Thursday, May 30, 2013

पोरबंदर के अमीर सेठ की बेटी थीं कस्तूरबा गांधी

पोरबंदर में बा के घर के बाहर । 
बापू का घर देख लिया तो अब चलिए बा यानी बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखने चलें। जब आप पोरबंदर में बापू का घर देखने जाते हैं तो बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी का घर देखना नहीं भूलें। बा का घर कीर्ति मंदिर के ठीक पीछे है। कीर्ति मंदिर देख लेने के बाद इसके पिछवाड़े से ही बा के घर जाने का रास्ता है। रास्ते में घर जाने के लिए मार्ग प्रदर्शक लगा हुआ है।


बा का घर तीन मंजिला है। घर देखकर लगता है कि बा के परिवार वाले अपने समय में काफी संपन्न रहे होंगे। बा के घर में तीन रसोई घर, कमरे में गुसलखाना और खाने के लिए डायनिंग हॉल भी बने हुए हैं।

बा का पूरा घर अभी भी अच्छी हालत में है। इसे पूरी तरह घूम कर देखा जा सकता है। घर को देखकर लगता है कि उनका संयुक्त परिवार था। घर में मेहमानों के लिए भी कमरे बने हुए हैं। बा का जन्म अप्रैल 1869 को हुआ था। उनका शादी के पहले नाम कस्तूरबा कपाडिया था। वे पोरबंदर के अमीर व्यापारी गोकुलदास माखरजी की बेटी थीं। 14 साल की उम्र में उनकी बापू से शादी हुई। हर सुख दुख में बापू का साये की तरह साथ निभाती रहीं बा। पर 22 फरवरी 1944 को वे पुणे में बापू का साथ छोड़ गईं। 
कस्तूरबा गांधी का घर 

वर्षा जल संचय का अनूठा इंतजाम  

दो सौ साल पुराने इस कस्तूरबा के घर में वर्षा जल संचय का अद्भुत इंतजाम है। छत से बारिश का पानी नीचे आने के लिए कई छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं। इससे छत का पानी पाइप के सहारे आधार तल पर आ जाता है। आधार तल पर जमीन के नीचे पानी की टंकी बनाई गई है जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाता है। इस पानी का इस्तेमाल बारिश के बाद दिनों में अलग अलग तरह के कार्यों के लिए किया जाता है। बताया जाता है पोरबंदर के तमाम संपन्न लोगों ने अपने घरों में बारिश के पानी के संचय के लिए इंतजाम कर रखे थे। बारिश के पानी के संचय का यह इंतजाम प्रेरक है। दो साल पहले भी पानी बचाने को लेकर लोगों में जिस तरह की चेतना थी यह आज भी सीखने योग्य है। आज सार्वजनिक भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की बात की जा रही है, पर ऐसा इंतजाम तो घर घर में होना चाहिए।

सात साल में सगाई 13 साल में शादी
बा और बापू की शादी कब हुई ये सही सही पता नहीं चलता। किसी भी पुस्तक में उनकी शादी की तारीख नहीं मिलती। इतना लिखा हुआ मिलता है कि मई 1883 में मोहनदास और कस्तूरबा का विवाह धूमधाम से हुआ। पर तारीख नहीं पता चलता। वैसे उन दोनों का विवाह होना 7 साल की उम्र में ही तय हो गया था। तय होने पर सगाई कर दी गई। पर शादी 1883 में हुई। तब बापू साढ़े 13 साल के थे और बा 14 साल की। वनमाला पारिख अपनी पुस्तक में बा का जन्म अप्रैल 1869 लिखती हैं। जन्म तारीख स्पष्ट नहीं है। ठीक इसी तरह शादी की तारीख भी स्पष्ट नहीं है। बा के पिता का नाम गोकुल दास मकन जी था। मां का नाम ब्रज कुअंर। वैष्णव परिवार था। बा के तीन भाई और दो बहनें थीं। पर लंबे समय तक जीवित बा और उनके भाई माधवदास ही रहे।

अक्षर ज्ञान से दूर बा थीं विदूषी महिला – 
काठिवाड़ में उस जमाने में लड़कियों को कोई पढ़ता ही नहीं था इसलिए बा भी पढ़ी लिखी बिल्कुल नहीं थीं। शादी के बाद बापू ने अलग अलग समय में बा को पढ़ाने की कोशिश की। तब बा गुजरात में लिखना पढ़ना सीख गई थीं। पर बापू बा के विद्वता और मानसिक स्तर की बहुत तारीफ करते हैं। अगर मौका मिला होता तो बा पढ़ने के बाद उच्च कोटि की विदूषी महिलाओं में गिनी जातीं। शादी के बाद बा और बापू के बीच अक्सर  विवाद होते थे। बापू के एक अपनी बातमनवाने वाले पति के तौर पर व्यवहार करते पर धीरे धीरे बा समझ गईं कि बापू किस मिट्टी के बने हैं। बा ने खुद को सामंजित किया और बापू के सामाजिक जीवन में उनकी बहुत बड़ी सहयोगी बनकर उभरीं। अपने आखिरी दिनों तक वे बापू के सुख दुख का ख्याल रखने में लगी रहीं। इससे बापू को अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में काफी सुविधा हुई।

बा पर पुस्तकें –
कुछ किताबें कस्तूरबा गांधी पर केंद्रित लिखी गई हैं। इनमें सबसे प्रमुख है वनमाला पारिख और सुशीला नय्यर की हमारी बा। यह गुजराती के अलावा हिंदी में भी उपलब्ध है। 

नवजीवन प्रकाशन मंदिर की इस पुस्तक में बा के बारे में प्रमाणिक जानकारियां हैं। पहली बार 1945 में प्रकाशित इस पुस्तक को खुद बापू ने भी देखा था और उसकी प्रस्तावना भी लिखी है। मूल रूप से यह पुस्तक वनमाला पारिख का प्रयास है। इस पुस्तक में गांधी जी सचिव रहे प्यारे लाल की बहन सुशीला नय्यर ने भी सहयोग किया है। पुस्तक में बा का लिखा एक दुर्लभ पत्र भी है जिसमें बा ने खुद को गांधी जी की सहधर्मिणी होने पर गर्व किया है। बा लिखती हैं – मुझे जैसा पति मिला है वैसा तो दुनिया में किसी स्त्री को नहीं मिला होगा। मेरे पति के कारण ही मैं सारे जगत में पूजी जाती हूं।

दूसरी पुस्तक बा और बापू को मुकुल भाई कलार्थी ने लिखा है। यह पुस्तक बा और बापू के बारे में संस्मरण के तौर पर है। यह भी नवजीवन प्रकाशन मंदिर से प्रकाशित है। पहली बार प्रकाशन 1962 में हुआ। इसकी प्रस्तावना मगन भाई देसाई ने लिखी है। कुल 175 पृष्ठों की पुस्तक में बा और बापू पर 120 संस्मरण हैं। पुस्तक पढ़ने पर बा और बापू के जीवन के बड़े ही सरल तरीके से चित्रात्मक स्वरूप में दृष्टिपात किया जा सकता है।

कस्तूरबा गांधी पर तीसरी पुस्तक का नाम है- बा। पहला गिरिमिटिया लिखकर चर्चित हुए गिरिराज किशोर की यह नई पुस्तक आई है – बा। यह पुस्तक भी उपन्यास शैली में लिखी गई है। गिरिराज किशोर ने पुस्तक लिखने से पहले बा के जीवन पर गहन शोध किया है। ठीक उसी तरह जैसे पहल गिरमिटिया लिखने से पहले किया था। पुस्तक 600 रुपये की है। हार्ड बांड में संस्करण में प्रकाशित है। एक अंग्रेजी लेखिका की पुस्तक भी बा पर मुझे देखने को मिली पर उसकी जानकारियां ज्यादा भरोसेमंद नहीं हैं।



-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( KASTURBA GANDHI, PORBANDAR )

Wednesday, May 29, 2013

पोरबंदर का कीर्ति मंदिर जहां महात्मा का जन्म हुआ


गुजरात का पोरबंदर यानी बापू का शहर। दो अक्टूबर 1869 को यहीं मोहन दास करमचंदर गांधी का जन्म हुआ जिसे दुनिया महात्मा गांधी के नाम से जानती है। बापू की जन्मस्थली को कीर्ति मंदिर के नाम से जाना जाता है। कीर्ति मंदिर का महत्व देश के तमाम देवी देवताओं के मंदिरों की ही तरह है। अब यहां हर रोज देश के कोने कोने से लोग पहुंचते हैं। बापू का सम्मान करने वालों के लिए यह स्थल तो सचमुच मंदिर ही है। वह कमरा जहां बापू का जन्म हुआ उसे देखने दूर दूर से लोग आते हैं। कीर्ति मंदिर तीन मंजिला है। इस घर को बापू के पिता करमचंद गांधी ने खरीदा था बाद में उसे अपनी सुविधा के अनुसार और बड़ा बनवाया। 



कीर्ति मंदिर - यहीं हुआ था बापू का जन्म। 
कीर्ति मंदिर के तीन मंजिल में 20 से ज्यादा कमरे हैं। घर की संरचना आंगन वाली है। आंगन के चारों तरफ कमरे बने हैं। ऊपर की मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। इनमें कुछ सीढियां लकड़ी की हैं। तीसरी मंजिल पर नन्हे मोहन का अध्ययन कक्ष है। घर के हर कमरे को लोगों के दर्शन के लिए खुला रखा गया है।सभी कमरे में ठंडी ठंडी हवा आती है। दुनिया भर के गांधी प्रेमियों के 
लिए कीर्ति मंदिर किसी तीर्थ की तरह है। प्रेरणा का स्थल है। अब कीर्ति मंदिर के पास के हिस्से को भव्य रूप देकर यहां एक बड़ी फोटो गैलरी बना दी गई है जहां बापू का पूरा जीवन परिचय तस्वीरों में देखा जा सकता है। कीर्ति मंदिर पोरबंदर में एमजी रोड पर शहर के बीचों बीच है।


बापू के पिता का नाम वैसे तो करमचंद गांधी था पर लोग उन्हें प्यारा से काबा गांधी कहते थे। उनके पिताका नाम उत्तम चंद गांधी था। काबा गांधी पहले पोरबंदर राजघराने के दीवान थे। बाद में राजकोट के दीवान बने। दीवान मतलब प्रधानमंत्री। जाहिर है बापू खाते पीते घर से आते थे। करमचंद गांधी ने चार शादियां की। दो पत्नियां जल्दी मर गईं. उनकी चौथी शादी पुतली बाई से हुई। पुतली बाई ने चार संतानों को जन्म दिया। सबसे बड़े लक्ष्मी दास, दूसरे करसन दास और तीसरे मोहन दास। एक बेटी भी हुई रायलता बेन। मोहन दास इनमें सबसे छोटे थे। 1869 में जन्में बापू का मई 1883 में 13 साल 6 माह की उम्र में शादी कर दी गई। कस्तूरबा उनसे कुछ महीने  बड़ी थीं। बालपन में तो बापू शादी से काफी खुश थे। नए कपड़े पहनने को मिलेंगे और खाना पीना होगा। पर बाद में बापू बाल विवाह के बड़े विरोधी हो गए। 1885 में जब मोहनदास 16 साल के थे तब पिता करमचंद गांधी स्वर्ग सिधार गए। कीर्ति मंदिर वह जगह है जहां बापू का जन्म हुआ और उनका बालपन यहां गुजरा। 
अपने स्कूली दिनों मोहनदास। 


कहां ठहरें - पोरबंदर रेलवे स्टेशन से यह दो किलोमीटर है। अगर पोरबंदर जा रहे हैं तो एमजी रोड पर होटल नटराज में ठहर सकते हैं। इसके बगल में मून पैलेस भी किफायती होटल है।


कैसे पहुंचे - पोरबंदर गुजरात का एक छोटा सा समुद्र तटीय शहर है। पोरबंदर आने के लिए दिल्ली और अहमदाबाद से सीधी रेलगाड़ियां उपलब्ध हैं। कई शहरों से विमान सेवा भी है। पोरबंदर रेलवे स्टेशन से कीर्ति मंदिर की दूरी दो किलोमीटर के आसपास है। बापू का घर शहर के मुख्य बाजार में ही स्थित है। अगर आप रेलवे स्टेशन की तरफ से आ रहे हैं। तो मुख्य बाजार के चौक पर दाहिनी तरफ मुड़े, कीर्ति मंदिर नजर आ जाएगा।


बापू के घर कीर्ति मंदिर में पहली मंजिल पर अनादि। ( मई 2013)

क्या देखें - पोरबंदर में बापू के घर कीर्ति मंदिर के अलावा कस्तूरबा का घर, सुदामा जी का मंदिर, चौपाटी, समुद्र तट, कथावाचक रमेश भाई ओझा का आश्रम ( संदीपनी आश्रम ) देखा जा सकता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( ( BAPU, KIRTI MANDIR, PORBANDAR, BIRTH PLACE ) 

Tuesday, May 28, 2013

सराय रोहिला रेलवे स्टेशन से गुजरात की ओर

बापू की धरती पर ( 17 मई 2013) 

नई दिल्ली का सराय रोहिला रेलवे स्टेशन। गुजरात और राजस्थान जाने वाली ज्यादातर रेलगाडियां यहीं से खुलती हैं। लेकिन सराय रोहिला दिल्ली के बाकी चार रेलवे स्टेशनों की तुलना में यात्री सुविधाओं के नाम पर काफी पिछड़ा हुआ है। यहां पहुंचकर लगता ही नहीं है कि आप देश राजधानी दिल्ली के किसी स्टेशन पर हैं। दिल्ली के शास्त्री नगर मेट्रो स्टेशन से एक किलोमीटर दूर स्टेशन का सड़क से पहुंच मार्ग अत्यंत संकरा है। करोलबाग की तरफ से रोहतक रोड से स्टेशन पहुंचने का रास्ता गलियों से होकर है। इस गली में गाड़िया अक्सर जाम में फंस जाती हैं।
सराय रोहिला स्टेशन भवन काफी पुराना है। प्लेटफार्म और फुटओवर ब्रिज टूटे फूटे हैं। प्लेटफार्म पर शेड्स की कमी है। कैंटीन, वेटिंग हॉल के नाम पर भी खानापूर्ति है।


दिल्ली के बाकी स्टेशनों को वर्ल्ड क्लास बनाने की कवायद चल रही है। पर सराय रोहिला स्टेशन पर रेलवे की नजरें इनायत क्यों नहीं हैं। जबकि यहां से रेलवे को बड़ा राजस्व मिलता है। यहां से गुजरात की कई ट्रेनें, मुंबई गरीब रथ, जयपुर के लिए डबल डेकर जैसी रेलगाड़ियां रोज खुलती हैं। पर स्टेशन पर इंतजाम के नाम पर कुछ भी नहीं। सराय रोहिला किसी जमाने में मीटर गेज का स्टेशन हुआ करता था। पर राजस्थान और गुजरात की ज्यादातर लाइनें ब्राडगेज हो जाने के बाद अब स्टेशन से मीटर गेज खत्म हो चुका है। 


रेलवे केटरिंग का घटिया खाना

जामनगर के बाद एक स्टेशन पर खड़ी पोरबंदर एक्सप्रेस 
अब बात दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस की। 19264 पोरबंदर एक्सप्रेस सोमवार और गुरुवार को यहां से चलती है। हमारी यात्रा 16 मई गुरुवार के दिन आरंभ हुई। ट्रेन दिल्ली से समय पर यानी सुबह 8.20 बजे खुल गई। माउंट आबू के रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म पर मिलने वाली रबड़ी की खूब तारीफ सुनी थी। पर खाया तो उसका स्वाद औसत निकला।
हमने इस सफर में पाया कि गुजरात जाने वाली इस महत्वपूर्ण ट्रेन की रखरखाव के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। सबसे बुरा हाल ट्रेन की केटरिंग व्यवस्था का है। हमने रात का खाना आर्डर किया। 85 रुपये की थाली। इस थाली में मटर बिल्कुल कच्चे थे। दाल अधपकी थी। पराठे भी पके हुए नहीं थे। चावल घटिया क्वालिटी का था। ये समझ में नहीं आया कि 85 रुपये किस बात के लिए जा रहे हैं। वहीं जब हमने महाराष्ट्र में सतारा कोपरगांव के बीच महाराष्ट्र एक्सप्रेस में खाना आर्डर किया तो महज 50 रुपये में इससे काफी बेहतर खाना मिला। कई ट्रेनों में आईआरसीटीसी के ठेकेदार खाने के नाम पर रेल यात्रियों को लूट रहे हैं। खासतौर पर दिल्ली पोरबंदर एक्सप्रेस की केटरिंग ठीक किए जाने की जरूरत है। इससे तो अच्छा हो कि गुजरात के लोकप्रिय रेस्टोरेंट्स को ट्रेन में गुजराती थाली परोसने की व्यवस्था की जाए। इससे गुजरात जाने वाली ट्रेन में खूशबू गुजरात की महसूस की जा सकेगी।

17 मई की सुबह हुई तो हम गुजरात में थे। अहमदाबाद पीछे छूट गया था। हमने सुबह का नास्ता राजकोट जंक्शन में लिया। यहां ट्रेन का ठहराव 15 मिनट का था। नास्ते में अगर गुजरात में हैं तो भला ढोकला के अलावा और क्या हो सकता है। हमारा आरक्षण जामनगर तक का ही था। पहले हम जामनगर से द्वारका जाने वाले थे। पर अब हमने योजना में थोड़ा बदलाव किया था। हम पहले पोरबंदर जाना चाहते थे। चलती ट्रेन में टिकट का विस्तार कराया।



ट्रेन जामनगर से आगे भाग रही थी। हरियाली कम होती जा रही है। आसपास में पवन ऊर्जा से बिजली बनाने वाली इकाइयां दिखाई दे रही हैं। ट्रेन दोपहर एक बजे द्वारका पहुंच गई। ट्रेन से उतरते ही हमने बापू की जन्मभूमि की मिट्टी को नमन किया। हमने होटल नटराज में ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। पर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही भूख लग रही थी, सो होटल पहुंचे से पहले जो शाकाहारी भोजनालय दिखा वहां खाने के लिए बैठ गए। खाने के बाद होटल नटराज पहुंचकर यात्रा की सारी थकान जाती रही। होटल का कमरा और साफ सफाई और बाकी इंतजाम काफी बेहतर था। कमरे का किराया महज 500 रुपये। होटल एमजी रोड पर मु्ख्य बाजार में स्थित है। रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है।  
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- -  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( यात्रा का मार्ग - दिल्ली- माउंट आबू- अहमदाबाद - पोरबंदर - द्वारका - ओखा-भेट द्वारका - सोमनाथ- वेरावल- दीव- वेरावल- अहमदाबाद - गांधीनगर - वडोदरा -मुंबई - पूणे - पंचगनी- महाबलेश्वर- वाई- सतारा- कोपरगांव- शिरडी - नासिक - खंडवा- ओंकारेश्वर -उज्जैन - दिल्ली ) 


( PORBANDAR, RAIL , GANDHI, SRAI ROHILLA, PANTRY CAR FOOD  )

Saturday, May 25, 2013

963 झरोखों वाला गुलाबी नगरी का हवा महल

गुलाबी शहर जयपुर में स्थित हवा महल राधा और कृष्ण को समर्पित है। यह महल जयपुर शहर की पहचान है। यह एक राजसी-महल है। सन 1798 में बना ये महल किसी राजमुकुट सा दिखाई देता है। हवा महल की पांच-मंजिला इमारत ऊपर से महज डेढ़ फीट चौड़ी है।  यह बाहर से देखने पर हवा महल किसी मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखाई देती है।
हवा महल में 963 बेहद खूबसूरत छोटे-छोटे जालीदार झरोखे हैं। इन झरोखों को जालीदार बनाने के पीछे मूल भावना यह थी कि बिना बाहरी लोगों की निगाह पड़े राजमहल का महिलाएं इन झरोखों से महल के नीचे सडकों के समारोह और गलियारों में होने वाली रोजमर्रा की जिंदगी की गतिविधियों का नजारा कर सकें।
इसके अलावा "वेंचुरी प्रभाव" के कारण इन जटिल संरचना वाले जालीदार झरोखों से हमेशा ठंडी हवा, महल के भीतर आती रहती है।  इस कारण से तेज गर्मी में भी महल हमेशा वातानुकूलित सा ही रहता है। हवा महल महाराजा जय सिंह का विश्राम करने का पसंदीदा स्थान था क्योंकि इसकी आतंरिक साज-सज्जा बेहद खूबसूरत है।

हवा महल को महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने बनवाया था। इसके वास्तुकार लाल चंद उस्ताद थे। महल का निर्माण चूने, लाल और गुलाबी बलुआ पत्थर से हुआ है। हवा महल की ऊंचाई 50 फीट (15 मीटर) है। इसके शिल्प में हिन्दू राजपूत शिल्प कला और मुगल शैली का एक अनूठा मेल दिखाई देता है। फूल-पत्तियों का आकर्षक काम, गुम्बद और विशाल खम्भे राजपूत शिल्प कला का बेजोड़ उदाहरण हैं,  तो पत्थर पर की गयी मुगल शैली का नमूना है।
हवा महल अनेक अर्द्ध अष्टभुजाकार झरोखों को समेटे हुए है, जो इसे दुनिया भर में बेमिसाल बनाते हैं। इमारत के पीछे की ओर के भीतरी भाग में अलग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार कमरे बने हुए हैं जिनका निर्माण बहुत कम अलंकरण वाले खम्भों व गलियारों के साथ किया गया है और ये भवन की शीर्ष मंजिल तक इसी प्रकार हैं।

खुलने का समय – सुबह 9.00 बजे से शाम 4.30 बजे तक खुला रहता हवा महल। यह  पुराने जयपुर के प्रसिद्ध जौहरी बाजार के पास स्थित है। यहां पहुंचने के लिए निकटम मेट्रो रेल का स्टेशन चांद पोल है। आप चांद पोल से टहलते हुए गुलाबी शहर का नाजारा लेते हुए हवा महल तक पहुंच सकते हैं।

 
हवा महल की मुंडेर पर अनादि के साथ ) ( मार्च 2008)


Friday, May 10, 2013

सोनपुर-वाराणसी पैसेंजर में पांच साल सफर

पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र रहा। 1990 से 1995 के बीच पिताश्री की पोस्टिंग हाजीपुर में हुआ करती थी। हाजीपुर से वाराणसी आने का सबसे सस्ता तरीका हुआ करता था सोनपुर वाराणसी पैसेंजर (SONEPUR ALLAHABAD CITY PASSENGER) । तब ये ट्रेन मीटर गेज पर चलती थी। किराया था 16 रुपये। शाम 5 बजे सोनपुर से खुलने वाली पैसेंजर सुबह 5 बजे से पहले वाराणसी पहुंचा देती थी। पहली बार इस ट्रेन से बनारस आया था अपने एलएस कालेज के दोस्त विष्णु वैभव के साथ। सोनपुर से परमानंदपुर, शीतलपुर, दीघवारा होते हुए छपरा कचहरी।

 फिर छपरा, गौतम स्थान, मांझी का पुल बकुलहां और ट्रेन घुस गई यूपी में। मैं अपना बैग खोलता हूं, मां ने जो राह के लिए बनाकर दिया है, पूड़ियां और भुजिया उसे उदरस्थ करता हूं। इसके बाद भी सोने का तो कोई सवाल ही नहीं होता था। वाराणसी की ओर आगे बढ़ने के साथ ही पैसेंजर ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाती थी। सुरेमनपुर, बलिया, चितबड़ागांव, फेफना जंक्शन, सागरपाली जैसे स्टेशनों के बाद आता था औरिहार जंक्शन। यहां से गोरखपुर के लिए लाइन अलग होती है। वाराणसी से पहले आता था ऐतिहास पर्यटन स्थली सारनाथ। ये सब स्टेशन रात में होते थे लेकिन भीड़ के कारण जागते रहना पड़ता था। कई बार मैं 20 रुपये अतिरिक्त देकर पैंसेजर में स्लीपर कोच में जाकर आरक्षण करा लेता था। तब सफर आरामदेह हो जाता था। पर उस समय 20 रुपये की भी बहुत कीमत थी। ये बच जाए को बनारस में कई बार लौंगलता खाया जा सकता था। लौंगलता बनारस की लोकप्रिय मिठाई है।
 वाराणसी सोनपुर पैंसेजर पहले सोनपुर से  इलाहाबाद सिटी तक जाती थी। तब वाराणसी से भुलनपुर (डीएलडब्लू) माधो सिंह होते हुए इलाहाबाद सिटी (रामबाग) के लिए मीटरगेज लाइन थी। मैं 1990 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा देने भी सोनपुर से इलाहाबाद मीटर गेज की पैसेंजर ट्रेन में ही बैठकर गया था। वह एक लबा और उबाऊ सफर था। हमारे पास पता था मालति प्रजापति का जो लाला की सराय में रहती थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया था। कविताएं भी लिखती थीं। उनके घर रहकर ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी थी। हालांकि मेरा चयन इलाहाबाद और बीएचयू दोनों जगह हो गया। पर बीएचयू का कैंपस और होस्टल मुझे भा गए थे इसलिए एडमिशन बीएचयू में लेना तय किया। यहां होस्टल मिलने की गारंटी थी क्योंकि प्रवेश परीक्षा में मैं सेकैंड टॉप था। इंडेक्स 250 में 222 आया था। 1990 के जुलाई में मैं वाराणसी आ गया।

वाराणसी सोनपुर पैसेंजर के अलावा हमारे पास विकल्प थी जीएल यान गौहाटी इलाहाबाद एक्सप्रेस। ये ट्रेन कभी गुवाहाटी से लखनऊ तक जाती थी इसलिए ये जीएल कहलाती थी। ये ट्रेन रात को 8 बजे हाजीपुर से ही मिल जाती थी। पर इसमें 50 रुपये के करीब टिकट का लग जाता था। पीछे से आने के कारण जीएल कई बार लेट भी जाती थी। 1993-94 में वाराणसी इलाहाबाद के बीच की मीटरगेज लाइन ब्राडगेज में बदल गई। तब जीएल को वाराणसी तक ही सीमित कर दिया गया।
ओटी मेल की याद
लखनऊ के चारबाग स्थित लखनऊ जंक्शन स्टेशन से उन दिनों सुबह आठ बजे पूर्वोत्तर रेलवे की प्रतिष्ठित ट्रेन लखनऊ-गुवाहाटी (तत्कालीन गौहाटी) अवध तिरहुत मेल ( OUDH TIRHUT MAIL) रवाना हुआ करती थी। यह ट्रेन ओटी मेल के संक्षिप्त नाम से लोकप्रिय थी। इस ट्रेन में शानदार डाइनिंग कार भी हुआ करता था। यह ट्रेन अपने समय देश की सबसे लंबी मीटर गेज ट्रेन थी। यह ट्रेन गुवाहाटी से लखनऊ के बीच 1427 किलोमीटर की दूरी तय करती थी। बाद में मीटर गेज का संभवतः पहला डीजल इंजन भी इसी ट्रेन को मिला था। तब लखनऊ जंक्शन स्टेशन पर सिर्फ मीटर गेज की ट्रेनें आती-जाती थीं। अस्सी के दशक में लखनऊ-गोरखपुर-बरौनी-गुवाहाटी रूट मीटर गेज से ब्रॉड गेज में बदले जाने के साथ ही इस प्रतिष्ठित ट्रेन का मार्ग बदल दिया गया। यह ट्रेन गेज गुवाहाटी से बरौनी, हाजीपुर, सोनपुर, छपरा, बलिया वाराणसी होकर इलाहाबाद के बीच चलने लगी। वाराणसी से इलाहाबाद के बीच आमान परिवर्तन हो जाने के बाद ये सीमित तौर पर वाराणसी से सिलिगुड़ी के बीच चलती रही। एक दिन ऐसा आया जब इस ट्रेन की पटिरयों विदाई हो गई। आज भारतीय रेलवे के यात्री डिब्बों के लिए जो नीला और आसमानी रंग सामान्यतः प्रयुक्त होता है वह बहुत पहले ही ओटी मेल के डिब्बों पर देखा जा सकता था। तब अन्य यात्री ट्रेनों में डिब्बे आमतौर पर लाल रंग के हुआ करते थे।  1996 में औरिहार छपरा खंड बड़ी लाइन में बदल गया। इसके साथ ही बलिया जिला छोटी लाइन इतिहास हो गई। हालांकि तब मैं वाराणसी छोड़कर दिल्ली आ गया था। बाद में ओटी मेल मीटरगेज पर लखनऊ से लालकुआं के बीच चल रही थी।

दिसंबर 2011 के आखिरी दिन के साथ ही बरेली से लालकुंआ तक जाने वाली मीटर गेज की रेलगाड़ी भी इतिहास बन गई। तकरीबन 126 साल का इस रेलगाड़ी का यह सफर 1 जनवरी 2012 से इतिहास में दर्ज हो गया। लाल कुंआ से चलने वाली  छोटी लाइन की सभी रेल गाड़ियां भी बंद हो गई। लालकुआं रेलवे स्टेशन से नवाबों के शहर लखनऊ तक, छोटी लाईन की यह रेल 23 अप्रैल 1882 को अवध तिरहुत मेल के नाम से शुरू हुई थी। भारत में पहली बार रेल का संचालन 16 अप्रैल 1853 को होने के लगभग 30 साल बाद रेल लाल कुंआ के रास्ते काठगोदाम पहुंची और काठगोदाम रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली ये ट्रेन कभी पूर्वोत्तर के शहर गुवाहाटी तक का लंबा सफर तय करती थी।
vidyutp@gmail.com

(BHU, BIHAR, RAIL, UTTAR PRADESH, SONEPUR, VARANASI )