Sunday, June 25, 2017

गिर गाय...स्नेह और प्रेम की भूखी

छोटी छोटी गइया छोटे छोटे ग्वाल छोटो सो मेरो नंद गोपाल...ये भजन तो आपने सुना ही होगा। गिर नस्ल की गाय को देखकर यही गीत गुनगुनाने की इच्छा होती है। गुजरात की गिर नस्ल की गाय कद काठी में छोटी होती है। पर यह प्रेम और स्नेह की भूखी होती है। आप इसके साथ खड़े होकर कितना भी प्यार और दुलार करें यह आपसे दूर नहीं जाएगी। ऐसा लगता है मानो हमारा इसका कोई जन्म जन्म का रिश्ता हो। बेंगलुरु के कनकपुरा रोड स्थित आर्ट ऑफ लिविंग की गौशाला में 400 से ज्यादा गिर नस्ल की गाय हैं। आश्रम के भोजनालय में इन्ही गायों के दूध से बने खीर, छाछ आदि श्रद्धालुओं को परोसे जाते हैं। इन गायों से मिलने वाला सारा दूध आश्रम में ही खर्च किया जाता है। दूध की बाहर बिक्री नहीं की जाती है।

बात गिर गाय की करें तो यह बहुतायत तौर पर गुजरात में पाई जाती है। कहा जाता है कि यह वही गाय है जिसे कान्हा जी चराया करते थे। कान्हा जी और बलराम इन गायों के साथ दिन भर जंगल में गुजार देते थे, पर गिर गाय का ममत्व देखकर लगता है कि दिन का इनके साथ पूरा जीवन गुजारा जा सकता है।

यह भी कहा जा रहा है कि भारत की गिर गाय सिर्फ पांच हजार ही बची हैं। आमतौर पर यह गुजरात राज्य के गिर वन क्षेत्र और महाराष्ट्र और राजस्थान के आसपास के जिलों में पायी जाती है। यह गाय अच्छी नस्ल की मानी जाती है। आमतौर पर इस गाय के शरीर का रंग सफेद, गहरे लाल या चॉकलेट भूरे रंग के धब्बे के साथ या कभी कभी चमकदार लाल रंग में पाया जाता है। 
गिर गाय अपनी बेहतरीन रोग प्रतिरोध क्षमता के लिए जानी जाती है। यह नियमित रूप से बछड़े देती है। पहली बार यह तीन साल की उम्र में बछड़ा देती है। गिर गायों में थन भी अच्छी तरह विकसित होते हैं। देखने में छोटी लगने वाली यह गाय प्रतिदिन 12 लीटर से अधिक दूध देती है। कुछ लोग दावा करते हैं कि 40 से 60 लीटर दूध देने वाली गाय है। पर यह सही नहीं है। गिर का मूल निवास दक्षिण काठिवाड़ के इलाके में है। पर गिर गाय हर मौसम के लिए अनुकूलित होती है। यह गर्म इलाकों में भी आसानी से रह सकती है। गिर गाय के बछड़े अच्छे बैल नहीं होते। यह मूल रुप से दूध देने वाली गाय है। एक गिर गाय की औसत कीमत 60 हजार रुपये से आरंभ होती है। यह कई बार लाखों में भी चली जाती है। 

गिर गाय के मूत्र में सोना - हाल ही में जूनागढ़ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (जेएयू) के वैज्ञानिकों ने अपने विश्लेषण के बाद पाया कि गाय के मूत्र में सोने के कण होते हैं। ये प्रयोग गिर की गायों पर किया गया था।  गुजरात के जूनागढ़ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने गिर की 400  गांवों के मूत्र के विश्लेषण के बाद पाया कि उसमें सोने के अंश हैं। गाय के एक लीटर मूत्र में तीन मिलीग्राम से लेकर दस मिली ग्राम तक सोने के कण पाए गए। ये सोना आयोनिक रूप में मिला, जोकि पानी में घुलनशील गोल्ड साल्ट है। वैज्ञानिकों का दावा है कि गाय के मूत्र में पाए जाने वाले सोने को निकाला जा सकता है और केमिकल प्रक्रिया से उसे ठोस बनाया जा सकता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( GIR COW, ART OF LIVING, KANAKPURA ROAD ) 




Friday, June 23, 2017

युगादि का दिन श्री श्री के नाम

बेंगलुरु के कनकपुरा रोड पर है आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी का आश्रम। इस बार के बेंगलुरु यात्रा में हमारी इच्छा श्री श्री के आश्रम में जाने की थी। तो संयोग ऐसा बना कि हिंदू नववर्ष यानी युगादि हमने यहां मनाया। बेंगलुरु पहुंचने पर हम उत्तरहाली के पास गुबलाला में रुके थे। यहां हमें पता चला की श्री श्री रविशंकर जी का आश्रम कनकपुरा रोड में निकट ही स्थित है। तो हमने अपने पत्रकार मित्र स्वंय प्रकाश से बात की। स्वयं प्रकाश भाई ने श्री श्री रविशंकर की हिंदी में जीवनी जीना सीखा दिया लिखी है। हिंदी में श्री श्री के जीवन परिचय पर ही बेहतरीन पुस्तक है। इसे आप देश भर के बुक स्टाल पर बिकते हुए देख सकते हैं। 


हमने स्वंय भाई को बताया कि हमलोग आर्ट ऑफ लिविंग का आश्रम देखना चाहते हैं। उन्होंने तुरंत हमारी बात सुजीत भाई से कराई। पर सुजीत भाई यूपी में कहीं दौरे पर थे। उन्होंने श्री श्री के आश्रम में मीडिया सेल में कार्यरत श्रीकुमार जी से बात कराई। उन्होंने तारीख और कितने लोग आएंगे आदि पूछा। तय कार्यक्रम के अनुसार 29 मार्च को युगादि के दिन हमलोग कनकपुरा रोड स्थित आर्ट ऑफ लिविंग के आश्रम के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। यह शहर के बाहर सुरम्य वातावरण में स्थित है। अंदर स्वागत कक्ष पर पहुंचने के बाद श्रीकुमार जी ने आश्रम की वैन सेवा से रसोई घर के पास आने को कहा। रसोई घर के प्रवेश द्वार पर युवा श्रीकुमार जी मुलाकात हुई।

हमलोग सीधे भोजन कक्ष की ओर चले। विशाल हाल में कुर्सी टेबल पर बड़ी संख्या में भक्तगण भोजन कर रहे थे। पर श्री कुमार जी हमारे पूरे परिवार को विशिष्ट अतिथि कक्ष में ले गए। दोनों कक्ष का खाना एक समान ही है। आज युगादि होने के कारण खाने मे मिष्ठान खीर आदि भी था। खाना अत्यंत सुस्वादु था।यह भी पता चला कि आश्रम को भोजन में जो दही और छाछ इस्तेमाल होता है वह आश्रम की ही गायों का होता है।

भोजन के बाद हमलोग आश्रम के अलग अलग हिस्सों में घूमने निकले। सबसे पहले संस्कृत विद्यालय और वहां स्थित मंदिर थे। यहां बालकों के लिए कई सालों का लंबा संस्कृत का पाठ्यक्रम चलाया जाता है। शिक्षा में पारंगत बटुक वेद की ऋचाओं का अत्यंत शुद्धता से उच्चारण करते हैं।

इसके बाद हमने आश्रम का सरोवर कृषि क्षेत्र देखा। आश्रम के परिसर में विशाल पंचकर्म केंद्र है। यहां पर शुल्क देकर पंचकर्म कराया जा सकता है। केंद्र का वातावरण अत्यंत मनोरम है। यह आपको केरल के वन प्रदेश में ले जाता है। नारियल के विशाल वृक्षों पर बंदरों खूब हैं। वे नारियल तोड़कर नीचे फेंक देते हैं। तो थोड़ा उनसे सावधान रहने की सलाह गी गई हमें। पर हमने बंदरों द्वारा फेकें गए नारियल को प्रसाद समझकर उठा लिया। इसके बाद हमलोग आश्रम की ओर से संचालित आयुर्वेदिक हास्पीटल और मेडिकल कालेज देखने गए।
कालेज से लौटने के बाद कुछ वक्त आश्रम के बिक्रय केंद्र में गुजारा। यहां श्री श्री के आश्रम के आयुर्वेदिक उत्पाद कपड़े आदि खरीदे जा सकते हैं। शाम गहराने लगी और हमलोग चल पड़े विशालाक्षी मंडपम की ओर। हर रोज शाम को इस विशाल मंडप में 6.30 से 8.00 बजे तक सत्संग होता है। आज युगादि है तो गुरुदेव लाइव थे दुनिया के किसी और देश से। आधे घंटे से ज्यादा ध्यान के बाद थोड़ा प्रवचन और काशी भाई ने भक्तों के लिए नववर्ष का संदेश दिया। यहां हमारी मुलाकात हिमांशु कालरा से हुई। वे आईआईटी दिल्ली से निकलने के बाद दस साल कारपोरेट जगत में रहे। अब श्री श्री के आश्रम में नदियों को पुनर्जीवित करने की परियोजना की अगुवाई कर रहे हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की 23 छोटी छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है आर्ट ऑफ लिविंग ने।

-   - विद्युत प्रकाश मौर्य   (ART OF LIVING, KANAKPURA ) 

Wednesday, June 21, 2017

हर साल गर्म होता जा रहा बेंगलुरु

31 मार्च 2017 का दिन है। अखबार में खबर है कि कई सालों में पहली पर मार्च का आखिरी दिन इतना गर्म रहा है। बेंगलुरु शहर का दिन का तापमान 33 डिग्री को पार कर गया है। कभी बाग बगीचों के शहर के नाम पर और सालों भर सुहाने मौसम के लिए प्रसिद्ध बेंगलुरु शहर का तापमान हर साल बढ़ रहा है। कहा जाता है कि देश के पांच प्रमुख महानगरों में रहने के लिहाज से बेंगलुरु सबसे बेहतर शहर है। यहां का मौसम सदाबहार रहता है। अपनी इससे पहले की दो बेंगलुरु यात्राओं में मैंने इसे महसूस भी किया था। पर इस बार निराशा हो रही है। शहर का ट्रैफिक और लगातार बढ़ रहे तापमान को देखकर जान निकल रही है। बेंगलुरु के मेरे एक स्थानीय मित्र कहते हैं कि हर साल औसतन शहर का तापमान एक डिग्री बढ़ रहा है। अगर यही हाल रहा तो कुछ सालों में यह शहर रहने के लिए बेहतरीन शहरों की सूची से बाहर हो जाएगा।

इतना ही नहीं अप्रैल 2017 में 16 तारीख को स्थानीय अखबारों में खबर है कि शहर का तापमान 36 डिग्री को पार कर गया है। डाक्टर सलाह दे रहे हैं कि दोपहर 11 बजे से तीन बजे तक हिट स्ट्रोक से बचने के लिए उपाय करके शहर में चलें। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।

अप्रैल की दोपहर में ही बेंगलुरु में इतनी गर्मी पड़ने लगी कि खुली छत पर जाकर आप धूप में अंडे फ्राई कर सकते हैं। कुछ लोगों ने तो ऐसा करके देखा भी। महज 20 मिनट अंडा फोड़ कर पैन में रख देने के बाद धूप में अंडा अपने आप आमलेट बन गया।

साल 2016 में भी अप्रैल में बेंगलुरु का तापमान अधिकतम 39.2 डिग्री सेल्सियस तक रिकार्ड किया गया था। यह एक बड़े खतरे का संकेत है।
यह सब कुछ क्यों हो रहा है...क्योंकि शहर कंक्रीट के जंगलों में तेजी से तब्दील होता जा रहा है। हरे भरे पेड़ खत्म होते जा रहे हैं। उनकी जगह लेती जा रही हैं बहुमंजिली इमारते हैं। शहर के तमाम इलाकों में तो 25 मंजिल से ज्यादा की इमारतें बन रही हैं। हमारे पड़ोस में जैन स्वदेश टावर है जिसमें 26 मंजिले हैं। इसके ऊपर हेलीपैड भी बना हुआ है। हमारे एक दोस्त बताते हैं कि उत्तरहाली और गुब्बलाला में तो हरियाली है। पास में एक हरित क्षेत्र सुरक्षित है अभी। शहर के बाकी हिस्सों का हाल और बुरा है। शहर के केआरपुरम (कृष्णराजपुरम) इलाके में तो हरे भरे पेड़ दिखाई भी नहीं देते। अब गर्मी में बढ़ते तापमान के कारण बेंगलुरु निवासियों के चेहरे पर चिंता की लकीरे दिखाई दे रही हैं। जल्द ही शहर से गार्डेन सिटी का तमगा छीन जाएगा और इसे कंक्रीट सिटी ही कहा जाएगा।

कुछ साल पहले लोग कहते थे कि बेंगलुरु में घर में एसी (एयरकंडिशनर)  लगाने की कोई जरूरत नहीं है। पर अब इस साल की गर्मी में एसी की बिक्री तेजी से हो रही है। लोगों का बिजली बिल भी बढ़ रहा है। अस्पताल में हिट स्ट्रोक के मरीज भी बढ़ रहे हैं। शहर के कई तालाबों का अस्तित्व खतरे में है। कब्बन पार्क और लालबाग जैसे और भी बगीचे शहर में तलाश करना मुश्किल है क्योंकि शहर चारों तरफ तेजी से विशाल अपार्टमेंट के साथ आगे बढ़ता जा रहा है।
- vidyutp@gmail.com
(BENGALURU, CLIMATE, HOTTER ) 






Monday, June 19, 2017

यादों में बसा हंपी, वापसी वाया होसपेटे

ऐतिहासिक शहर हंपी में भ्रमण की हमारी शुरुआत गणेश मंदिर से हुई थी , तो अंत भी गणेश मंदिर से हुआ। हमने जाते समय  कडलेकालु गणेश जी के दर्शन किए थे, तो अब वापसी में ससिवेकालु गणेश जी के दरबार में पहुंचे हैं। यह गणेश प्रतिमा 2.4 मीटर ऊंची है। अत्यंत कलात्मक गणेश प्रतिमा वर्गाकर मंडप में स्थापित है। गणेश जी को नमन।

इससे पहले हमलोग चंडिकेश्वर मंदिर में रुके थे। सोलहवीं सदी के बने चंडिकेश्वर मंदिर में भी हनुमान, गरुड, बालकृष्ण आदि की अदभुत मूर्तिकारी देखी जा सकती है। वैसे हंपी में कई मंदिर हैं अभी जो देखने से रह गए हैं।

लेकिन हंपी के बारे में समग्र तौर पर जानने के लिए आप कमलापुर में  स्थित हंपी संग्रहालय जरूर जाएं। संग्रहालय बड़ा ही व्यवस्थित है। अंदर पूरी तरह वातानुकूलित है। शीतल पेयजल और शौचालय आदि का सुंदर इंतजाम है।

संग्रहालय में हंपी का मानचित्र, हंपी के बारे में जानकारी के साथ ही अलग अलग गैलरी में हंपी और आसपास से मिली मूर्तियां देखी जा सकती हैं। यहां आप कम से कम एक घंटे का समय जरूर दें। कमलापुर में खाने पीने के विकल्प मौजूद हैं। यहां क्लार्क इन समेत कई अच्छे आवासीय होटल भी हैं। हंपी से इसकी दूरी कोई 5 किलोमीटर है।

दिन भर घूमने का बाद हमलोग वापस अपने लक्ष्मी हेरिटेज होम में आ गए हैं। आटो वाले स्वामी को धन्यवाद देकर उनसे विदा ली। अब अपने कमरे का एसी चलाकर हमलोग आराम करने लगे। पर भूख भी तो लगी थी, लेकिन किसी भी कमरे से निकल कर आसपास के रेस्टोरेंट में जाने की इच्छा नहीं थी। तो हमने तय किया कि गोपी रुफ टॉप रेस्टोरेंट से खाना यहीं लाकर खाया जाए।
मैंने जाकर गोपी में वेज बिरयानी का आर्डर दिया। उनकी कल की बिरयानी इतनी उम्दा थी कि कुछ और आजमाने की कोशिश नहीं की।
उन्होंने हमें थाली पैक करके ले जाने की सुविधा प्रदान कर दी। फिर हमने कमरे में बैठकर बिरयानी खाने का लुत्फ उठाया। फिर हम गोपी से चाय भी लेकर आए और काफी देर तक चुस्की ली। तो आप भी हंपी में हों तो गोपी में भोजन के लिए जरूर पहुंचे।

एक दिन पहले रात को अनादि की मसाला डोसा खाने की इच्छा हुई थी, गोपी में मसाला डोसा का विकल्प नहीं था, तो हमलोग पड़ोस के अर्चना रुफटॉप रेस्टोरेंट में खाने चले गए। पर खाने के बाद महसूस हुआ कि उनका खाना काफी घटिया था। भले ही वहां कई देशों के सैलानी स्वाद ले रहे थे, पर हमें उनका सब्जियां बासी, डोसा जला हुआ मिला। तो आप भी अर्चना में मत जाना कभी। हां गोपी की चाय, बिरयानी या कोई भी डिश हो सब ताजा और स्वाद उम्दा होता है। हर व्यंजन वे आर्डर पर बनाते हैं इसलिए थोड़ा वक्त लगता है।

हंपी में एटीएम नहीं  
हंपी के विरुपाक्ष मंदिर के पास के बाजार में एटीएम की कमी खटकती है। हालांकि कई जगह आप कार्ड से लेनदेन कर सकते हैं। साथ ही यहां दुकानदार कई देशों की मुद्रा का विनिमय कर देते हैं।

बेंगलुरु के लिए हमारी ट्रेन होसपेटे रेलवे स्टेशन से रात को 9.30 बजे है। हंपी बाजार से रात 8 बजे तक बसें होसपेटे बस स्टैंड के लिए चलती हैं। हमलोग 7.30 बजे वाली बस में सवार हो गए। बड़े भरे मन से महान ऐतिहासिक विरासत वाले शहर हंपी अलविदा कहा। यहां घूमने के लिए दो दिन तो कम ही हैं। कर्नाटक रोडवेज बस के ड्राइवर महोदय ने हमें होसपेटे बाजार में पहुंचने पर एक चौराहे पर उतर जाने की सलाह दी। यहां से रेलवे स्टेशन 400 मीटर की दूरी पर था। तो हम टहलते हुए स्टेशन पहुंच गए। 

होसपेटे रेलवे स्टेशन यहां के बस स्टैंड की तरह भव्य नहीं है। रात खाना हमलोगों ने स्टेशन की कैंटीन में ही खाया। 20 रुपये का मसाला डोसा और 25 रुपये की बिरयानी। साथ में नमकीन छाछ का पैकेट। भला आज के दौर में इतना सस्ता खाना और क्या हो सकता है। स्टेशन पर आरओ वाटर की मशीनें लग गई हैं। यहां आप 5 रुपये में एक लीटर पानी ले सकते हैं। प्लेटफार्म पर हमारी मुलाकात एक बार फिर जर्मनी की इवा और उनके दोस्त से होती है। उन्हें भी हंपी एक्सप्रेस पकड़नी है। वे मैसूर जा रहे हैं। पर वे हमारे साथ बस से नहीं आए। उन्होंने आटो बुक किया, और आटो वाले ने स्टेशन छोड़ने के 400 रुपये ले लिए। हमने उन्हें कहा अगर हमारे साथ बस से आते तो महज 36 रुपये ही लगते। 

हंपी एक्सप्रेस अपने नियत समय पर आई। हमने अपनी सीट पर जाकर जगह ले ली। मैं अगले कुछ घंटे जागता रहा। तोरांगालु जंक्शन के बाद बेल्लारी जंक्शन आया। बेल्लारी कर्नाटक का सीमांत जिला है। वही बेल्लारी जो खानों के लिए प्रसिद्ध है।
बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन यहां से आंध्र प्रदेश में प्रवेश कर जाती है। रास्ते में गुंतकल जंक्शन, अनंतपुर, धरमवरम जंक्शन, पेनुकोंडा, हिंदूपुर जैसे स्टेशन आते हैं। ये सभी आंध्र के अनंतपुर जिले में पड़ते हैं। हमारी ट्रेन दुबारा गौरी बिदानौर से कर्नाटक के चिकबालपुर जिले में प्रवेश करती है। इसके बाद डोडाबालपुर आता है जहां से बेंगलुरु की सीमा शुरू हो जाती है। हमारी ट्रेन नियत समय पर सुबह छह बजे क्रांतिवीर संगोल्ली रायणा (केएसआर बेंगलुरु) स्टेशन पर पहुंच जाती है।
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(HAMPI EXPRESS, RAIL, GOPI ROOFTOP RESTAURANT, HOSAPETE  ) 


     

Saturday, June 17, 2017

हंपी में हुआ करता था सुव्यवस्थित बाजार

सोलहवीं सदी में गुलजार नगर विजयनगर यानी हंपी में सुव्यस्थित मार्केटिंग कांप्लेक्स का निर्माण कराया गया था। इन बाजारों की रचना और उनकी वास्तुकला आज भी देखने वालों को चकित करती है। पूरे विजय नगर में एक नहीं कई बाजार हुआ करते थे। इन्हें सालू मंडप कहते थे। यह पत्थरों से निर्मित संरचना थी। पर ऐसे सुव्यवस्थित बाजार आज भी कम देखने को मिलते हैं। पहला प्रमुख बाजार विरुपाक्ष मंदिर के ठीक सामने था। मंदिर के दोनों तरफ हमें पत्थरों की बनी हुई बाजारों की संरचना दिखाई देती है। कहीं कहीं ये बाजार के भवन दो मंजिलों वाले भी हैं। इन बाजारों में एक लंबा गलियारा भी बना हुआ है। कदाचित यह बारिश के समय ग्राहकों को बचाव करता होगा। साथ ही धूप से भी बचाव होता होगा। दूसरा प्रमुख बाजार कृष्ण मंदिर के सामने कृष्णा बाजार है। तीसरा बाजार हजार राम मंदिर के सामने पान सुपारी बाजार है। तो चौथा बाजार विजय विट्ठल मंदिर के सामने का लंबा बाजार है। हर बाजार की अपनी अलग विशेषता हुआ करती थी।


हीरे जवाहरात बिकते थे विरुपाक्ष बाजार में- विरुपाक्ष मंदिर के सामने स्थित बाजार का नाम राजा बीधी ( राज वीथिका) हुआ करता था। यहां कुल 380 दुकानें बनाई गई थीं। इनका निर्माण 1422 ईश्वी में हुआ था। हर दुकान चार बड़े पत्थरों के स्तंभ और इनके उपर पत्थरों के छत से बनाई गई थी। इनमें बताया जाता है कि सोने चांदी और हीरे जवाहरात की तिजारत हुआ करती थी। यहां बड़े बड़े व्यापारी आया करते थे। विजय नगर सम्राज्य के व्यापारिक रिश्ते मालबार, गोवा और उत्तर भारत के राज्यों से मिलते हैं। वहीं कई विदेशी राज्यों व्यापारी और दूत भी विजयनगर आया करते थे। यहां पुर्तगाल और पश्चिम एशिया से मुस्लिम व्यापारियों के आने के प्रमाण मिलते हैं। यह बाजार हफ्ते में एक ही दिन खुलता था और यहां आम तौर पर हर चीज की खरीद बिक्री होती थी।

कृष्णा बाजार - कृष्णा मंदिर के ठीक सामने विशाल बाजार है। इस बाजार का नाम कृष्णा बाजार है। पत्थरों की स्थायी संरचना में कभी दुकानें लगती थीं। इस वीरान बाजार को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी जमाने में यहां कितनी रौनक रहा करती होगी। कहते हैं ना कि खंडहर बताता है कि इमारत कितनी बुलंद रही होगी। कृष्णा बाजार के ठीक बगल में एक विशाल सरोवर (पुष्करिणी) का भी निर्माण कराया गया था। नवंबर 2015 में भारी बारिश के कारण कृष्णा बाजार के मार्केटिंग कांप्लेक्स के कई हिस्से ध्वस्त हो गए।

पान सुपारी बाजार - कृष्णा बाजार की तरह का ही बाजार हमें देखने को हजार राम मंदिर के बाहर, जिसका नाम पान सुपारी बाजार था। जैसा कि नाम से जाहिर होता है कि यहां पान सुपारी जरूरत बिकता होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि यह हरी भरी सब्जियों का भी बाजार रहा होगा। यह बाजार शाही अहाता के काफी करीब है। इसलिए यहां शाही जरूरतों के अनुरुप चीजें बिकती होंगी।

घोड़ों के लिए मशहूर था विट्ठल बाजार -  विजय विट्ठल मंदिर के बाहर का बना मार्केटिंग कांप्लेक्स सबसे विशाल है। इस बाजार की लंबाई 945 मीटर है। यानी तकरीबन एक किलोमीटर। वहीं बाजार की चौड़ाई  40 मीटर है। हालांकि इस सुंदर बाजार के अब सिर्फ अवशेष देखे जा सकते हैं। पर विजय नगर सम्राज्य के समय यह विट्ठल बाजार घोड़ों की खरीद बिक्री के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध था। कई दूसरे प्रांतों के व्यापारी यहां अपने घोड़े लेकर बिक्री के लिए आते थे।

सालों अवैध कब्जे का शिकार रहा बाजार - हमारी बातचीत गोपी में रसोइया का काम करने वाली महिला से हुई। उन्होंने बताया कि पांच साल पहले तक हंपी के मंदिर के पास जो ऐतिहासिक बाजार बने हैं उन पर अवैध कब्जा था। इसमें दुकानें लगी थीं और दुकानदारों का पूरा परिवार भी इसी में रहता था। कई लोगों ने तो पीछे अस्थायी शौचालय आदि भी बनवा लिए थे। यहां तक की विरुपाक्ष मंदिर के दक्षिणी हिस्से में स्थित छोटे बाजार के ऐतिहासिक भवन और कुछ मंदिरों के प्रांगण में भी लोगों ने कब्जा करके आवास बना लिए थे। पर एक रात बुल्डोजर चलाकर इन सभी कब्जों को हटा दिया गया। यहां सालों से कब्जा जमाए लोगों को हंपी से पांच किलोमीटर दूर पुनर्वासित किया गया। उन्हें घर बनाने के लिए धनराशि भी मुहैय्या कराई गई।



पर हंपी में साल 2016 में भी दर्जनों रिजार्ट और रेस्टोरेंट अवैध तरीके से इमारतें बनाकर संचालित किए जा रहे थे। जिनको हटाने का आदेश कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ बेंच ने दिया था।
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( HAMPI SAALU MANTAPA, MARKET COMPLEX ) 



Thursday, June 15, 2017

अनूठी जल प्रणाली से लैस हंपी का शाही अहाता

हंपी में हम अब महानवमी टिब्बा पहुंच गए हैं। यह वास्तव में विशाल राज प्रांगण है। इसके प्लेटफार्म की ऊंचाई 8 मीटर है। राजकीय प्रयोग में लाया जाना वाले ग्रेनाइट पत्थरों से बना यह विशाल ढांचा है। इसमें जाने के लिए पूर्व –पश्चिम और दक्षिण दिशा से से सीढ़ियां बनी हैं। यहां पर नवमी और विजयादशमी के दिन बड़े राजकीय आयोजन हुआ करते थे। इसके अंदर एक सुंरग भी है। इससे लगा हुआ एक शाही अहाता भी है। इसका क्षेत्रफल 59,000 वर्ग मीटर है। ऊंची और दोहरी दीवारों के अंदर इस अहाते में कुल 43 इमारतें हुआ करती थीं। अहाते में जाने के लिए तीन प्रवेश द्वार बने हैं। इसी अहाते में राजा का निवास भी हुआ करता था। इस अहाते में पानी पहुंचाने के लिए सुंदर जल प्रणाली निर्मित की गई थी। इसमें कुल 23 छोटे बड़े हौज थे जिन्हें भरा जाता था।था। संभवतः इसमें तुंगभद्रा नदी से जल लाने का इंतजाम किया गया था। अहाते में एक कुआं भी है। शाही अहाता विजयनगर साम्राज्य की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। 

तो यहां नहाती थी रानी - आगे चलने पर हमें रानी स्नान कुंड दिखाई देता है, इसे क्वीन्स बाथ के नाम से जाना जाता है। जो 15 वर्ग मीटर में बना हुआ है। रानी के स्नान कुंड के बाहर विशाल उद्यान बना हुआ  है। कुंड के चारों ओर सुसज्जित बरामदे और बालकोनी बनी हुई है। इन बरामदों की नक्काशियां भी शानदार हैं। हालांकि हमें देश के अलग अलग हिस्सों में शाही बावड़ियां देखने को मिलती हैं। क्वीन्स बाथ कुछ उसी तरह का है, पर यह खास तौर पर रानी के लिए बनाया गया था। रानियां यहां रथ में सवार होकर जल क्रीड़ा करने के लिए आती थीं।

हंपी का अनूठा हजार राम मंदिर

देश भर में रामचंद्र जी के मंदिर बहुत कम ही हैं। पर हंपी का हजार राम मंदिर द्रविड़ शैली में 15वीं सदी का बना हुआ भव्य मंदिर है। जनाना प्रांगण से आगे बढ़ने के बाद हम रुकते हैं हजार राम मंदिर के सामने। इस मंदिर के उल्टी तरफ पान सुपारी बाजार हुआ करता था।

हजार राम का मंदिर विजयनगर के राजसी अंचल में स्थित है। इसे राज परिवार के अनुष्ठान के लिहाज से बनवाया गया था। मंदिर की योजना में गर्भ गृह अंतराल, मुख मंडप और उत्तर और दक्षिण में अर्ध मंडप बनाए गए हैं। महामंडप का रुख पूरब दिशा की ओर है। मुख्य मंदिर के चारों ओर तीन श्रेणियों में रामायण की कथा को मूर्तियों में उकेरा गया है। इसमें लव कुश के चित्र भी बनाए गए हैं। मंदिर में सुंदर काले पत्थरों के पालिश किए हुए स्तंभ हैं जिनकी सुंदरता देखते ही बनती है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर की सुंदरता में खो जाते हैं। यह एक ऐसा मंदिर है जिसका सौंदर्य निहारने के लिए आपके पास एक घंटे से ज्यादा का वक्त होना चाहिए।

विशाल और अदभुत है हंपी का विट्टलस्वामी मंदिर
अब हम लंबी यात्रा पर चल पड़े हैं। हम विट्टलस्वामी मंदिर की ओर जा रहे हैं। यह हंपी के बाकी स्मारकों से थोड़ी दूर पूर्वोत्तर में पहाड़ी पर स्थित है।रास्ते में सड़क पर एक चेकपोस्ट आता है, यह 16वीं सदी का ही बना हुआ है। ऐसे कई चेक पोस्ट विजय नगर सम्राज्य में बने हुए थे। 

विट्ठल स्वामी का यह मंदिर अपनी अदभुत वास्तुकला, गोपुरम, पत्थर के विशाल रथ और सारेगामा स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। विट्ठल मंदिर से एक किलोमीटर पहले आटो स्टैंड और छोटा सा बाजार है, जहां आपको खाने पीने की कुछ चीजें मिल सकती है।

नारी सशक्तिकरण का उदाहरण बैटरी कार – मंदिर से एक किलोमीटर पहले स्वामी आटो रोक कर बताते हैं मंदिर तक आटो रिक्शा या कोई भी पेट्रोल डीजल से चलने वाला वाहन नहीं जाता है। कर्नाटक टूरिज्म ने विट्ठल मंदिर जाने के लिए बैटरी कार का इंतजाम किया हुआ है। कई बैटरी कार लगातार चलती रहती हैं। 

इन सभी बैटरी कारों को महिलाएं चलाती हैं। टिकट बेचने का काम भी महिलाओं के ही हवाले है। यानी नारी सशक्तिकरण का सुंदर उदाहरण। हमलोग भी टिकट लेकर बैटरी कार में बैठ गए। जाने और आने का टिकट 20 रुपये का है। बच्चों का टिकट नहीं लगता। हंप में बैटरी कार की शुरुआत दिसंबर 2010 में हुई। कुल 20 बैटरी कारों का संचालन सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक होता है। हर बैटरी कार की लागात 7 लाख आई है। इसमें 14 लोग एक साथ बैठकर सफर करते हैं। 

विट्ठल मंदिर तक जाने के लिए कच्चा इको फ्रेंडली रास्ता है। मंदिर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। रास्ते में पुराने बाजार की संरचना और कुछ हौज दिखाई देते हैं। मंदिर के बाहर एक विशाल रथ दिखाई देता है।

विट्ठल मंदिर का निर्माण देवराय द्वितीय के काल में 1422 से 1446 के मध्य हुआ। राजा कृष्णदेव राय द्वारा 1513 के आसपास यहां 100 खंबो वाले मंडप का निर्माण कराया गया। इन स्तंभों की खास बात है कि इसको ताड़ित करने  पर संगीत की स्वर लहरियां सुनाई देती हैं। इन स्तंभों से तब की वैज्ञानिक तकनीक का पता चलता है जब पत्थरों से निकलते संगीत की रचना की गई होगी। कई लोग इसलिए इन स्तंभों को सारेगामा स्तंभ के नाम से भी जानते हैं।
हंपी के विट्ठल मंदिर का विशाल रथ। 

यहां विजयनगर की मंदिर निर्माण शैली का उत्कर्ष दिखाई देता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर आपको गाइड मिलते हैं जो मंदिर कलात्मकता बारे में बताने की बात करते हैं। मंदिर परिसर में मुख्य गोपुरम से प्रवेश करने के बाद हमें कल्याण मंडप और उत्सव मंडप दिखाई देता है। मंदिर में प्रवेश के लिए कुल तीन गोपुरम बने हैं। मंदिर परिसर में पत्थरों का बना एक विशाल रथ भी आपको चकित करता है। किसी समय में इस रथ के पहियों को घुमाया भी जा सकता था, पर अब इसे संरक्षित रखने के लिए सीमेंट से जाम कर दिया गया है। मंदिर के पास विशाल पुष्करिणी (तालाब) भी निर्मित किया गया है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  

(HAMPI, MAHNAVMI TIBBA, QUEENS BATH, HAJARRAM MANDIR, VITHHAL SWAMI TEMPLE) 

Tuesday, June 13, 2017

हंपी का अनूठा भूमिगत शिव मंदिर

हंपी के तमाम मंदिरों के बीच शिव का प्रसन्न विरुपाक्ष या भूमिगत शिव मंदिर अनूठा है। इसे पातालेश्वर मंदिर भी कहते है। सिर्फ हंपी में ही क्यों यह देश के तमाम शिव मंदिरों में अनूठा स्थान रखने वाला देवालय है। यह मंदिर जमीन के स्तर से नीच एक तालाब में बनाया गया है। मंदिर में स्थित शिवलिंगम हमेशा पानी में डूबा रहता है। इसे लोग आम बोलचाल की भाषा में अंडरग्राउंड शिव मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर की छत का स्तर जमीन के समानंतर  है। पूर्वी द्वार के पास से मंदिर में नीचे प्रवेश के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। मंदिर के वास्तु के आधार पर प्रतीत होता है कि इसका निर्माण बुक्का राय के शासन काल में हुआ होगा। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंगम स्थापित है। बाहर इसको देखती हुई नंदी की भी प्रतिमा है। मंदिर के चारो तरफ नहर बनाया गया है जिससे जल प्रवाहित होता रहता है। मंदिर के दो कोने पर छोटे छोटे मंदिरों का भी निर्माण कराया गया है। कई बार इस मंदिर में पानी में सांप भी दिखाई दे जाते हैं।

मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी की शैली में हुआ है। इसके गर्भगृह, अंतराल, अर्धमंडप और महामंडप जुड़े हुए हैं। महामंडप के उत्तर और दक्षिण में स्तंभ वाला बरामदा बना हुआ है। मंदिर से जुड़े एक शिलालेख के मुताबिक राजा कृष्णदेव राय ने अपने पिता नरसा नायक और माता नगाजी देवी की याद में पुण्य अर्जित करने के लिए इस मंदिर को दान भी किया था।

हंपी भ्रमण करने आने वाले सैलानी बड़े ही कौतूहल से इस मंदिर को देखते हैं। यह मंदिर कमलापुर से हंपी जा रहे सड़क के बगल में स्थित है। मंदिर के आसपास हरियाली नजर आती है। हालांकि इस मंदिर में आजकल नियमित पूजा नहीं होती। पर यह हंपी के दर्जनों मंदिरों में अलग और अनूठा मंदिर है।

बडविलिंग मंदिर ( शिवलिंगम )
अब हंपी के एक और अनूठे शिवलिंगम की चर्चा। बडविलिंग मंदिर में अनूठा शिवलिंगम देखने को मिलता है। यह तीन मीटर का एकाश्म शिवलिंगम  है। यह अकेले बड़े शिलाखंड पर उत्कीर्ण किया गया है। सपाट और उत्तल शिखर वाला यह शिवलिंग ऊंची वर्गाकार चौकी पर बना है। इसमें अभिषेक के जल निकासी के लिए नाला बनाया गया है। निर्माण कुछ इस तरह का है कि शिवलिंगम की पीठ हमेशा पानी में डूबी रहती है। कहा जाता है कि इस लिंगम का निर्माण के निर्धन महिला (बडवि ) द्वारा कराया गया था। बडवलिंग मंदिर हंपी बाजार से कमलापुर जाने के मार्ग में थोड़ी दूर चलने पर दाहिनी तरफ थोड़ा अंदर जाकर बना है।  

बडविलिंगम मंदिर के बगल में ही उग्र लक्ष्मी नरसिम्हा का मंदिर है। यहां 6.7 मीटर ऊंची भव्य लक्ष्मी नरसिम्हा की मूर्ति है। इसके पीछे एक मकर तोरण भी बना है। हंपी के सभी प्रतिमाओं में यह आकार में सबसे बड़ी है। नरसिम्हा भगवान विष्णु के दस अवतारों में चौथे अवतार हैं। इस प्रतिमा के पास 1528 का राजा कृष्णदेव राय का एक शिलालेख भी मिलता है। हालांकि यह लक्ष्मी नरसिम्हा की मूर्ति थोड़ी खंडित हो गई है। मूर्ति के हाथ और उनकी बायीं गोद में ललितासन में बैठी लक्ष्मी की प्रतिमा भग्न हो गई है, फिर भी इसकी भव्यता में कोई कमी नजर नहीं आती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(UNDERGROUND SHIVA TEMPLE, HAMPI )