तीन किलोमीटर दूर झांसा रोड पर स्थित है। आप कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर या पैनोरमा के आसपास से यहां जाने के लिए आटो रिक्शा करके जा सकते हैं।


भद्रकाली मंदिर – 
कुरुक्षेत्र का एक और प्रसिद्ध मंदिर है मां भद्रकाली का मंदिर। यह सती के 51 शक्ति पीठ में से एक है। भद्काली मंदिर स्थानेश्वर मंदिर से थोड़ी दूर पर ही स्थित है। कहा जाता है कि यहां भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर सती के दाहिने पाव की एड़ी कट कर गिरी थी।

 इसे सिद्ध पीठ माना जाता है और यहां दशहरे पर मेला लगता है। मंदिर परिसर में कूप है जिसमें लोगो मनोकामना पूर्ति के लिए मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि यही वह जगह है जहां महाभारत के युद्ध से पूर्व अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर दुर्गा स्तोत्र का पाठ किया था।

-    माधवी रंजना 

Monday, September 9, 2013

कुरुक्षेत्र- यहां देखिए कान्हा के अनेक रूप

माखन चोर नंद किशोर मनमोहन घनश्याम रे
कितने तेरे रुप हैं कितने तेरे नाम रे
कान्हा के बहुत सारे रुप देखने हों तो कुरूक्षेत्र पहुंचिए। यहां महाभारत की लड़ाई हुई थी लेकिन कुरुक्षेत्र में बना श्रीकृष्ण संग्रहालय आपको कान्हा के कई रुपों से मिलवाता है। कुरुक्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है श्रीकृष्ण संग्रहालय। 1991 में बना ये संग्रहालय अब भव्य रूप ले चुका है। तीन मंजिले संग्रहालय में महाभारत का मल्टीमीडिया स्वरूप देखा जा सकता है। संग्रहालय की उपर वाली मंजिल पर बने इस प्रदर्शनी में महाभारत की युद्ध भूमि का बड़ा ही विशाल स्वरूप दिखाई देता है। खास तौर पर ये बच्चों को काफी पसंद आता है।

श्रीकृष्ण संग्रहालय सालों भर खुला रहता है। यहां सातों दिन रविवार को भी जाया जा सकता है। प्रवेश का टिकट 30 रुपये का है। संग्रहालय के भवन के मुख्य भवन पर महाभारत के युद्ध में रथ पर सवार अर्जुन श्रीकृष्ण की तस्वीर है। संग्रहालय के अंदर श्रीकृष्ण को कई रूपों में देखा जा सकता है। 

देश के प्रमुख पेंटिंग शैली में श्रीकृष्ण की तस्वीरें यहां देखी जा सकती हैं। कांगड़ा शैली में, दक्षिण भारत के तंजौर शैली में तो मधुबनी पेटिंग में बाल गोपाल के चित्र यहां देखे जा सकते हैं। सिर्फ पेंटिंग, बल्कि मूर्तिकला, स्थापत्य कला में भी कान्हा के विविध रूप आप यहां देख सकते हैं। संग्रहालय में गीता गैलरी भी है। साथ ही धर्म का ज्ञान बढ़ाने मल्टीमीडिया में सवाल जवाब वाले रोचक कियोस्क लगाए गए हैं जो बच्चों को काफी आकर्षित करते हैं। यहां आप अभिन्यु का चक्रव्यूह भी देख सकते हैं जो काफी रोचक है। म्यूजिम के ब्लॉग पर जाएं- www.srikrishnamuseum.blogspot.in www.srikrishnamuseum.blogspot.in
म्यूजियम के परिसर में ही श्रीकृष्ण पैनोरमा बना है। यह वास्तव में साइंस सेंटर है जो सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी लुभाता है। यहां टेलीविजन का वर्चुअल स्टूडियो जैसी कई रोचक चीजें देखी जा सकती हैं। संग्रहालय के परिसर के बाहर विशाल पार्क भी है जहां कई तरह के रोचक खेल हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य    ( KURUKSHETRA, SRI KRISHNA, MUSSEUM) 

Sunday, September 8, 2013

कुरूक्षेत्र नरकातारी तीर्थ और बाणगंगा

कुरूक्षेत्र में थानेसर से ज्योतिसर के रास्ते में 5 किलोमीटर की दूरी पर नरकातारी तीर्थ स्थित है। वर्तमान में नरकातारी तीर्थ में आप वाणगंगा देख सकते हैं जो एक कुएं के समान है। यहां परिसर में कई मंदिर बने हैं। यहां भीष्म पितामह की माता गंगाजी की मूर्ति, बाण शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह की विशाल मूर्ति, पांचों पांडव और द्रौपदी की मूर्तियां स्थापित है। परिसर में 26 फीट ऊंची हनुमान जी की भी विशाल मूर्ति है।
कहा जाता है महाभारत के युद्ध में घायल भीष्म पितामह बाण शैय्या पर लेटे थे तब उन्होंने अर्जुन से पानी मांगा। अर्जुन ने यहीं भूमि में शक्तिशाली बाण मारा तो भूमि से गंगा का एक स्रोत फूट पड़ा। पुराणों के अनुसार महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पांडव हस्तिनापुर चले गए। एक माह 26 दिन बाद नरकातारी तीर्थ पर पांच पांडव द्रौपदी व नारद जी कई ऋषियों समेत भीष्म से मिलने पहुंचे। यहीं पर भीष्म पितामह ने महाभारत का शांतिपर्व और विष्णु सहस्त्रनाम सुनाया था। भीष्म पुराणों के बहुत बड़े ज्ञाता थे।
भीष्म जब महाभारत के युद्ध 10वें दिन घायल होकर गिर पड़े तो उस समय सूर्य दक्षिणायन था इसलिए वे परलोक नहीं जाना चाहते थे। उन्हें पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था। लिहाजा वे अर्जुन द्वारा बनाई गई बाणों की शैय्या पर ही लेटे रहे।

 यहां किया था भीष्म ने देहत्याग


युद्ध समाप्त होने के बाद जब सूर्य उत्तरायण हो गए तब माघ मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को नरकातारी में ही भीष्म ने अपने प्राण त्यागे। भीष्म महाभारत में सबसे बलशाली पुरूष थे। वे एक पल में युद्ध को खत्म कर सकते थे, लेकिन उन्होंने शस्त्र नहीं उठाने का प्रण ले रखा था। कहा जाता है भीष्म ने लगातारा गायत्री मंत्र के उपासना से ये शक्तियां अर्जित की थीं। भीष्म ने अर्जुन को वरदान दिया था कि यदि कोई व्यक्ति पाप का अन्न खा ले, उसका मन मलिन हो जाए तो मेरे दर्शन मात्र से व निर्मल हो जाएगा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


Saturday, September 7, 2013

ज्योतिसर – यहां श्रीकृष्ण ने दिया गीता का उपदेश

कुरुक्षेत्र शहर से आठ किलोमीटर आगे पेहवा रोड पर स्थित है ज्योतिसर। ज्योतिसर वही जगह है जहां पर महाभारत के युद्ध से पहले  श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का संदेश दिया था। उन्होने अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुनाने के बाद युद्ध के लिए तैयार किया था। ब्रह्म सरोवर से ज्योतिसर आटो रिक्शा या फिर पेहवा जाने वाली लोकल बस से जाया जा सकता है। रास्ते में कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय का परिसर और कल्पना चावला तारामंडल आता है।

ज्योतिसर में पुराना वट वृक्ष है। कहा जाता है इसी पेड़ के नीचे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के 18 अध्याय सुनाए थे, जब अर्जुन ने अपने ही बंधु बांधवों के खिलाफ शस्त्र उठाने से इनकार कर दिया था। वट वृक्ष ही गीता की घटना का एक मात्र साक्षी है। यहां आने वाले श्रद्धालु इसी वृक्ष के आगे सिर नवाते हैं। ज्योतिसर नाम इसलिए कि यहां एक बड़ा सरोवर है जिसे ज्योति सर कहते हैं। ज्योति सर यानी ज्ञान का सरोवर। भला गीता के ज्ञान से बड़ा ज्ञान क्या हो सकता है। हालांकि कुछ लोग इसे ज्योतिश्वर महादेव भी कहते हैं। कहा जाता हैं यहां कभी एक प्रचीन शिव मंदिर हुआ करता था। 

आदि शंकराचार्य भी यहां गीता के बारे में चिंतन मनन के लिए पधारे थे। ज्योतिसर के परिसर में एक प्राचीन दिखाई देता शिवमंदिर कहा जाता है कि ये मंदिर कश्मीर के राजा ने बनवाया था। परिसर में कई और छोटे छोटे मंदिर हैं। ज्योतिसर में लंबे समय से लाइट एंड साउंड शो चलाया जा रहा था जिसे अब वट वृक्ष को संरक्षित रखने के लिए बंद कर दिया गया है।

कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य के प्रयासों से वर्ष 1967 में अक्षय वृक्ष के निकट एक सुंदर कृष्ण-अर्जुन रथ का निर्माण किया गया तथा साथ ही शंकराचार्य मंदिर का भी निर्माण हुआ।   इस तीर्थ की व्यवस्था कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के हाथों में है। मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात् श्री गीता जयन्ती के दिन कुरुक्षेत्र उत्सव का आयोजन किया जाता है। 


ज्योतिसर का पवित्र तीर्थ स्थान सरस्वती नदी के किनारे है। पर ये नदी अब लुप्त प्राय है। कुरुक्षेत्र  के धार्मिक महत्त्व को देखते हुए यहां पर श्री अक्षरधाम और तिरुपति बाला जी का मंदिर बनाया जा रहा है। इससे श्रद्धालुओं के साथ-साथ धार्मिक पर्यटक भी कुरुक्षेत्र आएंगे। 


1960 में दरभंगा महाराज ने इस वटवृक्ष के आसपास पक्का चबूतरा बनवा दिया। हांलाकि अब इस पक्के चबूतरे के कारण पेड़ पर संकट आ गया है। पेड़ की जड़ों को आगे फैलने की जगह नहीं मिल पा रही है।
 पर्यावरणविद अब इस चबूतरे को हटाने की बात कर रहे हैं ताकि इस वृक्ष को जिंदा रखा जा सके। यहां एक छोटा सा कृष्ण मंदिर भी बना हुआ है। यहां का सरवोर अति पवित्र माना जाता है। यहां भी स्नान करने के लिए पक्के घाट बने हुए हैं।
ज्योतिसर का वातावरण समग्र में बहुत ही रमणीक है। यहां हरियाली विराजती है। कमल पुष्पों को निहारते हुए बड़ा भला लगता है। ज्योतिसर के इस सरवोर में आजकल खिलते हैं कमल के बड़े बड़े फूल। यहां से आप फूल खरीद कर ले जा भी सकते हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य