Friday, November 30, 2012

मदुरै के पोंगल स्वाद - जो रहे याद

पोंगल - श्री सबरीज में - विद्युत प्रकाश 
तमिलनाडु का शहर मदुरै खाने पीने मे भी नफीस नगर है। अगर आप उत्तर भारतीय खाना चाहते हैं तो स्टेशन के सामने बांगड़ धर्मशाला में पहुंचे। बांगड़ धर्मशाला में रहने की व्यवस्था है साथ ही यहां उत्तर भारतीय भोजनालय भी है। हालांकि हमारी यात्रा के दौरान इस धर्मशाला में पुनर्निमाण कार्य चल रहा था, इसलिए हम यहां का स्वाद नहीं ले सके। लेकिन मदुरै शहर जाना जाता है अपने खास तमिलानाडु स्टाइल वाले शाकाहारी भोजनालयों के लिए।

सुबह की ईरानी चाय - शहर की सुबह होती अलग अलग टी स्टाल पर चाय की चुस्की के साथ। चाय तो पूरे देश में बनती है लेकिन चाय को फेंटने का खास अंदाज है मदुरै के टी स्टाल्स का। ये समवार में बनने वाली ईरानी चाय है। तो आप मदुरै शहर में हैं तो चाय की एक चुस्की जरुर लें। फिर ले स्वाद सुबह के नास्ते में इडली का। इडली दस रुपये में दो से लेकर 16 रुपये में दो तक मिलती है। यह रेस्टोरेंट के स्डैंडर्ड पर निर्भर करता है।
मदुरै का होटल श्री सबरीज, मदुरै। ( जरुर जाइए )
रेलवे स्टेशन से मीनाक्षी मंदिर जाने वाले रास्ते में कालेज हाउस की बिल्डिंग में मीनाक्षी भवन नास्ते और खाने के लिए अच्छी जगह है। पर हमने जो मदुरै में खाने के लिए सबसे अच्छी जगह ढूंढी वह है ठीक कालेज हाउस के सामने सबरीज।

सबरीज शानदार डेकोरेशन वाला मध्यमवर्गीय भोजनालय है। प्रवेश करते ही सामने मंदिर। दीवारों पर मदुरै शहर के ऐतिहासिक चित्र। वर्दीधारी वेटर अति व्यवहार कुशल। सबरीज में खाने वालों की हमेशा भीड़ रहती। एक खाली टेबल ढूंढने में आपको वक्त लग सकता है। लेकिन 60 रुपये की मिल्स की थाली जब केले के पत्ते में आपके सामने होगी आपका दिल खुश हो जाएगा। अलग अलग स्वाद देखकर।

सबरीज का पोंगल, लेमन राइस, कर्ड राइस का तो कहना ही क्या। दिन में खाने के बाद हम इस भोजनालय के स्वाद के ऐसे मुरीद हुए कि रात को कहीं और जाने की इच्छा ही नहीं हुई। घूमघाम कर फिर यहीं पहुंचे। जैसा की आपको पता है कि दक्षिण भारतीय थाली मतलब चाहे जितना खाओ। हां थाली में छोटे बच्चों की शेयरिंग पर भी कोई रोक नहीं है।
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---- विद्युत प्रकाश मौर्य ( HOTEL SRI SABAREESH, MADURAI, TAMILNADU, BANGAD DHARAMSHALA)   

Thursday, November 29, 2012

मदुरै का गांधी म्यूजियम


दक्षिण भारत के कई शहरों में गांधी जी की स्मृतियां हैं। त्रिवेंद्रम को गांधी जी ने सदाबहार शहर कहा था। तो कन्याकुमारी में बापू की स्मृति में गांधी मंडप बना है। वहीं तमिलनाडु के मदुरै शहर में गांधी संग्रहालय है। मदुरै पहुंचने पर हमारी इच्छा गांधी म्यूजियम जाने की हुई। हम लोग रेलवे स्टेशन के पास न्यू रूबी लॉज में ठहरे थे। मैं और बेटे अनादि चल पड़े गांधी म्यूजिम। स्टेशन के पास वाले बस स्टैंड से लोकल बस ली। बस वैगेई नदी को पार कर तामुकम पहुंची। कंडक्टर महोदय ने बताया यहां आप उतर जाएं सामने गांधी म्यूजिम है।
 बस स्टाप के पास बीएसएनएल का बडा दफ्तर था। आधा किलोमीटर पैदल चलने के रास्ते में मदुरै की बड़ी रंगशाला मिली। यहां अक्सर नाटक होते हैं। सफेद रंग की विशाल बिल्डिंग में है गांधी म्यूजिम। ये संग्रहालय तिरुमल नायक वंश के ऐतिहासिक महल में बना है। कोई प्रवेश टिकट नहीं। दो मंजिले म्यूजिम में गांधी जी के जीवन की कहानी के साथ साथ देश की आजादी की कहानी बताई गई है। कुछ श्वेत श्याम कुछ रंगीन चित्र। पर क्या खास है संग्रहालय में।

खून के छींटे वाले गमछे को देखें - उपरी मंजिल पर हमें देखने को मिला बापू के इस्तेमाल किए गमछे का एक टुकड़ा। यह वही गमछा है जिसे बापू ने आखिरी वक्त में अपने शरीर पर डाल रखा था। बापू को 30 जनवरी 1948 को गोली लगने के बाद खून के छींटे के निशान इस गमछे पर हैं। बापू के मदुरै में रहने वाले सहयोगी इस गमछे को लेकर आए मदुरै के संग्रहालय में। म्यूजिम के बाहर एक पुस्तक बिक्रय केंद्र भी है। पड़ोस में एक राज्य सरकार का पुरात्तव विभाग का भी संग्रहालय है। एक विशाल डायनासोर की प्रतिमा भी है।

अनूठा बाल उद्यान - 
मदुरै के इस बापू के संग्रहालय को देखने तमिलनाडु में आसपास से स्कूली बच्चे बड़ी संख्या में आते हैं। संग्रहालय के ठीक सामने बच्चों के लिए बहुत बड़ा एम्यूजमेंट पार्क है। इस पार्क में एक से बढ़कर एक खेलकूद के सामान और झूले आदि हैं। इन सब झूलों के रेट भी बड़े मुनासिब हैं। सबसे अच्छी बात है कि इन शानदार झूलों के लिए कोई प्रवेश टिकट नहीं है। यानी मुफ्त में जमकर मौज मस्ती करो। अनादि तो घंटे एक झूले से दूसरे झूले पर मौज मस्ती करते रहे।

-    ---- विद्युत प्रकाश 

((GANDHI, MADURAI, TAMILNADU ) 

Wednesday, November 28, 2012

मां पार्वती का मंदिर- मीनाक्षी मंदिर


मदुरै का मीनाक्षी मंदिर दक्षिण भारत के सबसे बड़े परिसर वाले मंदिरों में से एक है। 

स्थापत्य कला की दृष्टि से इसे भारत के सात आश्चर्यों में से एक माना जाता है। मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर है। मीनाक्षी यानी देवी पार्वती का रुप और सुंदरेश्वर यानी शिव। कहा जाता है एक जन्म में पार्वती मीनाक्षी के रुप में तमिल प्रदेश में एक राजा के घर में पैदा हुईं तो शिव सुंदरेश्वर के रुप में। इस जन्म में मीनाक्षी को सुंदरेश्वर को पाने के लिए तपस्या करनी पड़ी।
मीनाक्षी मंदिर मदुरै रेलवे स्टेशन से महज आधा किलोमीटर है। अगर आप मदुरै में सिर्फ मीनाक्षी मंदिर देखना चाहते हैं तो अपना सामान क्लाक रुम में जमा करके मंदिर दर्शन के बाद अगले शहर को प्रस्थान कर सकते हैं। या फिर रेलवे स्टेशन और मंदिर के आसपास भी सस्ते आवास मिल सकते हैं। मंदिर के आसपास दुकानों में भी क्लाक रुम की सुविधा है। मंदिर में मोबाइल कैमरे भी वर्जित हैं। कैमरे का इस्तेमाल शुल्क देकर किया जा सकता है। दक्षिण के अन्य मंदिरों की तरह यहां भी ड्रेस कोड है। पर पुरुषों के लिए बंदिश नहीं महिलाएं शार्ट्स या स्कर्ट आदि पहन कर मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती हैं।
मंदिर में दर्शन लिए श्रद्धालुओं की सालों भर भीड़ होती है। मीनाक्षी मंदिर में सुबह और शाम दर्शन किए जा सकते हैं। दोपहर में मंदिर बंद होने के बाद शाम को पांच बजे खुलता है। कई एकड़ में बने मीनाक्षी मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं। हर प्रवेश द्वार पर विशाल गोपुरम है। इन गोपुरम में देवी देवताओं के प्रतिमाएं हैं। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा गणेश और भगवान शिव के भी मंदिर हैं। पूरा मंदिर पत्थरों से बना है। मंदिर परिसर में यज्ञशाला और रंगमंडप भी है।

 हर रोज शाम के मंदिर में देवी की स्तुति में गायन और नृत्य के कार्यक्रम भी होते हैं। मंदिर परिसर में गजराज महाराज भी भक्तों को आशीर्वाद देते नजर आते हैं। हमने भी मंदिर की नृत्यशाला में सांस्कृतिक आयोजन का रसास्वादन किया। 
मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालु ये याद रखें कि उन्होंने कौन से द्वार से प्रवेश किया था। फिर वापस भी उसी द्वार से निकलें। वर्ना गलत द्वार से बाहर होने पर आप शहर के किसी और इलाके में पहुंच सकते हैं।
-    विद्युत प्रकाश
( MINAXI TEMPLE, MADURAI) 

Tuesday, November 27, 2012

तमिलनाडु की सांस्कृतिक राजधानी - मदुरै


मदुरै -मीनाक्षी मंदिर जाने वाली सड़क। 
तमिलनाडु का सबसे बड़ा शहर तो इसकी राजधानी चेन्नई है। लेकिन राज्य में कोयंबटूर, मदुरै, त्रिचनापल्ली दूसरे बड़े शहर हैं। इनमें मदुरै शहर भौगोलिक दृष्टि से तमिलनाडु के ठीक बीचों बीच स्थित है। ये तमिलनाडु का सांस्कृतिक राजधानी जैसा है। अगर आप तमिलाडु घूमने निकले हैं मदुरै को केंद्र बनाकर पूरे तमिलनाडु का भ्रमण कर सकते हैं। मदुरै से कन्याकुमारी, रामेश्वरम और कोयंबटूर लगभग बराबर दूरी पर हैं। वैगेई नदी मदुरै शहर के बीचों बीच बहती है। हालांकि अक्सर इसमें पानी नहीं दिखाई देता। मदुरै की आबादी दस लाख के पार कर चुकी है। यहां मद्रास हाई कोर्ट की बेंच भी स्थापित है। शहर तमिनाडु की राजनीति का बड़ा केंद्र है। करुणानिधि के बड़े बेटे एमके अलागिरी यहां से राजनीति करते हैं। फिलहाल वे यहां से सांसद और केंद्र में मंत्री हैं।
मदुरै शहर का समृद्ध इतिहास रहा है। दो हजार साल पहले शहर के कारोबारी रिश्ते विदेश के भी कई शहरों से थे। मदुरै में दक्षिण भारत के सम्मानित आटोमोबाइल समूह टीवीएस का हेडक्वार्टर भी है। 


मदुरै का रेलवे स्टेशन 
मदुरै रेलवे स्टेशन के ठीक सामने टीवीएस की बड़ी सी बिल्डिंग है। शहर में सिटी बसें चलती हैं। इन बसों में हालांकि कम से कम किराया सात रुपये है। मदुरै में मीनाक्षी मंदिर, गांधी म्यूजियम के अलावा तिरुमल नायक पैलेस देखा जा सकता है। ये किला कभी मदुरै पर राज करने वाले राजाओं का है। मदुरै रेलवे स्टेशन के सामने ही रहने के लिए कई अच्छे मिड्ल बजट वाले होटल हैं। शहर पारंपरिक खाने पीने के लिए आपको कई विकल्प उपलब्ध कराता है। शापिंग के लिए भी मदुरै आदर्श जगह है। यहां से आप दक्षिण भारत के तमाम शहरों में बनने वाले काटन होजरी के उत्पाद रियायती कीमतों पर खरीद सकते हैं। खासतौर पर त्रिपूर के बने उत्पाद मदुरै में खरीदे जा सकते हैं। रेलवे स्टेशन और मीनाक्षी मंदिर के आसपास मदुरै शहर का बाजार है।

-    --विद्युत प्रकाश 

Monday, November 26, 2012

कन्याकुमारी से मदुरै की ओर

कन्याकुमारी से हमारी चलने की वेला थी। हमारी ट्रेन नगर कोविल जंक्शन से थी। हमारा होटल केप रेसीडेंसी नगर कोविल रोड पर ही था। सो हमें वहीं पास के बस स्टाप से नगर कोविल की बस मिल गई। आधे घंटे में हम पहुंच गए नगर कोविल जंक्शन। बस ने रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क पर उतार दिया। हमें थोड़ा पैदल चल कर रेलवे स्टेशन पहुंचना पड़ा। रास्ते में अंधेरा था। ट्रेन आने में अभी समय था हमें तकरीबन दो घंटे स्टेशन पर इंतजार करना पड़ा। इस दौरान हमने स्टेशन के कैंटीन में खाना खाया। खाना बहुत ही रियायती दरों पर था।

नगर कोविल का स्टेशन कोड है NCJ रात सवा 11 बजे हमारी ट्रेन थी मदुरै पैसेंजर। 56701 पैसेंजर पुनालुर से त्रिवेंद्रम होते हुए आती है। नगर कोविल में इसका समय रात 10.30 में आने का 10.40 में खुलने का है। लेकिन इसके स्लीपर क्लास में हमारा आरक्षण था। ट्रेन के पास पहुंचे तो टीटीई महोदय गेट पर खड़े थे। टिकट मांगा हमने एसएमएस दिखाया। अंदर जाने की अनुमति दी। यानी कोई फालतू आदमी कोच के अंदर नहीं।


पहली बार भारतीय रेल में इतनी अच्छी ड्यूटी देखी किसी टीटीई की। वर्ना दिल्ली से बिहार जाने वाली ट्रेनों में तो घंटों टीटीई आते ही नहीं। टीटी बाबू ने पूछने पर बताया कि ट्रेन सुबह साढ़े पांच बजे मदुरै पहुंच जाएगी। हमलोग अपनी अपनी बर्थ पर सो गए। पेट पूजा नगर कोविल जंक्शन की कैंटीन में कर ली थी। रास्ते में कौन से स्टेशन आए याद नहीं।

ट्रेन ने पहुंचाया एक घंटा पहले -  नींद खुली तो सुबह के 4.20 हो रहे थे। ट्रेन खड़ी थी बाहर झांक कर देखा तो मदुरै जंक्शन। भरोसा नहीं हुआ। तय समय से एक घंटे पहले मदुरै। आस पास के यात्रियों को जगाकर पूछा। लोगों ने कहा कभी कभी ऐसा भी होता है। एक बार फिर सुखद अचरज हुआ। भारतीय रेल ने मंजिल पर पहुंचाया एक घंटा पहले। अब इतनी सुबह स्टेशन के बाहर कहां जाएं।

प्लेटफार्म नंबर एक पर मिला वातानुकूलित प्रतीक्षालय। सबके लिए 10 रुपये प्रति घंटे देकर इस्तेमाल करने वाला। शानदार सोफे लगे हुए। पसर कर सो जाइए। अंदर शौचालय और स्नानागार की भी सुविधा इसी राशि में। भला इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। दक्षिण भारत के कई और रेलवे स्टेशनों पर इस तरह के पेड प्रतीक्षालय बनाए गए हैं जो यात्रियों के लिए काफी सुविधा जनक हैं। सूरज उगने के बाद हमलोग स्टेशन से बाहर निकले मदुरै के सड़कों पर।
-  ---   विद्युत प्रकाश    
((RAIL, TAMILNADU, MADURAI )

Sunday, November 25, 2012

हर मौसम का आम का मौसम


कन्याकुमार सागर तट पर आम - कच्चे आम का स्वाद 
पके आम तो सब खाते हैं लेकिन कच्चे आम खाने का मजा ही कुछ और है। उत्तर भारत में अक्टूबर महीने में भले ही आम नहीं मिलता हो लेकिन कन्याकुमारी में जब कच्चा आम बिकते हुए देखा तो बड़ा अचरज हुआ।

 कच्चे आम को बड़े ही डिजाइनर अंदाज में काटकर फुटपाथ पर सजे दुकानों में बेचा जाता है। ये आम स्वाद में हल्के से खट्टे होते हैं। लेकिन आम के साथ नमक और लाल मिर्च का मसाला लगाकर पेश किया जाता है। दस रुपये में एक आम। मैंने खरीदा और खाना शुरू किया तो बेटे अनादि का भी मन मचलने लगा। तब हमने स्वाद साझा किया।

थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे आम का पेड़ भी दिखाई दे गया जहां कच्चे आम लटक रहे थे। कच्चे आम मदुराई और रामेश्वरम की सड़कों पर भी बिकते हुए दिखाई दिए। जब तिरुपति से बाला जी के दर्शन के लिए तिरुमला हिल्स पहुंचे तो वहां एक बार फिर आम बिकते देखा।
तिरुपति बालाजी के दरबार में भी कच्चे आम का स्वाद 
कुछ इसी तरह डिजाइनर अंदाज में। एक बार फिर आम खाने की इच्छा हुई। 

हमने अनादि से पूछा कुछ खट्टा हो जाए...तो ये है हर मौसम आम का मौसम। जब जी करे तब खाओ। दक्षिण भारत में सर्दी हो या फिर गर्मी आम का मौसम कभी नहीं जाता।
तभी तो हमारे उत्तर भारत में भी सबसे पहले पके हुए आम दक्षिण भारत से ही आते हैं। लेकिन डिजाइनर अंदाज में काट कर कच्चे आमों को खाने का रिवाज यहीं दिखा। कभी बचपन में हम आम के बगीचे में घुमौवा बनाकर खाते थे। कच्ची अमिया की। कसम से उसकी याद आ गई एक बार फिर। तो हो जाए एक बार फिर कच्चा आम।


सुनामी का दर्द और मछुआरे -  कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल के पास मछुआरे दिखाई दिए जो अपनी जाल के मरम्मत में व्यस्त थे। समुंदर से मछलियां पकड़ना यहां मुख्य व्यवसाय है। पर सुनामी के दौरान इन मछुआरों के विनाशकारी आपदा का सामना करना पड़ा था। कन्याकुमारी में हमें फिश आक्शन सेंटर का भवन दिखाई देता है। हाल में बना यह भवन सीआईआई और हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के सौजन्य से बनाया गया है। इसके उदघाटन शिलापट्ट पर 15 मार्च 2009 की तारीख अंकित है। शिलापट्ट पर हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की संपादकीय निदेशक शोभना भरतीया का नाम लिखा गया है। सुदूर दक्षिण में अपने समाचार पत्र द्वारा करवाए गए इस पुनीत कार्य को देखकर खुशी होती है। 

-    ------विद्युत प्रकाश
( ( MANGO, TAMILNADU, TSUNAMI, HT MEDIA ) 

Friday, November 23, 2012

कन्याकुमारी का लेडी ऑफ रैनसम चर्च

देश का आखिरी छोर तमिलनाडु का शहर कन्याकुमारी। जहां तीन समंदर भारत भूमि को चूमते हैं। वहां कन्याकुमारी का कुमारी अम्मान मंदिर और विवेकानंद रॉक मेमोरियल तो है हीं। एक और धार्मिक स्थली है यहां। जी हां, कन्याकुमारी में समंदर के किनारे एक और आकर्षण है लेडी ऑफ रैनसम चर्च। इस सुंदर चर्च का निर्माण 1914 में हुआ था। समंदर के किनारे पीले रंग का ये चर्च दूर से ही दिखाई देता है। इस चर्च का गुंबद 153 फीट ऊंचा है। चर्च के मुख्य भवन की लंबाई 153 फीट और चौड़ाई 53 फीट है। यदि आप कन्याकुमारी में हैं तो लेडी ऑफ़ रैनसम चर्च ज़रूर जाएं। ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि महान संत सेंट थामस भी यहां पर आए थे। वहीं 1542 में यहां पर सेंट फ्रांसिस जेवियर भी आए।

इस चर्च को ऑवर लेडी ऑफ रैनसम के नाम से भी जाना जाता है। तो यहां के लोगों द्वारा प्यार से ईसा की मां का चर्च कहा जाता है। जब आप समुन्दर के किनारे खड़े होकर तीन विशाल ऑफ वाइट गोथिक टावर को देखेंगे तो आपको अपने आप ही पुर्तगाली सभ्यता का अनुभव होगा। इस चर्च की इमारत बहुत ही ऐतिहासिक और पुरानी है। सौ साल से ज्यादा पुरानी यह इमारत मदर मैरी को समर्पित है।

इस चर्च में सबसे पहले जो चीज़ आपका ध्यान आकर्षित करेगी वो है बीच में खड़ा ऊंचा टावर जिसके क्राउन में लगे क्रॉस की सोने के चमक आपका दिल लुभाने को मजबूर कर देगी।

इस चर्च की सुन्दरता सच में आने वाले लोगों को मंत्र मुग्ध कर देती है। समंदर के किनारे खड़ी चर्च की इमारत सागर की लहरों के साथ मिलकर सुंदर नजारा पेश करती है। यहां आकर घंटों बैठकर अद्भुत शांति मिलती है। चर्च का प्रार्थना हॉल काफी बड़ा है। चर्च के अंदर मदर मेरी और इसा मसीह के जीवन से जुड़ी कहानियों को दर्शाती कुछ तस्वीरें भी लगी हैं।

-         -------  विद्युत प्रकाश मौर्य 

(OUR LADY RANSOM CHURCH, KANYAKUMARI, TAMILNADU) 

Wednesday, November 21, 2012

कन्याकुमारी और स्वामी विवेकानंद


कन्याकुमारी से स्वामी विवेकानंद का बड़ा ही गहरा संबंध हैं। देश भर घूमते हुए जब संन्यासी विवेकानंद कन्याकुमारी पहुंचे। तब सागर तट पर बैठ कर वे देर तक ध्यान में रहे। कुमारी अमान मंदिर में उन्होंने पूजा की। कन्याकुमारी के समुद्र के मध्य 400 मीटर अंदर स्थित शिला से उनका खास संबंध है। कहा जाता है कि उस शिला तक स्वामी जी तैर कर गए। कथा के मुताबिक उनसे नाव वाले ने शिला तक जाने के लिए शुल्क मांगा, वह राशि उनके पास नहीं थी। फिर क्या विवेकानंद ने सागर में छलांग लगा दी। सागर में शिला पर घंटों बैठ कर देश काल पर चिंतन किया। यहां स्वामी विवेकानंद का खास तरह का ट्रांसफारमेशन हुआ। ये बदलाव युगांतकारी था। ठीक उसी तरह जैसे गौतम बुद्ध को बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, विवेकानंद को कन्याकुमारी में शिला पर ज्ञान की प्राप्ति हुई।

देश आजाद होने के बाद विवेकानंद की याद में महान संत एकनाथ रनाडे ने यहां एक अनूठा मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। 1970 में ये रॉक मेमोरियल बनकर तैयार हुआ। अब कन्याकुमारी आने वाले सैलानी फेरी से वहां तक जाते हैं। रॉक मेमोरियल जाने और आने के लिए फेरी का 35 रुपये टिकट लगता है। मौसम खराब होने पर फेरी की सेवा बंद कर दी जाती है।
विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी में.

विवेकानंद केंद्र - एकनाथ रनाडे ने कन्याकुमारी में 100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में विवेकानंद केंद्र का भी निर्माण कराया है। यह केंद्र 1972 से संचालित है। विवेकानंद केंद्र रॉक मेमोरियल से एक किलोमीटर तो स्टेशन से आधा किलोमीटर दूर तिरुनवेली रोड पर स्थित है। विवेकानंद केंद्र सालों भर युवाओं को सामाजिक कार्यों की ओर प्रवृत करने के लिए कई शिविर लगाता है।

आवास का भी इंतजाम - केंद्र में सैलानियों के रहने की भी रियायती दरों पर शानदार इंतजाम हैं। यहां 200 से लेकर 1000 रुपये के बीच आवासीय कमरे उपलब्ध हैं। इनकी एडवांस बुकिंग भी होती है। आप 3 से 60 दिन पहले तक अग्रिम बुकिंग कर सकते हैं। इस साइट पर जाएं-  http://yatra.vivekanandakendra.org/
Phone: +91 - (0)4652 - 246250 email: rooms@vkendra.org
केंद्र के कैंपस में पुस्तकालय, विवेकानंद पर प्रदर्शनी, पुस्तक बिक्री केंद्र है। साथ ही केंद्र में आप एकनाथ रनाडे का आवास देख सकते हैं, जो उनके नहीं रहने पर अब संग्रहालय बन गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ स्वंयसेवक रहे रनाडे संघ के दूसरे सर संघ चालक गोलवलकर जी के काफी करीबी थे।

विवेकानंद केंद्र की कैंटीन में चाय की चुस्की। 
विवेकानंद केंद्र के हरे भरे परिसर में मंदिर और एक अच्छी कैंटीन भी है। यहां 40 रुपये में खाने की थाली (सीमित) मिलती है। विवेकानंद केंद्र न सिर्फ कन्याकुमारी बल्कि देश के कोने कोने में अपनी गतिविधियां संचालित करता है।

केंद्र की अरुणाचल प्रदेश में कई तरह की गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। 1974 से ही केंद्र असम और अरुणाचल में मोबाइल मेडिकल यूनिट संचालित कर रहा है। समाज सेवा के इच्छुक लोग इससे जुड़ सकते हैं। साथ ही आप विवेकानंद केंद्र में समय दान देकर वहां अपनी सेवाएं भी दे सकते हैं। यहां कम से कम एक महीने या इससे अधिक का समय कार्यकर्ता के तौर पर दिया जा सकता है।

विवेकानंद केंद्र की देश भर में 225 से ज्यादा शाखाएं कार्यरत हैं। केंद्र में समय समय पर आध्यात्मिक और योग शिक्षा शिविरों का आयोजन किया जाता है। केंद्र स्वाध्याय वर्ग और संस्कार वर्ग भी चलाता है। आप देश के किसी भी हिस्से में केंद्र की गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं। जिस समय हमलोग केंद्र में पहुंचे यहां एक ऐसा ही स्वाध्याय वर्ग चल रहा था। केंद्र में कई अवकाश प्राप्त बुजुर्ग भी मिले जो समय दान देकर यहां सेवा कार्य में लगे थे। 
http://www.vivekanandakendra.org/
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  -- विद्युत प्रकाश मौर्य  
(  ( SWAMI VIVEKANAND, KANYAKUMARI, ROCK MEMORIAL VIVEKANAND KENDRA ) 
विवेकानंद केंद्र के परिसर में एक नन्हा सैलानी। 
      

Monday, November 19, 2012

कन्याकुमारी का कुमारी अम्मन मंदिर

जहां हिंद महासागर और अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की धाराएं भारत की धरती को चूमती हैं ठीक वहीं पर स्थित है कुमार अमान मंदिर। ये देवी पार्वती का मंदिर है। मंदिर के पास समंदर की लहरों की आवाज ऐसी सुनाई देती है मानों स्वर्ग का संगीत हो। यहां आने वाले भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं। मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखा जाता है। कहा जाता है कि किसी जमाने में मंदिर में स्थापित देवी के आभूषण की आभा से समुद्री जहाज इसे लाइट हाउस समझने की भूल कर बैठते थे। इस क्रम में जहाज को किनारे करने के कोशिश में दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाते थे। 
क़रीब दस फुट ऊंचे परकोटे से घिरे वर्तमान मंदिर का निर्माण पांड्य राजाओं के काल में हुआ था। देवी कुमारी पांड्य राजाओं की अधिष्ठात्री देवी थीं। मंदिर को कुमारी अम्मन यानी कुमारी देवी का मंदिर कहा जाता है।
मंदिर की कथा - कहा जाता है कि भगवान शिव ने असुर वाणासुर को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। राजा भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया। दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी शक्ति देवी का अवतार थीं। कुमारी की इच्‍छा थी कि वह शिव से विवाह करे। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि वाणासुर का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इस बीच वाणासुर को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी से शादी का प्रस्ताव रखा। कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच युद्ध हुआ और वाणासुर को मृत्यु हुई। 

कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में बदल गया। इसलिए कन्याकुमारी समुद्र तट पर रंग बिरंगी रेत नजर आती है।

मंदिर में प्रवेश - मंदिर में पुरूषों को प्रवेश के लिए कमर से ऊपर नग्न हालत में जाना पड़ता है। महिलाओं के लिए ड्रेस कोड है। भारतीय परिधान होना आवश्यक है। मंदिर सुबह साढ़े चार बजे से रात पौने नौ बजे तक खुला रहता है। यहां समान्य दर्शन के अलावा स्पेशल दर्शन के लिए भी कूपन उपलब्ध हैं। भीड़भाड़ से बचने के लिेए आप कूपन दर्शन का सहारा ले सकते हैं। मंदिर के अंदर फोटोग्राफी निषेध है।
- माधवी रंजना  ( KUMARI AMMAN TEMPLE, KANYAKUMARI ) 

Saturday, November 17, 2012

फुल टाइट भोजन – जमकर खाओ

घूमते घूमते भूख लग जाए तो खाने का स्वाद और बढ़ जाता है। अगर आपको भर पेट खाने को मिले तो कहना ही क्या। दक्षिण भारत के अधिकतर शहरों में थाली में भरपेट खाने का चलन है। जब भी यहां आप थाली मिल्स की बात करते हैं तो इसका मतलब भरपेट होता है। हालांकि भरपेट का मतलब भरपेट चावल से है। कन्याकुमारी और रामेश्वर इसके अपवाद हैं। कन्याकुमारी में जब हमने दोपहर के खाने के लिए जगह ढूंढनी शुरू की तो जा पहुंचे राजस्थान भोजनालय। 

राजस्थान भोजनालय ने बताया 70 रुपये की थाली। हमने पूछा की थाली में क्या होगा। चपाती फुलका, चावल, दाल, रसम, सांभर, दो सब्जियां, दही, पापड़, अचार सलाद। सब कुछ। और क्या चाहिए। दही और अचार तो दक्षिण भारत की थाली में अनिवार्य तौर पर नजर आते ही हैं। इन सब कुछ के बाद वेटर ने बताया कि ये सब कुछ फुल टाइट है। ( हो सकता उसका आशय फुल डाइट से हो)  मतलब चाहे जितना खाओ। हमने आर्डर दे दिया। जब खाना आया तो चपाती देखकर दिल खुश हो गया। खालिश गेहूं की चपाती, घी चुपड़ी हुई। चाहे जितनी भी चपाती खाओ। दक्षिण भारत के शहरों में अक्सर चपाती नहीं मिलती। मिलती भी है तो कई बार चावल के आटे की बनी हुई। लेकिन कन्याकुमारी और रामेश्वर में उत्तर भारतीय, मारवाड़ी भोजनालय हैं जहां आप छक कर अपने यहां के खाने का मजा ले सकते हैं।
कन्याकुमारी में राजस्थान भोजनालय के अलावा लक्ष्मी भोजनालय में एक जैसा मीनू है।
वहीं रामेश्वरम में अग्रसेन भवन, गुजराती भोजनालय के अलावा कई उत्तर भारतीय भोजनालय हैं जहां आपको उत्तर भारतीय चपाती और पराठे मिल जाएंगे। रामेश्वरम के अग्रसेन भवन में हमें सुबह के नास्ते में तिकाने पराठे मिले। आलू की सब्जी के साथ। रसोइए भी थे अपने झारखंड प्रांत के सिमडेगा के रहने वाले। ठीक वैसे ही पराठे जैसी मेरी मां बचपन में हमें बना कर परोसती थीं। बचपन की याद आई। मजा आ गया।
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-----विद्युत प्रकाश ( KANYAKUMARI, TAMAILNADU, VEG FOOD, RAJSTHANI THALI  )

Thursday, November 15, 2012

कन्याकुमारी का गांधी मंडप

बापू के निधन के बाद उनकी अस्थियों को देश भर में प्रवाहित किया गया था। अलग अलग जगहों पर उनमें से कन्याकुमारी भी एक है। यहां कुमारी अम्मान मंदिर के बगल में बना है गांधी मंडप जो आधुनिक युग का मंदिर है। यहां आना एक और तीर्थ में आने जैसा है। यहां आप बापू का अस्थि कलश करीब से देख सकते हैं। मंदिर तीन मंजिला है। मंदिर के सबसे उपर वाले तल पर जाने के बाद समंदर और कन्याकुमारी शहर दोनों का नजारा अद्भुत दिखाई देता है। गुलाबी रंग का गांधी मंडप दूर से ही किसी मंदिर की तरह नजर आता है।
 यहां आप बापू को नमन के बाद मंदिर के चौबारे पर देर तक बैठ सकते हैं और अपने पूरे देश को याद कर सकते हैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक।

गांधी मंडप की एक और खास बात है। यहां से कन्याकुमारी की सुबह और कन्याकुमारी की शाम देखी जा सकती है। आपने कन्याकुमारी के सूर्योदय और सूर्यास्त के बारे में सुन रखा होगा। सुबह और शाम को बहुत बड़ी भीड़ जुटती है, इस नजारे को अपने यादों के झरोखे में और कैमरे में कैद करने के लिए। हमारी यात्रा के समय बारिश हो रही थी इसलिए हम इस नजारे को नहीं देख सके।

और ये रहे बापू के तीन बंदर। 
गांधी मंडप से लगा हुआ बच्चों का खूबसूरत पार्क भी है। इस पार्क में अलग अलग स्टाइल के बच्चों के लिए बैठने की कुर्सियां लगी हैं। गांधी मंडप की छत से समंदर और कन्याकुमारी शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। यहां से थोड़ी दूरी पर एक लाइट हाउस भी है जहां से समंदर को निहारा जा सकता है।

समंदर के तट के किनारे कई अच्छे होटल भी हैं जहां से आप सुबह और शाम उगते और डूबते हुए सूर्य को देख सकते हैं। साथ ही सागर के लहरों की अठखेलियों का भी आनंद उठा सकते हैं।

- vidyutp@gmail.com
( GANDHI IN KANYAKUMARI, TAMILNADU, TEMPLE ) 

Tuesday, November 13, 2012

कन्याकुमारी- चरणों को धोता सागर का सम्राट


 कन्याकुमारी शहर का नाम पड़ा है कन्याकुमारी के मंदिर के नाम पर। कन्याकुमारी देवी पार्वती का दूसरा स्वरूप है। देवी कन्याकुमारी की कहानी है। उन्होंने दुष्टों का संहार किया था। मंदिर के आसपास आपको कन्याकुमारी का रुप धरे बालिकाएं मिल जाएंगी जो दुकानदारों से मंदिर के लिए दान मांगती हैं। कन्याकुमारी मंदिर में भी दर्शन के लिए ड्रेस कोड है। कमर से उपर नग्न होकर ही पुरुष मंदिर में जा सकते हैं। यहां निःशुल्क सर्व दर्शन के अलावा आप 20 रुपये का दर्शन टोकन ले सकते हैं। पूरा मंदिर पत्थरों का बना है। मंदिर में कैमरा, मोबाइल का प्रयोग वर्जित है। मंदिर के आसपास मोतियों, शंख, कौड़ियों मशालों, ड्राई फ्रूट्स की दुकानें हैं। मंदिर का एक द्वार समंदर की तरफ है।

समंदर का अदभुत नजारा 

कन्याकुमारी के समंदर को देखते हुए कवि प्रदीप की पंक्तियां याद आती हैं- दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है....गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं की ये पंक्तियां यहां बार बार याद आती हैं। कन्याकुमारी मंदिर के बाहर तीन तरफ आप समंदर का नजारा देख सकते हैं।

बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिंद महासागर की धाराएं कन्याकुमारी में एक साथ मिलती हैं। कन्याकुमारी में सागर तट पर बैठकर घंटों अपलक समंदर को निहारना बड़ा ही मनोहारी अनुभव है। यहां के समंदर का पानी अपेक्षाकृत साफ भी नजर आता है। बिल्कुल सफेद लहरें उठती और गिरती हैं।

 कई बार समंदर से आने वाली लहरें आपको भिगो देती हैं। हालांकि यहां समंदर में नहाने के लिए कोवलम जैसा खूबसूरत तटीय किनारा नहीं है। लेकिन कन्याकुमारी के समंदर में भी स्नान करना एक न भूलने वाली अनुभूति है। काफी लोग यहां धार्मिक भावना से भी नहाते हैं। और नहाने के बाद पूजा पाठ।
कुमारी अमान मंदिर के समुद्र तट के सामने नजर आता है विवेकानंद रॉक मेमोरियल और संत तिरुवल्लुर की बड़ी सी प्रतिमा। मंदिर के बगल में ही कांची शंकरचार्य का मठ और उसके बगल में गांधी मंडप है। वहीं दूसरी तरफ एक पुराना चर्च भी है। ये सब कुछ घूमने के लिए आधा दिन का वक्त काफी है। लेकिन आपकी मर्जी है आपका जी नहीं भरे तो देर तक नजारा कर सकते हैं।
-   -  विद्युत प्रकाश मौर्य

((KANYAKUMARI, CAPE, TAMILNADU, SEA )  



Sunday, November 11, 2012

कन्याकुमारी - देश का आखिरी छोर

कन्याकुमारी तमिलनाडु प्रान्त के सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है। हालांकि कन्याकुमारी केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम से महज 90 किलोमीटर आगे है। इसलिए चेन्नई की तुलना में त्रिवेंद्रम से यहां पहुंचना आसान है। आमतौर पर त्रिवेंद्रम से रेलगाड़ियां दो घंटे में कन्याकुमारी पहुंच जाती हैं। कन्याकुमारी से 15 किलोमीटर पहले नगर कोविल जंक्शन है। यह कन्याकुमारी की तुलना में बड़ा रेलवे स्टेशन है। कई रेलगाडियां नगर कोविल तक ही जाती हैं। वैसे आप त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी बस से भी जा सकते हैं।

हमलोग दोपहर में त्रिवेंद्रम सेंट्रल रेलवे स्टेशन से एक एक्सप्रेस ट्रेन से स्लीपर क्लास डिब्बे में सवार हुए। जगह आसानी से मिल गई। हमारे साथ कुछ सैलानी हैं जो मुंबई से कन्याकुमारी जा रहे हैं। हलकी हल्की बारिश के बीच ट्रेन सरपट दौड़ रही है। थोड़ी देर मे हम केरल छोड़कर तमिलनाडु में प्रवेश कर गए। त्रिवेंद्रम से तकरीबन 35 किलोमीटर आगे कुजीथुराई में ट्रेन तमिलनाडु में प्रवेश कर जाती है। इसके बाद के 35 किलोमीटर के सफर के बाद नगरकोविल जंक्शन (NCJ ) आ जाता है। हमें सुखद अचरज हुआ कि ट्रेन ने हमें समय से कुछ पहले ही कन्याकुमारी पहुंचा दिया।  

देश का आखिरी रेलवे स्टेशन - कन्याकुमारी भारतीय रेलवे का दक्षिणी छोर पर आखिरी रेलवे स्टेशन है।  यहां से आगे रेल की पटरियां नहीं जाती हैं। इसलिए स्टेशन की पटरियों के अंत में हावड़ा की तरह स्टापर लगा हुआ है।इसका स्टेशन कोड CAPE है। यह विदेशियों द्वारा दिया गया नाम था।रेलवे स्टेशन पर छोटी सी कैंटीन है। दिन भर में गिनती की रेलगाड़ियां ही कन्याकुमारी पहुंचती हैं। इसलिए स्टेशन पर भीड़भाड़ बहुत कम नजर आती है। रेलवे स्टेशन किसी गांव या कस्बे के स्टेशन सा नजर आता है। स्टेशन के आसपास बाजार नहीं है। रेलवे द्वारा स्टेशन का ररखाव भी उम्दा नहीं है। रेलवे स्टेशन से कुछ फर्लांग पैदल चलकर जाने के बाद बाजार में पहुंचा जा सकता है।
रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आने के बाद दाहिनी तरफ आगे बढ़ने पर तकरीबन एक किलोमीटर चलने पर कन्याकुमारी का मुख्य मंदिर, कुमारी अमान मंदिर और रॉक मेमोरियल आदि आते हैं। वहीं स्टेशन से बायीं तरफ जाने पर आधे किलोमीटर आगे विवेकानंद केंद्र है। कन्याकुमारी तीन किलोमीटर के दायरे में बसा छोटा सा शहर है। बेहतर होगा आप कुमारी अम्मान टेंपल के आसपास किसी होटल में ठहरें।

कन्याकुमारी हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां अलग-अलग सागर अपने विभिन्न रंगों से मनोरम छटा बिखेरते हैं।

भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी हजारों सालों से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्व है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र तट पर फैले रंग बिरंगे रेत इसकी सुंदरता और बढ़ा देते हैं।

कहां ठहरें - कन्याकुमारी में हमने ठहरने के लिए नगर कोविल रोड पर केप रेसीडेंसी होटल में अग्रिम आरक्षण कराया था। ये होटल किसी रिजार्ट की तरह है। बड़े हवादार कमरे, हरा-भरा कैंपस, रहने का आनंददायक अनुभव। हालांकि आप विवेकानंद केंद्र में भी ठहर सकते हैं। पर जब हम गए उस समय फोन करने पर केंद्र के स्वागत कक्ष से जवाब आया कि उन तारीखों में केंद्र में जगह नहीं है। कई बार कन्याकुमारी में होटल भरे हुए मिलते हैं इसलिए अग्रिम आरक्षण करा लेना अच्छा रहता है।
विवेकानंद केंद्र से मुख्य दर्शनीय स्थलों तक जाने के लिए आटो रिक्शा लेना पड़ता है। कन्याकुमारी में आटो रिक्शा केरल की तुलना में महंगे हैं। वैसे आप पूरा कन्याकुमारी चाहें तो पैदल ही घूम सकते हैं। यहां आटोरिक्शा वाले केरल की तरह सीधे नहीं है। वे दिल्ली वालों की तरह किराये का मोलभाव करते हैं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य ( KANYAKUMARI, VIVEKANAND KENDRA) 

- होटल न्यू केप ( रेलवे स्टेशन के बिल्कुल सामने है )
- केप रेसीडेंसी, नगर कोविल रोड, ( विवेकानंद केंद्र से थोड़ा आगे
- गंगा लॉज ( मंदिर से पहले रियायती लॉज है )

Saturday, November 10, 2012

त्रिवेंद्रम का डोसा और बनाना चिप्स

त्रिवेंद्रम के जाला बाजार में बालाजी रेस्टोरेंट का डोसा और इडली का स्वाद नहीं भूलता। दरें भी काफी वाजिब हैं। लेकिन पद्मनाभ स्वामी मंदिर के पास वाले बस स्टैंड के उल्टी तरफ स्थित है अन्नपूर्णा भोजनालय। यहां का सुबह का नास्ता या फिर दोपहर का भोजन उम्दा है। केरल के ज्यादातर रेस्टोरेंट में आपको मिल्स ( थाली ) भोजन के लिए टोकन लेना पड़ता है। बाकी सब कुछ खाने के लिए टेबल पर बैठकर वेटर को आदेश कर सकते हैं।

 अन्नपूर्णा भोजनालय में केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले मिल्स का स्वाद उम्दा तो है ही होटल की सफाई व्यवस्था भी शानदार है।केरल के तमाम भोजनालयों में कैश काउंटर पर लेन देन का काम महिलाएं संभालती हैं। त्रिवेंद्रम में ऐसे कई भोजनालय भी हैं जो उत्तर भारतीय भोजन परोसते हैं। पद्मनाभ स्वामी मंदिर से रेलवे ओवरब्रिज तरफ चलने पर पंजाबी ढाबा भी मिलता है। केरल नारियल के तेल का प्रयोग प्राय हर व्यंजन में होता है।
केरल आयुर्वेदिक वाटर ( लाल पानी ) 
पूरे केरल में भोजनालयों में आपको गर्म पानी परोसा जाता है। ये गर्म पानी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां डाले होने के कारण लाल रंग का होता है। न सिर्फ होटल बल्कि तमाम कैंटीन में भी आपको यही केरला आयुर्वेदिक वाटर पीने को मिलेगा। यानी आपको मिनरल वाटर पीने की कोई जरूरत नहीं है। इस पानी को पीकर आपकी सेहत दुरुस्त रहती है। साथ ही पानी से होने वाली बीमारियों से भी आप सुरक्षित रहते हैं। 

बनाना चिप्स 
त्रिवेंद्रम के हर प्रमुख सड़क के कोने पर चाय और पान की दुकानें मिल जाती है। केले के चिप्स यहाँ की ख़ासियत हैं। पद्मानाभ स्वामी मंदिर के बाहर केले के स्वादिष्ट चिप्स की कई दुकाने हैं। ये दुकाने आपके सामने चिप्स बनाकर पैक कर देती हैं। हालांकि केले के चिप्स नारियल तेल और पाम आयल में तले होने के आधार पर महंगे और सस्ते होते हैं। यहां पके हुए केले का भी चिप्प तैयार किया जाता है। 

सलाह -  अगर आप शाकाहारी हैं तो केरल में यात्रा के दौरान खाने के लिए हमेशा पूरी तरह शाकाहारी रेस्टोरेंट का ही चयन करें। केरल में अक्सर मांसाहारी रेस्टोरेंट में चिकेन मटन के साथ बीफ भी मिलता है। यहां बैठकर खाते हुए आपको परेशानी हो सकती है।
- विद्युत प्रकाश 

Friday, November 9, 2012

कोवलम - बुला रहा है समंदर का संगीत

 कोवलम बीच को संसार कुछ सबसे सुंदर समुद्र तट में गिना जाता है। सदाबहार शहर त्रिवेंद्रम के बाहरी इलाके में है कोवलम। शहर के मुख्य इलाका कारपोरेशन बाग से महज 16 किलोमीटर दूर। अब त्रिवेंद्रम शहर का विस्तार कोवलम तक हो गया है। कारपोरेशन बाग से कोवलम के लिए आपको हमेशा बसें मिल जाएंगी। ( किराया 12 से 14 रुपये ) जैसे ही आप कोवलम में बस स्टाप से समुद्र तट की ओर पहुंचेंगे एक सुखद एहसास होगा। अनंत जलराशि वाले समुद्र की शांत लहरें। धीरे-धीरे आती और जाती हैं। कोवलम आप सुबह पहुंचे या फिर दोपहर या शाम आपको आनंद उतना ही आएगा। जैसे जैसे दिन गहराता है कोवलम के समुद्र तट पर भीड़ बढ़ती जाती है।

अरब सागर का कोवलम समुद्र तट अर्धचंद्राकार खूबसूरत वलय सा दिखाई देता है। एक कोने में ऊंचा लाइट हाउस दूसरी तरफ कुछ खूबसूरत होटल्स और ऊंचे नारियल के पेड़। समुद्र के किनारे बालुका राशि के बीच ही पहाड़ के अवशेष और पार्क समुद्र तट की खूबसूरत और बढ़ा देते हैं। आप लाइट हाउस पर चढ़कर भी समुद्र का नजारा कर सकते हैं। अगर आप कोवलम तट पर पहुंचे हैं तो समंदर में नहाने का मजा जरूर लें। आप घंटों नहा सकते हैं। यकीनन दिल नहीं भरेगा। समुद्र के किनारे नहाने के लिए लाइफ जैकेट्स, बोट्स और लहरों पर अठखेलियां करने के लिए सपोर्ट भी मौजूद है। समुद्र के तट पर सैकड़ो विदेशी सैलानी धूप सेंकते मिल जाएंगे। समुद्र मं 20 फीट तक जाने में कोई खतरा नहीं है। ज्यादा अंदर जाने पर डूबने का खतरा है लेकिन ज्यादा अंदर जाना खतरनाक है। तट पर केरल टूरिज्म के प्रशिक्षित जवान वर्दी में तैनात होते हैं डूबते सैलानियों की मदद करने के लिए।
नहाने के बाद भूख लग जाए तो समुद्र के किनारे ढेर सारे रेस्टोरेंट हैं जहां आप पेट पूजा कर सकते हैं। समुद्र के किनारे चौपाटी पर आप फ्रूट चाट और सी फूड का भी मजा ले सकते हैं। अगर आपको कोवलम बीच ज्यादा पसंद आ जाए और यहां कुछ दिन गुजारना चाहें तो कोवलम बीच पर समुद्र तट बने होटलों में कमरे बुक करा सकते हैं।
-    - - -विद्युत प्रकाश ( KERALA, SEA, SOUTH INDIA ) 
   

Thursday, November 8, 2012

शेषनाग की शैय्या पर विराजमान हैं पद्मनाभ स्वामी

पद्मनाभ स्वामी मंदिर दक्षिण भारत में भगवान विष्णु के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण अराधाना स्थल है। अब ये मंदिर दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में गिना जाता है। भगवान विष्णु के इस मंदिर के खजाने में एक लाख करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का पता चला है। हालांकि अभी पांच तहखानों की ही संपत्ति का आकलन हुआ है। 

केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम या तिरुवनंतपुरम के बिल्कुल केंद्र में स्थित है पद्मनाभ स्वामी मंदिर। मंदिर की संरचना एक किले की तरह है। मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को अभेद्द सुरक्षा कवच से होकर गुजरना पड़ता है। त्रिवेंद्रम रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित पद्मनाभ स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु की शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। माना जाता है कि केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम को ये नाम भगवान विष्णु के अनंत फन वाले नाग के कारण ही मिला है। आपको पद्मनाभ स्वामी के दर्शन के लिए मंदिर में प्रवेश के लिए खास ड्रेस कोड का पालन करना पड़ेगा। 

पद्मनाभ स्वामी म्यूजियम। 
मुंडु पहन कर ही प्रवेश - मंदिर में पुरुष केवल धोती ( मुंडु) पहन कर ही प्रवेश कर सकते हैं। मंदिर के बाहर बने काउंटर पर अपने सारे समान लॉकर में जमा कराने के साथ ही आप धोती या तो खरीद सकते हैं या फिर किराये पर ले सकते हैं। महिला श्रद्धालुओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। सलवार कुर्ता और स्कर्ट-टॉप, जींस आदि पहनकर प्रवेश वर्जित है।

इस मंदिर की देखभाल त्रावणकोर का राजपरिवार ही करता है। तिरुपति बालाजी मंदिर की तरह पद्मनाभ स्वामी मंदिर का प्रबंधन सरकारी ट्रस्ट नहीं देखता। मंदिर में मिले अकूत खजाने की देखभाल भी त्रावणकोर का राजपरिवार ही कर रहा है। मंदिर में चप्पे-चप्पे पर आपको सुरक्षागार्ड तैनात मिलेंगे लेकिन इन लोगों का ड्रेस कोड भी मुंडु (धोती) ही है।

पद्मनाभ स्वामी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है।  महाभारत में जिक्र आता है कि बलराम इस मंदिर में आए थे और यहां पूजा की थी। बताया जाता है मंदिर की स्थापना पांच हजार साल पहले कलियुग के पहले दिन हुई थी। लेकिन 1733 में त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा ने इसका पुनर्निमाण कराया था। मंदिर की वास्तुकला द्रविड़ और केरल शैली का मिला जुला उदाहरण है। मंदिर का स्वर्ण जड़ित गोपुरम सात मंजिल का, 35 मीटर ऊंचा है। कई एकड़ में फैले मंदिर परिसर के गलियारे में पत्थरों पर अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है। मंदिर के बाहर सरोवर है जिसे पद्मनाभ तीर्थ कहते हैं। 
रोशनी में आलोकित पद्मनाभ स्वामी का मंदिर। 

दर्शन - सुबह साढ़े तीन बजे से दोपहर 12 बजे तक। शाम 5 बजे से 7.20 बजे तक मंदिर की ऑफिशियल वेबसाइट- 
http://www.sreepadmanabhaswamytemple.org/ पर जाकर आनलाइन पूजा भी बुक कराई जा सकती है। प्रसाद आपके घर कूरियर से आ जाएगा। 

पद्मनाभ स्वामी की प्रार्थना - शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् । वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्
-vidyutp@gmail.com